आम जन के संघर्षों के साथ खड़ी ‘उजाले हर तरफ होंगे’ की गज़लें – अरुण कुमार कैहरबा

आशिक, माशूक, हुस्न, इश्क, साकी और शराब जैसे विषयों तक महदूद रहने वाली गज़ल आज सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को प्रकट करके वंचित और शोषित वर्ग के संघर्षों के साथ खड़ी हो रही है। गज़ल की प्रगतिशील पंरपरा की कड़ी में ही सत्यशोधक फाउंडेशन, कुरुक्षेत्र द्वारा मनजीत भोला का पहला गज़ल संग्रह- ‘उजाले हर तरफ होंगे’ प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह ने गज़ल में नई संभावनाओं की उम्मीद जगाई है और गज़ल प्रेमियों को सुखद अहसास से भर दिया है। भोला के संग्रह में 50 से अधिक गज़लें हैं। ये गज़लें किसान, मजदूर, दलित, वंचित व शोषित वर्गों के जीवन-संघर्षों और आकांक्षाओं को बड़ी संजीदगी के साथ आवाज प्रदान करती हैं। इनमें संवेदनशून्य व क्रूर शासन सत्ताओं से टकराने का साहस मुखर होकर सामने आया है। अहंकार के नशे में चूर सत्ताओं की चालबाजी और खून में रंगे हाथों को भोला साफ-साफ देखते हैं। वे कहते हैं-

नशा उतरे हकूमत का तभी हाकिम कोई समझे
जहाँ तामीर कुरसी है पराई वो इमारत है।
रंगे हैं हाथ जिसके खून से खैरात वो बांटे
कयामत है कयामत है कयामत है कयामत है।

झूठी सरकारी घोषणाओं को भोला आड़े हाथ लेते हैं। वे जिंदगी के लिए रोटी के सवाल को सबसे अहम मानते हैं। यदि लोगों को दो वक्त का मान-सम्मान के साथ भोजन ही नहीं मिला तो फिर सरकारी घोषणाओं से कोई फायदा होने वाला नहीं है-

ये दिया है वो दिया है रोटियां पर हैं कहाँ
घोषणा सरकार की हमको करे बदनाम है।

गज़लकार मानवता के लिए संघर्षरत शक्तियों के पक्ष में पूरी मजबूती से खड़ा होता है। वह श्रम की अहमियत को शिद्दत से पहचानता है और विकास में श्रम और श्रमिकों की योगदान की प्रशंसा करता है। उनकी पक्षधरता में कोई कन्फ्यूजन नहीं है। यह शेर देखिए-
मेरे महबूब यारों से कभी तुमको मिलाऊँगा
कोई रिक्शा चलाता है कोई फसलें उगाता है।

साथ ही भोला की गज़लें मजदूर-किसानों की कड़ी मेहनत के बावजूद उनके यहां पसरी गरीबी के प्रति भी संजीदा हैं- 

मुफलिसों की बस्तियों में ये नजारा आम है
धूप को दिन खा गया है बेचरागां शाम है।
तप रहा था गात फिर भी जा चुकी है काम पर
कह रही थी चाँदनी कुछ आज तो आराम है।

भोला की गज़लों में गरीबी और बेबसी की मार झेल रहे ग्रामीण अंचल के बच्चे यदा-कदा दिखाई देते हैं। उनके पोषण, स्कूलों से दूरी और उनकी जीवन स्थितियों पर वे पूरी संवेदनशीलता के साथ नजर दौड़ाते हैं-
गेट के भीतर नहीं जो जा सके इस्कूल के
आपकी हर योजना उनके लिए बेकाम है।

मजबूरियों और बाल मन को इस शेर में बहुत करीबी से पकड़ा गया है-
खेलने की सिन है जिनकी बोझ ढो सकते नहीं
हाय रे मजबूरियां हल्के गुबारे बेचते।

सरकारी स्तर पर शिक्षा का मजाक बनाए जाने की चिंताजनक स्थितियों को भोला ने इस तरह भी बयां किया है-
महकमा तालीम का उसको मिला सरकार में
पास दसवीं कर न पाया शख्स जो छह बार में।

गज़लकार केवल विभिन्न प्रकार के नामों वाली योजनाएं घोषित करने का प्रचार करने और उनके क्रियान्वयन के प्रति बेरूखी के कारण सरकार को ही कटघरे में नहीं खड़ा करता, बल्कि अच्छी शिक्षा के प्रति ध्यान नहीं देने वाले अभिभावकों पर भी सवाल उठाता है, जोकि अंबेडकर का नाम तो लेते हैं और बच्चों को शिक्षा के लिए बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दे सकते-

इक कलम औ कुछ किताबें दे नहीं सकते अगर
झोंपड़ी पे क्यों लिखा है अंबेडकर का नाम है।

बच्चे आज यांत्रिकता और दिखावे की जिंदगी की तरफ तेजी से अग्रसर हो रहे हैं। शहरों में अच्छी शिक्षा के लिए दौड़-धूप कर रहे बच्चों को और सुविधाएं भले मिल रही हों, लेकिन प्राकृतिक परिवेश और उसके अनुभव उनके हाथ से छिटक गए हैं। इसको भोला ने देखिए किस तरह बयां किया है-

बारिशें अब ना रही वो, ना रही वो कश्तियां
सब खिलौने बालकों के हाथ से खोने लगे।

शेर में शिक्षा और सौहाद्र्र का यह नजारा पेश कर गज़लकार पाठकों व श्रोताओं की वाहवाही लूट ले जाता है-

नाज़ ने तख्ती गढ़ी बस्ता बनाया नूर ने
इस तरह भोला मिरा इस्कूल में जाना हुआ।

हर बड़ी जंग कलम से लड़ी जा सकती है। कलम को हथियार बनाकर जंग जीतने का जज़्बा हमें उत्साह से भर देता है-

अब कलम से ही लडूंगा जंग मैं हो
गई है म्यान से शमसीर गुम।

इन गज़लों में आनंद और उल्लास के पल भी हैं और विपदाओं से बोझिल पलों को भी बहुत सुंदर ढ़ंग से प्रकट किया गया है। शिक्षा के निजीकरण की तरफ बढ़ती जा रही सरकारी नीतियों के कारण शिक्षा आम आदमी के बच्चों के हाथ से छिटकने का खतरा मंडरा रहा है। आने वाले समय में क्या स्थितियां बनेंगी, चेतावनी देते हुए गज़लकार ने भविष्यवाणी कुछ यूं की है-

मकतब के दर खुले हुए थे सबके वास्ते
थी फीस भी मुआफ अभी कल की बात है। 

भोला की गज़लों में जहां एक तरफ मजदूरों और उनके बच्चों की दशा को दर्शाया गया है, वहीं किसानों के हको-हुकूक के लिए भी आवाज बुलंद की गई है। किसानों की दिन-रात हाड़तोड़ मेहनत से उपजाई हुई फसलों का मोल उसे नहीं मिलता है। उसकी मेहनत की कमाई को कईं ताकतें हड़प कर जाती हैं। जो मिट्टी के साथ मिट्टी होकर फसल पैदा करता है, उसकी बजाय बिचौलियों को ज्यादा लाभ मिलता है। यही नहीं, उसकी जमीन पर पूंजीवादी ताकतें और कारपोरेट कंपनियां उसकी जमीन पर गिद्ध दृष्टि लगाए हुए हैं। इन स्थितियों को व्यक्त करते संग्रह की गज़लों के कुछ शेर देखिए-

सूख ना पाए पसीना होट नम होते नहीं
रोटियां उगती हैं कैसे हलधरों से पूछिये।
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बचा है क्या मियाँ हलकू तुम्हारे खेत में बाकी
उगाए थे चने तुमने मगर भुनवा चुका हूँ मैं।
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आज गर न जागे तो बारहा कहोगे कल
खेत ये हमारे थे क्यारियाँ हमारी थी।

मीडिया के द्वारा सच को उजागर करने की बजाय जब महिमागान ही होता है। तो आम आदमी का जी उससे उकता जाता है। शायर पत्रकारों द्वारा अपनी कलम को गिरवी रखने से खासा आक्रोशित है। हमने पत्रकारों को बड़े-बड़े सियासतदानों से सवाल करते हुए देखा है। लेकिन जब पत्रकार अपनी कलम की जिम्मेदारी से बेपरवाह हो जाएं तो शायर किस तरह से पत्रकारों से सवाल पूछता है। इसकी बानगी देखिए-

है कहाँ गिरवी कलम, कुछ ऐ सहाफी तुम कहो
खुदकुशी लिखते कत्ल को क्या गजब अंदाज है।

सच से मुंह मोड़ चुके अखबारों के प्रति आम आदमी के मन में क्या भाव पैदा होता है, यह शेर दिखा रहा है-

और कुछ तो पेश अपनी चल नहीं सकती यहाँ
चाहता है जी लगादूँ आग मैं अखबार में।

मौजूदा दौर के मुख्य धारा के मीडिया से अब उम्मीदें नहीं रखी जा सकती। ऐसे समय में जब घर-घर में चैनल कहर बरपा रहे हैं। ऐसे में शायर की कल्पना पर गौर फरमाईये-

कम-अज-कम वो आदमी तो चैन से होगा यहाँ
जो किसी चैनल किसी अखबार से वाकिफ नहीं।

भोला के गज़ल संग्रह में अनेक स्थानों पर नाजुकता और संवेदनशीलता की प्रतीक तितलियों व चिडिय़ों का जिक्र आता है। लेकिन आज के हिंसक दौर में उनके साथ सलूक कैसा होता है। कौन उन्हें कुचलने पर उतारु है। मौजूदा परिवेश की क्रूरताओं को पेश करते कुछ शेर देखिए-

बागबां को डूबकर अब मर ही जाना चाहिए
एक भी तितली नहीं महफूज इस गुलजार में।

– अरुण कुमार कहैरबा

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