एल.पी.तेस्सीतोरी : थार का इतालवी साधक – डॉ. अमरनाथ

हिंदी के आलोचक

एल.पी.तेस्सीतोरी

इटली के ‘उदीने’ नामक गाँव में जन्मे, फ्लोरेंस में पढ़े -लिखे, डॉ. एल.पी. तेस्सीतोरी (Luigi Pio Tessitori, 13.12.1887-22.11.1919) ने मात्र 32 वर्ष की उम्र में अध्ययन और अनुशीलन के क्षेत्र में जो कीर्तिमान रचा, उसे देखकर कोई भी आश्चर्यचकित हो सकता है.

विदेशी भाषाओं के प्रति रुचि रखने वाले तेस्सितोरी ने 1910 ई. में फ्लोरेंस विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक किया और मात्र 24 वर्ष की आयु में संस्कृत में लिखे बाल्मीकि रामायण और अवधी में रचित तुलसीदास के रामचरितमानस का तुलनात्मक अध्ययन करके डॉक्टोरेट की डिग्री हासिल की. उनका यह शोध पहली बार इटैलियन में जियार्नल दलासोसियेता एशियाटिका इटेलियाना ( जिल्द-24, 1911, पृष्ठ-99-164) में प्रकाशित हुआ था. इसका अंग्रेजी अनुवाद जार्ज ग्रियर्सन और सर आर.सी.टेम्पुल के सुझाव पर प्रकाशित कराया गया था. इसमें वाल्मीकीय रामायण के चौरासी स्थलों  की रामचरितमानस के साथ तुलना करके उसे ही मानस का उद्गम बताया गया था. इस शोध कार्य पर ग्रियर्सन की टिप्पणी है,

“जो हमलोग चाहते थे वह कार्य तेस्सीतोरी ने कर दिया है. हम प्राप्त कर्ताओं के लिए न इसके लिये अवकाश था न अवसर. तुलसीदास के सभी विद्यार्थियों से मेरा अनुरोध है कि वे इसे पढ़ें. महत्वपूर्ण तुलनाओं से और सुक्षाव भरी बातों से यह निबंध पूर्ण है तथा इसे भविष्य में सदैव ध्यान में रखा जाएगा, जब भी रघुवंश के गौरव का गान करने वाले महाकवियों के संबंध की खोज होगी.” ( जर्नल रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, 1912, पृष्ठ-768)

 अपने इस अध्ययन के दौरान ही तेस्सीतोरी के भीतर भारत आने की ललक पैदा हो गई थी. पढ़ाई के बाद 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने मिलान में फौज की नौकरी तो कर ली किन्तु उनका तनिक भी मन नहीं लगा और कुछ माह बाद ही उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया. अपने अध्ययन के दौरान ही भारत आने के लिए उन्होंने इंडिया ऑफिस में आवेदन कर दिया था. भाषा के क्षेत्र में अध्ययन और शोध के लिये उन्होंने भारतीय राजाओं और विद्वानों से भी संपर्क किया था.  उन्होंने भारत के आचार्य विजयधरम सूरि के पास भी पत्र लिखा. अंतत: भारत आने की तेस्सीतोरी की अभिलाषा डॉ. सर जार्ज ग्रियर्सन के प्रयास से 1914 ई. में पूरी हुई. तेस्सीतोरी की योग्यता से प्रभावित होकर ग्रियर्सन ने उन्हें भारत बुलाया. वे बंगाल एशियाटिक सोसाइटी में ‘बार्डिक एंड हिस्टॉरिकल सर्वे ऑफ राजपूताना’ के सुपरिंटेंडेंट नियुक्त हुए. अपना कार्यभार संभालने के लिए डॉ. तेस्सीतोरी 8 अप्रैल 1914 ई.को भारत आए और कुछ दिन कोलकाता में रहने के बाद जुलाई 1914 ई. में राजस्थान चले गए. इसके बाद डॉ. तेस्सीतोरी का पूरा जीवन राजस्थान में ही बीता. बीकानेर को केन्द्र बनाकर वे राजस्थान के गाँवोँ का दौरा करते रहे. इस तरह थोड़े ही दिनों में वे ठेठ राजस्थानी हो गए. राजस्थान से उन्हें मातृभूमि जैसा प्यार हो गया.

भारत आने से पहले ही तेस्सीतोरी ने पुरानी राजस्थानी पर काम शुरू कर दिया था.  फ्लोरेंस के रीजिए बिबिलोथेका नेजनाले चेत्राले में उन्हें प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी के कुछ हस्तलिखित ग्रंथ मिले थे.  उन्हें आधार बनाकर तेस्सीतोरी के मन में प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी का व्याकरण लिखने की इच्छा जागृत हुई. अपने इस काम के लिए उन्होंने विजयधर्म सूरि से कुछ पाण्डुलिपियाँ भी मँगवाई थी. भारत से बाहर रहकर बिना भारतीयों की सहायता के, अपने इस काम के द्वारा तेस्सीतोरी ने अपने असाधारण श्रम और ज्ञान का परिचय दे दिया था. ‘ग्रामर ऑफ द ओल्ड वेस्टर्न राजस्थानी’ नामक उनकी इस पुस्तक का अनुवाद ‘पुरानी राजस्थानी’ शीर्षक से नामवर सिंह ने किया है. इस पुस्तक की प्रशंसा करते हुए सुनीति कुमार चाटुर्ज्या ने लिखा है, “पुरानी राजस्थानी उच्चारण रीति, रूपतत्व और वाक्य-रीति के पूरे विचार के साथ तेस्सीतोरी की आलोचना ऐसी महत्वपूर्ण है कि इसे राजस्थानी ( मारवाड़ी) तथा गुजराती भाषा तत्व की यदि बुनियाद कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी. उनका यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है. पुरानी पश्चिमी राजस्थानी के द्वारा तेस्सीतोरी ने अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के बीच की उस खोई हुई कड़ी के पुनर्निर्माण का प्रयत्न किया है ….. उनका यह विवेचन 22 जैन हस्तलिखित ग्रंथों के आधार पर हुआ….. उनके इस काम से अपभ्रंश युग के बाद की भाषा के ध्वनि- परिवर्तन की प्रवृत्तियों पर पूरा प्रकाश पड़ता है.” ( उद्धृत, हिन्दी के यूरोपीय विद्वान : व्यक्तित्व और कृतित्व, मुरलीधर श्रीवास्तव, पृष्ठ-170)

तेस्सीतोरी ने प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी को शौरसेनी अपभ्रंश की पहली संतान और साथ ही गुजराती और मारवाड़ी  की माँ माना है. उस भाषा में गुजराती और मारवाड़ी दोनो के उद्भव के तत्व मिलते हैं. इस प्रबंध को प्रस्तुत करने में उन्हें बहुत श्रम करना पड़ा था. इसके लिये उन्होंने ‘प्राकृत पैंगलम्’ की भाषा की पूरी परीक्षा करनी पड़ी थी.

 राजस्थान में तेस्सीतोरी ने जोधपुर को कार्यक्षेत्र बनाकर हस्तलिखित ग्रंथों के सर्वेक्षण का कार्य आरंभ किया. बीकानेर में उन्हें महाराजा गंगासिंह का सहयोग मिला. तेस्सीतोरी ने बीकानेर रियासत के प्रमुख गाँवों एवं नगरों का भ्रमण किया और घूम- घूमकर पुराने शिलालेख, सिक्के, मूर्तियाँ तथा ऐतिहासिक सामग्रियों का संग्रह किया.

राजस्थान प्रवास के दौरान उन्होंने न केवल यहाँ का सघन दौरा किया, बल्कि तपते रेगिस्तान तथा झुलसा देने वाली धूप की भी परवाह नहीं की. उन्होंने राजस्थानी भाषा व संस्कृति के विकास व समृद्धि के लिए रात-दिन काम किया. वे गाँवों की गरीब जनता व किसानों के साथ घुल मिल जाते थे. वे स्थानीय लोगों से उन्हीं की भाषा में बात करते थे.  हालकृत ‘सतसई’, ‘नासकेतरी कथा’, ‘इंद्रिय पराजय शतकम्’ आदि कृतियों का इतालवी भाषा में अनुवाद करके जहाँ उन्होंने इतालवी लोगों को  भारतीय साहित्य से परिचित कराया, वहीं इतालवी साहित्य की भी श्रीवृद्धि करके अपनी मातृभाषा की भी सेवा की. आचार्य विजयधरम सूरि की प्रेरणा से उन्होंने जैन साहित्य का भी गंभीर अध्ययन किया.

डॉ. तेस्सीतोरी ने चारणों और ऐतिहासिक हस्तलिखित ग्रन्थों की एक विवरणात्मक सूची तैयार की. उन्होंने अपना कार्य पूरा कर राजस्थानी साहित्य पर दो ग्रंथ लिखे. पहला, ‘राजस्थानी चारण साहित्य एवं ऐतिहासिक सर्वे’ और दूसरा ‘पश्चिमी राजस्थान का व्याकरण’.

उन्होंने राजस्थान के मध्यकालीन साहित्य, खासकर कविताओं का अनुवाद किया और उन पर अपनी टिप्पणियाँ भी कीं. इनमें से कई का अध्ययन वे पहले ही फ्लोरेंस के राष्ट्रीय पुस्तकालय में कर चुके थे. उन्होंने पुरानी राजस्थानी के व्याकरण का उसी तुलनात्मक पद्धति से अध्ययन किया जैसा उन्होंने अपनी थीसिस के लिए शोध के दौरान किया था. उन्होंने डिंगल और पिंगल बोलियों तथा वंशावली कथाओं में भी काव्य- कृतियों की खोज की.

तेस्सीतोरी ने ही क्षेत्रीय साहित्य का कोषगत ( लेक्सिकोग्राफिक) और व्याकरणिक अध्ययन करके पहली बार स्थापित किया कि पुरानी गुजराती नामक बोली के बोलने के ढंग से उसे वास्तव में पुरानी पश्चिमी राजस्थानी कहा जाना चाहिए. राजस्थानी बोलियों की खूबसूरती से वे बहुत प्रभावित थे, इसीलिए उन्होंने कई साहित्यिक रचनाओं का समालोचनात्मक और समीक्षात्मक ढंग से संपादन भी किया है. इनमें ‘वेलि क्रिसन रुक्मणी री’, ‘नासकेत री’ तथा ‘छंद राउ जइत-सी’ प्रमुख हैं.

तेस्सीतोरी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शोधकार्य है, ‘बॉर्डिक एंड हिस्टॉरिकल सर्वे ऑफ राजपूताना : ए डेस्क्रिप्टिव कैटलॉग ऑफ बार्डिक एंड हिस्टॉरिकल मैनुस्क्रिप्ट्स’. मुख्य रूप से इसी काम के लिए ग्रियर्सन ने उन्हें आमंत्रिकत किया था. इस काम के लिए उन्हें राजस्थान के गाँव- गाँव में भटकना पड़ा था. इसमें राजस्थान के चारणो और भाटों द्वारा रचित ऐतिहासिक गाथाओं का विस्तृत विवरण है. उनकी इस खोज की योजना और उसकी रिपोर्ट 1914 से लेकर 1920 ई. के बीच एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल में प्रकाशित हुई थीं.

डॉ एल.पी.तेस्सीतोरी के अनुसार राजस्थान ओर मालवा की बोलियों को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पश्चिमी राजस्थान की बोलियाँ और पूर्वी राजस्थान की बोलियाँ. उनके अनुसार पश्चिमी राजस्थान की प्रतिनिधि बोलियाँ हैं – मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी और शेखावाटी. गौड़ वाड़ी, देवड़ा वाटी तथा ढाटी आदि उसकी उपबोलियाँ हैं. इसी तरह पूर्वी राजस्थान की प्रतिनिधि बोलियाँ हैं, ढूंढाड़ी, हाड़ोती, मेवाती और अहीरवाटी. तोरावाटी, मालवी, राँगड़ी, निमाड़ी, खेराड़ी आदि उसकी उपबोलियाँ हैं.

तेस्सीतोरी जब प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कुछ शोध कर रहे थे तब उस क्षेत्र के खंडहरों की मौर्य पूर्व काल और हड़प्पा संस्कृति की समानता से वे हैरान थे. उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सर जॉन मार्शल से मदद माँगी, जो उस समय ए.एस.आई. हड़प्पा में खुदाई कर रहे थे, लेकिन वे खंडहरों के महत्व से अनजान थे. उन्होंने सर जॉन मार्शल की ओर से स्मारक स्तंभों, मूर्तियों, सिक्कों और पुरातात्विक स्थलों की खोज में जोधपुर और बीकानेर की यात्रा की.

उन्हें रंगमहल और अन्य स्थानों के टीलों के खनन से गुप्तकाल की टेरकोटा वस्तुयें प्राप्त हुईं, साथ ही गंगानगर के पास देवी सरस्वती की दो विशाल संगमरमर की मूर्तियाँ भी मिलीं. उन्हें दुलामनी और गंगानगर में कुषाण-साम्राज्य के समय का टेराकोटा सामान मिला. उन्होंने जोधपुर-बीकानेर क्षेत्र में पत्थर (गोवर्धन) स्तंभों और शिलालेख या बीजलेखों के लेखों की संकेतावली को हल करके प्रकाशित किया. इसके अलावा बीकानेर रियासत के सैकड़ों गाँवों में घूमकर उन्होंने 729 पुरालेखों और 981 मूर्तियाँ तथा पुरातत्व महत्व‍ की अन्य चीजें खोजकर एकत्र कीं. तेस्सीतोरी ने बीकानेर-गंगानगर क्षेत्र में इतिहासोन्मुख प्रोटो-ऐतिहासिक खंडहरों का उल्लेख किया है, जो इंगित करते हैं कि ये मौर्यकालीन संस्कृति के हैं. इस खोज ने कालीबंगन की सिंधु घाटी सभ्यता स्थल की खोज और उत्खनन को सक्षम बनाया.

डॉ. तेस्सीतोरी द्वारा पुरातत्व के क्षेत्र में किए गए कार्यों के महत्व के बारे में ओम थानवी ने लिखा है, “पुरातात्विक इतिहास पर डॉ. नयनजोत लाहिड़ी का एक अध्ययन ‘फाइंडिंग फॉरगटन स्टडीज’ ( लुप्त नगरों की खोज ) पढ़कर मुझे अहसास हुआ कि तेस्सीतोरी के पाण्डुलिपि संग्रहण और भाषा, व्याकरण, साहित्य़ या इतिहास के संदर्भ में उनके योगदान पर तो विद्वानों का मुनासिब ध्यान गया है, लेकिन उनकी पुरातात्विक खोज को ठीक से देखा-परखा नहीं गया. न तेस्सीतोरी के जीते जी न बाद में.” ( तेस्सीतोरी के शहर में, जनसत्ता, कोलकाता, 28 जनवरी 2007)

उन्होंने आगे लिखा है, “यह तथ्य अपने आप में कम रोमांचकारी नहीं कि सिन्धु घाटी की सभ्यता की खोज के घटनाक्रम में मुअनजो-दड़ो से पहले कालीबंगा में तेस्सीतोरी का फावड़ा चला. तबतक पुरातात्विक संसार केवल हड़प्पा का नाम जानता था. हड़प्पा में भी अलेक्जेंडर कनिंगम को मुहरों और अवशेषों से किसी प्रागैतिहास का अहसास नहीं हुआ था. शुरू में उन्होंने हड़प्पा को महज ह्वेनसांग के दौर का कोई बौद्ध मठ समझा. जबकि इससे उलट तेस्सीतोरी ने कालीबंगा के कुछ पुरावशेष देखकर साफ लक्ष्य किया कि ये “प्रागैतिहासिक नहीं तो बहुत पीछे के” जरूर हैं. ये चीजें थीं नुकीले पत्थर और तीन मुहरें, जिनमें दो एकशृंगी वृषभ वाली हैं. एकशृंगी वृषभ की मुहरें आज सिन्धु सभ्यता की जानी मानी चाक्षुष पहचान हैं.” ( उपर्युक्त ) ओम थानवी इस विषय पर टिप्पणी करते हैं कि, “तेस्सीतोरी की मुश्किल यह थी कि वे प्रशिक्षित पुरातत्वी नहीं थे. इसलिए कालीबंगा की अपनी खोज पर पुरातत्व के किसी अधिकारी विद्वान से सलाह लेते हुए झिझके होंगे.  लेकिन कालीबंगा की तीन मुहरों को लेकर मन में घुमड़ी शंका पर उन्होंने अपने गुरू समान जॉर्ज ग्रियर्सन से खतो-किताबत की थी, जब वे माँ को देखने इटली गए. उन्होंने ग्रियर्सन को एक पत्र में मुहरों की तस्वीर भेजते हुए लिखा, “मेरा विश्वास है ये प्रागैतिहासिक काल की हैं, नहीं तो गैर-आर्य तो जरूर…. मैंने इन्हें अबतक किसी को नहीं दिखाया है, सर जान मार्शल को भी नहीं. मैं पहले आप की राय जानना चाहता हूँ.” ( उपर्युक्त ) थानवी लिखते हैं कि, “1924 में जॉन मार्शल ने दुनिया को भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता  की आधिकारिक खबर दी. तेस्सीतोरी की झोली में एक महान उपलब्धि आकर भी अज्ञात रह गई.” (उपर्युक्त.)

बीकानेर का प्रसिद्ध संग्रहालय तेस्सीतोरी की देन है. बीकानेर के प्रसिद्ध अभिलेखागार में तेस्सितोरी अभिलेख कक्ष बना हुआ है जिसमें उनसे जुड़ी तमाम सामग्री का प्रदर्शन किया गया है. इस कक्ष की सामग्री हजारीलाल बाँठिया ने उपलब्‍ध कराई है. उनकी समाधि भी बीकानेर में ही है. इनकी समाधि का निर्माण भी हजारीलाल बाँठिया ने कराया है.

अपनी भाषा के अलावा तेस्सीतोरी को अंग्रेजी, लैटिन, ग्रीक, जर्मन, संस्कृत, प्राकृत, गुजराती, अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी, ब्रज आदि भाषाओं का ज्ञान था. जैन आचार्य विजयधरम सूरि के सानिध्य में आकर वे शाकाहारी हो गए थे. अपनी मूछें और केश भी उन्होंने राजस्थानी रंग में ढाल लिया था. बीकानेर में वे जब ऊँट पर सवार होते तो लू से बचने के लिए वे साफा भी पहन लेते थे.

तेस्सीतोरी की प्रमुख कृतियाँ हैं, ‘ओरिजिन ऑफ द डेटिव एंड जेनेटिव एंड डेटिव-पोस्ट पोजीशन इन गुजराती एंड मारवाड़ी’, ‘सम ग्रामैटिकल फॉर्म्स इन द ओल्ड बैसवाड़ी ऑफ तुलसीदास’, ‘ग्रामर ऑफ द ओल्ड वेस्टर्न राजस्थानी’, ‘बॉर्डिक एंड हिस्टॉरिकल सर्वे ऑफ राजपूताना’, ‘द वाइड साउंड ऑफ ई एंड ओ इन मारवाड़ी एंड गुजराती’ और उनके संपादित ग्रंथ हैं, ‘वचनिका राठौड़ रतनसिंहजी री’, ‘बेलि क्रिसन रुकमणी री’ तथा ‘छंद राउ जइत-सी’.

अपनी माँ की गंभीर बीमारी की खबर पाकर तेस्सीतोरी 17 अप्रैल 1919 को इटली के लिए रवाना हो गए. लेकिन जबतक वे इटली पहुँचे तबतक उनकी माँ का देहावसान हो चुका था. कुछ महीने इटली में रहकर जब वे नवंबर में जहाज से भारत लौट रहे थे तब दुर्भाग्य से उन्हें इस्पेनिश इन्फ्लूएंजा हो गया और वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए. 12 नवंबर 1919 को बीकानेर में उनका निधन हो गया.  महाराजा गंगासिंहजी ने उन्हें किले के पास ही राजपूत शैली की छतरी की समाधि में दफनाया. बीकानेर में तेस्सितोरी की समाधि को स्मृति स्थल के रूप में विकसित किया गया हैं.

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( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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