मनजीत भोला: हिंदी ग़ज़ल में एक नया नाम – योगेश शर्मा

प्रस्तुत समीक्षा का पाठ 03.12.2021 को हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय कुरुक्षेत्र एवं देस हरियाणा पत्रिका के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित “उजाले हर तरफ होंगे” ग़ज़ल संग्रह पर केन्द्रित समीक्षा गोष्ठी में किया गया था.

मनजीत भोला ने अपनी बात कहने के लिए ग़ज़ल विधा को चुना है. अब बाकायदा उनका एक ग़ज़ल संग्रह हमारे बीच है जोकि अपने आप में एक साहित्यिक कृति के रूप में विशिष्ट तो है ही परन्तु इसके साथ ही यह मनजीत भोला जैसे अनेक आम आदमियों की सामाजिक-राजनैतिक चेतना का भी परिचायक है. भोला को आम आदमी कहने के पीछे  मुख्य कारण है कि रचनाकार के तौर पर  इनकी कोई विशेष साहित्यिक पृष्ठभूमि नहीं रही है जिससे कि वो गंभीर साहित्य रचने के लिए निरंतर उर्जा प्राप्त करते. अपनी बहर सम्बन्धी जटिलताओं के कारण ग़ज़ल उतनी आसान विधा नहीं है. ग़ज़ल की शिल्प सम्बन्धी बारीकियों पर मजबूत पकड़ के लिए अथक प्रयास तथा वस्तुगत नवीनता के लिए निरंतर सम्भावनाओं के विकल्पों की तलाश दो महत्वपूर्ण पहलु है. जहाँ एक ओर ग़ज़ल में वस्तुगत वैविध्य तथा आत्मपरक रोमानियत के लिए बराबर अवकाश है वहीं दूसरी ओर कविताओं, कहानियों तथा उपन्यास की तुलना में इसकी अपनी सीमाएं हैं. आलोचना की दृष्टि से ग़ज़ल की तरफ ध्यान कम दिया गया है जबकि हिंदी ग़ज़ल एक सम्भावनाशील विधा है.

ग़ज़लगत सम्प्रेष्ण में रचनाकार के पास सीमित शब्दों के प्रयोग के लिए ही अवकाश होता है. इसी में इसकी खूबसूरती निहित है. इस सन्दर्भ में ग़ज़ल के शिल्प को इतने कम समय में साधना काबिले तारीफ तो है ही वस्तुगत संप्रेषण के स्तर पर दृष्टि का विकास भी दृष्टव्य है. रचनाकार का स्वयं का मानना है कि कुरुक्षेत्र आने के बाद वो देस हरियाणा पत्रिका के सम्पर्क में आए. उन्होंने अपने परिवेश का तथा देश भर में  घट रही असामाजिक घटनाओं का  सचेत दृष्टि से अवलोकन किया. रागनियों से शुरुआत करके उन्होंने हिंदी ग़ज़ल को अपनी बात कहने के लिए चुना.

गाँव देहात के वातावरण ने रचनाकार की सौन्दर्य विषयक मान्यताओं को प्रभावित किया है तथा देस हरियाणा द्वारा आयोजित गोष्ठियों तथा पत्रिका में निरंतर छपने वाली बहसों से उन्होंने वैचारिक गति प्राप्त की.

अमूमन यह सुना जाता है कि मैथिलीशरण गुप्त के कवित्व में बहुत बड़ा योगदान महावीर प्रसाद द्विवेदी का है, सरस्वती का है. यह बात पहले उतनी समझ में उतनी नहीं आती थी. अब भोला को देखता हूँ, भोला की गजलों को देस हरियाणा पत्रिका में देखता हूँ, वेबसाइट पर देखता हूँ तो महसूस होता है कि पत्रिका पर्दे के पीछे धीरे धीरे अपना काम करती ही रहती है. एक पत्रिका एक सहृदय से रचनाकार तक की विकास यात्रा में किस प्रकार सार्थक सहयोग करती है वह आपके सामने है.

भोला की गजलों का कथ्य सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. वस्तुगत सौन्दर्य के धनी शायर हैं भोला. रचना प्रक्रिया में रचनाकार अपने आस पास घट रही घटनाओं से ही अपने विषय प्राप्त कर रहा है. पहली ग़ज़ल में ही अपने तेवर सपष्ट करते हुए कुर्सी के रोब से अकड़े हुए लोगों को चेतावनी देते हुए वो कहते हैं-

नशा उतरे हुकूमत का तभी हाकिम कोई समझे
जहाँ तामीर कुर्सी है पराई वो ईमारत है

सत्ता से सीधा प्रशन करने के लिए वैचारिक पक्ष का मजबूत होना बहुत आवश्यक है. यह मात्र क्षणिक संवेग नहीं है. रचनाकार का भोगा हुआ जीवन इस तरह के सवाल करने की हिम्मत पैदा करता है. रचनाकार भूख को जानता है. उसके लिए सौन्दर्य के बाकि सभी प्रतिमान फीके हैं-

चाँद पूनम का बहुत ही खूब था
रोटियां लेकिनमुझे प्यारी लगी

भोला के लिए भूख चाँद से कहीं अधिक महतवपूर्ण है. यह स्पष्ट करते हुए वो चाँद को धिक्कारते नहीं हैं. एक रचनात्मक शिष्टता से सर्वाधिक प्रचलित उपमान ‘चाँद’ की अपनी अहमियत को समझते हुए एहितयात से रोटी को एक दर्जा ऊपर कर देते हैं. रचनाकार रोजी कमाने के शगल से वाकिफ है. यह शेर देखिए-

तप रहा था गात फिर भी जा चुकी है काम पर
कह रही थी चांदनी कुछ आज तो आराम है.

 क्या यहाँ चांदनी नाम का चयन अपने आप हो गया है? नहीं. यह रचनाकार के अवचेतन में चलने वाली रचनाप्रक्रिया है जो  विशेष शब्दों के चयन के लिए प्रेरित करती है. ‘चांदनी’ जैसे ही बराबर मात्रा भार के अन्य नाम हो सकते थे लेकिन जाने अनजाने चांदनी शब्द का ही चयन किया गया है. भूखे पेट की आग चाँद की शीतल चांदनी से कहीं ज्यादा ताकतवर है और रोटियों की ऊष्मा सही मायनों में सुखदायक. भूखे पेट के लिए चाँद रोटियों का ही उपमान है. यह हालत केवल मजदूरी करते गरीब आदमी की नहीं है. मध्यवर्गीय व्यक्ति भी उतना ही व्यथित है. आसान नजर आती सरकारी नौकरी में व्यक्ति का उसूलों पर रहना मुश्किल हो जाता है. उसकी टीस भोला की भी ग़ज़लों में है. कुछ अशआर देखिए-

खुशबुएँ थी जिन गुलों में बस वही तोड़े गए
काम जो आए किसी के गिरती उसपे गाज है

उसूलों की लड़ाई कहीं मैं जीत ना जाऊं
यही सोचकर मुझको मेरा अफसर डराता है.

यह विडंबना है कि छोटी से छोटी सरकारी गैर सरकारी व्यवस्था में व्यक्तिगत राजनीति हावी है. हर व्यक्ति जो तुच्छ राजनीति में लिप्त है हीनता की ग्रंथि से ग्रस्त है. ईमानदार व्यक्ति जो लग्न से काम करना चाहता है उसे किसी न किसी तरह जाल में फंसाने के षड्यंत्र रचे जाते हैं. किसी के काम आने वाले व्यक्ति सबसे पहले रस्ते से हटाया जाता है. यह वर्तमान व्यवस्था की सच्चाई है. अफसरों के नीचे रहकर भी कुछ लोग हैं जो उसूलों पर पहरा देते हैं.

इस संग्रह की गजलों में सामाजिक विद्रूपताओं के साथ सांस्कृतिक ह्रास तथा अन्य अनेक प्रत्याशित-अप्रत्याशित घटनाओं के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं. एक ग़ज़ल के शेर देखिए-

है करोड़ों का बजट जब मंदिरों के वास्ते
क्या इजाफा हो सकेगा तुम कहो रुजगार में

जान की क्या बात कीजे तुमसे प्यारी तो नहीं
कीमतें मिलती कहाँ है जान की बाजार में

भोला का रचनाकार जानता है कि वैश्विक ग्राम के बड़े बाजार में महज पूंजी की ही कीमत है. मरे हुए मनुष्यों तक को भगवान् के रूप में तब्दील करके वोट जुटाए जाने के प्रयासों से जाहिर है कि ईश्वर जैसे तात्विक चिंतन के विषय को इन्वेस्टमेंट के व्यापक स्कोप के रूप में देखा जा रहा है. गोदान में झुनिया गोबर को जान देने का अरथ हर परिस्थिति में निबाह करना बताती है. पूंजी के केन्द्रीकरण तथा दिनों दिन बढ़ती यांत्रिकता के इस माहौल में जहाँ मनुष्य खुद क्रय विक्रय की वस्तु बनता जा रहा है, कितने लोग ऐसे बचे हैं जो जान देने के इस अरथ से वाकिफ होंगे? ईमानदार व्यक्ति जो सत्ता से सवाल करने की हिम्मत जुटाता है वह दिन दहाड़े गायब हो जाता है. इस माहौल में भोला का यह सवाल लाजमी है कि आखिर जान की कीमत क्या है? महामारी के साये में बीते गत दो वर्षों  ने इस बात को और पुष्ट किया है कि में वर्तमान भारतीय समाज में आदमी की जान की कीमत नगण्य है. यहाँ ‘आदमी की जान’ भोला की अपनी सरकारी नौकरी पर कार्यरत एक उसूलों वाले व्यक्ति की जान के समानांतर व्यापक स्तर पर मानवीय संवेदनाओं  का प्रतीक हो जाती है.

शिल्प के स्तर पर प्रतीकों के चयन में एक प्रयोग भोला ने किया है. दो अशआर देखिए-

बागबां को डूबकर अब मर ही जाना चाहिए
एक भी तितली नहीं मह्फूज़ इस गुलज़ार में

तितलियाँ बेख़ौफ़ जिसमें उड़ सकें
इस तरह आबाद ये गुलज़ार हो

नामवर सिंह ने अपनी किताब छायावाद में लिखा है- “अपनी सार्थकता प्रमाणित कर चुकने के बाद जब ‘रूप’ अथवा ‘फॉर्म’ किसी अतिरिक्त भाव की व्यंजना करता है तब वह प्रतीक हो जाता है.” अब गोदान की मालती को याद कीजिए. उसकी चारित्रिक विशेषता बताने के लिए तितली शब्द का प्रयोग किस अर्थ में किया गया था यह बताने की यहाँ आवश्यकता नहीं.

मनजीत भोला का यह प्रयोग साहसिक है और कदाचित मौलिक भी कि उन्होंने तितली जैसे शब्द को एक भिन्न सन्दर्भ देकर उसका नवीन अर्थ उद्घाटित किया है. उसके रूढ़ व्यंजित अर्थ की बजाय यहाँ  तितली देश की बेटी मात्र का प्रतीक हो गया है. बागबां जोकि संरक्षक के तौर पर समझा जाता था उसका किरदार शक के घेरे में आ गया है.

काव्य में विचार की अभिव्यक्ति स्पष्ट नहीं होती, बहुधा इशारा भर किया जाता है. पाठक की जिम्मेदारी है कि वह उस अर्थ तक पहुंचे जहाँ रचनाकार उसे ले जाना चाहता है. बलात्कार जैसे संगीन मामले को बिना नाम लिए उद्घाटित करके भोला अपनी बेहतरीन कलात्मकता का परिचय देते हैं. इस प्रकार के अशआरों में उनके काव्यगत सम्प्रेष्ण की व्यापकता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है.

इसके आलावा विरोध के स्वर के लिए जिन भी प्रतीकों का प्रयोग हुआ है पहले पहल सब अपने आप में एक जीवंत बिम्ब प्रस्तुत करते हैं-

मुसाफिर शाहराहों के मुबारक हो सड़क तुमको
हमें प्यारा वो रस्ता है जो खेतों से मिलाता है.

हरखुआ को नींद अब आ ही जाएगी
बेटियों के हाथ पीले हो गए.

चमारों की ये बस्ती है यहाँ हर प्यास प्यासी है
यहाँ तो भूक भी भूकी ही रहकर है पली यारों

 जहाँ एक ओर फल, फूल, बाग़, रोटियां, हलधर, पसीना, खेत का रास्ता, तीतर, गुलाब, कांटे, हाथों का पीला होना आदि आदि सब देहात की जीवंतता का प्रमाण हैं वहीं देहात की विद्रूपताओं को भी सावधानी से इन्हीं प्रतीकों के जरिए उधेड़ कर रखा गया है. हरखुआ को नींद बेटी के हाथ पीले होने के बाद ही क्यों आएगी इसमें ग्रामीण क्षेत्र की भयावहता का चित्रण है. चमारों की बस्ती के रूप में भोला ने तमाम दलितों की बात की हैं. जाहिर है यह प्यास और भूख जिसका जिक्र किया गया है केवल दैहिक नहीं है. देह से आगे बढ़कर अब चेतना की बात है.

बनारस के नसीबों में लिखी फिरदौस की महफ़िल
मगर जश्न ए कज़ा मेरा मुर्शिद मनाता है

प्रारम्भिक काल में रचनाकार अपनी परम्पराओं से ही उर्जा ग्रहण करता है. कबीर को अपना मुर्शीद बताकर भोला अपनी विचारगत प्रतिबद्धता स्पष्ट करते हैं. कबीर, रैदास से प्रेरित एक आदर्श समाज की परिकल्पना भी भोला के यहाँ दृष्टिगोचर होती है. इस कल्पना का स्वर आदर्शवादी है मगर उसके मूल में चेतना आधुनिक है. इस तरह की दो ग़ज़ल उनके संग्रह में संकलित हैं, देखिए-

बागों में गुल खिले तो मैं ग़ज़ल कहूँ
महकी हवा चले तो मैं ग़ज़ल कहूँ

कितना हसीं मंजर है हरा भरा
बारूद नहीं उगे तो मैं ग़ज़ल कहूँ

मिलके गले यहाँ सलमा को ईद की
सीता बधाई दे तो मैं ग़ज़ल कहूँ

ऐसी घटा उठे सरहद के पार भी
सिली हवा चले तो मैं ग़ज़ल कहूँ

        और दूसरी-

कम से कम इतना तो अब सरकार हो
चोर के हक में न चौकीदार हो

भूख दस्तक दे रही हो जिस घडी
एक भी चूल्हा नहीं बीमार हो

हक पसीने का अदा हो वक्त पर
हाथ में सबके रुजगार हो

तितलियाँ बेख़ौफ़ जिसमें उड़ सकें
इस तरह आबाद ये गुलज़ार हो

गर सियासत खेल अपना छोड़ दे
राम का ‘भोला’ रहीमा यार हो

पहली ग़ज़ल में रचनाकार शांति के पक्ष में बात रखता है और एक ऐसे आदर्श राष्ट्र की कल्पना करता है जो धर्म आदि के भेदभाव से सर्वथा मुक्त हो. यह चिंता रैदास, कबीर से प्रारम्भ होकर तमाम प्रगतीशील रचनाकारों के चिंतन में समान रूप से उपस्थित है. समय के साथ सरहद की मौजूदगी ने इस चिंता को और अधिक विकट बनाया है. भोला के चिंतन में सरहद के दोनों तरफ शांति की एक अहम चिंता है. एक शेर और इसी तरह का देखिए-

बताओ मत हमें हाकिम मरे उस पार कितने हैं
यहाँ जब लाश आती है बड़ी तकलीफ होती है”

 यहाँ अनायास ही ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक का ‘चन्द्रगुप्त’ याद आता है जो कहता है कि “जीवन विश्व की सम्पत्ति है”. यह पवित्र और स्पष्ट मानवीय दृष्टिकोण है. उग्र राष्ट्रवाद के इस परिदृश्य में जब अदृश्य सीमाएं मनुष्य के मनो मस्तिष्क पर अत्यधिक हावी हैं सीमाओं रहित विश्व मानव की संकल्पना अपने आप में एक साहस का काम है.

दूसरी ग़ज़ल में सांप्रदायिक तनाव के साथ साथ देश के वर्तमान आर्थिक हालातों को केंद्र में रखा गया है. भोला सावधानी से बेरोजगारी का मुद्दा उठाते हैं. ठीक अगले शेर में महिलाओं की सुरक्षा का. दोनों परेशानियाँ एक क्रम विशेष में एक दुसरे से जुडी हई हैं. वर्तमान समय का एक बहुत बड़ा मसला युवाओं में व्याप्त बेरोजगारी है. रोजगार की अनुपलब्धता युवाओं में व्याप्त निराशा तथा लक्ष्यहीनता का एक बड़ा कारण है. भोला ने विशेषतः बेरोगारी और उसके सम्भावित परिणामों को मद्देनजर रखकर भी शेर कहे हैं-

कब तलक बेकार फिरेंगे नौजवां
हाथ में हथियार होंगे देखना

बेरोजगार युवा अपनी उर्जा को कहाँ केन्द्रित करे? हमारे समय का यह एक बड़ा सवाल है. ऐसे में अनेक खतरे समाज के लिए पैदा होते हैं. महिलाओं की सुरक्षा हो या विद्रोह उसका मूल कारण अच्छी शिक्षा व्यवस्था की कमी ही है.

वर्तमान समय में पर्यावरण की सुरक्षा एक बड़ा चिंता का विषय है. एक आध ग़ज़ल भोला के इस ग़ज़ल संग्रह में पर्यावरण को भी समर्पित है. ग़ज़ल में पर्यावरण सुरक्षा से सम्बन्धित शेर देखना एक नया अनुभव है. भोला का शेर देखिए-

जरूरत है यही सबकी यही आधार जीवन का
तिरी नस्लों की खातिर तो बचा ऐ यार पानी तू.

ऐसा कहा जाता है कि यह पर्यावरण और धरती के तमाम संसाधन हमारी सम्पत्ति नहीं हैं बल्कि यह तो हमारी आने वाली पीढ़ियों की हमारे पास अमानत है. भोला का उपरोक्त शेर इसी दृष्टि से लिखा गया है.

इसके आलावा दलित, स्त्री, किसान, बाल श्रम, मजदूर आदि अनेक विमर्श इस ग़ज़ल संग्रह में अपनी प्रखर उपस्थिति दर्ज कराते हैं. 

कलात्मक विधाएँ चिंताजनक सामजिक स्थितियों की सीधी प्रविष्टियाँ मात्र नहीं होती. कला और विचार  का उचित सामंजस्य जहाँ रचना की उम्र बढ़ाता है वहीं वस्तु वैविध्य रचनाकार को रचनात्मक अवरोध से बचाने का कार्य करता है. भोला कलात्मकता के स्तर पर समृद्ध शायर हैं तथा उनमें प्रयोग करने का साहस है. वे अपनी रचनाओं में निरंतर वस्तुगत वैविध्य बनाए रखेंगे. इसी आशा के साथ धन्यवाद.

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