एहतेशाम हुसैन : उर्दू की मार्क्सवादी आलोचना के प्रमुख स्तंभ – डॉ. अमरनाथ

एहतेशाम हुसैन

हिंदी के आलोचक –

आजमगढ़ ( उ.प्र.) जिले के ‘माहुल’ नामक गाँव में जन्मे, इलाबहाबाद में पढ़े-लिखे और इलाहाबाद में ही अध्यापक रहे सैय्यद एहतेशाम हुसैन ( 21..04.1912—01.12.1972 ) प्रतिष्ठित मार्क्सवादी आलोचक हैं. उनका विचार है कि साहित्य को समझने के लिए प्रगतिशील सामाजिक दृष्टिकोण सबसे अधिक उपयोगी साबित हो सकता है. आलोचना और आत्मालोचना के मार्ग पर चलकर ही सच्चाई को ढूँढने में सफल हुआ जा सकता है. शाफे किदवई के शब्दों में,

“ प्रगतिशील आलोचकों में सबसे महत्वपूर्ण नाम सैयद एहतेशाम हुसैन का है.  एहतेशाम हुसैन ने साहित्य की सैद्धांतिक समस्याओं के अतिरिक्त सृजनात्मक कलाकारों का भी मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र  की रौशनी में अध्ययन किया. उन्होंने क्रिस्टोफर कॉडवेल, लूकाच और कुछ अन्य मार्क्सवादी चिन्तकों के माध्यम से मार्क्सवादी काव्यशास्त्र संकलित करके फिर उसके व्य़ावहारिक नमूनों की निशानदेही की. उन्होंने यह भी विश्वास दिलाया कि साहित्य सांस्कृतिक प्रक्रिया की धुरी पर घूमने वाला ऐसा अमल है  जो बाज मूल्यों के हवाले से स्वरूप ग्रहण करता है. साहित्य, समाज में सक्रिय विभिन्न वर्गों के परस्पर संबंधों का भी दर्पण होता है. अत: साहित्यिक कलाकृति का मूल्यांकन उसी अवस्था में अर्थपूर्ण हो सकता है, जब तक सामाजिक चेतना को विवाद का केन्द्र विन्दु न बनाया जाय. “  (बीसवीं शताब्दी में उर्दू साहित्य, शाफे किदवई का लेख, पृष्ठ- 239)

एक आलोचक के अध्ययन का क्षेत्र और उसके दायित्व की ओर संकेत करते हुए एहतेशाम हुसैन लिखते हैं, “ आलोचना उन सारी विद्याओं से संबद्ध हो जाती है जिनसे मानव –संस्कृति तथा सभ्यता का सृजन एवं निर्माण हुआ है. ….. विश्लेषण के लिए इन सारी विद्याओं की जानकारी की जरूरत है, जो मानव –प्रकृति और ज्ञान के स्वाभाविक तथा ऐच्छिक निरूपण से संबंध रखती है. ….. आलोचक को मनोविज्ञान-वेत्ता, शिक्षाविद्, राजनीति-विशारद, नीतिशास्त्र-ज्ञाता की हैसियत से साहित्य का अवलोकन करना चाहिए….. यदि आलोचना कोई विद्वत्तापूर्ण काम है और महज भावप्रवणता का वर्णन नहीं, तो उन सभी नई विद्याओं से काम लेना होगा जिनसे जिन्दगी और साहित्य को समझा जा सकता है. “ ( उद्धृत, उर्दू समालोचना पर एक दृष्टि, पृष्ठ 165)

  सैयद एहतेशाम हुसैन ने काव्य और कथा साहित्य दोनो विधाओं की समान रूप से आलोचनाएं की हैं. प्रगतिशील आन्दोलन से पहले कथा- साहित्य को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था. सैयद एहतेशाम हुसैन ने उपन्यास और कहानी की सैद्धांतिक समस्यायों पर वस्तुपरक अंदाज में लिखा. उदाहरणार्थ प्रगतिशील आन्दोलन के समय जब नग्नतावाद ( प्रकृतवाद) और यथार्थवाद को समतुल्य करार दिया जाने लगा तो एहतेशाम हुसैन ने लिखा,

“ चूंकि यथार्थवाद और नग्नता की हदें प्राय: एक –दूसरे से मिल जाती हैं, इसलिए कभी- कभी  दोनो को एक समझ लिया जाता है.  हालांकि सबसे बड़ा अंतर जो दोनों में है, वह यही है कि यथार्थवाद के सिलसिले में यदि नग्नता की अभिव्यक्ति भी हो जाय तो वह ध्येय नहीं होता, एक साधन होता है. यदि उसकी अभिव्यक्ति केवल नग्नता तथा आमोद- प्रमोद के लिए हो तो वही ध्येय करार पाता है. वह केवल उत्तेजना पैदा करके छोड़ देता है. ….. ऐसा साहित्य अच्छा साहित्य नहीं है. इस का मिटना, मिटा देना ही हमारा फर्ज है. “ ( तन्कीदी जायजे, पृष्ठ 145) 

इसी तरह अपने पुराने साहित्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या होना चाहिए –इस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए वे लिखते हैं, “ अतीत के साहित्य से संबंधित हमारी भावुक प्रतिक्रिया हर हाल में वह तो कभी नहीं हो सकती जो उन शताब्दियों के लोगों की रही होगी. लेकिन प्रश्न तो यह है कि उसके प्रति हमारा रवैया क्या होना चाहिए, केवल यह कि जो था ठीक था. उस समय के आस्वादन के संबंध में हमें कुछ कहने का हक नहीं है. यहीं अतीत के साहित्य के अध्ययन की समस्या हमारे लिए मुसीबत बनती है, क्योंकि कोई आलोचक न तो पूर्ण रूप से उस काल की सारी भावना कैफीयत को अपने भाव- बोध पर हावी कर सकता है और न अपने जमाने की चेतना को दबाकर अतीत को समझ सकता है. रास्ता कहीं दरमियान में होगा. “ ( जदीद अदब, मंजर और पस मंजर, पृष्ठ- 80)

एहतेशाम हुसैन ने कहानी व उपन्यास के पात्रों का अध्ययन भी किया. उन्हें विश्वास था कि  लेखक की वैचारिक आस्थाओं का अनुमान उसके सृजित पात्रों से लगाया जा सकता है. उन्होंने मूल रूप से हिन्दी में ‘उर्दू साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’ भी लिखा है जो अबतक उर्दू साहित्य के इतिहास की सबसे बेहतरीन कृति मानी जाती है. इसकी भूमिका में अपने दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा है, “ जबतक इस बात को अच्छी तरह नहीं समझा जाएगा कि साहित्य राष्ट्रीय, सामाजिक जीवन, सांस्कतिक परंपरा और ऐतिहासिक उन्नति –अनुन्नति का प्रतिबिम्ब होता है और उसकी भावानात्मक एवं मनसिक आकांक्षाओं का रचना- विधान प्रस्तुत करता है, उस समय तक साहित्य- इतिहास बदलते हुए साहित्यिक- दृष्टिकोण का प्रामाणिक उल्लेख नहीं कर सकता. साहित्य समाज का जीवित अंग होता है, उसका ऐतिहासिक विश्लेषण इसी ढंग से होना चाहिए. जिस इतिहास से यह स्पष्ट न हो सके कि साहित्य –चिन्तन में एक युग से दूसरे युग में किस प्रकार अंतर उत्पन्न हो जाता है और एक रूप-विधान दूसरे के लिए अस्वीकार क्यों हो जाता है, वह इतिहास कुछ साहित्यिक जानकारी प्राप्त करने का माध्यम तो बन जाता है परंतु संतोषजनक साहित्यिक चेतना और संवेदना नहीं पैदा कर सकता. …… मैंने इस छोटी सी पुस्तक की सीमाओं के भीतर इसकी चेष्टा की है कि उर्दू साहित्य की जो रूपरेखा दी जाए, वह उसका सही- साफ परिचय दे सके कि कौन सी ऐतिहासिक परिस्थितियाँ थीं, जिनमें साहित्य- विकास तथा परिवर्तन का क्रम जारी रहा.” ( उर्दू साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, प्रस्तावना )

 ‘तन्क़ीदी नजरियात’, ‘रवायत और बगावत’, ‘अदब और समाज’, ‘तन्क़ीद और अमली तन्क़ीद’, ‘जौक़े -अदब और शऊर’, ‘अफ़कारो मसायल’, ‘अक्स और आइने’, आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं. ‘हिन्दुस्तानी लिसानियत का खाका’ भाषा विज्ञान से संबंधित पुस्तक है. ‘गालिब का तफक्कुर’ और ‘प्रेमचंद की तरक्की पसंदी’ जैसे लेख उनके आलोचना सिद्धांतों के प्रमाण हैं.

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( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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