माखन लाल चतुर्वेदी

कैदी और कोकिला – माखन लाल चतुर्वेदी

माखन लाल चतुर्वेदी
तुम रवि-किरणों से खेल, जगत को रोज़ जगाने वाली, 
कोकिल ! बोलो तो!
क्यों अर्धरात्रि में विश्व जमाने आई हो ? मतवाली, 
कोकिल ! बोलो तो!

दूबों के आंसू धोती रवि-किरणों पर,
मोती बिखराते विन्ध्या के झरनों पर,
ऊँचे उठने के व्रतधारी इस वन पर
 ब्रह्मांड कॅपाती उस उदंड पवन पर,
 तेरे मीठे गीतों का पूरा लेखा
मैंने प्रकाश में लिखा सजीला देखा।
तब सर्वनाश करती क्यों हो तुम जाने या बेजाने ? 
कोकिल ! बोलो तो!
क्यों तमोपत्र पर विवश हुई लिखने मधुरीली ताने ? 
कोकिल ! बोलो तो! 

क्यों!-देख न सकती जंजीरों का गहना ?
हथकड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना
कोल्हू का वर्रक-चू' ?--जीवन की तान,
गिट्टी पर अंगुलियों ने लिक्खे गान?
हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ,
खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूआ।
दिन में करुणा क्यों जगे, रुलाने वाली,
 इसलिए रात में गजब ढा रही आली ? 
इस शांत समय में अन्धकार को बेध रो रही क्यों हो ? 
कोकिल ! बोलो तो! 
चुपचाप मधुर विद्रोह-बीज इस मांति बो रही क्यों हो? 
कोकिल ! बोलो तो!

काली तू रजनी भी काली, शासन की करनी भी काली,
काली लहर कल्पना काली, मेरी काल कोठरी काली,
टोपी काली, कमली काली, मेरी लोह-श्रृंखला काली.
पहरे की हुंकृति व्याली,तिसपर है गाली, ऐ आली!
इस काले संकट-सागर पर मरने की, मदमाती ? 
कोकिल ! बोलो तो!
अपने चमकीले गीतों को क्योंकर हो तैराती ! 
कोकिल ! बोलो तो!

तुझे मिली हरियाली डाली, मुझे नसीब कोठरी काली !
तेरा नम भर में संचार, मेरा दस फुट का संसार !
तेरे गीत कहावें वाह, रोना भी है मुझे गुनाह !
 देख विषमता तेरी-मेरी, बजा रही तिसपर रण-भेरी !
इस हुंकृति पर, अपनी कृति से और कहो क्या कर दू? 
कोकिल ! बोलो तो!
मोहन के व्रत पर, प्राणों का पासव किस में भर दूं? 
कोकिल ! बोलो तो!

फिर कुहू ! .."अरे क्या बन्द न होगा गाना ?
इस अन्धकार में मधुराई दफनाना ?
नम सीख चुका है कमज़ोरों को खाना
क्यों बना रही अपने को उसका दाना ?
फिर भी करुणा-ग्राहक बन्दी सोते हैं,
स्वप्नों में स्मृतियां श्वासों से धोते हैं !
इन लौह-सीखचों की कठोर पाशों में,
क्या भर दोगी ? बोलो निद्रित लाशों में ? 
क्या घुस जाएगा रुदन तुम्हारा निःश्वासों के द्वारा, 
कोकिल ! बोलो तो!
और सवेरे हो जाएगा उलट-पुलट जग सारा, 
कोकिल ! बोलो तो!

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