‘वकार’ अम्बालवी

वकार अम्बालवी की क्रान्तिकारी कविता

बढ़ो, बहादुरों बढ़ो, आलम वतन को खोलकर
करो मुकाबला अदू का तेग तोल-तोलकर।

वतन की आन तुमसे है, वतन की शान हो तुम्हीं,
वतन की लाज तुमसे है, वतन का मान हो तुम्हीं।

लड़ो तो इस तरह लड़ो, बहादुरी निसार हो,
मुकाबला हो मौत से तो मौत शर्मसार हो।

बहादुरों की हिम्मतों को इज्ने-जंग मिल गया,
वो ज़िन्दगी के रंग में क़जा का रंग मिल गया।

कटेंगे सर, टलेंगी अब बलाएँ मुल्को-कौम की,
कुमुक को आ रही है वो दुआएँ मुल्को-कौम की।

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