प्रभाकर श्रोत्रिय : बहुमुखी प्रतिभा के आलोचक – डॉ. अमरनाथ

हिंदी के आलोचक- 51

प्रभाकर श्रोत्रिय

       मध्य प्रदेश के जावरा कस्बे ( जिला रतलाम) में जन्मे, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से उच्च शिक्षा प्राप्त करके भोपाल में शिक्षक रहे प्रभाकर श्रोत्रिय (19.12.1938—15.9.2016) प्रतिष्ठित आलोचक के साथ साथ, पत्रकार, निबंधकार और नाटककार भी हैं. उनका अध्ययन फलक व्यापक है. ‘साक्षात्कार’, अक्षरा, ‘वागर्थ’, समकालीन भारतीय साहित्य तथा ‘नया ज्ञानोदय’ जैसी प्रमुख पत्रिकाओं का उन्होंने कुशल संपादन किया है तथा भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता एवं भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली के निदेशक के रूप में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है. अपने संपादन काल में उन्होंने सैकड़ों उदीयमान प्रतिभाओं की खोज की और जतन के साथ उन्हें स्थापित किया.

‘सुमन : मनुष्य और स्रष्टा’, ‘प्रसाद का साहित्य : प्रेमतात्विक दृष्टि’, ‘कविता की तीसरी आंख’, ‘संवाद’, ‘कालयात्री है कविता’, ‘रचना एक यातना है’, ‘अतीत के हंस : मैथिलीशरण गुप्त’, ‘जयशंकर प्रसाद की प्रासंगिकता’, ‘मेघदूत : एक अंतर्यात्रा’, ‘शमशेर बहादुर सिंह’, ‘नरेश मेहता’, ‘कवि परंपरा : तुलसी से त्रिलोचन’, ‘साहित्य के नए प्रश्न’ ‘मैं चलूँ कीर्ति- सी आगे-आगे’, ‘हिन्दी-कल आज और कल’ आदि उनकी प्रमुख आलोचना कृतियां हैं.  इसके अलावा ‘हिन्दी कविता की प्रगतिशील भूमिका’, ‘सूरदास : भक्ति कविता का एक उत्सव’, ‘प्रेमचंद : आज’, ‘रामविलास शर्मा – व्यक्ति और कवि’, ‘धर्मवीर भारती : व्यक्ति और कवि’, ‘कबीर दास : विविध आयाम’, ‘भारतीय श्रेष्ठ एकांकी ( दो खंड)’ आदि का उन्होंने संपादन किया है.

प्रभाकर श्रोत्रिय ने आलोचना के लिए कविता को केन्द्र में रखा है. वे आधुनिक काव्यान्दोलन को खेमों में बांटकर नहीं देखते और लोक कल्याण को साहित्य का केन्द्रीय मूल्य मानते हैं.  काव्यालोचना के संबंध में अपनी मान्यताओं को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं, “श्रेष्ठ कवि का चयन मैं वाद को सामने रखकर नहीं, कविता की श्रेष्ठता को सामने रखकर करता हूँ. काव्य-मूल्य दरअसल अपने उच्चतर अर्थों में हमारे जीवन मूल्य की संवेदनात्मक और मार्मिक प्रतीति है. आत्म साक्षात्कार है. शब्द और अर्थ के गहरे संयोजन में कविता संवेदन अंतर्दृष्टि, सौन्दर्यबोध, रस बोध, कला समय और समाज बोध उत्पन्न करती है जो हमारे सामने हर समय नए संदर्भों में नवीनता प्राप्त करता है. यही कारण है कि कविता समय और देश की भूमि अतिक्रान्त करती है.” ( ‘मति का धीर : प्रभाकर श्रोत्रिय’, ओम निश्चल, samalochan.blogspot.com, December 19,2016)  

ओम निश्चल से एक बातचीत में उन्होंने कहा था, “जहाँतक आलोचना के प्रतिमानों का सवाल है वे कविता से ही जन्म लेते हैं. रचना को जो तत्व सौन्दर्य प्रदान करते हैं और मार्मिक कौशल से अपने समय, सत्य और जीवनार्थ को व्यक्त करने में सहायक होते हैं, वे ही आलोचना के प्रतिमान बनते हैं. इसे वह (आलोचना) औचित्य और समय की कसौटी पर कसती है और तमाम ज्ञान बिन्दुओं से उसे विशद बनाती हैं. इसका विवेचन मैंने अपनी पुस्तक ‘कविता की तीसरी आँख’ में किया है.” ( उपर्युक्त )

प्रभाकर श्रोत्रिय कहा करते थे कि ज्यादातर आलोचनाएं विचारधारा का नहीं, संगठनों का भी मुंह जोहते हुए की जाती हैं. इस तरह ये विचारधारा के प्रति भी ईमानदार नहीं होती. वे मानते थे कि विचारधारा एक रचनाकार की स्वायत्तता, उसके विवेकसंगत चिंतन और उसके अधिकार को छीन लेती है जबकि एक स्वाधीन लेखक की दृष्टि उस तथ्य और यथार्थ के पार भी पहुँचती है जहाँ विचारधाराएं नहीं पहुँच पातीं.

 उनकी सवार्धिक उल्लेखनीय आलोचना पुस्तक है ‘कविता की तीसरी आंख’. इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने पौर्वात्य और पाश्चात्य काव्य की परंपराओं में प्रवेश करके नए काव्य की सर्जना के लिए नए मानदंडों को स्थिर करने की कोशिश की है. वे खुद लिखते हैं, “कविता के सच्चे मूल्यांकन के लिए आधुनिकता के छद्मों को रेखांकित करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी शास्त्र के नाम पर मरी हुई परंपरा को अस्वीकार करना भी.  काव्य का सारा चिन्तन  कविता से हमारी अंतरंग और साक्षात् मुलाकात के लिए ही तो है, वरना, कविता अलग और कविता का शास्त्र अलग, क्या मानी है! ऐसे शास्त्र के जो कविता की बजाए अपने को कहता है. कसौटी क्या खुद आंकने के लिए होती है?” (उद्धृत, दस्तावेज-152, जुलाई-सितंबर 2016, पृष्ठ- 14).

अरविन्द त्रिपाठी ने उनका मूल्यांकन करते हुए लिखा है, “ मेरी दृष्टि में कम से कम उनकी तीन पुस्तकें, ‘कविता की तीसरी आंख’, ‘अतीत के हंस : मैथिलीशरण गुप्त’ और ‘मेघदूत : एक अंतर्यात्रा’ ऐसी आलोचना दृष्टि का साक्ष्य उपस्थित करती हैं कि जो उनके आलोचनात्मक विवेक के साथ उनके आलोचना संसार की विविधता भरे रेंज का आभास कराती है.” ( दस्तावेज-152, जुलाई-सितंबर,2016 पृष्ठ- 13)

प्रभाकर श्रोत्रिय की समीक्षा का दायरा बहुत विस्तृत है. वे संस्कृत कविता के भी अध्येता हैं और कालिदास उनके प्रिय कवि हैं. उनकी पुस्तक ‘मेघदूत : एक अंतर्यात्रा’ यद्यपि एक आलोचनात्मक कृति है किन्तु उसमें काव्य की रमणीयता है. उसमें उन्होंने कहा है कि जबतक किसी रचना का अपना विराट ब्रह्मांड नहीं होता तबतक उसे बड़ी रचना होने का गौरव नहीं मिल सकता. वे स्वीकार करते हैं कि मेघदूत पर लिखना सर्वथा एक नई भाव-भाषा भूमि पर पैर रखना था.

 इसके बावजूद  श्रोत्रिय की आलोचना दृष्टि में परंपरा के साथ आधुनिकता पर भी उतना ही जोर है. उनकी आलोचना की भाषा में पठनीयता का एक अलग ही स्वाद है.

‘इला’, ‘साँच कहूँ तो’, ‘फिर से जहाँपनाह’ आदि उनकी नाट्यकृतियां हैं. ‘सौन्दर्य का तात्पर्य’, ‘समय का विवेक’, ‘हिन्दी : दशा दिशा’, ‘समय समाज साहित्य’ ‘शाश्वतोयं’,’ प्रजा का अमूर्तन’, ‘कवि परंपरा’ ‘भारत में महाभारत’ आदि उनके ऐसे निबंध संग्रह हैं जिनमें उनका चिन्तक व्यक्तित्व भी प्रस्फुटित हुआ है.

भारतीय भाषा परिषद के निदेशक के रूप में वे जबतक कोलकाता में रहे, साहित्यिक समारोहों के केन्द्र में रहे. उन्होंने ही परिषद से ‘वागर्थ’ का प्रकाशन और संपादन प्रारंभ किया और उसे हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं में महत्वपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित भी किया.

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( लेकक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागध्यक्ष हैं.)

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