भारत माता -एक विमर्श – सुरेन्द्रपाल सिंह


‘भारत माता की जय’ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान सबसे अधिक लगाए जाने वाला नारा था। भारत माता का उल्लेख सबसे पहले किरणचन्द्र बंदोपाध्याय के नाटक में आया था जो सन 1873 में खेला गया था। भारत भूमि को जीवन का पालन करने वाली माता के रूप में रूपायित कर उसकी मुक्ति के लिए उसकी विजय का उद्घोष करने वाला यह नारा राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यकर्ताओं में नए उत्साह का संचार करता था।


कुछ वर्ष पहले घूमने के लिए महाराष्ट्र में दौलताबाद का किला देखने के लिए जाना हुआ था। उस विशाल किले के मुख्य द्वार पर किले के अंदर दर्शनीय स्थानों की सूची में भारत माता का मंदिर भी अंकित था। उत्सुकतावश जब उस स्थान पर गए तो मंदिर के नाम पर एक बरामदे में नारंगी रंग की साड़ी पहने हाथ में भगवा ध्वज लिए गुस्से में गुर्राते हुए शेर पर बैठी एक महिला का चित्र बनाया हुआ मिला। पुजारी भी था, चढ़ावा भी चढ़ाया जा रहा था और मंत्रोच्चारण भी हो रहा था। एक ऐतिहासिक इमारत में उस इमारत के इतिहास से किसी प्रकार का वास्ता न रखने वाले मंदिर का विचार काफी अटपटा सा लगा। देवी देवताओं की मान्यता तो धार्मिक आस्थाओं और ग्रंथों से चलती आ रही है लेकिन उसी परिपाटी पर भारत माता को  धार्मिक देवी की तरह मंदिर में स्थापित करके पुरातन परंपरा में पुजारी, आरती, पूजा, चढ़ावा, दक्षिणा आदि का यह विचार किसी भी प्रकार के गले नहीं उतरा। बाद में ऐसा ही मंदिर माउंट आबू की झील के किनारे देखने को मिला तो सहज ही मन में सवाल उठा क्या भारत माता प्रत्येक भारतीय की माता नहीं है। भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा मंदिर, पूजा-पाठ आदि आदि  का हिस्सा नहीं है तो मंदिर वाली भारत माता से उसका क्या वास्ता? भारत माता के मंदिर उज्जैन, हरिद्वार, ऋषिकेश आदि स्थानों पर बनाए गए हैं और जल्द ही कुरुक्षेत्र में पांच एकड़  जमीन पर ऐसा एक मंदिर बनने बनने जा रहा है।
लंबे अरसे से एक नारा हवा में रहा है- दूध मांगोगे तो खीर देंगें, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगें। गला फाड़कर पूरी ताकत से यह नारा लगाने वाला से आप कश्मीर की बजाए कश्मीरियों का जिक्र कर बैठोगे तो यूं लगेगा जैसे उनके जले पर नमक छिड़क दिया हो। ऐसा ही विरोधाभास हमें उनके भारत माता को देवी का रूप देकर पूजा-पाठ मंदिर पुजारी तक सीमित करने और भारत माता की विस्तृत व्याख्या के रूप में दिखाई देगा।


बात 1920 के दशक की है जब नेहरू जी  संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के किसानों के नेता बन चुके थे। इसी सिलसिले में एक गांव में किसानों ने उनका स्वागत भारत माता की जय के नारों के साथ किया। उन्होंने ग्रामीणों से संवाद शुरू किया। उनका सवाल था कि आप जिसका जयकारा लगा रहे हैं वह भारत माता कौन है?

जवाब कुछ यूं थे:
–  यह धरती ही हमारी माता है।
– ये नदी, पहाड़, खेत-खलिहान यही सब मिलकर भारत माता बनती है। इन्हें अंग्रेजों के जुल्म से आजाद कराना है।


तब नेहरू जी ने कुछ बातें रखी:
-यह सब बातें जो आपने भारत माता के बारे में बताई हैं तो सही  लेकिन यह तो हमेशा से हैं।
-आखिर धरती को या नदी, पहाड़ों को तो आजादी नहीं चाहिए। -अंग्रेजी राज में जुल्म, गरीबी और भूखमरी का सामना तो आखिरकार हम भारत के लोग ही कर रहे हैं। अगर हम ना हों तो इस धरती को भारत माता कौन कहेगा?

– तो जब हम भारत माता की जय बोलते हैं तो हम भारत के 30 करोड लोगों की जय बोलते हैं।
– इसलिए हम सब भारत माता का एक-एक टुकड़ा है और हम सबसे मिलकर ही भारत माता बनती है।
–  तो जब भी हम भारत माता की जय बोलते हैं तो अपनी ही जय बोल रहे हैं। और, जिस दिन हमारी गरीबी दूर हो जाएगी, हमारे तन पर कपड़ा होगा, हमारे बच्चों को अच्छी से अच्छी तालीम मिलेगी, हम सब कुशल होंगे, उस दिन भारत माता की सच्ची जय होगी। उपरोक्त संवाद और भारत माता की देवी की तरह मंदिर में पूजा-पाठ के मद्देनजर दो विरोधी दृष्टिकोण हमारे समक्ष हैं। भारत माता को धार्मिक रूप देकर उसे संकीर्ण दायरे में समेटते हुए, पुजारी- पुरोहित की रोजी रोटी का माध्यम बनाते हुए एक बनावटी आस्था का तंत्र खड़ा कर देना या इसके विपरीत प्रत्येक भारतवासी का बेहतर  समाज की रचना करने के सपनों के साथ भारत माता का तादात्म्य पैदा करना।

पाठक  दोनों पक्षों की आलोचनात्मक तुलना कर सकते हैं।
विमर्श को आगे बढ़ाते हुए फिर एक बार नेहरु जी का 15 अगस्त 1948 को लाल किले की प्राचीर से  भाषण को याद करना आवश्यक लगता है।
– क्या चीज है हिंदुस्तान?…….. सिवाय इसके कि जो आप हैं, और मैं हूं और लाखों और करोड़ों आदमी है जो इस मुल्क में बसते हैं।…….. हिंदुस्तान हमसे अलग कोई चीज नहीं है।  हम हिंदुस्तान के छोटे टुकड़े हैं।………. जय हिंद हम पुकारते हैं और भारत माता की जय बोलते हैं, लेकिन जय हिंद तो तब है जब हम सही रास्ते पर चलें, सही ख़िदमत  करें और हिंदुस्तान में ऐसी बात ना करें जिनसे इसकी शान कम हो,  कमजोर हो।
विमर्श को समेटते हुए इतना स्पष्ट है कि विषय अत्यंत सरल है। समस्या केवलमात्र इतनी है कि भारत माता की अवधारणा को क्या दिशा दी जाए। भारत देश का प्रत्येक बाशिंदा अपने आप को देश का अटूट हिस्सा मानते हुए जनमानस की समग्रता को भारत माता माने या इसकी व्याख्या को कूपमंडूक तरीके से धार्मिक आवरण देते हुए पंडों- पुजारियों के हवाले कर दी जाए।

(लेखक लोकविद्, सामाजिक चिंतक और इतिहास के जानकार हैं।)
संपर्क – 9872890401

सुरेंद्र पाल सिंह

जन्म - 12 नवंबर 1960 शिक्षा - स्नातक - कृषि विज्ञान स्नातकोतर - समाजशास्त्र सेवा - स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन - सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर - देस हरियाणा कार्यक्षेत्र - विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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