एन्तॉन पावलेविच चेखव 

एक शर्त- एन्तॉन पावलेविच चेखव 

पांच मिनट बीत गए पर कैदी ने कोई हरकत नहीं की। पंद्रह वर्ष के कारावास से उसे स्थिर बैठने का अभ्यास हो गया था। बैंकर ने अपनी उंगली से खिड़की पर दस्तक दी। जवाब में कैदी ने कोई हरकत नहीं की। फिर बैकर ने सावधानी से दरवाजे की सील तोड़ दी और ताले में चाबी घुमाई। जंग लगे ताले से एक कर्कश सी गुर्राने जैसी आवाज निकली। दरवाजा चरमरा उठा….(कहानी से)

एन्तॉन पावलेविच चेखव 

शरद की एक घनी रात थाी। बूढ़ा बैंकर अध्ययन कक्ष में एक कोने से दूसरे कोने तक चहलकदमी कर रहा था। उसके दिमाग में 15 साल पहले ऐसी ही शरद की शाम की पार्टी का दृश्य घूम रहा था। पार्टी में बहुत से समझदार लोग मौजूद थे और बेहद दिलचस्प गपशप चल रही थी। बातों ही बातों में मृत्युदंड पर बहस चल पड़ी। मेहमानों में कई विद्वान और पत्रकार भी मौजूद थे, उनमें से बहुत से मृत्युदंड के खिलाफ थे। वे इसे सजा देने का पुराना और दकियानूस तरीका मानते थे, जो इसाई राज्य के लिए अनुचित और अनैतिक था। कइयों का यह मानना था कि मृत्युदंड को दुनिया भर में हमेशा के लिए उम्र कैद में बदल देना चाहिए। 

“मैं तुमसे सहमत नहीं हूं”, मेज़बान ने कहा, “मैंने खुद न तो कभी मृत्युदंड भोगा है और न ही उम्र कैद, पर यदि कोई अनुभव की दृष्टि से देखे तो मेरे विचार से मृत्युदंड उम्र कैद से ज्यादा मानवीय है। मृत्युदंड पल भर में आपका काम तमाम कर देता है, उम्र कैद आपको तिल-तिलकर खत्म करती है। अब आप ही बताइए कौन ज्यादा मानवीय है-फांसी देने वाला जल्लाद जो आपको पल भर में मार देता है या वह जो वर्षों तक लगातार आपको तिल-तिलकर मारता है ?” 

“ये दोनों ही अनैतिक हैं” एक मेहमान बोल पड़ा, “क्योंकि दोनों का उद्देश्य एक ही है, जीवन लेना। राज्य कोई ईश्वर नहीं होता। उसे किसी का भी जीवन लेने का हक नहीं है, जिसे वह लौटा नहीं सकता।” 

उस महफिल में एक वकील भी था, वह करीब पच्चीस साल का एक नौजवान उसको राय पूछी गई तो वह बोला, “मृत्युदंड और उम्र कैद दोनों ही समान रूप से अनैतिक है पर यदि मुझे इनमें से एक को चुनना पड़े तो मैं यकीनन उम्र कैद चुनूंगा। किसी तरह जी लेना बिल्कुल न जीने से ज्यादा बेहतर है।” 

इसी के साथ बहस ने दिलचस्प मोड ले लिया। नौजवान बैंकर जो काफी उतावला अचानक उत्तेजित हो उठा और टेबल पर अपनी मुट्ठी ठोंक ठोंक कर युवा वकील की मार मुखातिब हो चिल्ला उठा: 

बकवास है, मैं तुम्हें दो लाख दूंगा, मुझे यकीन है तुम उम्र कैद तो क्या पांच साल जेल नहीं काट सकते, मैं शर्त लगाता हूं।” 

“यदि वाकई तुम गंभीर हो,” वकील ने कहा “तो मैं भी शर्त लगाता हूँ कि पाँच नहीं बल्कि पंद्रह साल जेल में रहूंगा।” 

“अच्छा पंद्रह ! ठीक है।” बैंकर जोर से चीखकर बोला, “भाईयों! मैं दो लाख दांव पर लगाता हूं।” 

“ठीक है, तुम अपने दो लाख दांव पर लगाओ और मैं अपनी आजादी” वकील ने कहा। 

और फिर इस तरह वह सनकी और अजीबोगरीब शर्त लगाई गई। बैंकर के पास उस वक्त बहुत पैसा था, अकूत संपत्ति थी। पैसे के गरूर ने उसे गुस्ताख और सनकी बना दिया था। वह हर्षोन्माद में अपने में ही लीन था। खाने की मेज पर उसने वकील का मजाक उड़ाते हुए कहा : 

“नौजवान दोस्त, होश में आओ। अभी भी वक्त है सोच लो। मेरे लिए दो लाख कोई मायने नहीं रखते पर तुम जिंदगी के तीन चार सुनहरे साल खो दोगे। मैं तीन, चार साल ही कह रहा हूं क्योंकि मुझे यकीन है तुम इससे अधिक नहीं टिक पाओगे। बदनसीब इंसान, मत भूलो कि मर्जी से स्वीकार की गई कैद सजा के कारावास से कहीं ज्यादा कठिन होती है। फिर किसी भी क्षण तुम मुक्त हो सकते हो, यह ख्याल ही कोठरी में तुम्हारी जिंदगी में जहर घोल देगा। मुझे तुम पर दया आती है।” 

और अब बैंकर को एक कोने से दूसरे कोने तक चहलकदमी करते हुए वे तमाम , बातें याद आ रही थीं। उसने खुद से पूछा : 

“आखिर मैंने क्यों यह शर्त लगाई? इससे क्या फायदा? वकील अपने जीवन के 15 साल खो देगा और मैं दो लाख फूंक दूंगा। क्या इससे साबित हो जाएगा कि मृत्युदंड उम्र कैद से बेहतर या बदतर है? नहीं, नहीं। यह सब बकवास है। मेरे जैसे दौलतमंद आदमी के लिए यह एक सनक थी, और वकील के लिए केवल पैसे का लोभ!” 

उसे फिर याद आया उस शाम की पार्टी के बाद क्या हुआ। यह तय हुआ कि वकील को बैंकर के घर के बाहर बनी बाग की कोठरी में उसकी कड़ी निगरानी में कैद रखा जाएगा। यह भी तय हुआ कि इस परे समय के दौरान वकील उस सीमा को पार नहीं कर पाएगा, किसी भी जीवित व्यक्ति से नहीं मिलेगा, न ही किसी की आवाज सुन पाएगा और उसे किसी प्रकार के पत्र या अखबार वगैरह भी उपलब्ध नहीं होंगे। पर हाँ उसे संगीतयंत्र रखने, किताबें पढ़ने, पत्र लिखने और शराब तथा सिगरेट पीने की अनुमति होगी। करार के मुताबिक वह चाहे तो एक छोटी सी खिड़की के जरिये बाहरी दुनिया से संवाद कर सकेगा पर बेहद खामोशी से, जरूरत की हर चीज किताबें, संगीत, शराब जितना चाहे वह उस छोटी सी खिड़की से चिट भेजकर मंगा सकेगा। उस करारनामे में हर छोटी से छोटी बात को भी बड़ी सावधानी से विस्तारपूर्वक दर्ज किया गया, ताकि कैद को पूरी तरह एकाकी बनाया जा सके और इस करारनामे के तहत वकील ठीक 15 साल बाद अर्थात् 14 नवंबर 1870 के 12 बजे से 14 नवंबर 1885 के ठीक 12 बजे तक बंदी रहने के लिए वचनबद्ध था। निर्धारित समय से एक-आध मिनट भी पहले निकल भागने का कोई भी प्रयास शर्त का उल्लंघन माना जाएगा और फिर बैंकर उसे दो लाख अदा करने की शर्त से मुक्त हो जाएगा। 

कैद के पहले वर्ष में वकील की छोटी-मोटी पर्चियों के जरिये जितना जानना संभव था उससे यही पता चला कि वह बेतहाशा एकाकीपन और बोरियत के दौर से गुजर रहा था। उसके कक्ष से दिन-रात पियानो की आवाज गूंजती रहती। उसने शराब और सिगरेट पीनी छोड़ दी थी। “शराब’, उसने लिखा, “इच्छाओं को जगाती है और इच्छाएं किसी भी कैदी की सबसे बड़ी दुश्मन हैं, इसके अलावा अच्छी शराब अकेले पीने से बढ़कर उबाऊ काम और कोई नहीं हो सकता और तम्बाकू कमरे की हवा को दूषित करता है।” पहले वर्ष के दौरान वकील को हल्की-फुल्की किताबें भेजी गईं, जटिल प्रेम घटनाओं वाले उपन्यास, अपराध और काल्पनिक जगत की कहानियां, हास्य कहानियां और ऐसी ही कुछ किताबें। 

दूसरे वर्ष पियानो की आवाज आनी बंद हो गई और वकील की रुचि केवल क्लासिक किताबें पढ़ने में रही। पांचवें वर्ष के दौरान संगीत फिर गूंजने लगा, कैदी ने शराब की भी मांग की। उसे जिस किसी ने भी देखा उसने पाया कि पूरे साल वह केवल खाता पीता रहा और बिस्तर पर पड़ा रहा। वह अक्सर जम्हाइयां लेता और खुद से गुस्से में बातें करता। किताबें उसने बिल्कुल नहीं पढ़ीं। कभी-कभी रात को वह लिखने बैठ जाता। वह देर-देर तक लिखता रहता और सुबह सबकुछ फाड़ देता। एकाध बार उसे रोते हुए भी सुना गया। 

छठे वर्ष के आखिरी महीनों में कैदी पूरे उत्साह से नयी-नयी भाषाएं सीखने लगा। वह दर्शनशास्त्र और इतिहास की किताबें पढ़ने लगा। वह इन विषयों में ऐसा डूबा कि बैंकर के लिए इतनी किताबें जुटाना मुश्किल होने लगा। चार सालों के समय में उसने करीब छह-सौ किताबें मंगवाईं। इसी उन्माद के दौर में बैंकर को कैदी से एक पत्र मिला “प्यारे जेलर, मैं यह पंक्तियां छह भाषाओं में लिख रहा हूं। तुम इसे विशेषज्ञों को दिखाओ। उन्हें ये पढ़ने दो। यदि उन्हें इनमें एक भी गलती न मिले तो मैं तुमसे गुजारिश करता हूं कि बगीचे में बंदूक की गोली दागने का आदेश दो। उसकी आवाज से मैं समझ जाऊंगा कि मेरी मेहनत जाया नहीं हुई। हर युग और हर देश के जीनियस विभिन्न भाषाओं में बोलते हैं, पर उन सभी के भीतर की लौ एक ही है। मैं अब उन सबको समझ सकता हूँ इस अहसास ने मुझे जो परम सुख दिया है, ओह, तुम उसका अंदाजा नहीं लगा सकते।” कैदी की इच्छा पूरी कर दी गई। बैंकर के आदेश से बगीचे में दो बार गोलियां दागी गईं। 

बाद में, जब दस वर्ष पूरे हो गए, वकील अपने टेबल के करीब स्थिर बैठा रहता और सिर्फ बाइबल पढ़ता रहता। बैंकर को इस बात पर बड़ा ताज्जुब होता कि एक जो चार सालों में छह सौ भारी भरकम किताबें चाट गया वही अब महज एक किला में पूरा साल लगा रहा है, वह भी इतनी सरल और छोटी सी किताब । इसके बाद बाइबल की जगह धर्म और आध्यात्म की किताबों ने ले ली। 

अपने कारावास के अंतिम दो वर्षों के दौरान कैदी ने बेतरतीब तरीके अधिक तादाद में पढ़ा। अब वह कभी प्राकृतिक विज्ञान पर कुछ पढ़ता, तो कभी बायरन या फिर शेक्सपीयर। वह जो पर्चियां भेजता उसमें एक ही साथ कभी रसायन चिकित्सा विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें, कभी कोई उपन्यास या दर्शन अथवा धर्म पा शोधग्रंथ की मांग करता। वह ऐसे पढ़ता जैसे समुद्र में जहाज के टूटे हुए टुकडों के ही तैर रहा हो और अपना जीवन बचाने की लालसा में एक टुकड़ा छोड़ दूसरा पकड रहा हो। 

बैंकर ने यह सब याद किया और सोचा : 

“कल बारह बजे वह आजाद हो जाएगा। करारनामे के अनुसार मुझे उसे दो लाख देने होंगे। यदि मैं देता हूं तो मैं पूरी तरह तबाह हो जाऊंगा हमेशा के लिए…” 

पंद्रह साल पहले उसके पास बेपनाह दौलत थी, कई हजार मिलियन। पर अब उसके पास क्या बचा है? सिर्फ कर्ज। शेयर बाजार में सट्टेबाजी, जोखिम भरे दांव और अंधाधुंध खर्च जिसे वह बुढ़ापे में भी छोड़ नहीं पाया था। इन सब आदतों ने उसका कारोबार चौपट कर दिया था। एक बेबाक, आत्मविश्वासी और गर्वीला व्यापारी महज एक साधारण बैंकर बनकर रह गया था, जो बाजार में हर उतार-चढ़ाव से कांपने लगता था। 

“ओह वह बेहूदा शर्त !”वह बूढ़ा हताशा में अपना सिर पकड़ मन ही मन कोसने लगा…यह आदमी मर क्यों न गया? वह सिर्फ चालीस साल का है। वह मेरी दमड़ी तक नहीं छोड़ेगा। मौज मस्ती करेगा और बाजार में दांव लगाकर खुश होगा और मैं कौड़ी कौड़ी का मोहताज एक ईर्ष्यालु भिखारी बन कर रह जाऊंगा और रोज उससे मुझे वही सब सुनना होगा। “मैं अपने जीवन की इस खुशी के लिए तुम्हारा आभारी हूं। चलो मैं तुम्हारी मदद करूं?” नहीं, कभी नहीं, यह नहीं हो सकता! इस दिवालियेपन और बदनामी से बचने का अब केवल एक ही रास्ता है-“इस आदमी को मरना होगा।” 

घड़ी ने तीन बजाए। बैंकर ने सुना। घर में हर कोई नींद में बेसुध था और खिड़कियों से बाहर केवल बर्फ से ढके वृक्षों की सरसराहट गूंज रही थी। बगैर कोई आवाज किए उसने सेफ से उस दरवाजे की चाबी निकाली जिसे पिछले पंद्रह वर्षों से खोला नहीं गया था। उसने अपना ओवर कोट पहना और घर से बाहर निकल आया। बगीचे में अंधेरा और ठंड थी। पानी बरस रहा था। जिस्म को बेधती हुई सर्द हवा बगाच में सरसरा रही थी। वक्षों का झूमना जारी था। बैंकर ने अपनी आंखों पर काफी जोर डाला पर उसे कहीं कोई जमीन नजर नहीं आई। वह बगीचे में बनी सफेद मूर्तियों, कैदखान और वृक्षों को भी नहीं देख पा रहा था। उस कैदखाने की ओर बढ़ते हुए उसने दो बार वॉचमन को आवाज दी। जवाब नहीं मिला। जाहिर था कि खराब मौसम से बचने के लिए वह रसोई अथवा ग्रीनहाऊस के किसी कोने में जा सोया था। 

“यदि मैं अपने इरादे को पूरा करने का साहस जुटा लेता हूं तो सबसे पहले वाचमैन पर ही शक किया जाएगा,” बूढ़े बैंकर ने मन ही मन सोचा। 

अंधेरे में उसने सीढ़ियों और दरवाजे को टटोला और उस कैदखाने के हॉल में प्रवेश किया, फिर संकरे गलियारे में दीवार टटोलकर बढ़ने लगा। 

उसने माचिस की तीली जलाई। वहां किसी का नामोनिशां नहीं था। किसी का बिस्तरा बिना चादर के वहां पड़ा था और लोहे का एक स्टोव कोने में अस्पष्ट धुंधला सा दिखाई दे रहा था। कैदी के दरवाजे पर लगी सील बरकरार थी। 

जब तीली बुझ गई, तो उत्तेजना से कांपते हुए उस बूढ़े ने छोटी खिड़की से भीतर झांका।

कैदी के कमरे में धुंधली सी मोमबत्ती जल रही थी। कैदी खुद टेबल के करीब बैठा हुआ था। केवल उसकी पीठ, सिर के बाल और हाथ दिख रहे थे। खुली किताबें मेज पर दोनों कुर्सियों और टेबल के पास बिछे कालीन पर बिखरी हुई थीं। 

पांच मिनट बीत गए पर कैदी ने कोई हरकत नहीं की। पंद्रह वर्ष के कारावास से उसे स्थिर बैठने का अभ्यास हो गया था। बैंकर ने अपनी उंगली से खिड़की पर दस्तक दी। जवाब में कैदी ने कोई हरकत नहीं की। फिर बैकर ने सावधानी से दरवाजे की सील तोड़ दी और ताले में चाबी घुमाई। जंग लगे ताले से एक कर्कश सी गुर्राने जैसी आवाज निकली। दरवाजा चरमरा उठा। बैंकर को तत्काल आश्चर्यभरी सिसकारी और किसी के कदमों की आवाज़ सुनने की पूरी उम्मीद थी। तीन मिनट बीत गए पर भीतर पहले जितनी ही निस्तब्धता छाई रही। अब उसने अंदर घुसने का इरादा किया। 

मेज के समीप एक आदमी बैठा हुआ था। किसी सामान्य आदमी से बिल्कुल अलग। वह नर कंकाल था, चमड़ी खिंची हुई, महिलाओं की तरह लंबे धुंघराले रूखे बाल, खुरदरी सी दाढ़ी। उसके चेहरे का रंग पीला पड़ गया था, बिल्कुल धूसर जमीन की तरह । गाल अंदर धंस गए थे, पीठ लंबी और पतली और हाथ, जिस पर वह अपना घने बालों वाला सिर झुकाकर लेटा हुआ था, इतना पतला था कि उसे देखना बेहद कष्टदायक था। उसके बालों में सफेदी चमकने लगी थी और उस बूढ़े से लगने वाले जर्जर शरीर को देखकर यह यकीन करना मुश्किल था कि वह सिर्फ चालीस साल का है। मेज पर, उसके झुक हुए सिर के पास ही एक कागज रखा था जिस पर बहुत छोटे-छोटे अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। 

“बेचारा शैतान,” बैंकर ने सोचा, “वह सोया है और शायद करोड़ों के सपने देख रहा है। मुझे बस उसके अर्द्ध मरणासन्न शरीर को बिस्तर पर फेंकना होगा, एक मिनट तकिये से दबाना होगा और किसी भी तरह की जांच से यह सिद्ध नहीं हो पाएगा कि उसकी मौत सामान्य ढंग से नहीं हई है। पर पहले देख लिया जाए उसने यहां क्या लिखकर रखा है?” 

बैंकर ने मेज से कागज उठाया और पढ़ने लगा : 

“कल आधी रात को ठीक बारह बजे मैं आजाद हो जाऊंगा और लोगों से मिल जुल सकूँगा। पर यह कोठरी छोड़ने और सूरज देखने से पहले मैं आपसे कुछ कहना जरूरी समझता हूं। मैं अपने पूरे होश हवास में और ईश्वर को साक्षी मानकर यह घोषित करता हूँ कि मैं आजादी, जिंदगी और खुशहाली तथा तुम्हारी किताबों में दर्ज दुनिया की तमाम खुशियों से नफरत करता हूं।” 

“पंद्रह सालों तक मैंने बड़ी मेहनत से सैंकड़ों किताबें पढ़ीं और इस दुनिया के बारे में जाना। सच तो यह है कि मैंने इन किताबों में ही दुनिया की हर चीज को देखा। तुम्हारी इन किताबों में मैंने सुगंधित मदिरा को पिया है, जंगलों में हिरणों और खतरनाक सूअरों का शिकार किया है। स्त्रियों से प्रेम किए हैं। ये सुंदर स्त्रियां जो अलौकिक बादलों की तरह थीं, आपके कवियों की प्रतिभा से जादू का सा असर करती, रातों को मेरे करीब आईं। उन्होंने फुसफुसाकर मुझे अद्भुत कथाएं सुनाईं, जिन्हें सुनकर मैं नशे से चूर हो गया। तुम्हारी किताबों में मैंने एलब्रूज और मान्ट ब्लॉन्क की चोटियों की चढ़ाई की और वहां से मैंने देखा कि सुबह सूरज किस तरह उगता है, और शाम को कैसे पूरे आकाश को लालिमा से भर देता है ? किस तरह समुद्र और पहाड़ की चोटियां बैंगनी सुनहरे रंग में रंग जाती हैं ? मैंने वहां से देखा कि किस तरह बिजली कौंधती है और बादलों को चीरती चली जाती है ? मैंने हरे-भरे जंगल, खेत खलिहान, नदियां, झीलें, नगर देखे। मैंने शांत गीतों और वाद्य यंत्रों के संगीत को सुना। मैंने उन सुंदर यक्षों के परों को छुआ जो ईश्वर की बातें करते उड़ते हुए मेरे पास आते थे। इन किताबों में मैं अतल गहराई में डूबा, मैंने कई चमत्कार देखे। इन किताबों में मैंने संसार के बसते और उजड़ते शहरों को जाना। इन किताबों से मुझे मनुष्य के हजारों सालों के इतिहास का ज्ञान हुआ। 

“तुम्हारी किताबों ने मुझे ज्ञान दिया, युगों से जन्मे अथक मानवीय विचार मेरी खोपड़ी के छोटे से पिंड में सिकुड़ कर रह गए हैं। मुझे पता है कि मैं आप सभी से ज्यादा ज्ञानी हूँ। 

“और मैं जान गया हूं कि संसार की हर चीज झूठी है । नफरत है मुझे तुम्हारे इन सांसारिक सुखों से और समझदारी से। सबकुछ मरीचिका की तरह व्यर्थ, खोखला, नश्वर, काल्पनिक और भरमाने वाला है। कोई कितना भी सुंदर हो, बुद्धिमान हो, गर्वीला हो फिर भी किसी दिन मौत उसका नामोनिशां मिटा देगी, बिल्कुल धरती में दफन चूहों की भांति और तुम्हारा सारा वैभव, सारी समृद्धि, सारा इतिहास धरा रह जाएंगा और तुम्हारे प्रतिभासम्पन्न विद्वानों की अमरता भी नहीं रहेगी। वह इस लौकिक भूमंडल के साथ नष्ट हो जाएगी।

“तुम पागल हो और रास्ता भटक गए हो। तुमने मिथ्या को ही सत्य मान लिया है और कुरूपता को सुंदरता। यदि तुम अचानक सेब और संतरे के वृक्षों पर फलों की बजाय मेंढ़क और छिपकलियों को उगते देख लो या फिर गुलाब में से बदबूदार घोड़े की पसीने की गंध आने लगे तो यह सब तुम्हें विस्मय से भर देगा। मुझे भी तुम्हें देखकर ऐसा ही विस्मय होता है। मैंने पृथ्वी के बदले स्वर्ग पाया है । मैं तुम्हें समझाना नहीं चाहता। 

“और मैं साबित करना चाहता हूं कि मेरे लिए यह सब व्यर्थ है जिसके लिए तुम मर-मिटते हो। मैं उस दो लाख की रकम को भी तिलांजलि देता हूं जिसकी मैंने कभी जन्नत के रूप में कल्पना की थी और जिससे अब मुझे नफरत है, मैं उन पैसों पर अपना अधिकार छोड़ता हूं। मैं कल रात बारह बजने से पांच मिनट पहले ही बाहर आ जाऊंगा और इस तरह करार की शर्तों को तोड़ दूंगा।” 

जब बैंकर पूरा पत्र पढ़ चुका तो उसने वह कागज टेबल पर रख दिया। उसने कैदी के माथे का चुंबन लिया और रोने लगा। वह कोठरी से बाहर आ गया। जिंदगी में कभी, किसी भी समय, अपना सबकुछ सट्टे में गंवाने पर भी उसे अपने आप से इतनी घृणा नहीं हुई थी जितनी कि आज! घर आकर वह बिस्तर पर गिर पड़ा, इस हादसे ने उसे इतना हिला दिया था कि देर तक वह रोता रहा और उसे नींद नहीं आई। 

अगली सुबह बेचारा वॉचमैन भागते हुए उसके पास आया और बताया कि उसने उस कैदी को कोठरी की खिड़की से बगीचे में कूदते हुए देखा। वह गेट से बाहर निकल ओझल हो गया। बैंकर तत्काल अपने नौकर के साथ उस कोठरी तक गया और कैदी के भाग जाने की पुष्टि की। किसी तरह की अफवाह से बचने के लिए उसने बेहद निर्मोही ढंग से पत्र उठाया और वहां से लौटेंकर सेफ में बंद कर दिया। 

साभार- विश्व के अमर कथाकार, आधार प्रकाशन। (अनुवाद- अनुराधा महेंद्र)

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