मोहनदास नैमिशराय

सफ़दर हाश्मी की याद में- मोहनदास नैमिशराय

मोहनदास नैमिशराय

एक

दोस्तों
तुम्हें इस वर्ष
मैं केवल गमजदा संवेदनाएं ही दे सकूंगा
क्योंकि इस बार 
नए वर्ष की दस्तक ने 
एक आदमी को 
हमसे छीन लिया है 
जो हम सभी को 
रोते हुए भी हंसता था, 
हमारी अनुभूतियों से 
अपनी संवेदनाएं जोड़ता था. 
हमारे दरवाजों पर 
दस्तक देता था 
वही एक शख्स था 
जो आदमी को 
आदमी से जोड़ता था. 
उसे सरकारी माफिया ने 
हम सबसे जुदा कर दिया है 
दोस्तों,
इस बार 
मैं तुम्हें गमजदा संवेदनाएँ ही दे सकूंगा
क्योंकि वह हमारे बीच नहीं है, 
उसकी संवेदनाओं से
हमारी धडकनों का नाता टूट गया है 

दो

शब्दों के खिलाफ एक माफिया 
जो फैक्ट्री के दरवाजों 
बाजारों
बंदरगाहों,
खेतों 
और मैदानों में
अलग अलग मुखौटे बंधकर 
घात लगाए 
हम सब के इंतजार में है.
फर्क सिर्फ इतना है
कि हम सभी को वह 
एक साथ नहीं दस सकता 
इसीलिए एक एक कर 
वह 
तुम्हें मुझे हम सभी को 
निगल कर चला जाएगा 
तुम अकेले हो न 
महज अकेले 
सिसको, गलियां दो 
उस पर जितना भी थूको 
पर वहां कोई असर नहीं पड़ेगा 
गैंडे से भी अधिक 
मोटी खाल बन चुकी है उसकी 
उसे तुम चिकना घडा भी कह सकते हो 
पर 
वह हंसते हुए भी
तुम्हें रुलाएगा 
अब सडकों पर शायद ही तुम 
नुक्कड़ नाटक कर सको 
नाटक करोगे 
तो तुम्हें भी
सुरक्षा कवच पहनने होंगे
इस देश का प्रतिनिधि 
कमांडो संस्कृति से प्रभावित जो है 
वह तो आम आदमी से 
बात तक नहीं कर सकता.
उसे तुम्हारे शब्दों से भय है 
तुम्हारे पास केवल शब्द हैं 
फिर भी 
उसे बात करने के दौरान 
सुरक्षा की जरूरत पडती है 
तुम चाहे अख़बार छापो 
या किताब लिखो अथवा नाटक 
कलम के साथ तुम्हे भी 
अब बंदूक रखनी होगी 
तुम गली के नुक्कड़ पर हो 
या पार्क  में 
पुस्तकालय में 
हो या काफी हॉउस में कलम के साथ 
हर समय 
तुम्हारे पास बंदूक होनी ही चाहिए 
शब्दों का विरोध करने वाले माफिया का 
सामना करने के लिए 
मेरी मानो 
एक हो जाओ
चाहे तुम मजदूर हो या किसान, 
शिक्षित हो या अशिक्षित 
पार्टी की हदों से 
बाहर आ जाओ.
तुम्हें सफदर हाशमी के बहते खून 
से प्रेरणा लेनी है, 
पागल सरपस्तों के खिलाफ 
जूझना है 
साहित्य और कला को 
विलासिता के दायरे से निकाल 
चाकू जैसी धार देनी है उसे 
अपनी मुखर आवाज के साथ 
परिवर्तन के शिखर पर पहुँचाना है 
जहाँ से 
ऊपर बैठा सत्ता का दलाल 
गिरे तो, उसे दोबारा लौटाना न पड़े.
हमें शासक की
जमात की पशुता से सीधी लड़ाई 
लड़नी है.
जब एक सफदर मरा तो वह निहत्था था 
इसलिए हमें कलम के साथ 
बन्दूक भी रखनी है जिससे सत्ता के दलालों से 
अपनी रक्षा की जा सके 
तुम्हें 
मेरे दोस्तों, 
साहित्य और कला को 
आम आदमी की संवेदनाओं से जोड़ना होगा.
वरना, 
पंजाब में पाश की हत्या 
गढ़वाल में 
उमेश ढोभाल को पुलिस द्वारा 
गायब कराने की प्रक्रिया 
और मलियाना में, 
माशाअल्लाह के साथ 
यूँ ही हादसे-पर-हादसे होते रहेंगे.
तुम्हें सफदर की 
शहादत की कसम 
तुम्हें शहरों को 
कब्रिस्तान बनाने वालों से लड़ना है 
उनके पास चाहे कितना भी 
असला क्यों न हो 
याद रखो
उनके पास शब्द नहीं हैं 
और संवेदनाएं भी 
कोरी बन्दूक और गोली से 
कोई भी युद्ध नहीं जीता जा सकता
उनका निर्दयी इतिहास 
सूखे दरख्त के समान 
तुम्हारे सामने खड़ा है 
जिसे तुम अपने शब्दों की आँच 
से ही जलाकर खाक कर सकते हो 
मेरे दोस्तों
एक हो जाओ 
अभी भी समय है 
तुम्हें, 
आने वाली पीढ़ी के लिए 
क्रांति का दस्तावेज बनाना है ।

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