सुशीला टाकभौरे

ओ वाल्मीकि- सुशीला टाकभौरे

सुशीला टाकभौरे
ओ वाल्मीकि! 
सभ्य सुसंस्कृत संबोधन को 
तुम 
क्यों पसंद नहीं करते 
तुम्हें ये शब्द 
झूठे और बेमानी 
क्यों लगते हैं? 
अगर तुम्हें कुछ देर 
अभिजात्य परिसर में 
रहना पड़े तो— 
क्या तुम्हारा दम घुट जाएगा? 
वाल्या का संबोधन तुम्हें प्रिय है 
इसमें तुम्हें 
सच्चाई और आत्मीयता लगती है 
मगर ओ वाल्मीकि! 
तुम वाल्य ही 
क्यों बने रहना चाहते हो? 
बीते बचपन को भूल नहीं पाते तुम 
यौवन के संघर्ष को तुमने 
मान लिया है— 
जीवन की धरोहर 
बोलते समय भी 
मौन हो चिंतन में 
क्या सोचते हो— 
एक नई रचना का विधान! 
जो राजा नहीं 
प्रजा के लिए 
शबरी और शंबूक के लिए होगी 
समानता और परिवर्तन के संदर्भ में 
एक जीवंत और सक्रिय कृति। 
ओ वाल्या! 
तुम कभी बुत नहीं बन सकते 
तुममें चेतना है। 
समयबोध की 
तुमने महात्मा राम के अपराध को 
छिपाया नहीं 
दिशा दी है शंबूक वंशियों को 
अन्यथा 
अनभिज्ञ रह जाते वे 
उस काल की 
विद्रूपता के सत्य से। 
दलित महत्वाकांक्षी का 
हत्यारा बधिक—समय 
अब बीत चुका है 
अब तुम भी मुक्त हो 
उस अभिजात्य परंपरा से 
आज युग की मांग है। 
पुनः करो 
वाल्मीकि का आव्हान 
कितने क्रौंच मृत हैं 
घायल हैं, पीड़ित हैं 
अपमानित हैं। 
हे महाकवि, आदि कवि 
जन-जन के हित में 
रचो, 
नए रचना-विधान! 

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