अपनी-अपनी हैसियत- हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई

अखबार खत्म हो जाता है, तो विज्ञापन पढ़ने लगता हूँ। यों अखबारों में होता भी क्या है? रोज-रोज वही-वही समाचार-उसने पैसा खाया था, उसकी पोल खुल गई, उसकी तलाशी हो गई, वह गिरफ्तार हो गया। मैं न तब उन केन्द्रों के इर्द-गिर्द था जहाँ पैसे खाए जाते थे और न अब उन केन्द्रों के इर्द-गिर्द हूँ, जो पोल खोल रहे हैं। मैं वहाँ भी कहीं नहीं हूँ जहाँ पैसे खाने के लिए नए अड्डे खुल गए हैं। यानी अपने जमाने के इतिहास के निर्माण में अपना कोई योगदान नहीं है। मेरे हिस्से में सिर्फ इतिहास की कसम खाने का काम पड़ा है। तो समाचारों पर सरसरी निगाह डालकर मैं विज्ञापन पढ़ने लगता हूँ-खासकर दिल्ली के होटलों के। इसमें बड़ा रस आता है। अशोक होटल में फ्रेन्च पकवान । वाह! जनपथ होटल के गुलनार रेस्तराँ में मुगलाई भोजन। अकबर होटल में बार-ए-कबाब! . पढ़ते-पढ़ते लगता है मेरे मुँह में चिकन मुगलाई घुस गया है और मैं इस स्वाद के साथ घर की दाल-रोटी खा लेता हूँ।

वन्चित की यही ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ होती है कि वह अपनी दाल-रोटी के साथ कल्पना के अशोक होटल चबाकर सन्तुष्ट और चुप हो जाए। 

आज सब होटलों में जीम चुका तो एक खास विज्ञापन पर ध्यान या। ऐसा कोई विज्ञापन रोज ही छपता है पर पहले मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया था। विज्ञापन में अक्सर किसी वृद्ध का चित्र होता है। मैं समझता यह गुमशुदा की तलाश का विज्ञापन होगा, जैसा उन लड़कों के बारे में होता है, जो फिल्मी हीरो बनने बम्बई भाग जाते हैं। बढे भी घर से भागने लगे, मैं सोचता लड़कों ने छपाया होगा-पिता जी, आप जहाँ भी हों लौट आइए। आप जब से गए हैं, तब से माँ की हालत बहुत खराब है इस वाक्य को पढ़कर तो बुढ़उ कभी नहीं लौटेंगे)। नहीं! बुढ़ऊ भागे नहीं हैं। ऊपर बड़े अक्षरों में छपा इन मेमोरियम-याने स्मृति में! नीचे बुढ़उ के बेटों के नाम हैं। साथ ही कम्पनी का नाम-पता और फोन नम्बर भी है, जिससे वृद्ध की याद में किसी रोना आ जाए तो वह फौरन कम्पनी से सामान खरीद ले। दुख दुर हो जाएगा। 

ये कोई लालाजी थे। लाला ने कोई कम्पनी खोल डाली थी। अच्छा किया। लाला कोई बाल काटने की दुकान थोड़े ही खोलते। लाला जी की यह कम्पनी खूब चल निकली। यह भी शुभ हुआ, वरना बेटों को बाप की खर्चीली अखबारी याद का कोई कारण नहीं होता। इसी तारीख को लाला जी की मृत्यु हुई थी। यह भी अच्छा हुआ-क्या पता आगे कम्पनी डूब भी सकती थी। लाला जी की कम्पनी की बेटों ने खूब तरक्की की। सपूत ऐसे ही होते हैं। बेटे लाला जी को आज ऐलानिया याद कर रहे हैं। क्यों नहीं? ऐसा बाप ही तो याद करने लायक होता है, जो कम्पनी जमाकर फौरन दुनिया छोड़ दे। लाला जी गए कहाँ? लड़कों को यह भी ठीक मालूम है। छपा है-‘हू लेफ्ट फार हिज हेवनली एबोड’-याने जो अपने स्वर्गीय निवास को पधार गए । स्वर्ग में लालानगर कालोनी का बँगला नम्बर पाँच लालाजी के लिए पहले से रिजर्व होगा। 

मेरे पिता की मृत्यु को भी कई साल हो गए। मुझे अभी तक पता नहीं कि वे कहाँ हैं? स्वर्ग में या नरक में? पुनर्जन्म हो गया? या कहीं नहीं हैं? मुझे उनकी याद में उनका फोटो छपाने की भी प्रेरणा भी नहीं हुई क्योंकि वे धन्धा जमाकर नहीं, उजाड़कर मृत्यु को प्राप्त हुए थे। उन्होनें सही पितापन स्थापित ही नहीं किया। लालाजी ने सही पितापन स्थापित करके यह असार संसार छोड़ा और सार-रूप धंधा जमा गए। लाला जी स्वर्गीय हो गए और मेरे पिता सिर्फ मरे। अंग्रेजी में मरे को ‘दि लेट’ देते हैं। हम उसे ‘स्वर्गीय’ या ‘दिवंगत’ कहते हैं। विश्वासों और संस्कारों का छल भाषा में आ ही जाता है। 

बेटों को क्या पक्का पता है? मुझे शक है। शायद लालाजी का पुनर्जन्म हो चुका है। मनुष्य जन्म दुबारा चौरासी लाख योनियों में भटकने बाद मिलता है। लाला जी इतने जल्दी मनुष्य तो बने न होंगे। हो सकता स्वान योनि में चले गए हों, और अपने कारखाने के फाटक पर ही हों। बेटों को क्या पता कि वे जो कारखाने के फाटक पर भौंकते रहते हैं वे पूज्य पिता जी ही हैं। वे मजमून नहीं पढ़ेंगे और घबराहट में अखबार छिपा लेंगे कि कहीं कोई देवता इनाम के लोभ में उन्हें पकड़वा न दे। ये बेटे लाला जी को क्यों दुखी और परेशान करते हैं। इस अखबार को उस कारखाने के कर्मचारी भी देखेंगे। वे शायद कहें-यही है वह दुष्ट लाला। मजदूरों का खून चूसता था। कितनी कम तनखा देता था और कितना काम लेता था। मजदूर एक दिन बीमार पड़ जाए तो पैसा काट लेता था। अब रौरव नर्क भोग रहा होगा। व्यापारी भी इसे देखेंगे। वे शायद कहें-अरे, आज सबेरे किसका मुँह देख लिया। अरे, इस लाला ने जिसका पैसा लिया, वापस नहीं किया। इसके नाम को कई लेनदार रो रहे हैं। मेरी सलाह मानते तो मैं इन पिता-भक्तों से कहता-उमर-दराज, पिता जी की फोटो इस तरह मत छपाया करो। लोग उनके बारे में बुरी-बुरी बातें कहते हैं। उनकी दबी हुई बदनामी उभर आती है, पर लड़के मेरी बात नहीं मानते। पिता का फोटो छपाना उनके लिए सजावट और विज्ञापन है। जिस दिन लाला जी मरे उस दिन उनका फोटो छपाना लड़कों के लिए वैसा ही है जैसे दिवाली पर नया रंगीन साइनबोर्ड बनवाना। वरना लाला जी को कौन जानता। किसे मतलब है कि उन्होंने कौन-सा पराक्रम किया। किसे इससे गरज़ है कि ये मरे कि नहीं और कब मरे। मगर लड़कों ने लाला जी की याद को राष्ट्रीय महत्त्व दे डाला। 

पैसा ऊपर हो जाता है तो वह अपना रूप प्रकट करना चाहता है। वह अकुलाता है कि मैं हूँ और दिख नहीं रहा हूँ। मैं अपने को अभिव्यक्त करुँ और पैसा इस तरह फूटकर प्रकट हो जाता है, जैसे पके फोड़े का मवाद। 

फूहड़पन के लिए भी हैसियत चाहिए। मेरी हैसियत नहीं है तो लालाजी के बेटों पर हँस रहा हूँ। पैसा और फूहड़पन दोनों आ जाए तो मैं गहरा रंग खरीदकर चेहरे को रँगवा लूँ-एक गाल पीला, दूसरा लाल नाक हरी, कपाल नीला।। 

मेरे सामने एक पैसेवाले युवक की शादी का निमन्त्रण-पत्र रखा है। कई रंगों का है। इतने गहरे रंग हैं कि पढ़ा नहीं जाता कि शादी के बारे में लिखा है या श्राद्ध के। वर की तस्वीरें भी हैं-बैठे हुए, सोचते हुए, लिखते हुए, सितार बजाते हुए। मुझे मालूम है, यह युवक लेन-देन के मामलों में एक बार पिट भी चुका है। एक फोटो इसका भी छपना था-वर जूते खाते हुए। इस निमन्त्रण-पत्र को देखकर मतली आती है। फोड़ा पककर फूट गया है और मवाद बिखर रहा है। 

कल उधर एक बरात आई थी। मजदूरों के सिर पर कई गैस-बत्तियाँ रखी थीं। दूल्हे की सजावट ऐसी कि वधू को उसे देखकर उल्टी हो जाए। दो बैण्ड और इसके साथ ही लाउडस्पीकर। बड़ा घमासान कोलाहल। बरातियों को विभिन्न रंगों से पोत दिया होता तो अच्छा होता। 

मेरी दीवार पर एक कैलेण्डर टँगा था, जो मैंने निकलवा दिया। बड़े व्यापारी का कैलेण्डर था। उसमें धन की देवी लक्ष्मी फूल पर बैठी हैं। फूल में सौन्दर्य होता है। गन्ध होती है, कोमलता होती है। मगर ये लक्ष्मी फूल को कुर्सी समझकर उस पर बैठी हैं। धन की देवी हैं न। जब इनका यह हाल है तो देवी के कृपापात्र फूहड़पन क्यों नहीं करेंगे। फिर भी मैं कहता हूँ-देवी, तू अपनी बैठक बदल दे। सिंहासन पर बैठ और हाथ में फूल ले ले। या फूल जूड़े में खोंस ले। फिर तू जिसे चाहे धन दे। मगर उसके साथ ही थोड़ी-सी सुरुचि एकाध किलोग्राम दे दिया कर। इससे इन्फेक्शन नहीं होगा और सम्पन्नता के फोड़े से बदबूदार मवाद नहीं बहेगा। 

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