अज्ञेय

हमारा देश- अज्ञेय

अज्ञेय
इन्हीं तृण-फूस छप्पर से 
ढके ढुलमुल गवारू 
झोंपड़ों में ही हमारा देश 
बसता है। 
इन्हीं के ढोल-मादल बाँसुरी के . 
उमगते सुर में 
हमारी साधना का रस 
बरसता है। 
इन्हीं के मर्म को अनजान 
शहरों की ढंकी लोलुप विषैली 
वासना का साँप 
डॅसता है। 
इन्हीं में लहरती अल्हड़ कर 
अयानी संस्कृति की दुर्दशा पर 
सभ्यता का भूत 
हँसता है। 


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