रविंद्रनाथ टैगोर

रविन्द्रनाथ टैगोर की कविता – धूलि-मन्दिर

भजन-पूजन साधना-आराधना सब-कुछ पड़ा रहे,
अरे, देवालय का द्वार बन्द किए क्यों पड़ा है!
अँधेरे में छिपकर अपने-आप
चुपचाप तू किसे पूजता हैं? 
आँख खोलकर ध्यान से देख तो सही – देवता घर में नहीं हैं। 

देवता तो वहाँ गए हैं, जहां माटी गोड़कर खेतिहर खेती करते हैं –
पत्थर काटकर राह बना रहे हैं, बारह महीने खट रहे हैं। 
कैसी धूप, क्या वर्षा, हर हाल में सबके साथ हैं
उनके दोनों हाथों में धूल में लगी हुई है
अरे, तु भी उन्ही के समान स्वच्छ कपड़े बदलकर धूल पर जा।

मुक्ति! मुक्ति कहाँ पाएगा भला, मुक्ति है कहाँ?
स्वयं प्रभु ही तो सृष्टि के बन्धन में सबके निकट बँधे हुए हैं।
अरे, छोड़ो भी यह ध्यान, रहने भी दो फूलों की डलिया
कपड़े फट जाने दो, धूल-बालू लगे
कर्मयोग में उनसे मिलाकर पसीना बहने दो।

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