अरुणा आसफ अली
अरुणा आसफ अली

अरुणा आसफ अली : 1942 की रानी झाँसी

महात्मा गांधी ने उन्हें पत्र लिखकर आत्म-समर्पण करने और आत्म-समर्पण के एवज में मिलने वाली धनराशि को हरिजन अभियान के लिए उपयोग करने को कहा, किन्तु अरुणा आसफ अली ने आत्म-समर्पण नहीं किया। वर्ष 1946 में जब उन्हें गिरफ्तार करने का वारंट रद्द किया गया तब जाकर अरुणा आसफ अली ने आत्मसमर्पण किया।

 

अरुणा आसफ अली
अरुणा आसफ अली

9 अगस्त 1942 को बम्बई के गोवालिया टैंक मैदान ( वर्तमान में अगस्त क्रान्ति मैदान ) में तिरंगा फहराकर ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन की बिगुल बजाने वाली और देश के युवाओं में एक नया जोश भरने वाली अरुणा आसफ अली (16.7.1909- 29.7.1996) का जन्म बंगाली परिवार में हरियाणा ( तत्कालीन पंजाब ) के कालका नामक स्थान में हुआ था। अरुणा आसफ अली के बचपन का नाम ‘अरुणा गांगुली’ था। इनके पिता बंगाल के एक प्रतिष्ठित परिवार से थे। उनका नाम था डॉ. उपेन्द्रनाथ गांगुली। वे बंगाल से आकर तत्कालीन संयुक्त प्रांत में बस गए थे। अरुणा के सिर से पिता का साया बचपन में ही उठ गया था किन्तु उनकी माँ अम्बालिका देवी ने उनकी पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था में किसी तरह की कमी नहीं आने दी। अरुणा ने पहले लाहौर के सैक्रेड हार्ट स्कूल और उसके बाद नैनीताल के ऑल सेन्ट्स कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की।

नैनीताल में उनके पिता का होटल का व्यवसाय था। वहीं पर जवाहरलाल नेहरू से भी उनका परिचय हुआ था, क्योंकि गर्मियों में पं. नेहरू का परिवार आमतौर पर नैनीताल चला जाता था। आरंभ से ही अरुणा बहुत ही कुशाग्र बुद्धि की थीं और बाल्यकाल से ही कक्षा में सर्वोच्च स्थान पाती थीं। बचपन में ही उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता और चतुरता की धाक जमा दी थी। लाहौर और नैनीताल से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे बंगाल आ गईं और कोलकाता के ‘गोखले मेमोरियल कॉलेज’ में अध्यापन करने लगीं।

इसी बीच इलाहाबाद में उनकी बहन पूर्णिमा बनर्जी के घर पर अरुणा की मुलाकात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आसफ अली से हुई। ये वही आसफ अली हैं जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले भगत सिंह का हमेशा समर्थन किया था। असेंबली में बम फोड़ने के बाद गिरफ्तार हुए भगत सिंह का केस भी आसफ अली ने ही लड़ा था।

आसफ अली से उनकी यह मुलाकात धीरे-धीरे घनिष्ठता में बदल गई। स्वतंत्र और साहसी विचारों वाली अरुणा ने परिजनों के विरोध के बावजूद आसफ अली से 1928 में विवाह कर लिया। उस समय अरुणा की उम्र 19 वर्ष थी और आसफ अली उनसे लगभग 20 साल बड़े थे। विवाह के बाद अरुणा का नाम बदलकर कुलसुम जमानी हो गया था लेकिन समाज में उनकी पहचान अरुणा आसफ अली के रूप में ही रही।

आसफ अली से विवाह करने के पश्चात अरुणा स्वाधीनता संग्राम से जुड़ गईं। वे अपने पति के साथ दिल्ली आ गईं और दोनों पति-पत्नी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने लगे।

नमक सत्याग्रह के दौरान होने वाली सार्वजनिक सभाओं में भाग लेने के कारण अरुणा आसफ अली को 1930 में गिरफ्तार कर लिया गया। वे लगभग एक वर्ष तक जेल में रहीं। वर्ष 1931 में गाँधी-इर्विन समझौते के अंतर्गत लगभग सभी राजनैतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया था, किन्तु, अरुणा आसफ अली को मुक्त नहीं किया गया। अरुणा आसफ अली के साथ होने वाले इस भेद-भाव से आहत होकर उनकी अन्य महिला साथियों ने भी जेल से बाहर निकलने से मना कर दिया। इसके बाद महात्मा गाँधी के दखल देने के बाद ही अरुणा आसफ अली को जेल से रिहा किया गया। वर्ष 1932 में तिहाड़ जेल में बंद होने के दौरान उन्होंने जेल प्रशासन द्वारा राजनैतिक कैदियों के साथ बुरा बर्ताव करने के विरोध में भूख हड़ताल कर दी। उनके प्रयास से तिहाड़ जेल के कैदियों की दशा में तो सुधार हुआ लेकिन अरुणा आसफ अली को अंबाला की जेल में एकांत कारावास की सजा दे दी गई।

वर्ष 1932 में महात्मा गाँधी के आह्वान पर उन्होंने सत्याग्रह में सक्रिय भाग लिया, जिस कारण इन्हें फिर से छह माह के लिए जेल जाना पड़ा।

वर्ष 1941 में अंग्रेजों ने भारत को द्वितीय विश्वयुद्ध में ढकेल दिया, जिसके विरोध में महात्मा गाँधी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू कर दिया।  अरुणा आसफ अली ने भी इसमें भाग लिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक वर्ष कारावास की सजा मिली।

ऊपर उल्लेख किया जा चुका है कि 9 अगस्त, 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बम्बई अधिवेशन में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आन्दोलन शुरू करने का प्रस्ताव पारित हुआ। इस अधिवेशन में अरुणा आसफ अली भी अपने पति के साथ मौजूद थीं। अंग्रेज सरकार ने अपने विरुद्ध हुए इस फैसले को असफल करने के लिए कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं और कार्यसमिति के सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया। ऐसी परिस्थिति में अन्तिम सत्र की अध्यक्षता अरुणा आसफ अली ने किया और उन्होंने 9 अगस्त को बम्बई के गोवालिया टैंक मैदान में भारत का तिरंगा फहराकर भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कर दी।

झंडा फहराए जाने के बाद पुलिस ने भीड़ पर आँसू गैस के गोले छोड़े, लाठी चार्ज किया और गोलियाँ भी चलाईं। इस दमन ने अरुणा आसफ अली के मन में आजादी की लौ को और अधिक तेज कर दिया। वे आम जनमानस में क्रान्ति का संदेश देकर भूमिगत हो गईं और वेश एवं स्थान बदल-बदलकर आन्दोलन में हिस्सा लेने लगीं।

अरुणा आसफ अली द्वारा गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराने का व्यापक असर सारे देश पर पड़ा और आजादी के आन्दोलन में हिस्सा लेने वाले युवाओं में ऊर्जा का संचार हो गया।  निश्चित रूप से अरुणा आसफ अली भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका थीं। उस समय कोई स्थिर नेतृत्व न होने के बावजूद देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ कड़े विरोध प्रदर्शन हुए जो यह स्पष्ट कर रहे थे कि अब भारतवासियों को गुलाम बना कर नहीं रखा जा सकता। गोवालिय़ा टैंक मैदान को अब अगस्त क्रान्ति मैदान कहा जाता है।

इसी दौरान अरुणा आसफ अली को भी गिरफ्तार करने का आदेश जारी कर दिया गया था। गिरफ्तारी से बचने के लिए अरुणा भूमिगत हो गईं थीं। दरअसल उनके ऊपर जयप्रकाश नारायण, डॉ॰ राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन जैसे समाजवादियों के विचारों का ज्यादा प्रभाव था। इसी कारण ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में अरुणा जी ने अंग्रेज़ों की जेल में बन्द होने के बदले भूमिगत रहकर अपने अन्य साथियों के साथ आन्दोलन का नेतृत्व करना उचित समझा। गाँधी जी सहित अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के तुरन्त बाद बम्बई में विरोध सभा आयोजित करके विदेशी सरकार को खुली चुनौती देने वाली वे असाधारण महिला थीं। बाद में उन्होंने गुप्त रूप से उन कांग्रेस जनों का पथ-प्रदर्शन किया, जो जेल से बाहर थे। बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली आदि में घूम-घूमकर, मगर पुलिस की पकड़ से बचते हुए उन्होंने आजादी के आन्दोलन में शामिल लोगों में नव जागृति लाने का प्रयत्न किया। 1942 से 1946 तक वे देश भर में लगातार सक्रिय रहीं किन्तु ब्रिटिश सरकार का गुप्तचर विभाग लाख कोशिश करने के बावजूद उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाया। अंत में अंग्रेजों ने उनकी सारी संपत्ति जब्त करके उसे नीलाम कर दिया। इस बीच वे राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर ‘इंकलाब’ नामक मासिक समाचार पत्र का संपादन भी करती रहीं। अंग्रेज सरकार ने अरुणा आसफ अली की सूचना देने पर पाँच हजार रूपए का इनाम रखा था। इसी दौरान उनका स्वास्थ्य भी बहुत खराब हो गया था।

9 अगस्त 1942 से 26 जनवरी 1946 तक अरुणा आसफ अली को गिरफ्तार करने का वारन्ट उनका पीछा करता रहा किन्तु वे पकड़ में नहीं आईं।

महात्मा गांधी ने उन्हें पत्र लिखकर आत्म-समर्पण करने और आत्म-समर्पण के एवज में मिलने वाली धनराशि को हरिजन अभियान के लिए उपयोग करने को कहा, किन्तु अरुणा आसफ अली ने आत्म-समर्पण नहीं किया। वर्ष 1946 में जब उन्हें गिरफ्तार करने का वारंट रद्द किया गया तब जाकर अरुणा आसफ अली ने आत्मसमर्पण किया।

आत्म-समर्पण करने के बाद पूरे देश में उनका भव्य स्वागत हुआ। कलकत्ता और दिल्ली में अरुणा आसफ अली ने अपने स्वागत में आयोजित सभाओं में ऐतिहासिक भाषण दिए। दिल्ली की सभाओं में उन्होंने कहा, “भारत की स्वतंत्रता के संबंध में ब्रिटेन से कोई समझौता नहीं को सकता। भारत अपनी स्वतंत्रता ब्रिटेन से छीनकर ग्रहण करेगा। समझौते के दिन बीत गए। हम तो स्वतंत्रता के लिए युद्ध क्षेत्र में ब्रिटेन से मोर्चा लेंगे। शत्रु के पराजित हो जाने के बाद ही समझौता हो सकता है। हिन्दुओं और मुस्लिमों की संयुक्त माँग के समक्ष ब्रिटिश साम्राज्यवाद को झुकना होगा। हम भारतीय स्वतंत्रता की भीख माँगने नहीं जाएंगे।“

15 अगस्त 1947 को आजादी मिली। अरुणा आसफ अली दिल्ली प्रदेश काँग्रेस कमेटी की अध्यक्ष बनीं. वर्ष 1947-48 में उन्होंने दिल्ली में शरणार्थियों की समस्या को हल करने के लिए अपना जी-जान लगा दिया था।

आर्थिक नीतियों के प्रश्न पर भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू से सैद्धांतिक मतभेद होने के कारण वे कांग्रेस से अलग हो गईं और वर्ष 1948 में आचार्य नरेन्द्र देव की सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं।

दो साल बाद सन् 1950 ई. में उन्होंने अलग से ‘लेफ्ट स्पेशलिस्ट पार्टी’ बनाई और वे ‘मज़दूर-आंदोलन’ में जी-जान से जुट गईं। फिर वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं। 1953 में पति आसिफ अली के निधन से अरुणा जी को निजी जीवन में गहरा धक्का लगा। वे मानसिक और भावनात्मक रूप से बहुत कमजोर हो गई थीं।

1954 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की महिला इकाई, “नेशनल फेडरेशन ऑफ वीमेन.” का गठन किया। 1956 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को भी छोड़ दिया मगर वे पार्टी की हमदर्द बनी रहीं। इस दौरान वर्ष 1958 में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली मेयर चुनी गईं। मेयर बनकर उन्होंने दिल्ली के विकास, सफाई और स्वास्थ्य आदि के लिए बहुत अच्छा कार्य किया और नगर निगम की कार्य प्रणाली में भी उन्होंने यथेष्ट सुधार किए।

 जयप्रकाश नारायण के साथ मिलकर उन्होंने दैनिक समाचार पत्र ‘पैट्रियाट’ और साप्ताहिक समाचार पत्र ‘लिंक ‘का प्रकाशन किया। जवाहरलाल नेहरू तथा बीजू पटनायक आदि से संबंधित होने के कारण जल्दी ही दोनों समाचार पत्रों को देश में अच्छी पहचान मिल गई। लेकिन अंदरूनी राजनीति से आहत होकर उन्होंने कुछ ही समय में प्रकाशन का काम भी छोड़ दिया। पं. जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद मई 1964 में अरुणा आसफ अली फिर से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गईं और प्रगतिशील विचारों को बढ़ावा देने के लिए काम करने लगीँ, किन्तु सक्रिय राजनीति से वे दूर रहीं। अरुणा आसफ अली, इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी के करीबियों में भी गिनी जाती थीं। यद्यपि उन्होंने 1975 में इन्दिरा गाँधी द्वारा आपातकाल लगाने का विरोध किया था।

अरुणा आसफ अली की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें उन्होने अपने संघर्ष तथा राजनीतिक विचारों को वाणी दी है। पुस्तक का नाम है, ‘वर्ड्स ऑफ फ्रीडम : आइडियाज ऑफ ए नेशन’। मार्च 1944 में उन्होंने अपनी पत्रिका ‘इंकलाब’ में लिखा,

‘’आजादी की लड़ाई के लिए हिंसा-अहिंसा की बहस में नहीं पड़ना चाहिए। क्रान्ति का यह समय बहस में खोने का नहीं है। मैं चाहती हूँ, इस समय देश का हर नागरिक अपने ढंग से क्रान्ति का सिपाही बने।’’

दैनिक ‘ट्रिब्यून’ ने अरुणा आसफ अली की साहसिक भूमिगत मोर्चाबंदी के लिए उन्हें ‘1942 की रानी झाँसी’ की संज्ञा दी थी। साथ ही उन्हें ‘ग्रैंड ओल्ड लेडी’ भी कहा जाता है। उनके नाम पर दिल्ली में अरुणा आसफ अली मार्ग है जो वसंत कुंज, किशनगढ़, जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी, आईआईटी दिल्ली को जोड़ता है।

सामाजिक कार्यों में अरुणा आसफ अली की गहरी रुचि थी। वे समाज के दबे पिछड़े लोगों के लिए हमेशा संघर्ष करती रहीं। वे भारत-रूस संस्कृति संस्था की सदस्य थीँ और उन्होंने दोनो देशों की मित्रता बढ़ाने में बहुत सहयोग किया। दिल्ली में उन्होंने सरस्वती भवन की स्थापान भी की, जो संस्था गरीब और असहाय महिलाओं की शिक्षा से जुड़ी थी। अरुणा आसफ़ अली ‘इंडो-सोवियत कल्चरल सोसाइटी’, ‘ऑल इंडिया पीस काउंसिल’, तथा ‘नेशनल फैडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन’ आदि संस्थाओं के लिए उन्होंने बड़ी लगन, निष्ठा, ईमानदारी से कार्य किया। दिल्ली से प्रकाशित वामपंथी अंग्रेज़ी दैनिक समाचार पत्र ‘पेट्रियट’ से वे जीवनपर्यंत पूरी निष्ठा से जुड़ी रहीं।

 भारत के बँटवारे को वे कभी स्वीकार नहीं कर पाईं। पंजाब में 1983 में जब सिख दंगे हुए तो विभिन्न धर्मावलंबी एक सौ स्वयं-सेवकों के साथ वे वहाँ अपने शान्ति- मिशन में डटी रहीं।

दिल्ली की प्रतिष्ठित लेडी इर्विन कॉलेज की स्थापना भी अरुणा के प्रयासों से हुई। वे आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की उपाध्यक्ष भी रहीं।

लम्बी बीमारी के बाद 29 जुलाई 1996 को अरुणा आसफ अली का नई दिल्ली में 87 वर्ष की आयु मे निधन हो गया।

अरुणा आसफ अली की अपनी विशिष्ट जीवन शैली थी। वे आजीवन अपने पति के साथ एक कमरे के फ्लैट में रहीँ। उम्र के आठवें दशक में भी वह सार्वजनिक परिवहन से सफर करती थीं।

अरुणा आसफ अली को 1997 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित किया गया।

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं।)

डॉ. अमरनाथ

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