होने वाले महाकवि के लिए- शमशेर बहादुर सिंह

शमशेर बहादुर सिंह

मेरी यह मान्यता है कि हिन्दी का कोई भी नया कवि अधिक-से-अधिक ऊपर उठने का महत्वाकांक्षी होगा। उसे और सबों से अधिक तीन विषयों में अपना विकास एक साथ करना होगा।

1. उसे आज की, कम-से-कम अपने देश की, सारी सामाजिक, राजनैतिक और दार्शनिक गतिविधियों को समझना होगा अर्थात् वह जीवन के आधुनिक विकास का अध्येता होगा। साथ ही विज्ञान में गहरी और जीवन्त रुचि होगी। हो सकता है इसका असर ये हो कि वो कविताएँ कम लिखे मगर जो भी वह लिखेगा व्यर्थ न होगा।

2. संस्कृत, उर्दू, फारसी, अरबी, बँगला, अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं और उनके साहित्य से गहरा परिचय उसके लिए अनिवार्य है। (हो सकता है कि उसका असर ये हो कि बहुत वर्षों तक वह केवल अनुवाद करे और कविताएँ बहुत कम लिखे या बहुत अधिक लिखे जो नकल सी होगी, व्यर्थ, सिवाय मश्क के लिए लिखने के या कविताएँ लिखना वो बेकार समझे) इस दिशा में अगर वह गद्य भी कुछ लिखेगा तो वह स्थायी हो सकता है।

3. तुलसी, सूर, कबीर, जायसी, मतिराम, देव, रत्नाकर और विद्यापति को, साथ ही नज़ीर और मीर, गालिब, दाग, इकबाल, जौक और फैज़ के चुने हुए कलाम और उर्दू के क्लासिकी गद्य को अपने साहित्यगत और भाषागत संस्कारों में पूरी-पूरी तरह बसा लेना इसके लिए आवश्यक होगा। 

कला के विभिन्न अंगों के बारे में उसकी जानकारी उतनी ही गहरी होनी होगी जितनी छंद के बारे में, स्टाइल के बारे में। सबसे बड़ी चीज ये कि वह विनम्र होना सीखेगा, उसका व्यापक गहरा अध्ययन स्वयं उसको सिखायेगा, अपनी भाषा, संस्कृति और विशेषकर अपने का लेकर। ये बातें मैंने आज नहीं कल के होने वाले महाकवि के लिए ज़रूरी समझी हैं। साधारण रूप से केवल अच्छे और केवल बहुत अच्छे होने वाले कवियों को इन लाइन्स पर, इन चीज़ों पर सोचन की आवश्यकता नहीं। उनको ये चीजें भटका भी सकती हैं और अभी 10-20 साल तक इन चीजों का ज़िक्र करना भी एक फिजूल सी बात है। हर दृष्टिकोण के लिए एक पृष्ठभूमि और वातावरण होता है। वो अभी चौथाई सदी बाद आयेगा। बल्कि मुझे अणु मात्र भी सन्देह नहीं कि अगर हम अणु बमों के यद्ध में ख़तम न हो गये तो वह आकर रहेगा। तब तक भाषा, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा-पद्धतियाँ बदल चुकी होंगी। और उनके उसूल क्रांतिकारी परिवर्तन के बिना नया महाकवि और महान कलाकार सहज ही जन्म न ले सकेगा। अस्तु…

असल में, महान प्रतिभा अनुभूतियों के गहरे स्तरों तक पहुँचने में स्वयं सक्षम हो जाती है। जो कार्य औरों के लिए असम्भव और अत्यन्त…होते हैं, वह उसके लिए सहज ही द्रुततम विकास का आनन्द देने वाले हैं। कुछ…के समान है इसीलिए यह प्रत्यक्ष है। उपर्युक्त दिशाओं में विकास का प्रयत्न आज हमारे लिए अचिंत ही नहीं उपहासास्पद भी लग सकता है, कवि के दृष्टिकोण से। अभी तो हम पंजाब में हिन्दी रक्षा आन्दोलन जैसे तंग दौर से गुजर रहे हैं जो काशी की तंग गलियों से भी कहीं अधिक तंग और सँकरा है। अभी तो अराजकता (मोटे तौर से जिसे प्रयोगवाद कहा जा सकता है; इसमें अपवाद भी है काफी) ने हमें गहरे धुंधलके में डाल रखा है। 

भाषा की अवहेलना किसी भी रचना को सहज ही साहित्य के क्षेत्र से बाहर फेंक देती है और शिल्प की अवहेलना कलात्मकता के क्षेत्र से। अब तक शिल्प व भाषा की साधना में जो कुछ प्राप्त हो चुका है उससे अज्ञान अक्षम्य है।

उसी को दोहराकर प्रस्तुत करना कोई माने नहीं रखता। उससे आगे जाने का संघर्ष ही सजीव साहित्य और सफल कविता कहलाई जा सकती है, जो कुछ दिनों याद रखी जा सके। मुक्त छन्द और गद्य में कविता लिखने वाले को छन्द और गद्य के सौन्दर्य से अच्छी तरह परिचित होना चाहिए। मुहावरे की गलती मैं अक्षम्य मानता हूँ। 

मेरा ख़याल है कि अब तक के रचे साहित्य में बहुत कम ऐसा है जो कायम रहने वाला है। इसका महत्व ऐतिहासिक ही रहेगा, जीवंत नहीं। जीवंत साहित्य में निराला, कुछ पंत, नरेन्द्र और थोड़ा सा बच्चन, कहीं-कहीं से थोड़ा मैथिलीशरण, फुटकर चीजें औरों की। बचा यही रहेगा-बाकी लोकगीत के श्रेष्ठ पद होंगे, जिनके अध्ययन और प्रचार की तरफ़ विशेष ध्यान होगा और साथ ही उर्दू का ख़ासा हिस्सा उस समय जिन्दा होगा और पिछला रीतिकाल का भी, अलावा महाकवि नवरत्नों के उर्दू और हिन्दी का साहित्य एक हो जायेगा। गद्य उर्दू के अधिक निकट होगा। बहुत कुछ बदलेगा। अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी, चीनी, फारसी, अरबी, बँगाली, जर्मन हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक भाषाएँ हो जायेंगी और इनके सीखने वालों के लिए ये विषय सबसे आसान होंगे। भाषाशास्त्र एक अनिवार्य विषय होगा जिसकी शिक्षा-प्रणाली कल्पनातीत रूप से आज से भिन्न होगी यह सब जभी सभव होगा…ले सकेगी और अपना भविष्य अपने आदर्शों के अनुरूप बना सकेगी। (1958) 

आशु कविता

आशु कवि होना साहित्य में कोई मामूली घटना नहीं होती। एक अच्छा सुथरा आशु कवि होना। स्वाभाविक और सच्चा आशु कवि। आशु कविता करने का यह मतलब है कि तत्क्षण किसी भी विषय पर सुनने-सुनाने योग्य पद-रचना प्रस्तुत कर देना। महत्वपूर्ण पॉइन्ट है रचना की तत्क्षणता भार क्योंकि इतने से काम नहीं चलेगा-उसका सुनने-सुनाने योग्य होना। 

ऐसे कवि बिरले ही हुए हैं जो आशु कवि भी रहे हों। और महान कवि भी। सामन्त युग के पारा कवियों में संकेत मात्र पर किसी भी विषय पर तुरन्त प्रभावी पद्य रचना प्रस्तुत कर देना कमाल की बात समझी जाती थी। और यह कमाल की बात है भी। 

पर यहाँ सोचने की बात यह है, यानी प्रश्न यह उठता है कि क्या कवि, एक सच्चा कवि अपनी विषय-वस्तु के लिए अन्य जनों का (चाहे विशिष्ट अन्य जनों का) मुँह जोहता है के नाना राग-विराग, उसके अपने सुख दुःख, हर्ष-विषाद के क्षण उसे मौलिक रचना के लिए उद्वेलित नहीं करते…दरबारी कवियों की एक यही परवशता थी। कवि को अपनी रचनाधर्मी शक्तियों को हर समय तैयार रखना पड़ता था मानो एक कसा-कसाया घोड़ा दरवाज़े पर तैयार खड़ा। हुकुम होते ही उस पर चढ़े, एड़ लगाई और हवा से बातें करने लगे। या यूँ कहो कि कवि एक मशीन था जिस जिसने जैसा मन चाहा बटन दबाया वैसा राग निकलने लगा या वैसा तार बजने लगा। एक कवि ये करतब दीर्घ, अटूट अभ्यास, चारों तरफ की गतिविधियों में गहरी दिलचस्पी मनोरंजन करने की सहजवृत्ति और सैकड़ों कविताएँ हर समय कंठस्थ रख सकने की क्षमता के बलबूते पर दिखा सकता है। 

सच्चे कवि के लिए ये करतब दिखाना जरूरी नहीं। न ही उसके लिए इसकी कोई अनिवार्यताहै। वो किसी सामंत या संरक्षक या अभिभावक के अधीन नहीं है। वो स्थितियों को अपनी आँखों देखता, अपनी अनुभूति की रोशनी में उन्हें समझता, अपने निजी तर्क से उन्हें परखता और उसे अपनी निजी शैली में प्रस्तुत करता है। दूसरों की मुँहदेखी बात कहना उसकी शान के खिलाफ है। सामन्ती युग में भी मर्यादावान श्रेष्ठ कवि अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न रखने के लिए यदि जब तब कुछ लिखते भी थे तो उसमें उनकी अपनी प्रतिभा थी। मौलिक छाप और शैली की गरिमा, प्रभावकारिता स्पष्ट लक्षित होती थी और उनकी बात हल्का मनोरंजन न होकर कोई मार्मिक उक्ति या सचमुच ही एक यादगार तोहफा हो जाती थी। ऐसे अनेक कवियों में अमीर देश में भी एक ‘तीसरी दुनिया’ है; उसकी आँख से तो ज़ियादा कुछ नहीं देखा-समझा गया है। ऐसा मेरा अपना (गलत हो या सही) ख़याल है।

मुझे लगता है कि साहित्यिक-सांस्कृतिक, राजनीति और प्रपंच से ऊब कर, और कुछ हवा का बदलता रुख देखकर, कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशकों ने सजग-सा होकर करवट बदली है। थोड़ी-सी। ये प्रायः नये प्रकाशन हैं। दूसरे यह कि मेरी पीढ़ी के आसपास के कुछ (‘पुराने’) लोगों ने अपना जमा-जोखा प्रस्तुत करने में आखिरकार गम्भीर रुचि दिखाना शुरू की है : इसमें थोड़ा-सा, या शायद खासा, श्रेय नये युवा प्रकाशकों का भी है। विदेशों में भी हिन्दी साहित्य (और इधर विशेष रूप से आधुनिक साहित्य) की चर्चा ने सोते हुए-से प्रकाशकों को, लगता है, चौंकाया है। ‘कविता बिकता नहीं’ का हीला भी अब कमजोर साबित हो रहा है। नयी कविता और उसे समझने के लिए उसका पूर्ववर्ती धारा को प्रस्तुत करने वाले संग्रह और समीक्षाएँ, पढ़े-लिखे नये पाठकों में लोकप्रिय हान लगी हैं। साहित्यिक विधाओं का शिल्प-पक्ष भी, अगर जिज्ञासा का नहीं तो, कुछ कौतुक का विषय बन गया है। सबसे बड़ा काम जो सातवीं और खासकर आठवीं दहाई ने किया है वह ह पत्रिकाओं के माध्यम से तथाकथित ‘बडी’ और रंगीन पत्रिकाओं के प्रति धीमे-धीमे एक उपेक्षा और ऊब का भाव पैदा करना और गम्भीर सार्थक साहित्यिक विवाद को प्रोत्साहन देना। प्रचार, पैसा और गुटबन्दी के बल पर ‘उठने’ और ‘आगे आने वालों’ के प्रति शंका पैदा करना। फिर यह कि अब युग समाज के उस तबके का आ गया है जो, और कुछ नहीं, तो, अपने वोट की शक्ति से सरकारों को तो थोड़ा बहुत तो बदल ही सकता है बल्कि कभी-कभी उन्हें पलट भी सकता है।

इस वोट की शक्ति के पीछे कितनी जनता की अपनी निजी वास्तविक शक्ति है, कितनी दूसरे जायज़-नाजायज़ यह भी विश्लेषण-विवेचना और विवाद का विषय हो सकता है।)

बड़ी पत्रिकाओं के मालिकों और खासकर बुद्धिजीवी परामर्शदाताओं की दृष्टि के केन्द्र में यह तबका कभी नहीं रहा था। वास्तव में है तो अब भी नहीं। मगर लघु पत्रिकाओं के प्रकाशकों-सम्पादकों-लेखकों कों की एक बड़ी जमात निश्चय ही खुली-आँखों केंद्र में इस तबके को और उसकी राजनीतिक ही नहीं, सांस्कृतिक कलात्मक शक्ति और क्षमता को बराबर देखती आ रही है। 

कला लोक-साहित्य, लोक-मंच हमारी दैनंदिन समस्याओं के मंच हैं। ‘पूर्वग्रह’ ने स्वयं इस बहुविधायुक्त ‘मंच’ पर भरपूर रोशनी डाली है। 

साभार- उद्भावना अंक- 97 (शमशेर बहादुर सिंह विशेषांक)

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