मुक्तिबोध

एक रग का राग – गजानन माधव मुक्तिबोध

मुक्तिबोध

ज़माने की वक़त और बेवक़त
धड़कती धुकधुकी
नाड़ियाँ फड़कती देखकर
खुश हुए हम कि
बगासी और उमस के स्वेद में
भीगी हुई उकताहट-उचाट खत्म हुई
और कुछ ज़ोरदार
सनसनीखेज कुछ,
गरम-गरम चाय के साथ-साथ
मिल गई ऐसी बात
जिससे कि ढीली रगें तन जायें
भीतर तनाव हों
व विचारों का घाव हो
कि दिल में एक चोट हो
आये दिन ठण्डी इन रगों को
गर्मी की खोज है,
वैसे यह ज़िन्दगी
भोजन है, मौज है !!

समाज के जितने भी निन्दा-प्रवाद हैं
सब हमें याद हैं
हरेक का चेहरा व जीवन-रहस्य हम जानते
अन्ध कौन, बहरा कौन
एक नेत्र कौन कहाँ उट्ठा है
सब हमें मालूम,
कौन किस उल्लू का कितना बडा पट्ठा है,
सब हमें मालूम
चाहो तो समाजी
शोषण-क्रिया की सब—
पाचन-क्रिया की सब—-
अँतड़ियां
टेबल पर रख दें,
कि तुम भी निहार लो
व हम भी निरख लें
चाहो तो निज की ही
खोपड़ी की हड्डी के बक्से को खोलकर
आपके सामने
भेजा उतार दें कि भेजा उधार दें !!

लेकिन, अब लगता है यह सब व्यर्थ है
क्योंकि पी ज़हर यह
क्योंकि जी ज़हर यह
सुन्न हुयी नाड़ियाँ
गई आब, पानी सब गया सूख
ह्रदय में उदासी की फैली हैं मटमैली
कीचड़ की खाड़ियां !!
चक्के टूट गये हाय !!
ग्राम-रम्य-वृक्ष-तले
पिकनिक को निकली हुई
ज़िन्दगी की नयी बैलगाड़ियाँ
टूट गयीं निरुपाय !!
(सौन्दर्य छूता नहीं
शिराओं में हल्की-सी मूर्छ
चेतना निवीर्य !! )
दार्शनिक मर्मी अब
कोई सरगर्मी अब
छू नहीं पाती है
हमें तो अपने बैंक-नोटों की, सत्यों में,
बू खूब आती है !!
एकमात्र उदेश्य-
ह्रदय की लुटिया से दिमाग की मोरी में
पानी डाल
जमी हुई काई सब निकालना !!
एकमात्र लक्ष्य कि विचलित न हो जायं
विवेक सताये ना,
न ज़िन्दगी को बेचैन करे वह !!

असल तो यह है कि
कोई अर्थ मर गया देखते-ही-देखते
लेकिन वह
ज़िंदगी का नक्शा पेश कर गया (हाय ! हाय ! )
उसका यह प्रस्तुतीकरण भी सही है
संवेदन यही है, संवेदन का निवेदन यही है !!



पूर्व-युगों में भी खूब बुराईयां रही आयीं
किन्तु, वे भीमाकार शक्ति-रूप
दिखलाई जाती थीं,
रावण व कुम्भकर्ण, शैतान
उनका ही रूप था ।
उनसे डरा जाता था, उनसे लड़ा जाता था ।
उनके विरुध्द वह
पाप-भीरु मृदु-तन
बहुत कड़ा रहता था समुध्दत !!

किन्तु उसी अमंगल को आज सिर्फ
सहा जाता ह्रास कह
आज वह मात्र व्यंग्य-रूप है
तर्क यह-
हाय ! वह सबका अंग-रूप है
सभ्यता-समाज का ही ह्रास है
इसलिए सहनीय मात्र निवेदनीय त्रास है
ह्रास में भी खूब-खूब मजा है,
आदमी की धजा है
व्यक्तिगत आलोचना-शील मन
जोड़ता है निन्दा-धन
जोड़ता है ज़हर और
कंकड़ और पत्थर और
कहता मैं गुनी जन
(हृदय में बैठा है चोट्टा कि मसीहा !!)
ऐसी आज आइडियालाजी है
हरेक के पीपल के पास अब बैठा हुआ एक निज
सन्त निज पीर है
लक्ष्य समाजी है
प्रतिभा का जिन्न आज खूब जिसके पास है
सत्य की सर्चलायट वह अनायास है !!

खेद है कि गलती सिर्फ़ एक हुई हमसे
कि ज़िन्दगी की रेती में किरचे मिले कांच के
तो मन में भी पूरा शीशा हम नहीं बना पाये सांच का
रत्न का टुकड़ा मिला किन्तु हाय
पूरा रत्न (अंश का पूर्ण रूप)
कल्पना में भी हम, ला नहीं पाये थे कि
खो गया टुकड़ा वह
खो दिये किरचे वे कांच के
ज़रा-ज़रा दर्द हुआ
किन्तु उस खण्ड का
पूर्ण अखण्ड, न मिल सका
कि इतने में खो गया दर्द भी !!
नसों और रगों व शिराओं की”‘
स्नायु-यन्त्र-गति में मन-बुद्धि गिरफ्तार
खंडेरों में छुपे हुए
किसी तहखाने में अजाने
खोजते हैं किंवदन्त-खज़ाना
और इस पागल-सी खोज को
कहते हम सत्यानुसन्धान
-फजूल बात है
जब तक न चाय मिले
हमारी न होती कभी
हाय ! सुप्रभात है !!

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