उदयभानु हंस

माटी के दर्द को वाणी देती पानीदार ग़ज़लें – भागिनाथ वाकले

उदयभानु हंस ने मिथकीय पात्रों को मौजूदा समय की विसंगतियों और नैतिक पतन से जोड़कर यथार्थ रचना की है। डॉ रामजी तिवारी मिथकों के विषय में कहते हैं कि “मिथक जनमानस में पहले से बैठे रहते हैं, उनका आधार लेने से रचना की संप्रेषणीयता ज्यादा हो जाती है।“ इस हेतु ग़ज़लकार ने मिथकों का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। (लेख से )

उदयभानु हंस

पेट की भूख से आग ऐसी लगी
जल के आदर्श सब रोटियाँ हो गए।

माँ , माटी और बाटी जीवन का यथार्थ है । इसमें कोरे आदर्श को कोई जगह नहीं क्योंकि यथार्थ से जुड़ाव वर्तमान है और आदर्श से जुड़ाव भविष्य। भविष्य से वर्तमान कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्तमान पर ही भविष्य का अस्तित्व टिका हुआ है ।इसलिए माँ, माटी और बाटी का केवल ऋण ही स्मरणीय है, उस ऋण से उऋण होना लगभग असंभव है। इनके प्रति का दायित्व बोध मनुष्य को कर्मरत, कर्मयोगी बनाता है। जो कर्मयोगी माँ, माटी  का मूल्य जानता है; वही उसकी उपेक्षा, यातना, पीड़ा समझता है। ऐसे ही कर्मयोगी है इस माटी के सपूत उदयभानु हंस, जिन्होंने अपनी कलम से माटी के मूक व्यथा  को मुखरता प्रदान की है।

उदयभानु हंस एक ऐसे नक्षत्र है जो साहित्यकाश में  उदित होकर माँ, माटी व बाटी की कथा व्यथा को प्रकाशित करते रहें। रुबाई के प्रवर्तक, रुबाई सम्राट, ख्यातिलब्ध कविवर हरियाणा के राज्य कवि उदयभानु हंस, केवल हरियाणा ,पंजाब, हिमाचल प्रदेश में ही नहीं इससे इतर समूचे हिंदी जगत में ससम्मान पढ़े जाते हैं।

हिंदी साहित्य साधकों में अपने अमूल्य योगदान के लिए उदयभानु हंस का नाम आदर के साथ लिया जाता है। हिंदी ग़ज़ल को विकसित करने वाले चंद गजलकारों में एक साहित्य के प्रमुख स्तंभ लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं अनेकायामी व्यक्तित्व तथा प्रतिभा के धनी उदयभानु हंस ने जहाँ ग़ज़ल के क्षेत्र में उसकी गुणात्मकता से नए कीर्तिमान स्थापित किए । वहीं साहित्य सर्जन की विविध विधाओं में अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया। बहुआयामी प्रतिभा के धनी साहित्यकार उदयभानु हंस जी ने गीत, दोहे,कविता,ग़ज़ल आदि में समान अधिकार के साथ उच्चस्तरीय साहित्य की रचना की है।

किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को स्मरणीय बनाने में उनके द्वारा स्थापित समाज सापेक्ष मानव मूल्यों से परिपूर्ण उदात्त कृतित्व का महत्वपूर्ण स्थान रहता है । यह वैशिष्ट्य ही इसे अमरत्व प्रदान करता है। इस दृष्टि से उदयभानु हंस का कृतित्व निःसंदेह सराहनीय है। उन्होंने हिंदी जगत की सराहनीय सेवा की है । उन्होंने व्यापक और अनेकायामी जीवन के जिन पहलुओं को जिया,देखा,परखा है तथा भोगा है। उनको अपनी कविता,गीत, दोहों तथा ग़ज़लों  के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।

उनके शब्दों में-

मैंने अनुभवों का रस जो लिया है जीवन से
कुछ भरा है गीतों में कुछ ग़ज़ल में डाला है।

हिंदी जगत में अलग प्रतिमान स्थापित करने वाले कविवर उदयभानु हंस समकालीन काव्य सर्जना की शक्तिमत्ता के ज्योतिश्मन्त प्रमाण-पत्र ही कह सकते हैं। वे हिंदी की रचनाधर्मिता के प्रभावंत स्वर ही नहीं, उसमें समाहित बौद्धिकता और भाव तरलता के संगम स्थल भी है और ऐसा संगम स्थल, जहाँ घाव , भाव व विचार गीत ग़ज़ल के रूप में ढल कर आए हैं –

वक्त ने हंस को घाव जितने दिए
वह ग़ज़ल-गीत की पंक्तियाँ हो गए।

या हंस जी की ही कलम है, जो घाव को भी भाव के रूप में प्रवाहित करते हुए, गीत ग़ज़ल के पैकर में ढालती है। यह वही कलम है जो माटी के दर्द को वाणी देती है –

कौन अब सुनाएगा दर्द हमको माटी का
‘प्रेमचंद’ गूंगा है लापता ‘निराला’ है ।

यह दो पंक्तियाँ एक ऐसे व्यक्तित्व का आत्मकथ्य है, जो इस विडंबना को अपने आसपास देख रहा है । आम आदमी तथा किसान की पीड़ा को वाणी देने वाले प्रेमचंद आज ‘गूँगा’ हैं और क्रांति का मसीहा जीर्ण बाहु है शीर्ण शरीर /उसे बुलाता कृषक अधीर/ ए विप्लव के वीर / बादल राग के माध्यम से क्रांति का आह्वान करने वाले क्रांतिचेता निराला अब ‘लापता’ है। यही चिंता का विषय है -‘अब कौन सुनाएगा दर्द हमको माटी का’ ग़ज़लकार अब उसकी अगुवाई करना चाहता है-

हमने अपने हाथों में जब धनुष सँभाला
बाँध कर के सागर को रास्ता निकाला।

ज्ञान प्रकाश विवेक कहते हैं – “अक्सर ऐसा देखा गया है, ग़ज़ल में जिसने नई डगर पर चलने का जोखिम उठाया है, वही ग़ज़लें ज्यादा मकबूल हुई है।” इस दृष्टि से उदयभानु हंस एक मिसाल है ,जिन्होंने प्रेमचंद, निराला का अनुगमन करते हुए धनुष संभाला है।

झोपड़ी की आहों  से महल भस्म हो जाते
निर्धनों के आँसू में जल नहीं है ज्वाला है।

मेहनतकश लोगों के आँसू को आँसू जल नहीं बल्कि ज्वाला- कण कहते हुए संकेत करते हैं कि-

मजदूर के माथे का कहता है पसीना भी
महलों में प्रलय होगी ,कुटिया में जशन होगा।

मानो जैसे अवाम की भावनाओं को शब्द दिए हो। क्योंकि अवाम में जो स्वप्न देखे थे, वे  भरभरा कर टूटे थे। उन्हीं के  शब्दों में –

स्वप्न सब राख की ढेरियाँ हो गए
कुछ जले, कुछ बुझे ,फिर धुआँ हो गए।

उदयभानु हंस ने मिथकीय पात्रों को मौजूदा समय की विसंगतियों और नैतिक पतन से जोड़कर यथार्थ रचना की है। डॉ रामजी तिवारी मिथकों के विषय में कहते हैं कि “मिथक जनमानस में पहले से बैठे रहते हैं, उनका आधार लेने से रचना की संप्रेषणीयता ज्यादा हो जाती है।“ इस हेतु ग़ज़लकार ने मिथकों का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। मिथकीय संस्पर्श वाले अशआर ज्यादा प्रभावी व चेतना को संस्पर्श करने वाले होते हैं। कुछ शेर दृष्टव्य है –

घोर कलयुग है कि दोनों राम रावण एक से है
लक्ष्मणों का हाथ रहता आजकल सीता हरण में।

द्वापर युग में रिश्तो की गरिमा और अहमियत तो थी किंतु आज रिश्ते-नाते और संबंध स्वार्थ की बलिवेदी पर चढ़ गए हैं। उपर्युक्त शेर में राम और रावण दो किरदार है , मिथकीय पात्र है। एक विनम्रता और अच्छाई का प्रतीक तो दूसरा अहंकार और बुराई का प्रतीक। लेकिन आज दोनों पात्रों, व चरित्रों की घुलावट हो गई है या कहें  महा मिलावट हो गई है।

जिस सीता की रक्षा का दायित्व लक्ष्मण पर था , आज सीता हरण में लक्ष्मणों का हाथ है। यह कैसी विडंबना है आज राम रावण में साँठ-गाँठ हो गई। दुर्गुणों का संक्रमण हो गया है। राम,लक्ष्मण और सीता जो आदर्श रिश्तो के लिए जाने जाते थे।आज उन संबंधों में बिखराव आया है। संबंधों का विखंडन कलियुग की देन है । एक अन्य मिथकीय संदर्भ वाला शेर-

इस देश की लक्ष्मी को लूटेगा कोई कैसे ?
जब शत्रु की छाती पर अंगद का चरण होगा।

रामायण में रावण ने धृष्टता कर सीता का हरण किया था। तब अंगद ने प्राण विद्या के बल पर अपना शरीर बलिष्ठ और पैरों को दृढ़ कर लिया; जिसे हिलाना किसी के भी बस की बात नहीं थी। उक्त शेर में ग़ज़लकार की प्राश्निक मुद्रा संकेत करती है, सूचित करती है , सजग और सतर्क करती है कि ‘शत्रु की छाती पर’ ‘अंगद का चरण’ रहे तो ‘देश की लक्ष्मी’ को लूटने की, उसकी ओर वक्र दृष्टि से देखने का धारिष्ट कोई नहीं कर पाएगा।

उदयभानु के शेरों में बार-बार प्रश्न दिखाई देते हैं। वे प्रश्न-चिह्न नहीं बल्कि समाज चिंता के चिह्न है। एक उदाहरण मौजूँ है –

इंसान की सूरत में जहाँ भेडिये फिरते हैं
फिर हंस कहो कैसे दुनिया में अमन होगा।

दुनिया में अमन शांति के लिए इंसानों की आवश्यकता है। जिनमें इंसानियत की भावना  व भाईचारा हो। इंसान के मुखौटों में ‘भेड़िये’ के  चरित्र वाले देश की अमन शांति में बाधक है। ये ‘भेड़िये’ यत्र- तत्र सर्वत्र अपनी मौजूदगी रखते हैं, बस दर्शाते नहीं है। उन्हें  ढूँढते की आवश्यकता नहीं है। ग़ज़लकार के शब्दों में –

सिर्फ जंगल में ढूंढते क्यों हो?
भेड़िए अब किधर नहीं होते।

शायरी का एक मकसद समाज को सही दिशा दिखाना भी होता है। उदयभानु जी ने भी शायर होने का फ़र्ज़ अपने नसीहतों को ग़ज़ल बना कर अदा किया है। उनकी मानीखेज़ शायरी समाज को कई दृष्टि से सचेत करती है-

जीवन के अंधेरे में हिम्मत न कभी हारो
हर रात की मुट्ठी में सूरज का रतन होगा।

मनुष्य निरंतर सीखता रहता है, सीखने की प्रक्रिया में नैरंतर्य हो तो जीवन-गीत मधुर बन जाता है। फिर जीवन-समर में कठिनाइयाँ कितनी भी आए। उदयभानु हंस एक शेर कहते हैं –

जीने की कला हमने सीखी है शहीदों से
होठों पे ग़ज़ल होगी जब सिर पर कफन होगा।

हमारे जाँबाज़ सिपाही ‘सिर पे कफ़न’ बाँधकर भी ‘होठों पर ग़ज़ल’ लेकर चलते हैं। दो मिसरे जीवन का ‘फाइन’ ‘आर्ट’ ही तो है । जो शहीदों से जीवन जीने की कला व ऊर्जा ग्रहण करने का आग्रह करते  है। वास्तविक जिंदगी के व्याकरण को ग़ज़लकार भाषा के व्याकरण से अधिक पेचीदा मानता है। किसी भी भाषा के अंग प्रत्यंग का विश्लेषण, संश्लेषण व विवेचन व्याकरण कहलाता है । व्याकरण किसी भाषा को अपने आदेश से नहीं चलाता, घुमाता ; प्रत्युत भाषा की स्थिति, प्रवृत्ति प्रकट करता है। उसी प्रकार जिंदगी का व्याकरण जिंदगी की स्थिति प्रवृत्ति को प्रकट करता है।

शब्द नारे बन चुके हैं,अर्थ घोर अनर्थ करते
संधि कम विग्रह अधिक ,जिंदगी के व्याकरण में ।

जिंदगी के व्याकरण में ‘संधि कम’ ‘विग्रह अधिक’ हो तो दूरियाँ निर्माण होती है।जिंदगी का स्वरूप बदल जाता है। यह दूरियाँ अलगाव, घुटन,संत्रास, पीड़ा, कुंठा को जन्म देती है। विद्वेष की जड़े गहरी होती है। प्रेम भाव दुर्लभ हो जाता है। जिंदगी के  व्याकरण का  एक महत्वपूर्ण अंग या तत्व है- प्यार का व्याकरण।

ग़ज़लकार के समक्ष प्रश्न है कि –

प्यार का व्याकरण लिखे कैसे
भाव होते हैं स्वर नहीं होते ।

स्वर दो प्रकार के हैं – व्याकरण के स्वर(vovels) तथा संगीत के स्वर। व्याकरण के स्वर भाषिक सौंदर्य वृद्धि में सहायक है; तो संगीत के स्वर गीत व भाव की प्रभावोत्पकता बढ़ाते हैं। भावों को स्वरों का जोड़ मिले तो वे बेजोड़ बन जाते हैं। परंतु वर्तमान में प्यार में भाव तो दिखते हैं लेकिन स्वर नदारद है । इसलिए ग़ज़लकार के समक्ष प्यार का व्याकरण कैसे लिखे यह प्रश्न है ।  व्याकरण छोड़के भाव को समझे तो ग़ज़लकार को उसमें निरालापन दिखाई देता है। जैसे –

दीप या पतंगे हो, दोनों साथ जलते हैं
प्यार करने वालों का ढंग ही निराला है ।

‘दीपक’ और ‘पतंगा’ यह पुराने प्रतीक है। लेकिन कई बार पुराने प्रतीक भी नएपन का अहसास कराते हैं ; तो वहाँ अंदाजे-बयाँ का सौंदर्य होता है। ग़ज़लकार के अंदाज़े-बयाँ की एक बानगी गौरतलब है –

पूछते हो पता ठिकाना क्या हम फकीरों के घर नहीं होते।
कब की दुनिया मसान बन जाती उसमें शायर अगर नहीं होते।

उपर्युक्त दो मिसरे दुनिया में शायरों की अहमियत को उद्घाटित करते हैं। शायर ध्वजवाहक है। शायर प्रवर्तक है। शायर किंग मेकर है । या कहें समाज निर्माता है। शायरों ने समाज में जान और साहित्य में प्राण फूँकने का काम किया है। यह मूल्यवान बात उदयभानु हंस जानते हैं इसीलिए तो कहते हैं। ‘दुनिया शमशान बन जाती यदि शायर नहीं होते’ बेशक उदयभानु हंस उच्च पद के और आला कद के ग़ज़लकार है। ग़ज़लों में अनुशासन और अनुभव में परिपक्वता उनकी ग़ज़लों को विशेष ‘हाइट’ प्रदान करती है। ग़ज़लकार का संवेदनशील मन जब ग़ज़ल में संवेदना भर देता है ; तो ग़ज़ल की संवेदयता दुनिया को स्वर्गसम बना देती है। तब जाकर ही साहित्यकार ‘सम्राट’ कहलाता है।

भागिनाथ वाकले

लेखक ‘रिवर डेल हाई स्कूल’औरंगाबाद, महाराष्ट्र में शिक्षक हैं.

सम्पर्क- 9404988813

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