अष्टभुजा शुक्ल

मेरे गांव से मेरे घर तक कोई रास्ता नहीं जाता- अष्टभुजा शुक्ल

बहुत मोटी-मोटी, बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर एम.फिल, डी.फिल, पी.डी.एफ. क्या-क्या होता है लेकिन कविता को आम जन जितनी गहराई से समझता है-शायद शिष्ट समाज उस तरह से जिंदगी के मुहावरे को, जिंदगी की संवेदना को और उस लोक जीवन से जो संवेदना निकलती है उसे नहीं समझता। (लेख से)

अष्टभुजा शुक्ल
अष्टभुजा शुक्ल

सहसा गिरिराज जी ने मुझे फोन किया और कई महीनों बाद हम लोगों की बात हुई। उन्होंने मुझे इसजे में फोन किया जैसे बहुत अमर्ष भरे लहजे में उन्होंने कहा कि आप कहाँ रहते हैं, आपका पता-वता नहीं रहता है, न बातचीत होती है। मैंने कहा, ऐसा तो नहीं है मैं तो अपने गाँव में रहता हूँ बल्कि जिस घर में मैंने जन्म लिया है उसी घर में अभी तक रहता हूँ। हमारे घर तक हमारे गाँव कोई रास्ता नहीं पहुँचता, ये इफको परिवार के जो सदस्य मुझे लेने गए होंगे यह उनका अनुभव होगा। गिरिराज जी ने कहा कि ऐसा है कि यह सब बातें घुमा-फिरा कर इसलिए कह रहा हूँ कि आपने इफको का नाम सुना है। जरा-सा उच्चारण में या फोन में कुछ अंतर हो जाता है तो ठीक-ठीक इफको तो मैंने पछा कि किसका? उन्होंने कहा कि इफको, जो खाद बनाने वाली संस्था है। हमने कहा कि हाँ, हम लोग तो उसका उपयोग ही करते हैं। तो उन्होंने कहा कि उसकी ओर से एक सम्मान दिया जाता है-श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान। वो मेरी अध्यक्षता में आपको दिया जा रहा है। मित्रो! मैं तो सनाका खा गया कि हिंदी में मुझे सम्मान की दृष्टि से भी देखा जाता है। मैं कुछ रोष की दृष्टि से हिंदी में देखा जाता हूँ लेकिन आज मैं बहुत अच्छा वक्ता नहीं हूँ क्योंकि अच्छा वक्तव्य अच्छे वक्ता ही देते हैं। चूँकि यह पहली मर्तबा हुआ है कि हिंदी कविता के लिए श्रीलाल शुक्ल सम्मान दिया गया है तो कोई बहुत बड़ा वक्तव्य न देकर मैं हिंदी के एक बड़े लेखक के एक वाक्य का आश्रय लूं तो उन्होंने कहा है कि-कविता ही परम वक्तव्य है। उनके इस वाक्य का आश्रय लेकर और आप सबों को धन्यवाद देकर, मैं इस औपचारिक उद्बोधन से बच सकता हूँ लेकिन जीवन में, समाज में, संसार में कुछ न कुछ औपचारिकताएँ भी निभानी ही पड़ती हैं लेकिन मैं जो कुछ कहूँगा वह बहुत अनौपचारिक ढंग से आपके सामने कहना चाहूँगा। पहली बात यही कि मेरी बहुत सारी सीमाएँ हैं। मेरी भाषिक सीमाएँ हैं, मेरी स्थानीय सीमाएँ हैं, मेरी प्रौद्योगिकी की सीमाएँ हैं, मेरी लेखन और अध्ययन की सीमाएँ हैं। भाषा के नाम पर थोड़ी बहुत हिंदी, आधी-अधूरी संस्कृत, अंग्रेजी की सिर्फ वर्णमाला, गुजराती और बांग्ला लिपियों को आँख गड़ा-गड़ा कर उनके अक्षरों की पहचान कर सकता हूँ। बोलियों में अपनी भोजपुरी, अवधी। विश्वनाथ जी बैठे हुए हैं, अवधी के वह धुरंधर गढ़ हैं। राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, यहाँ तक कि कश्मीरी बोलियां जो हैं इस देश की जो इस देश को एक में मिलाती हैं, सम्मिलन करती हैं, देश को एकात्मी बनाती हैं उनको सुनकर समझा जा सकता है। इन्हीं सीमाओं के बीच रहते हुए जैसा कि मैंने कहा कि आज तक मैं उसी गाँव में ही नहीं बल्कि उसी घर में रहता है जिसमें मैंने जन्म लिया है। उत्तर प्रदेश का पूर्वी इलाका जिसे पूर्वांचल कहा जाता है जहाँ इन्से फ्लाइटिस जैसा घातक रोग जन्मजात से लेकर दस साल तक के शिशुओं तक को कालकवलित प्रतिवर्ष पच्चास वर्षों से कर रहा है। अखबारों में रोजाना समाचार आते हैं, और अब उन्हें बच्चे नहीं कहा जाता -कहा जाता है कि मरीजों की मृत्यु हुई। यानी कि पूरी की पूरी टर्मलॉजी-अब बच्चों को बच्चा नहीं कहा जा रहा है क्योंकि उससे ज्यादा संवेदना मर्माहत करने वाली पैदा होगी तो इतनी बड़ी-और अभी तक वो अभागा पूर्वांचल इंसेफ्लाइटिस से निजात नहीं पा सका है। हमारे देश के फूल मुरझा नहीं मर मित्रो! कुछ बातें मुझे इस अवसर पर खासतौर से कहनी है। इफको का इसलिए आभारी होना चाहिए कि क्योंकि जब आज हिंदी कविता बहुत दिनों से अवधी व भोजपुरी की कविता, खड़ी बोली की कविता बनने के बजाए विश्व कविता बनने की प्रतियोगिता में बहुत दिनों से खड़ी हो रही है अब आज किसान संस्कृति को लेकर खेती, किसानी, खेतीहर, मजदूरों की संवेदना को लेकर इफको ने जो प्रतिबद्धता दिखाई है, क्योंकि सारा का सारा कृषक समाज आज जिस हाशिये पर है और उसकी आगामी दिनों में जो दुर्गति होने वाली है।…मैं खुद एक लघुसीमांत किसान हूँ, अपने हाथों से और अपने फावडे से अपने खेतों का कोना गोड़ता हूँ। अपने हाथों से उसमें बीज बोता हूँ। एक एकड़ से ज्यादा खेती मेरे पास नहीं है। उस दर्द को, उस आकांक्षा, उस संघर्ष और उस दुनिया को सम्मानित करने के लिए इफको जैसी संस्था ने अपनी जो प्रतिबद्धता दिखाई है उसके लिए मैं आभार प्रकट करता हूँ। 

मित्रो! खेती आज की चीज नहीं है। आरण्यक संस्कृति से लेकर महाभारत में एक ऋषि थे-आयोध्योआम। उनके एक शिष्य थे उनका नाम था आरुणि। पांचाल देश के थे। तब भी सिंचाई-ऊँचाई होती थी, खेती-वेती होती थी, छोटी-छोटी क्यारियों में ही होती रही होगी। यह हुआ कि गुरु ने आदेश दिया शिष्य को कि जाओ खेतों की मेड़ी कटी जा रही है, उसको जाओ बाँध आओ। शिष्य गया गच्छ केदार खंडम बधनेति। जाओ खेत के मेंड को बाँध आओ। आरुणि तक्रत्करदार खण्डआ बंधुम नाशकनोत। अगर आप लोगों का अनुभव होगा तो जो मेड़ी होती है खेतों में और जो पानी का प्रवाह होता है-जब मिट्टी बहुत गल जाती है तो उसका बाँधना बहुत कठिन होता है। आप तटबंध को तोड़ सकते हैं, बाँध सकते हैं लेकिन खेतों की मेड़ में यदि पानी बह रहा है और मिट्टी गीली हो गई तो आप उसे नहीं बाँध सकते। आरुणि ने क्या किया केदार खण्डे सयाने विनिवेश। वह उसी पर सो गया, जब मिट्टी नहीं बंध रही थी और पानी इधर से उधर जा रहा था तो. वह उसी पर लेट गया, और खुद मेड़ बन गया।

यानी किसान अपने खेत का मेड़ बन जाता है और जीवन में कितनी सांसत उठानी पड़ती है! त्रिलोचन का एक बरवै है उनके अमोला में भीजत बस काले जड़ात जड़ काल औउ घामे घमात खेतिहर कई खाल। खेतिहर की त्वचा नहीं होती है या चमड़ी नहीं होती है, खाल होती है। खाल होती है उसकी। जो वर्षाकाल में भीजती है, जाड़े में ठिठुरती है और प्रचंड धूप में उसे सहती है।

हिंदी कविता में –

वर्षा आ रहा है रवि अनल 
भूतल तवा सा जल रहा. है चल रहा सन सन पवन तन से पसीना टल रहा। 
देखो कृषक सोणित सुखाकर 
हल तथापि चला रहे किस लोभ से इस आंच में 
वे निज शरीर गला रहे। 

मित्रो! खेती के प्रति लोभ आज भी भारतीय किसान के भीतर है, वह उसे छोड़ना नहीं चाहता लेकिन जो नारकीय यातना जैसा कठिन जीवन वह जी रहा है मेरा ख्याल है कि व्यवस्था की नजर उस ओर जाएगी-ठीक से। 

जहाँ तक कविता का प्रश्न है हिंदी में मैं थोड़ा अमर्ष के साथ कहना चाहूँगा कि कविता की वापसी और सम्मान की वापसी यह कोई समानान्तर प्रक्रिया नहीं है। लेकिन आज यह मित्रो! अवश्य है कि हिंदी में कविता का पाठक मैं तो सुनता हूँ मैं जानता नहीं हूँ कि फेसबुक आदि पर बाढ़ आई है कविताओं की और कवियों की। लेकिन आचार्य शुक्ल ने कहा था कि-कवि कर्म कठिन होता जाएगा। जैसे-जैसे विज्ञान का दखल समाज में बढ़ता जाएगा, तकनीकी प्रौद्योगिकी का विकास होगा, को उसमें से संवेदना को क्रियेट करना बहुत कठिन होता जाएगा। लेकिन आज जितना विस्फोट प्रौद्योगिकी का है उससे ज्यादा विस्फोट मैं कहीं कविता का देख रहा हूँ। लेकिन हकीकत क्या है कि हिंदी का प्रकाशक कहता है कि दो सौ से ज्यादा हिंदी की किताबें नहीं छपतीं। कविताएँ कहाँ जा रही हैं, किस पाठक को संबोधित हो रही हैं तो निश्चित रूप से अधेगति हिंदी कविता की हुई है। उसकी वजह रही के प्रतिरोध और संघर्ष की कविताएँ बहुत लिखी गई हैं पिछले दिनों में। घोषित कर-कर के लिखी गई हैं। लेकिन कविता का जो मर्म है, कविता का-जो करुणा उसका मूल मंत्र होता है जिसे भवभूति ने अंगार रस की बहुत दिनों की अवधरणा को धवस्त किया था और कहा था कि-‘एको रसः करुण्योक’ वह करुणा गायब होती गई है, वह मर्म शायद गायब होता जा रहा है इसीलिए जयदेव ने कभी कहा था-

हंगहौ चिनमय चित्ते चारुमणि, 
संवर्धयत र्धयतधवं त रसान, 
रे रे र्स्वे ऋण निर्विचार कवि दे

 कविता में यदि बहुत विचार किया गया, बड़ी अक्ल लगाई गई तो शायद कविता कविता नहीं हो सकती। उसके औचित्य चर्चा पर बहुत ज्यादा विचार हुआ है कि हिंदी कविता को थोड़ा अपना दिल खोलना चाहिए मेरा ख्याल है। भी मित्रो! हमारी संस्कृति बड़ी प्रवर्धमान परंपरा रही है। कुछ लोग तो कहते हैं कि जो आधुनिकता के हिमायती हैं बल्कि पोस्टहमॉडर्निजम, उत्तर-आधुनिकता और हम जिस ग्लोबल विलेज विश्व ग्राम की कल्पना दुनिया में आई थी, यह कौन सा ग्राम बन रहा है? एक आदमी दूसरे आदमी को पहचानने से इनकार कर रहा है। गाँव की तो यह संस्कृति नहीं रही है कभी लेकिन विश्व ग्राम का नाम दिया गया है इसे। संस्कृत कविता में जाड़ों के दिन हैं, एक कवि लिखता है 

कंथा खंड मिदम प्रयेक्छाकयदिवा 
स्वांयके गृहाड़ाक्रवकम 

या तो पति है पत्नी है एक छोटा सा बच्चा है। पत्नी कह रही है या तो कथरी का टुकड़ा इधर खिसका दो कंथा खंड मिदम प्रयेक्छाटयदिवा स्वां के गृहाड़ाक्रवकम या तो इस शिशु को तुम अपनी गोद में ले लो, चिपटा लो। 

केवल भूतल मत्र्नात भवताम 
पृष्ठेम प्रड़ालोच्यस

 यहाँ तो केवल जमीन पर मैं सोई हूँ। तुम्हारी ओर तो कथरी है और पुवाल भी नीचे बिछा हुआ है। यह संवाद चल रहा था तभी एक चोर उनके घर में घुसता है। 

जल पत्योनर निशि वित्यंतो रितिवच 

अब दोनों का संवाद उस चोर ने सुन लिया और उनके घर में तो कुछ है ही नहीं। चोर के भीतर वह संवेदना जगी, इतना मर्माहत हुआ उस घर की गरीबी से कि दूसरे के घर की चद्दर जो चुराके लाया था, वो उन दोनों के ऊपर डाल दी। और 

उदं र्निगतरू 

रोता हुआ उस घर से चला गया। मित्रो! कविता का यह काम है।

कविता आपके मर्म को, आपकी संवेदना को अगर हृदय परिवर्तन नहीं करती है तो मेरा ख्याल है कि कविता लोहा लक्कड़ बन जाती है। गणित के किसी प्राध्यापक ने लिखा था कि गणित की तरह कविता भी थ्री डायमेंशनल होती है, स्पेस में होती है लेकिन यह हकीकत है कि कविता के लिए थोड़ा कुछ न कुछ नैसर्गिक कवित्व होना चाहिए-उसे ग्रहण करने के लिए।

आज कविता की केमेस्ट्री की बड़ी बात मैंने सुनी है इन दिनों। कहते हैं केमेस्ट्री कविता की बन रही है। हमारे पड़ोस में माफ कीजिएगा कि एक केमेस्ट्री के लेक्चरर हैं, अब भी हैं बाबू दिनेश प्रताप सिंह। मेरी कुछ कविताएँ समकालीन जनमत के कवर पेज पर छपी हुई थीं। उन्हीं में एक कविता थी एक छोटा सा अंश था-

किसी जाति का दो बटा तीन भाग कीचड़ में, 
एक बटा चार भाग पानी में, 
शेष पानी के ऊपर है, 
जाति का कौन सा भाग हवा में।

बाबू दिनेश प्रताप सिंह ने वह कविता पढ़ी। वो केमेस्ट्री के लेक्चरर हैं। उन्होंने कहा कितना होगा एक बटा बारह होगा ना तो मित्रो! बहुत मोटी-मोटी, बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर एम.फिल, डी.फिल, पी.डी.एफ. क्या-क्या होता है लेकिन कविता को आम जन जितनी गहराई से समझता है-शायद शिष्ट समाज उस तरह से जिंदगी के मुहावरे को, जिंदगी की संवेदना को और उस लोक जीवन से जो संवेदना निकलती है उसे नहीं समझता।

मैं बहुत बड़ा वक्तव्य नहीं दूंगा। आखिरी बात जो मैं नहीं कहना चाहता था उसे भी लगता है कह दूं। मित्रों जब इस सम्मान की घोषणा हुई तो कुछ शुभचिंतकों के औपचारिक फोन आते ही हैं बधाई देने के लिए। कई मित्रों ने फोन किया। उनका सारा ध्यान इस सम्मान की राशि पर था। यानि हिंदी का लेखक आंकड़ों में नफे-मुनाफे में सोचता है। उसे श्रीलाल शुक्ल जैसे रचनाकार और राग दरबारी जैसी किताब के प्रतिरोध से कोई मतलब नहीं है-कम मतलब है। संवेदना, कविता, कहानी, उपन्यास से उतना सरोकार उसका नहीं है। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक पूछा सयाने लोगों ने उसकी राशि क्या है? मैंने कहा कि मैं एक किसान हूँ, मैं सिर्फ खेतों और खलिहानों के अनाज की राशि जानता हूँ। अनाज के एक बोरे में धन या सरसों के कितने दाने होते हैं और उसका समर्थन मूल्य क्या होता है आप सब जानते हैं, सरकार जानती है। लेकिन मित्रो यह सम्मान मेरे लिए आलू का बोरा नहीं है, अनाज का एक बोरा है। अगर आलू का भी बोरा है तो उसमें इतने छोटे-छोटे आलू हैं कि जिन्हें आप उबाल दीजिए तो छीलना मुश्किल हो जाएगा। अगर आप भून दीजिए तो राख के अलावा और कुछ नहीं मिलेगा। यदि आप उसे जमीन में गाड़ दीजिए तो निश्चित रूप से उससे अखुए फूटेंगे। इस अवसर पर मैं इफको परिवार जिसने हिंदी को, साहित्य को सम्मानित करने के लिए इतनी ऊँची परिकल्पना हिंदी की दरिद्र मानसिकता के बीच की है, मैं बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहता हूँ। बात व्यक्तिगत होगी गिरिराज जी ने माननीय मंत्री जी के सम्मुख एक देशव्यापी प्रस्ताव रखा है। मैं कोई प्रस्ताव नहीं रख रहा हूँ-मेरे गाँव से मेरे घर तक कोई रास्ता नहीं जाता। 

धन्यवाद। 

(31 जनवरी, 2016 को श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान-2015 के अवसर पर दिया गया वक्तव्य) 

साभार- बनास जन, मई-जून 2016

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