भारतीय भाषाओं में छंद विधान- रामविलास शर्मा

रामविलास शर्मा

किसी भी भाषा की प्रकृति उसकी छंद-पद्धति से पहचानी जाती है । संस्कृत और हिंदी की छंद रचना में मौलिक अंतर यह है कि हिंदी के छंद मुख्यतः मात्रिक हैं और संस्कृत के छंद मुख्यतः वर्णिक हैं । वैदिक काल के वर्णिक छंदों की लय बहुत कुछ स्वतंत्र है जैसे कि हिंदी घनाक्षरी की लय स्वच्छंद है । बाद की संस्कृत में वर्णिक छंदों की गति सामान्यतः बंधी हुई है । वैदिक छंदों का उत्तराधिकारी अनुष्टुप् पयार आदि में लय की स्वच्छंदता है । संस्कृत के अधिकांश छंद गणात्मक हैं । जहां गणों की संख्या निश्चित होगी, वहां मात्राओं की संख्या भी निश्चित होगी । इस प्रकार संस्कृत के गणात्मक छंद वर्णिक हैं, मात्रिक भी हैं । इन वर्णिक छंदों में स्वच्छंद लय के स्थान पर निश्चित लय का चलन हुआ है । भवभूति जैसे कवि यति का स्थान बदलकर यहां भी लय में परिवर्तन करते हैं, पर कुल मिलाकर गणवृत्तों की लय एकरूप होती है । यह स्थिति मात्रिक छंदों के प्रभाव के कारण है । मध्यदेश की भाषा में बलाघात और स्वरतान का महत्त्व नहीं है । स्वरतान के अवशेष पंजाबी में हैं, बलाघात के अवशेष बांग्ला में हैं । बीच में मध्यदेश की भाषा स्वरतान और बलाघात से मुक्त है ।

जो भाषाएं बलाघात प्रधान होती हैं, उनमें स्वर की दीर्घता और हस्वता प्रमुख नहीं होती, उनमें किसी वर्ण पर बलाघात का होना या न होना महत्त्वपूर्ण होता है । छंद की लय इसी बलाघात की स्थिति के अनुसार नियंत्रित होती है । जहां ह्रस्व और दीर्घ स्वरों का भेद महत्त्वपूर्ण है, वहां मात्रा अथवा उच्चारण काल छंद की लय का नियामक होता है । ऐसी भाषाओं में अन्त्यानुप्रास की सुविधा और प्रचुरता होती है ।

वैदिक भाषा के बाद संस्कृत छंदों का जो विकास हुआ, उस पर मध्यदेश की भाषा की रागवृत्ति की छाप है । स्वच्छंद लय वाले छंदों के स्थान पर गणात्मक छंदों का विधान मात्रिक और वर्णिक छंदवृत्तियों के बीच एक प्रकार का समझौता है । कहा जा सकता है कि मात्रिक छंदों के प्रभाव से गणात्मक छंदों के रूप में एक समझौता हुआ- यह कल्पना व्यर्थ है क्योंकि मात्रिक छंदों के अस्तित्व का प्रमाण नहीं है। इसका उत्तर यह है कि वैदिक भाषा और लौकिक संस्कृत में स्वरतान और बलाघात को लेकर भेद है, और यह अकारण नहीं है । इस भेद का कारण मध्यदेश की भाषा का प्रभाव है । भाषाविज्ञानी मानते हैं कि लौकिक संस्कृत के विकास और प्रसार के मुख्य केंद्र मध्यदेश में थे । मध्यदेश की भाषाई स्थिति का प्रभाव वेदोत्तर संस्कृत पर किन रूपों में पड़ा-इसका अनुसंधान अभी नहीं किया गया । लौकिक संस्कृत के समृद्धिकाल में जैसे देशी भाषाओं का अस्तित्व उल्लिखित है, वैसे ही मात्रिक छंदों का अस्तित्व प्राकृत के गाथा छंद से प्रमाणित है ।

गाथा छंद प्राकृत का सर्वाधिक लोकप्रिय छंद है । संस्कृत और प्राकृत में भाषा का तात्विक अंतर बहुत कम है । शब्द-भंडार, व्याकरण व्यवस्था मूलतः एक हैं, केवल ध्वनितंत्र में अंतर है । किंतु छंद रचना में मौलिक अंतर है । संस्कृत के छंद वर्णिक हैं, प्राकृत का गाथा छंद मात्रिक है । इससे सिद्ध होता है कि संस्कृत के समृद्धिकाल में मात्रिक छंदों का अस्तित्व था और वे वर्णिक पुराने छंदों की मुक्त लय को प्रभावित कर सकते थे । इसके सिवा कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीय’ में मात्रिक अपभ्रंश-छंद रचना विद्यमान है । अपभ्रंश ने प्राकृत का ढांचा लिया और उसमें देशी भाषाओं के तत्त्व शामिल किए । स्वभावतः उसमें मात्रिक छंदों की बहुलता है और ये छंद ऐसे हैं जो हिंदी क्षेत्र के जनपदों में व्यापक रूप से प्रयुक्त हुए ।

जिस तरह अपभ्रंश भाषा और साहित्य के विशेषज्ञ आधुनिक भाषाओं की उत्पत्ति अपभ्रंश से मानते हैं, उसी तरह वे हिंदी छंदों की उत्पत्ति अपभ्रंश छंदों से मानते हैं । प्राकृत और संस्कृत का मूल ढांचा एक है, दोनों का छंदविधान भिन्न है- इसका कारण क्या है ? कारण यह है कि प्राकृत का भाषाई ढांचा अप्राकृतिक है किंतु उसका मात्रिक छंदविधान प्राकृतिक है । अपभ्रंश जिस हद तक प्राकृत का ढांचा स्वीकार करती है, उस हद तक वह भी अप्राकृतिक है । पर उसमें देशी भाषाओं के तत्त्व शामिल किए जा रहे हैं, इस कारण वह प्राकृत की अपेक्षा कम अप्राकृतिक है । संस्कृत के गणात्मक (अत : मात्रिक) छंदों से ही मध्यदेशीय भाषा की अपनी रागवृत्ति झलकने लगी है ; प्राकृत के गाथा छंद में वह झलकने के बदले प्रकाशित होने लगती है । यह प्रकाश अपभ्रंश में और भी प्रखर हो उठता है । किंतु रूढ़ भाषा के अप्राकृतिक तंत्र और लोकभाषा की रागवृत्ति का अंतर्विरोध अभी समाप्त नहीं होता । वह पूरी तरह समाप्त होता है जायसी, कबीर, तुलसी और सूरदास की रचनाओं में ।

कालिदास संस्कृत में वर्णिक छंदों का व्यवहार करते थे किंतु अपभ्रंश में उन्होंने इस तरह के मात्रिक छंद का प्रयोग किया है :

फलिहसिला अलणिम्मलणिज्झरु
बहुविहकुसुमे विरइअसेहरु ।
किंणर महरुग्गीअमणोहरु
देक्खावहि महुपिअअम महिहरु ।

इन पंक्तियों को यदि संस्कृत रूपांतर (अथवा मूल संस्कृत रूप) में लिख दिया जाए तो गीतगोविन्द की पदावली के पूर्वरूप का निदर्शन हो जाएगा ।

स्फटिक शिला तब निर्मल निर्झर
बहुविध कुमुमैर्विरचित शेखर ।
किन्नर मधुरोद्गीत मनोहर
दर्शय मम प्रियतमां महीधर ।

इससे तुलनीय हैं गीतगोविन्द की पंक्तियां : :

सरस मसृणमपि मलयज पङ्कम्
पश्यति विषमिव वपुषि सशंकम् ।
हरिरिति हरिरिति जपति सकामम्
विरह विहित मरणेव निकामम् ।

गीतगोविन्द की मात्रिक छंद-रचना बांग्ला भाषा में क्यों प्रचलित नहीं हुई ? इसलिए कि बांग्ला भाषा की रागवृत्ति पयार जैसे वर्णिक छंदों में व्यक्त होती है, मात्रिक छंदों में नहीं । आगे चलकर ब्रजबुलि में ऐसे ही मात्रिक पदों की रचना हुई । यह भाषा न बांग्ला थी, न ब्रज ; वह ब्रज और मैथिल भाषाओं का मिश्रण थी । इस तरह का मिश्रण बोलचाल के स्तर पर न हो रहा था, वह साहित्य की भाषा में हो रहा था, और इस मिश्रण को प्रस्तुत करने वाले कविगण थे । ब्रजबुलि का कृत्रिम रूप भाषाविज्ञानी पहचानते हैं, इसी तरह उन्हें अपभ्रंश में देशी भाषाओं के मिश्रण का कृत्रिम रूप पहचानना चाहिए । ब्रजबुलि की परंपरा अपभ्रंश की साहित्यिक परंपरा का अगला चरण है । ब्रजबुलि से कोई ब्रज, मैथिली या बांग्ला का उद्भव नहीं मानता, पर अपभ्रंश से इन तीनों का और इनके अलावा पूरबी पछांही बहुत सी भाषाओं का उद्भव लोग मानते हैं । अपभ्रंश भाषा के स्वरूप की समस्या विशुद्ध भाषाविज्ञान की समस्या नहीं है । वह साहित्य की उन रूढ़ियों की समस्या है जिनका संबंध लोकभाषा को साहित्य का माध्यम बनाने से है । इस माध्यम की सरसता या नीरसता से उसकी वास्तविकता का कोई संबंध नहीं है । बंगाल के जिन कवियों ने ब्रजबुलि में रचना की, उनकी पदावली बड़ी मधुर है । भानुसिंहेर पदावली के रचयिता रवींद्रनाथ ठाकुर की भाषा बड़ी मधुर है । पर यह सब बांग्ला भाषा की रागवृत्ति वैसे ही व्यजित नहीं करता जैसे गीतगोविन्द की पदावली उसे व्यंजित नहीं करती । इसी परिप्रेक्ष्य में दोहाकोश और चर्यागीतों का अध्ययन करना चाहिए ।

सरह के दोहाकोश का रचनाकाल जो भी हो, इसका छंद मात्रिक है ।

घर ही बड़सी दीवा जाली ।
कोणहिं बइसी घण्टा चाली ।
अक्खि णिवेसी आसण बन्धी ।
कष्णेहि खुस खुसाइ जण धन्यी ।

दोहाकोश की ये चौपाइयां बंगाल से पश्चिम की ओर बोली जानेवाली भाषाओं की रागवृत्ति व्यंजित करती हैं । इसी तरह चर्यागीतों में मात्रिक छंदों का प्रयोग हुआ :

जो मण गोअर आला जाला
आगम पोथी इष्टा माला ।
भणइ कान्ह जिस रअणविकइसा
काले बोब संबोहिअ जड़सा

इस तरह के छंद लोक व्यवहार में आते थे । जायसी और तुलसीदास की चौपाइयों के अलावा यदि उन पहेलियों की ओर ध्यान दें जिन्हें खुसरो की रचना माना जाता है, तो विदित होगा कि लोकसाहित्य के स्तर पर इस तरह के छंदों का चलन केवल हिंदी प्रदेश में था और हिंदी प्रदेश में दोहा-चौपाई का मूल केंद्र था अवध । जो कवि अवधी में काव्य रचते थे, वे सहज ही दोहा-चौपाई का व्यवहार करते थे । इसी तरह जो कवि गीत लिखते थे, वे सहज ही ब्रजभाषा का सहारा लेते थे । ब्रजभाषा में कथा भी लिखनी हो तो सूरदास जैसे कवि गीत लिखते हैं । तुलसीदास रामचरितमानस अवधी में लिखते हैं । उसमें दोहा-चौपाई का प्रयोग लोकसाहित्य की परंपरा के अनुरूप है । गीतावली, विनयपत्रिका वह ब्रजभाषा में लिखते हैं । विद्यापति जब पद लिखते हैं, तब वे स्वभावतः ब्रज लोकसाहित्य की परंपरा के निकट पहुंचते हैं । मिथिला के और ब्रज के लोकसाहित्य की परंपराएं ब्रजबुलि के रूप में मिश्रित होती हैं । जायसी या सूरदास का समर्थ साहित्य अचानक जन्म नहीं लेता । वह एक साहित्यिक परंपरा की कड़ी है और यह कड़ी अपभ्रंश में नहीं है, लोकभाषाओं के साहित्य में है । लोकसाहित्य की झलक अपभ्रंश में दिखाई देती है, लोकसाहित्य को अपभ्रंश की झलक समझना भूल है ।

सुदीर्घ सामंतकाल में उत्तर भारत के जनपदों ने अपनी भाषाओं के माध्यम से, विशिष्ट साहित्यिक परंपराओं का निर्माण किया । संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश के प्रभुत्व के कारण ये विशिष्ट परंपराएं शताब्दियों तक केवल मौखिक साहित्य के स्तर पर में अभिव्यक्त हुई । लिखित साहित्य में व्यक्त हुई हों, तो उसकी जानकारी अभी नहीं है । न केवल काव्य-रचना वरन् काव्य-रूपों के अध्ययन से जनपदों की विशिष्ट साहित्यिक परंपराओं का ज्ञान होता है । ब्रजभाषा में गीत-रचना की परंपरा ऐसी पुष्ट हुई कि मुगल शासनकाल में जो लोग घर में खड़ी बोली बोलते थे, वे भी गीत ब्रजभाषा में गाते थे या दूसरों से ब्रजभाषा के गीत सुनते थे । अभी तक किसी ने यह दावा नहीं किया कि ब्रजभाषा में गीत लिखने की परंपरा मुसलमानों ने डाली थी । मुसलमानों का संबंध खड़ी बोली से जोड़ा जाता है । यह ब्रज की गीत परंपरा वहां की लोकसंस्कृति का अभिन्न अंग थी । इसी तरह दोहा-चौपाई में आख्यान-रचना अवध की विशिष्ट परंपरा थी । न केवल जायसी वरन् अन्य जनपदों के मुसलमान कवि भी प्रेमाख्यान अवधी में लिखते हैं । जैसे-जैसे जनपदों का अलगाव समाप्त होता है, वैसे-वैसे यह जनपदीय विशिष्टता भी समाप्त होती है । पर उसे समाप्त होने में काफी समय लगता है और इसका एक कारण है उसकी जड़ें लोकसंस्कृति की धरती में बहुत गहरे पहुंची हुई हैं। दुर्भाग्य से लोकसाहित्य की परंपरा और अपभ्रंश साहित्य के संबंध को विद्वानों ने उल्टे ढंग से देखा है । जो आधार है, उसे वे आधेय मान बैठते हैं और जो आधेय है, व उनकी कल्पना में आधार बन जाता है । डॉ. रामसिंह तोमर ने अपने पूर्वोल्लिखित ग्रंथ में अपभ्रंश साहित्य से हिंदी साहित्य का विशिष्ट संबंध स्थापित किया । किंतु अपभ्रंश भाषा की प्रकृति को न पहचानने के कारण उन्होंने लोकसंस्कृति, अपभ्रंश साहित्य और हिंदी साहित्य का संबंध सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत नहीं किया । इन तीनों में मूलाधार है लोकसंस्कृति । इसका माध्यम है देशी भाषा, जो अपभ्रंश से भिन्न है । देशी भाषा तथा उसके माध्यम से व्यक्त होने वाली संस्कृति के थोड़े से तत्त्व अपभ्रंश भाषा और साहित्य में आ पाए हैं । उनकी पूर्ण अभिव्यक्ति, अपभ्रंश का ढांचा पूरी तरह छोड़ देने पर, हिंदी जनपदों के कवियों की रचनाओं में दिखाई देती है । विद्यापति अपभ्रंश के अंतिम महत्त्वपूर्ण कवि हैं, उस परंपरा से मुक्त होकर देशी भाषा में लोकसंस्कृति को व्यक्त करनेवाले वह प्रथम महाकवि हैं ।

अपने उक्त ग्रंथ में डॉ. रामसिंह तोमर ने लिखा है :”हिंदी साहित्य ने जितना सीधा संपर्क अपभ्रंश साहित्य से रखा है, उतना कदाचित् किसी अन्य प्रांतीय भाषा ने नहीं रखा । अपभ्रंश के समस्त बाह्य वैभव तथा आंशिक भावधारा का जो चित्र जैन, बौद्ध, ब्राह्मण आदि नाना संपद्राय, नाना प्रांतों में रचित अपभ्रंश रचनाओं में मिलता है, उसे अपभ्रंश की प्रधान उत्तराधिकारिणी हिंदी ने अपने अनेक रूपों- क्या ब्रज, क्या अवधी, क्या राजस्थानी, क्या मैथिली में अपनाया । हिंदी के उस युग के कवियों में लोक रुचि और सही मार्ग को समझने की कितनी सूझ और बुद्धि थी- यह उनकी अपभ्रंश काव्यधाराओं को उसी रूप में अपनाने से स्पष्ट होता है । इन कवियों में सच्चे प्रदर्शक की प्रतिभा थी और युगप्रधान कर्मठ नायक के समान साहस था । अपभ्रंश साहित्य का जो अंश उपलब्ध हुआ है, वह इतना सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि हिंदी साहित्य के प्रारंभ युग में प्राप्त काव्यधाराओं का प्रारंभ 13 वीं या 14 वीं शती से नहीं हुआ, किंतु उस समय हुआ था जब चतुर्मुख, द्रोण, स्वयंभू, सरहपा, कान्हपा, योगींद्र आदि कवियों ने अपनी रचनाओं को लिखना प्रारंभ किया था । इस प्रकार हिंदी काव्य की नींव और भी गहरी और दृढ़ है” (प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य, पृ . 283) । हिंदी काव्य की नींव अवश्य गहरी और दृढ़ है, पर उसके ऊपर विद्यापति, जायसी, कबीर, सूर और तुलसी ने जो सुंदर भवन निर्मित किया, उसके निर्माण में सबसे बड़ी बाधा अपभ्रंश में साहित्य रचने की परंपरा थी । यदि विद्यापति इस परंपरा का अनुसरण करते चले जाते तो उनका युगांतकारी महत्त्व हिंदी काव्य की गहरी नींव के नीचे ही दबा रह जाता । साहित्यिक रूढ़ि के पालन में अपने कौशल का प्रदर्शन करने के बाद उन्होंने देशी भाषा में अपनी प्रतिभा का चमत्कार दिखाया । इस चमत्कार का आधार उनका अवहट्ट रचना कौशल नहीं है । लोकसंस्कृति की कितनी फीकी झलक अपभ्रंश में आई थी, इसका सही अनुमान कीर्तिलता से विद्यापति की मैथिली पदावली मिलाने से हो जाएगा । कीर्तिलता विद्वानों की व्याख्या, भाष्य, विश्लेषण का आलंबन है, विद्यापति की पदावली हिंदी जनता का कंठहार है ।

डॉ. रामसिंह तोमर मानते हैं कि देशी भाषाएं अपभ्रंश से भिन्न थीं । यदि वे भिन्न थीं तो लोकसंस्कृति का माध्यम अपभ्रंश न हो सकती थी, ये देशी भाषाएं हो सकती थीं । इन्हीं में दोहा-चौपाई आदि छंदों का चलन हुआ । आल्हा की मौखिक काव्य-परंपरा विख्यात है । उसी तरह आख्यान-काव्यों, गेय पदों की परंपराएं थीं ।

यदि लोकसंस्कृति का माध्यम अपभ्रंश होती, तो साहित्य के मंच से उसे कोई शक्ति न हटा पाती । हिंदी अपभ्रंश की उत्तराधिकारिणी केवल इस दृष्टि से है कि हिंदी प्रदेश की लोकसंस्कृति टूटे-फूटे रूप में इसके माध्यम से व्यक्त हुई है ।

अच्छा होता यदि अपभ्रंश के कवियों में मार्गप्रदर्शक की प्रतिभा होती, युगप्रधान कर्मठ नायक के समान साहस होता । अपभ्रंश साहित्य के रचनाकारों के जो आश्रयदाता थे, उनका युग समाप्त हो रहा था । सामंती शक्तियों के विघटन के साथ अपभ्रंश संरक्षण नष्ट हो गया । इसके नष्ट होने से लोकसंस्कृति के विकास का रास्ता भी साफ हो गया ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *