धीरेन्द्र वर्मा : अध्यापन और अनुसंधान के पथ प्रदर्शक – डॉ. अमरनाथ

हिंदी के आलोचक – 53

धीरेन्द्र वर्मा

बरेली ( उ.प्र.) में जन्मे, इलाहाबाद और पेरिस में पढ़े-लिखे, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रथम हिन्दी विभागाध्यक्ष, सागर विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष तथा जबलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ( 17.05.1897-23.04.1973 ) ने हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान के क्षेत्र में पथ- प्रदर्शन का काम किया है. वे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था थे. हिन्दी में शिक्षण, शोध और साहित्य- सृजन के क्षेत्र में उन्होंने नए कीर्तिमान स्थापित किए.

डॉ. धीरेन्द्र वर्मा 1924 ई. में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुए. विश्वविद्यालय में शिक्षक नियुक्त होने वाले वे पहले व्यक्ति थे. बाद में वे प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष बने. वे एक आदर्श अध्यापक तो थे ही, विभाग की सुदृढ़ नींव डालने वाले एक उत्कृष्ट प्रबंधक भी थे.

धीरेन्द्र वर्मा, उस समय हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति अगाध प्रेम को लेकर हिन्दी जगत में आए जब हिन्दी साहित्य के अध्ययन की समुचित व्यवस्था ही नहीं थी. उन्होंने हिन्दी की समस्याओं पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया और हिन्दी के प्रचार -प्रसार तथा शोध के क्षेत्र की बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया. हिन्दी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन तथा शोध शोध के क्षेत्र में नवीन मार्ग प्रशस्त करते हुए उन्होंने हिन्दी साहित्य के गंभीर अध्येताओं और शोधकर्ताओं की एक लंबी श्रृंखला तैयार की.

अज्ञात सत्य का शोध करना ही मानो वर्मा जी के जीवन का चरम लक्ष्य था. ऋषियों की भाँति उन्होंने लिखा है- ”खोज से संबंध रखने वाला विद्यार्थी ज्ञानमार्ग का पथिक होता है. भक्तिमार्ग तथा कर्ममार्ग से उसे दूर रहना चाहिए. संभव है आगे चलकर सत्य के अन्वेषण की तीन धाराएं आपस में मिल जाती हों, कदाचित्‌ मिल जाती हैं, किंतु इसकी ज्ञानमार्गी पथिक को चिंता नहीं होनी चाहिए.”

      डॉ. धीरेन्द्र वर्मा का अधिकांश लेखन ही शोधपरक है. 1934 ई. में वे फ्रांस चले गए. वहाँ उन्होंने प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक ज्यूल ब्लॉख के निर्देशन में पेरिस विश्वविद्यालय से डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की. उनके निबंधों के आधार पर अनेक गंभीर शोध कार्य संपन्न हो चुके हैं. उनके द्वारा लिखी गई ‘हिन्दी भाषा का इतिहास’ शीर्षक पुस्तक हिन्दी भाषा का प्रथम वैज्ञानिक इतिहास है. यह अपने समय तक के आधुनिक भाषाओं से संबंधित खोज-कार्य के गंभीर अनुशीलन के आधार पर लिखा गया हिन्दी भाषा का प्रथम इतिहास है.

डॉ. धीरेन्द्र वर्मा की प्रमुख पुस्तकें हैं, ‘ब्रजभाषा व्याकरण’, ‘आधुनिक हिन्दी काव्य में नारी भावना’, ‘प्राकृत अपभ्रंश साहित्य’, ‘परिषद् निबंधावली’, ‘अष्टछाप’, ‘सूरसागर-सार’, ‘मेरी कॉलेज डायरी’, ‘मध्यदेश’, ‘ब्रजभाषा’, ‘ग्रामीण हिन्दी’, ‘हिन्दी राष्ट्र या सूबा हिन्दुस्तान’, ‘विचारधारा’, ‘यूरोप के पत्र’ आदि. ‘हिन्दी विश्वकोश’ ( बारह खंड), ‘हिन्दी साहित्य कोश’( दो खंड), ‘हिन्दी साहित्य’ ( तीन खंड ) तथा ‘कम्पनी के पत्र’ का उन्होंने संपादन किया है.

उनकी उपर्युक्त कृतियों में ‘मध्यदेश’ भारतीय संस्कृति संबंधी ग्रंथ है जो बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के तत्वावधान में दिए गए भाषणों का संशोधित रूप है. ‘ब्रजभाषा’ उनके शोधप्रबंध का हिन्दी रूपान्तर है. ‘यूरोप के पत्र’ यूरोप जाने का बाद वहाँ से लिख गए पत्रों का महत्वपूर्ण संचयन है.

डॉ. धीरेन्द्र वर्मा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचनात्मक उपलब्धियाँ हैं, ‘हिन्दी विश्वकोश’, ‘हिन्दी साहित्यकोश’ तथा ‘हिन्दी साहित्य’. वे नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दी विश्वकोश’ के प्रधान संपादक थे. 1956 ई. से लेकर 1970 ई. तक इस विश्वकोश के बारह खंड प्रकाशित हुए. यह एक असाधारण कार्य था. दो खंडों मे प्रकाशित ‘हिन्दी साहित्य कोश’ उनका दूसरा असाधारण कार्य है.  अपने प्रकाशन के छ: दशक से अधिक हो जाने के बावजूद आज भी इस ग्रंथ की महत्ता कम नहीं हुई है. हिन्दी भाषा और साहित्य के हर गंभीर अध्येता के लिए यह अनिवार्य जैसा है. आज भी इसका कोई विकल्प नहीं है. इसके पहले खंड में पारिभाषिक शब्दावली है और दूसरे में नामवाची शब्दावली. इसके लेखन में उस समय के सर्वाधिक प्रतिष्ठित 96 विद्वानों का सहयोग लिया गया है. इसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध है. इसकी भूमिका में उन्होंने लिखा है, “गत पचास वर्षों में हिन्दी साहित्य के अध्ययन, अध्यापन तथा अनुशीलन की परिधियाँ  बहुत व्यापक होती गई हैं. आलोचना, अनुसंधान और इतिहास- साहित्यानुशीलन के सभी क्षेत्रों में अनेक विद्वानों के अथक परिश्रम से जो उपलब्धियाँ हुई हैं, उनसे हमारे अध्ययन में यथेष्ट संपन्नता, गहराई और विस्तार आया है. परंतु साहित्य के इस अध्ययन से संबंधित अबतक कोई ऐसा संदर्भ ग्रंथ नहीं था, जो अध्येताओं के लिये उन उपलब्धियों का तात्कालिक उपयोग करने में सहायक हो सकता.  समृद्ध भाषाओं के साहित्यों में ऐसे दर्जनों छोटे-बड़े कोश हैं जिनमें साहित्य का, संपूर्ण उपयोगी ज्ञान तात्कालिक रूप में उपलब्ध रहता है. हिन्दी साहित्य के इस अभाव की पूर्ति के लिये लगभग तीन वर्ष पहले बनायी गई योजना आज ‘हिन्दी साहित्य कोश’ के रूप में साकार हो रही है.” ( भूमिका, हिन्दी साहित्य कोश, भाग -एक ) 

इस ग्रंथ में प्राचीन साहित्य शास्त्र, पाश्चात्य साहित्य शास्त्र, साहित्य के विविध वाद तथा प्रवृतियाँ, साहित्य के विविध रूप, हिन्दी साहित्य के इतिहास के विविध काल, युग और धाराएं,  साहित्यिक संदर्भ में प्रयुक्त दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक तथा समाजशास्त्रीय सिद्धांत, लोक साहित्य, आधुनिक भारतीय भाषाओं तथा संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी के साहित्यों का इतिहास, हिन्दी भाषा, उसकी जनपदीय बोलियों, प्राचीन तथा आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं और संबद्ध आर्यभाषाओं के परिचयात्मक विवरण आदि शामिल हैं.

इसी तरह उनका अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ है, ‘हिन्दी साहित्य’. यह ग्रंथ तीन खंडों में है. इसमें पहली बार हिन्दी क्षेत्र को एक जातीय क्षेत्र ( नेशनलिटी ) के रूप में कल्पित किया गया है. बाद में रामविलास शर्मा ने जिस हिन्दी जाति की अवधारणा को विकसित किया उसके सूत्र धीरेन्द्र वर्मा की इस पुस्तक में मिल जाते हैं. इसके पहले खंड की प्रस्तावना में वे लिखते हैं, “यद्यपि हिन्दी भाषा और साहित्य का इतिहास गत एक हजार वर्ष से अधिक पुराना नहीं है, परंतु उसकी परंपराएं अत्यंत प्राचीन हैं. हिन्दी भाषा का क्षेत्र वर्तमान राजस्थान से बिहार तथा हिमांचल प्रदेश और पूर्वी पंजाब से मध्यप्रदेश का विस्तृत भूभाग है. प्रशासनिक आधार पर इसमें पंजाब ( पूर्वी भाग ), हिमांचल प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार- आठ अलग- अलग इकाइयाँ हैं, परंतु भाषा की दृष्टि से यह संपूर्ण क्षेत्र एक अविभाज्य इकाई है, जिसकी जनसंख्या  लगभग बाईस करोड़ है. भाषा की इस इकाई को यदि हिन्दी प्रदेश कहा जाय तो अनुचित न होगा. विस्तार और जनसंख्या में ही नहीं, सांस्कृतिक दृष्टि से भी इस हिन्दी प्रदेश का विशेष महत्व रहा है. प्राचीन काल के वृहत्तर मध्यदेश का ही यह आधुनिक भाषा क्षेत्र है, जिसे उत्तर भारत और अनेक अंशों में संपूर्ण भारत की संस्कृति का केन्द्र कहा जा सकता है. हिन्दी भाषा आर्यों की उस भाषा की अन्यतम प्रतिनिधि है जिसमें उसका प्रचीनतम साहित्य और सांस्कृतिक इतिहास उपलब्ध हुआ है. ( हिन्दी साहित्य, प्रथम खंड, प्रस्तावना, पृष्ठ-3)

खेद है कि डॉ. धीरेन्द्र वर्मा की इस महत्वपूर्ण स्थापना की बहुत दिनों तक नोटिस नहीं ली गई. उन्होंने अपनी इसी स्थापना को अधिक सुसंगत और तार्किक ढंग से पाठको के सामने रखने के लिए एक अन्य पुस्तक लिखी है, जिसका नाम है, ‘हिन्दी राष्ट्र या सूबा हिन्दुस्तान’. इस पुस्तक के चार महत्वपूर्ण लेख 1922 ई. में ही छप चुके थे. इससे पता चलता है कि इस विषय पर वे कितने गंभीर थे. इस पुस्तक में उन्होंने हिन्दी भाषी जाति के एकीकरण की समस्या पर विचार किया है.  “इसी हिन्दी भाषी जाति को बंगाल के लोग ‘हिन्दुस्तानी’ कहते हैं. ‘हिन्दुस्तानी’ शब्द का अर्थ होता है ‘हिन्दुस्तान की’ (भाषा)’ और ‘हिन्दुस्तान’ शब्द मुस्लिम काल में अपने सीमित अर्थ में पंजाब तथा बंगाल के बीच के उत्तरभारतीय मैदान के लिये प्रयुक्त होता था.”( निराला की साहित्य साधना-2, पृष्ठ-69) ‘हिन्दी राष्ट्र या सूबा हिन्दुस्तान’ नामक पुस्तक का हवाला देते हुए रामविलास शर्मा ने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश’ की भूमिका को समाप्त करते हुए बड़े आदर के साथ डॉ. धीरेन्द्र वर्मा की उक्त स्थापना का उल्लेख किया है और लिखा है, “1930 में प्रकाशित ‘हिन्दी राष्ट्र या सूबा हिन्दुस्तान’ में धीरेन्द्र वर्मा ने लिखा था, “ हिन्दी में हिन्दी राष्ट्र के विशाल इतिहास की अभी कल्पना भी नहीं हो पाई है.  मेरी यह पुस्तक उस कल्पना को साकार करने का प्रारंभिक प्रयास मात्र है.” ( भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश, भाग-2, भूमिका, पृष्ठ-8)

उन्होंने इलाहाबाद में ‘भारतीय हिन्दी परिषद’ की स्थापना की जो आज भी देश के हिन्दी साहित्य के अध्येताओं और साहित्यकारों का सबसे बड़ा संहगठन है. यहाँ से ‘हिन्दी अनुशीलन’ नाम की पत्रिका उन्होंने शुरू की थी जो आज भी निकल रही है. वे 1958-59 में लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे.  1927 से ही वे हिन्दुस्तानी एकैदमी, इलाहाबाद के सदस्य रहे और कई वर्ष तक उसके मंत्री भी.

हिन्दी के आलोचक अनुक्रम के लिए क्लिक करें

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *