अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

आंसू- अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
तुम पड़ो टूट लूटलेतों पर।
क्यों सगों पर निढाल होते हो।।
दो गला, आग के बगूलों को। 
आँसुमो गाल क्यों भिगोते हो। 
आँसुओं और को दिखा नीचा ।
लोग पूजे कभी न जाते थे ।।
क्यों गंवाते न तुम भरम उनका। 
जो तुम्हें आँख से गिराते थे।
हो बहुत सुथरे विमल जलबूंद-से।
मत बदल कर रंग काजल में सनो॥
पा निराले मोतियों की-सी दमक ।
आँसुओं काले-कलूटे मत बनो। 
था भला आँसुओं वही सहते।
जो भली राह में पड़े सहना ।।
चाहिए था कि आँख से बहते ।
है बुरी बात नाक से बहना ।। 

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