शिवदान सिंह चौहान : आलोचना के मान के अन्वेषक – डॉ. अमरनाथ

हिंदी के आलोचक

शिवदान सिंह चौहान

 आगरा ( उ.प्र.) जिले के ‘बमानी’ नामक गाँव में जन्मे, इलाहाबाद से पढ़े-लिखे प्रतिबद्ध मार्क्सवादी आलोचक  शिवदान सिंह चौहान ( 15.03.1918- 29.08.2000) लेखक होने के साथ- साथ राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे. 1936 में ही उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी.  ‘आलोचना’ पत्रिका के वे संस्थापक संपादक थे. उन्होंने मार्क्सवाद को केवल विचारों के स्तर पर ही नहीं अपितु अपने जीवन में भी उतारा. इसके बावजूद मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति वे प्रर्याप्त उदार थे. उन्होंने लिखा है, “विश्व के महान विचारकों की पाँत में मार्क्स भी एक महान सत्यान्वेषी विचारक हैं, लेकिन यह समझ लेना कि वह त्रिकालदर्शी थे और उनके साथ ही सत्यान्वेषण की प्रक्रिया समाप्त हो गई, सर्वथा गलत है.”( आलोचना के मान, पृष्ठ-100) 

 शिवदान सिंह चौहान की प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं – ‘प्रगतिवाद’, ‘हिन्दी गद्य साहित्य’, ‘हिन्दी साहित्य के अस्सी वर्ष’, ‘साहित्यानुशीलन’, ‘आलोचना के मान’, ‘साहित्य की समस्याएं’, ‘साहित्य की परख’, ‘आलोचना के सिद्धांत’, ‘आधुनिक संस्कृति के निर्माता’, ‘प्रगतिशील स्मृति प्रवाह’ तथा ‘परिप्रेक्ष्य को सही करते हुए’ आदि.

उनका अधिकांश लेखन आलोचनात्मक और वैचारिक निबंधों के रूप में हुआ है. किसी भी लेखक पर उनकी स्वतंत्र आलोचनात्मक पुस्तक नहीं है. उनकी दो पुस्तकें खासी चर्चित रही हैं- ‘हिन्दी आलोचना के अस्सी वर्ष’ और ‘आलोचना के सिद्धांत’. ‘हिन्दी आलोचना के अस्सी वर्ष’ के लेखन के प्रति अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए उनका कहना है कि आधुनिक काल से पहले तक हम हिन्दी भाषा समूह का इतिहास लिखते हैं जिसमें मैथिली, अवधी, ब्रज, राजस्थानी आदि को शामिल किया जाता है. खड़ी बोली हिन्दी के साहित्य का शुभारंभ वे 1873 ई. में प्रकाशित भारतेन्दु के प्रहसन ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ से मानते हैं. ‘हिन्दी साहित्य के अस्सी वर्ष’ का लेखन काल 1953 है. इसलिए इन अस्सी वर्षों की कालावधि को ही वे हिन्दी साहित्य की संपूर्ण काल सीमा मानते हैं.

फिलहाल, शिवदान सिंह की उक्त थीसिस को परवर्ती साहित्यकारों ने स्वीकार नहीं किया और ज्यादातर उसकी नोटिस भी नहीं ली गई. निश्चय ही, सिर्फ खड़ी बोली हिन्दी के साहित्य का अलग से और स्वतंत्र इतिहास लेखन की उनकी दृष्टि अव्यावहारिक, एकांगी और जातीय एकता को खण्डित करने वाली है.

      शिवदान सिंह चौहन के अनुसार आलोचना भी एक सामाजिक कर्म है. एक आलोचक अपनी रुचि से श्रेष्ठ कृति का चयन करता है और उसके मूल्यांकन द्वारा पाठक की प्रतीति, अनुभूति और संवेदना का विस्तार करता है, रचना के सौन्दर्य का उद्घाटन करता है. साहित्य जीवन का ही प्रतिबिम्ब है, इसलिए मूल्यांकन के मान जीवन के व्यापक सत्य पर आधारित होने चाहिए. शिवदान सिंह चौहान कहते हैं, “कोई कृति कितनी महान है, कितने स्थाई मूल्य की है, इसका निर्णय व्यापक जीवन की अपेक्षा में रखकर ही किया जा सकता है.” ( आलोचना के सिद्धांत, पृष्ठ-185)

‘आलोचना’ पत्रिका की जरूरत के कारणों का जिक्र करते हुए उन्होंने ‘आलोचना क्यों?’ नाम से ‘आलोचना’ के पहले अंक का जो संपादकीय लिखा है उसे पढ़ने पर साहित्य और समाज के विषय में उनकी समझे और आलोचनात्मक दृष्टि का कुछ संकेत मिल सकता है. उनके लम्बे संपादकीय का एक अंश है, “प्रगतिवादी आलोचना के क्षेत्र में विकृत समाजशास्त्रीयता का प्रतिपादन करने वाली एक नकारात्मक संकीर्ण मतवादी प्रवृति ने अपना अकांड तांडव रचकर ऐसी असैद्धांतिक और अबुद्धिवादी आलोचना पद्धति चलाई जिसके आतंक के सामने प्रेरणा और अनुभूति के स्रोत बंद होने लगे, वस्तु सत्य की संवेदनशील प्रतिभा के पौधे मुरझाने लगे और साहित्यालोचन के मानदंड इस स्वेच्छाचारी संकीर्ण दृष्टिकोण की बेदी पर बलिदान कर दिए गए.

इसके विपरीत मनोविज्ञान का आधार लेकर आलोचना क्षेत्र में जो विचारकोण बनाया गया वह अंतत: साहित्य के सामाजिक प्रयोजनों और दायित्वों को त्यागकर केवल प्रतीकवादी प्रयोगों तक ही सीमित रह गया और साहित्य और समाज के आधारभूत प्रश्नों के प्रति उसकी अभिरुचि एकांगी और आनुषंगिक ही रही. इसके अतिरिक्त प्राचीन अलंकार-ग्रंथों की परिपाटी का अनुसरण करने वाले आलोचक एक प्रकार से लकीर के फकीर ही बने रहे और उन्होंने आचार्य शुक्ल के समान आधुनिक चेतना और सामाजिक जीवन –वास्तव के अनुकूल उन सिद्धांतों का नव संस्कार करने की भी कोई उल्लेखनीय प्रवृति नहीं दिखाई.  यहाँ तक कि सत् साहित्य का मूल्यांकन करने वाली ‘लोकमंगल’ और ‘लोकरंजन’ की शास्त्रीय कसौटियाँ भी उनके निकट मात्र एक रूढ़, अमूर्त विचार बनकर रह गईं -ऐसे काम्य आदर्श न रहीं जो प्रत्येक युग के सामयिक संघर्ष में जनता का हित- साधन करने वाली सजग चेतना का ठोस आधार लेकर बदलते और विकास करते जाते हैं और स्वयं ऐतिहासिक सत्य के सारवाही विचारों का मूर्त-सजीव युग-रूप धारण करके साहित्य में मानव मूल्यों और जन हितों के संरक्षक बनते हैं. आज के संघर्षपूर्ण संक्रान्ति युग में हमारे साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत का यह गतिरोध तो हमारी राष्ट्रीय स्वाधीनता और प्रगति के मार्ग में और भी बाधा बना हुआ है. ‘आलोचना’ इस गतिरोध को तोड़ने का संकल्प लेकर जन्मी है.” ( ‘आलोचना’, प्रथम अंक, अक्टूबर 1951 के संपादकीय से )

अपनी अन्तिम कृति ‘परिप्रेक्ष्य को सही करते हुए’ में अपनी समूची आलोचना यात्रा का सिंहावलोकन करते हुए आत्मालोचन की मुद्रा में उन्होंने लिखा है,  “पहली बार मुझे अहसास हुआ कि सन् 1937 से लेकर अब 1997 तक की अवधि में लगातार बीमारियों से जूझते हुए स्वतंत्रता संग्राम और वामपंथी राजनीति में स्वेच्छापूर्वक एक स्वयंसेवक की भूमिका निभाते हुए अपनी खानाबदोश जिन्दगी में प्रेमचंद जी के मासिक ‘हंस’ और बाद में त्रैमासिक ‘आलोचना’ जैसी प्रमुख पत्रिकाओं का संपादन करते हुए मैने साहित्य और आलोचना संबंधी जो निबंध लिखे उनमें अंतर्निहित बौद्धिक भावना ‘प्रगतिशील’ और ‘प्रगतिवाद’ की प्रवृति और विचारधारा को मार्क्सवाद की वैज्ञानिक तथा मानवतावादी दृष्टि से समझने –समझाने और परिभाषित करने के एक अनवरत प्रयास का अंग रही है.” ( उद्धृत, ‘आलोचना’, सहस्राब्दी अंक तीन, अक्टूबर –दिसंबर-2000, पृष्ठ-7) 

उल्लेखनीय है कि एक ही विचारधारा के होने के बावजूद शिवदान सिंह चौहान और रामविलास शर्मा के बीच कुछ मुद्दों को लेकर हमेशा विवाद होता रहा और चर्चा का विषय भी बना रहा.

शिवदान सिंह चौहान ने लगभग तीन दर्जन पुस्तकों का अनुवाद किया है और अनेक कृतियों का संपादन भी किया है जिनमें ‘ताज की छाया में’, ‘गद्यनिकुंज’, ‘नवकथा मंजरी’, ‘आधुनिक एकांकी’, ‘आधुनिक कहानियाँ’, ‘युगछाया’ आदि प्रमुख हैं. ( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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