सिंघु बॉर्डर पर निहंगों की शर्मनाक कारस्तानी – सुरेंद्र पाल सिंह


गुरु ग्रंथ साहब की बेअदबी के नाम पर वास्तव में सरबलोह ग्रंथ के बहाने एक नशेड़ी, गरीब, दलित सिख लखबीर सिंह को जिस बेरहमी से निहंगों ने मारा, हाथ काटे और उसकी लाश को बैरिकेड पर लटका दिया गया उससे तमाम संवेदनशील व्यक्ति सदमे में है। लखबीर सिंह पहली बार किसान मोर्चे पर क्यों आया, कौन लाया, निहंगों के बीच रहा, उन जैसा बाना भी पहना। और, फिर उसको तड़पा तड़पा के मारने वाले बेखौफ तरीके से उसकी यंत्रणा और कत्ल की वीडियो बनाकर रिलीज कर रहे हैं। पूरी छानबीन ही बता पाएगी कि आखिर पूरे षडयंत्र की असली कहानी क्या है।

खैर, फिलहाल, हम निहंगों के इतिहास और उनकी जीवनशैली को समझने का एक प्रयास करें।  निहंग फारसी भाषा का शब्द है जिसका मतलब है मगरमच्छ। मुगल फौज में आत्मघाती दस्ते को निहंग कहा जाता था जो नीले कपड़े पहनते थे। गुरु गोबिंद सिंह के पुत्र साहबजादा फतेह सिंह ने जब मार्शल भेष धारण किया तो उसे निहंग कहा गया था। कुछ विद्वानों के अनुसार निहंग शब्द संस्कृत के निःशंक से निकला है जिसका अर्थ है निडर, बिना शंका के। 

गुरु  गोबिंद सिंह ने होली के अगले दिन आनंदपुर साहब में एक मेले की शुरुआत की थी जिसका मुख्य आकर्षण सिखों की मार्शल ड्रिल होती थी, जिसमें गतका, नेजा, तलवार, तीर कमान आदि से आपस में नकली लड़ाई होती थी। वही परंपरा अभी तक बरकरार है और दूरदराज के तमाम निहंग अपने-अपने फ़ौज फर्राटे को लेकर आनंदपुर साहब की ओर निकल पड़ते हैं जहाँ वे अपने अपने लड़ाकू करतब दिखाते हैं। उनकी जीवनशैली के अनुसार निहंग किसी भी सत्ता को मानने से इनकार करते हैं और उनका अपना अनुशासन होता है, डेरे हैं और  डेरों के जत्थेदार हैं।  वे अपने डेरों को छावनी के नाम से पुकारते हैं। खांडा, तलवार, नेजा, कृपाण धारण करते हुए सिर पर असामान्य रूप से बड़ी पगड़ी (दुमाला) जिस पर स्टील के चक्कर लगे होते हैं और नीले रंग का चोगानुमा वस्त्र व कछेरा धारण किए हुए निहंगों के लिए घोड़ा अत्यंत प्रिय होता है।  उनके खाने में सुक्खा (भांग) का सेवन आमतौर पर होता है जिसे वे सुखनिधान प्रसाद कहते हैं। और, विशेष मौको पर अधिक मात्रा में भांग के सेवन को शहीदी देग कहा जाता है।

इनके तीन मुख्य संगठन है- तरुण दल, बुड्ढा दल और बिधिचंद दल। इनकी शब्दावली आपको रोचक लगेगी। मसलन, पेशाब करना- चीता भगाना, लेट्रिन करना- चित्तौड़ का किला जीतना, चना-बादाम, प्याज-चांदी के टुकड़े, काना- लखनेत्र सिंह, तीखी मिर्च- लड़ाकी, ट्रेन- भूतनी, चाय- तिड़फूंकनी, रोटी-मीठा प्रसादा, आलू-अंडा, फूलगोभी- पठान श्री, घोड़ा – जान भाई, हल्दी- केसर, बिल्ली-पटवारी आदि आदि। अकेला निहंग सवा लाख के नाम से पुकारा जाता है या उसे फौज भी कहा जाता है।

एक ऐतिहासिक झलक:


गुरु गोबिद सिंह की मृत्यु के बाद निहंग दस्ते बंदा बहादुर के साथ बहादुरी से लड़े। बाद में बाद में जब अहमद शाह अब्दाली ने सन 1757 में करतारपुर और अमृतसर को तहस नहस करना शुरू किया तो बाबा दीप सिंह ने दमदमा साहब से चलकर तरनतारन में 5-6 हज़ार लड़ाकों को साथ लेकर अफगानों से लड़ते हुए कुर्बानी दी थी। बाबा दीप सिंह के जत्थे को शहीद जत्था या निहंग मिसल के नाम से जाना जाता था और इसके सदस्यों को शहीद कहा जाता था। कुछ वर्षों के बाद सन 1763 में  सरहन्द के गवर्नर जैनखां को सिखों द्वारा मार दिए जाने के पश्चात इसी मिसल का मुखिया कर्मसिंह शहीद अंबाला के शहजादपुर, केसरी और माजरी का शासक बन गया।  दमदमा साहब के आसपास का इलाका, सहारनपुर का बनखंडी और बारथा जवाई भी कर्मसिंह शहीद की जागीर का हिस्सा बन गए थे।


महाराजा रणजीत सिंह के मुल्तान, पेशावर और कश्मीर में साम्राज्य विस्तार में निहंगों का विशेष योगदान था। सन 1818 में नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर के इलाके में जनरल हरिसिंह नलवा के साथ अकाली फूलासिंह के नेतृत्व में निहंगों ने जीत को कामयाबी दिलाई। इसी वर्ष जनरल ईलाहीबख्श की कमांड में मुल्तान को जीतने में साधुसिंह की निहंग पलटन अत्यंत बहादुरी से लड़ी।  सन 1819 में कुँवर खड़क सिंह के साथ लड़ते हुए निहंगों ने कश्मीर को फतह किया। सन 1823 में पेशावर को जीतने में अकाली फूलासिंह और गुरखा कमाण्डर बलभद्र मारे गए।


महाराजा रणजीत सिंह से निहंगों की नाराजगी: वाक्या सन 1831 का है जब रोपड़ में महाराजा रणजीत सिंह और गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक का हफ्ते भर का जश्न भरा मिलन आयोजित किया गया था। मुख्य मुद्दा था कि अंग्रेजों की नजर सिंध पर थी जिसके लिए महाराजा रणजीत सिंह की सहमति जरूरी थी क्योंकि सतलुज से उत्तर पश्चिम की ओर का इलाका लाहौर दरबार के अधीन था। इस दौरान हुई संधि के अनुसार अंग्रेज़ो को सिंध में  व्यापार करने की छूट दे दी गई थी जो अनेक दरबारीयों और निहंगों को नागवार लगी।  गुस्से में एक निहंग म्यान से तलवार निकालकर महाराजा रणजीत सिंह की ओर झपटा लेकिन सुरक्षा गार्डों की मुस्तैदी से उस निहंग पर काबू पा लिया गया। इसी तरह महाराजा रणजीत सिंह का एक मुस्लिम नर्तकी मोहरां से इश्क और शादी अकाल तख्त के तत्कालीन जत्थेदार अकाली फूला सिंह को नापसंद थी और इसके लिए महाराजा रणजीत सिंह को सौ कोड़ों की सजा दी गई। मौके पर प्रतीकात्मक रूप में एक ही कौड़ा मारा गया।
एंग्लो-सिक्ख युद्ध: सन 1839 में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद लाहौर दरबार में अराजकता, खूनखराबा और षड्यंत्रों का दौर था। इस दौर में खालसा फ़ौज ने स्थिति को काबू करने का असफल प्रयास किया और तीन एंग्लो-सिक्ख युद्धों में हार के बाद सन 1849 के बाद निहंगों की भूमिका गौण होती गई।


गुरुद्वारा मुक्ति आंदोलन में निहंगों की भूमिका: पिछली सदी के दूसरे और तीसरे दशक में महंतो से गुरुद्वारों को मुक्त करवाने के लिए अकाली मोर्चों की श्रृंखला में निहंगों ने ज़ोरदार भूमिका अदा की थी।


ब्लूस्टार ऑपेरशन के बाद अकाल तख्त की कारसेवा:

जब ब्लूस्टार ऑपेरशन में अकालतख्त क्षतिग्रस्त हो गया था तो उसको नए सिरे से बनवाने के लिए जत्थेदार संता सिंह के नेतृत्व में निहंगों ने कारसेवा में मुख्य भूमिका निभाई थी हालांकि बाद में सरकार के सहयोग से निर्मित अकालतख्त को ढहा कर फिर से बनवाया गया था।


छोटी बड़ी वारदातें:

पिछले साल अप्रैल के महीने में पटियाला में कुछ निहंगों द्वारा एक पुलिस सब इंस्पेक्टर के हाथ काट देने की वारदात हुई। सन 2008 में अजीत सिंह पूहला नाम के निहंग को अमृतसर की जेल में दो कैदियों द्वारा जलाकर मार देने की घटना हुई थी और उसीके साथ अजीतसिंह पूहला की रोंगटे खड़े कर देनी वाली दास्तानें मीडिया में सुर्खी बटोरती रही थी।
सिंघु बॉर्डर की घटना: लखबीर सिंह की हत्या के बाद अनेक सवाल उठ खड़े होना स्वभाविक है। संयुक्त किसान मोर्चा ने कड़े शब्दों में हत्याकांड की निंदा की है और स्पष्ट किया कि बॉर्डर पर स्टेज के नजदीक तंबू में रहने वाले निहंग किसान आंदोलन का हिस्सा नहीं हैं। उनकी गतिविधियां किसान नेताओं को अखरती रही है।


सिक्ख विद्वानों के अनुसार निहंगों के आचार- विचार में रोजाना गुरबाणी का पाठ करना, बाणे में रहना, शस्त्र धारण करना, किसी मजबूर गरीब व कमजोर पर हाथ न उठाना, उनकी रक्षा करना शामिल है।  लेकिन अभी जो कांड हुआ है उसमें तो लखबीर सिंह निहत्था था।


इस निंदनीय और चिंतित करने वाली घटना पर सवाल उठने ही चाहिए और पूरे षडयंत्र को उजागर करना समय की दरकार है।

संदर्भ:


1. History of the Panjab – SM Latif
2. A history of the Sikh Misals- Dr. Bhagat Singh
3. A history of the Sikhs- Khushwant Singh
4. Cunningham’s history of the Sikhs
5. ‘भूतनी’ पर सवार ‘तिड़फूंकनी’ की तलाश में- BBC News हिंदी

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