ब्रेख्तः नाटक के अंत पर नहीं, प्रक्रिया पर ध्यान रहे – मीत

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विश्व साहित्य


Bertolt-Brecht.jpgबर्टाेल्ट ब्रेख्त (बर्टाेल्ट आयगन फ्रीडरिक ब्रेख्त) नि:संदेह 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं। नाटक के क्षेत्र में उनका प्रभाव वैसा ही माना जा सकता है जैसा कि नावल के क्षेत्र में काफ्का का।

ब्रेख्त का जन्म 10 फरवरी 1898 को जर्मनी के बावेरिया प्रांत के ऑक्सबर्ग के उच्च-मध्य वर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता एक पेपर मिल के निदेशक थे। ब्रेख्त के पिता कैथोलिक और माता लूथर मत की अनुयायी थीं। ब्रेख्त का पालन लूथर मत के अनुसार हुआ। लूथर की बाइबल का प्रभाव उनके लेखन में नजर आता है। उनकी प्राथमिक शिक्षा ऑक्सबर्ग में ही हुई। 1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो ब्रेख्त की देशभक्ति जल्द ही पैसेफिजिम में बदल गई और उन्होंने कुछ पैसेफिस्ट लेख भी लिखे। इसी वर्ष उनकी कुछ कविताएं और कहानियां स्थानीय पत्र में प्रकाशित हुईं।

1917 में ब्रेख्त ने म्यूनिख यूनिवर्सिटी में मेडिकल साईंस की पढ़ाई शुरू की। प्रथम विश्वविद्यालय के अंतिम वर्ष में ब्रेख्त को सेना के  चिकित्सा कॉलेज में भर्ती कर लिया गया। सैनिक अस्पताल में अपने अनुभव से उन्होंने 1816 में लीलैंड ऑफ द डेड सोल्जर लिखी। 1819 में ब्रेख्त आक्सबर्ग मजदूर और सैनिक काऊंसिल के सदस्य बने। कुछ समय तक वे वामपंथी पत्र ‘देर-फाल्कसविले’ के नाट्य समीक्षक भी रहे।

 

 वे म्यूनिख अपनी मेडिकल साईंस की पढ़ाई के लिए वापिस आ गए। मगर उनका ज्यादा समय नाटक लेखन में ही लगने लगा। 1918 में ब्रेख्त ने ‘बॉल’ लिखा और 1919 में ‘ड्रग्स इन द नाइट’ 29 सितम्बर 1922 को ड्रग्स इन नाइट का फायख्तवेगर द्वारा पहला मंचन हुआ। ब्रेख्त को अब सक्षम नाटककार के रूप में मान्यता मिल चुकी थी। नवम्बर 1922 में उन्होंने ओपरा गायक मारियाने शोल्फ से शादी कर ली।

1926 के आसपास वे माक्र्सवादी विचारों और लेखन के प्रभाव में आने लगे। उन्हें लगने लगा कि माक्र्सवाद ही समाज का वैज्ञानिक विश्लेषण है। 1926 में बेे्रख्त की कविताओं का संग्रह ‘बुक ऑफ फेमिली रिवोल्यूशन’ प्रकाशित हुआ। 1927 में ब्रेख्त का अपनी पत्नी से तलाक हो गया। 1929 में उन्होंने हेलन वेगल से शादी कर ली। नाजीवाद के उदय से ब्रेख्त का समाजवाद में विश्वास और बढ़ गया और उन्होंने स्पष्ट रूप से शिक्षात्मक नाटक लिखे, जिनका मंचन मजदूर संघों और स्कूली बच्चों द्वारा किया जाना था।

 ब्रेख्त में भी स्वतंत्रता के बीज थे, जिस कारण किसी भी सत्ता के आगे वे बिना प्रश्र किए सिर नहीं झुका सकते थे। इसी कारण शायद माक्र्सवादी विचारकों से भी वे पूरी तरह सहमत नहीं हुए। माक्र्सवाद से ही उन्होंने लगातार प्रश्र करते रहना सीखा था और वह इसे एक मत बनाने के पक्ष में नहीं थे।

1933 में उन्हें यह स्पष्ट हो गया था कि साम्यवादी विचारधारा के लोगों के लिए जर्मनी में रहना मुश्किल था। 28 फरवरी 1933 को वे जर्मनी से डेनमार्क आए। बाकी जर्मन बुद्धिजीवियों की तरह वे भी यूरोप के विभिन्न शहरों में भटकते रहे। जर्मनी में उनकी किताबें जलाई गई और उनसे जर्मनी की नागरिकता छीन ली गई। पूर्व सोवियत संघ की यात्रा के बाद वे अमेरिका चले गए।

1937 और 1941 के बीच उन्होंने अपने सबसे उल्लेखनीय और परिपक्व नाटक लिखे। ‘द लाइफ ऑफ गैलिलियो’ (1938), ‘मदर करेज एंड हर चिल्ड्रन’ (1939), ‘द गुड विमेन ऑफ सेजुआं’                                    (1940), ‘मिस्टर पुतीला और उसके सेवक माती’ (1941)। इन सब नाटकों में चरित्र जहां जबरदस्त शक्तिशाली थे , वहीं अंतर्विरोध भी लिए हुए हैं। ये चरित्र सामाजिक और  ऐतिहासिक संदर्भों में उलझे हुए जटिल परिस्थितियों में पड़ते हैं और दर्शक से वैज्ञानिक सामाजिक निरीक्षण की मांग करते हैं। परम्परागत नैतिकता पर प्रश्रचिन्ह लगाते हैं।

अमेरिका में हॉलीवुड में भी उन्होंने कुछ काम करने की कोशिश की, मगर खास सफलता नहीं मिली।  ब्रेख्त के अनुसार अमेरिका में उनका बेहतरीन नाटक ‘द काकेशियन चाक सर्किल’ (1944)’ था। 30 अक्तूबर 1947 को ब्रेख्त को अमरीका विरोधी गतिविधियों की जांच के लिए गठित मैकार्थी कमेटी के समक्ष हाजिर होना पड़ा। इस अनुभव के बाद ब्रेख्त यूरोप के लिए निकल पड़े। यूरोप में सबसे पहले वे स्विटजरलैंड गए। उन्होंने आस्ट्रिया की नागरिकता के लिए प्रार्थना पत्र दिया। फिर वे पूर्वी बर्लिन चले गए। 1950 में उनकी आस्ट्रीयाई नागरिकता स्वीकृत हो गई। उन्होंने 1948 में नाटक  में अपने विचारों को सुनियोजित रूप ‘अ शोर्ट आरगॉन्म फॉर थियेटर’ में दिया। ब्रेख्त की सबसे बड़ी उपलब्धि ‘बर्लिनर एन्सेम्बल’ की स्थापना थी। यहीं पर लगातार नाटक और नाटक मंचन को लेकर प्रयोग किए।

 1955 में ब्रेख्त को लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 14 अगस्त 1956 को दिल का दौरा पड़ने से ब्रेख्त का देहांत हो गया।

नाटक के लिए ब्रेख्त ने एक मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र विकसित करने की कोशिश की जो अरस्तू के सौंदर्यशास्त्र और यथार्थवादी साहित्य को चुनौती देता है।

 यथार्थवादी थियेटर का लेखन व मंचन इस बात की कोशिश करते हैं कि दर्शक को ये लगे कि वह नाटक नहीं, बल्कि घटनाओं को सीधा देख रहा है। जैसे किसी ने कमरे की दीवार चुपके से सरका दी हो या हमारी आंख उस कमरे के किवाड़ के किसी छेद पर हो। हर संभव कोशिश की जाती है कि दर्शक यह भूल जाए कि वह नाटक देख रहा है। वह अपने-आपको  नाटक के किरदारों में खो दे और उन्हीं के साथ बह निकले। वह उन्हीं के नजरिए से देखे, उन्हीं की तरह महसूस करे। इस तरह के थियेटर की जादुई दुनिया दर्शक को एक सम्मोहन में बांध लेती है, जिसका परिणाम होता है मंच के किरदारों के साथ संवेदना।

ब्रेख्त का मानना है कि ऐसे में दर्शक की आलोचनात्मक और विश्लेषण की क्षमता सुन्न हो जाती है। अगर नाटक ने राजनैतिक और सामाजिक भूमिका निभानी है तो ब्रेख्त ये मानते हैं कि दर्शक की यह क्षमताएं जागृत रहनी चाहिएं ताकि वह घटनाओं का, चरित्रों का सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण कर सके।

इसके साथ-साथ ब्रेख्त के थियेटर समाज को न सिर्फ समझने का, बल्कि बदलने का भी प्रयास करता है। यह तभी संभव है। जब यह माना जाए कि यह सब बदला जा सकता है, परन्तु यथार्थवादी साहित्य वास्तविकता को निर्धारित और अपरिहार्य दिखाता है, क्योंंकि इन नाटकों में वास्तविकता तर्क की रेखाओं पर खुलती चलती है।

ब्रेख्त के हिसाब से ऐसे थियेटर की आवश्यकता है जो सिर्फ वास्तविकता का बखान न करे, बल्कि विश्लेषण करे, उसे एक ऐसी समस्या की तरह दर्शकों के सामने रखे, जो सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था और सरंचनाओं का परिणाम है और बदली जा सकती है। ब्रेख्त के अनुसार यह केवल ‘एपिक थियेटर’ या ‘द्वंद्ववादी थियेटर’ में ही संभव है।

ब्रेख्त ने नाटक लेखन और मंचन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने का प्रयास किया।  मंचन के स्तर पर दर्शक को ये भूलने नहीं दिया जाए कि वो थियेटर में है और नाटक देख रहा है। मंच पर लगी लाइट्स साफ दिखाई देती, छुपाई नहीं जाती थी। सीन के बीच बदलाव के लिए परदा नहीं गिराया जाता था। इसके अलावा मंच की पृष्ठभूमि में नाटक के दौरान आंकड़ों, नक्शों, कार्टून, फिल्म, तस्वीरों, टाइटल आदि का प्रयोग किय���।

 ब्रेख्त ने नाटक के कथानक में नैरेटिव का तत्व जोड़ा। अभी तक नाटक का अर्थ था, सिर्फ दिखाना, जबकि कहानी या नावल बताया या सुनाया जाता। मगर ब्र्रेख्त ने नाटक के नाटकीय सम्मोहन को भंग करने के लिए सूत्रधार, कोरस, गीत, संगीत आदि का प्रयोग किया। ब्रेख्त पूर्व के रंगमंच की परम्पराओं से भी काफी प्रभावित हुए। ब्रेख्त के नाटक के कथानक की सिलाई साफ नजर आती, जैसे अलग-अलग प्रकरण को एक साथ गांठ लगा के बांध दिया हो। ब्रेख्त ने नाटक से सस्पेंस  का तत्व भी खत्म करने की कोशिश की। उसका लक्ष्य था कि दर्शक का ध्यान अंत पर नहीं, बल्कि चल रही प्रक्रिया पर रहे। इसके लिए नाटकों में सीन से पहले ही उस सीन का सारांश लिख दिया या बता दिया जाता। सीन का अंत जानने के बाद दर्शक का ध्यान इस बात पर जाता है कि आखिर घटनाओं को वहां तक पहुंचने में क्या-क्या तत्व शामिल थे। इसके अलावा ब्रेख्त ने मोन्टाज और कोलाज की तकनीक का भी इस्तेमाल किया।

ब्रेख्त ने अभिनय के  क्षेत्र में नए-नए प्रयोग किए। उन्होंने अभिनेता-अभिनेत्री को अपने-आप को चरित्र से एक दूरी बनाए रखने को कहा। वह किसी चरित्र को जिएं नहीं, बल्कि उसको बताएं। इस तरह के अभिनय के लिए भी ब्रेख्त ने कई तरह की तकनीकों का इस्तेमाल किया, जैसे महिला का चरित्र पुरुष और पुरुष का चरित्र महिला द्वारा करके देखना।

ब्रेख्त के थियेटर का प्रमुख उद्देश्य था। अलगाव या दूरी पैदा करना। ब्रेख्त के अनुसार हम सब अपने आसपास की रोजाना की वास्तविकता के इतने आदी हो जाते हैं कि हम उसे देखकर भी नहीं देखते। वह चाहते थे कि इस वास्तविकता को नया रंग देकर हमारा ध्यान उसकी तरफ आकर्षित किया जाए, ताकि दर्शक उसको ध्यान से देखें, समझें और फिर उसे बदलने का प्रयास करें।

ब्रेख्त के थियेटर की परिकल्पना धीरे-धीरे ‘एपिक थियेटर’ से ‘द्वंद्वात्मक थियेटर’ की तरफ जा रही थी। वे ऐसा  थियेटर विकसित करना चाहते थे, जिसमें व्यक्ति, परिवार और समाज के द्वंद्व और विडम्बनाओं को सब अंतर्विरोधों के साथ प्रस्तुत किया जा सके। वह चाहते थे कि दर्शकों में यह थियेटर ‘जटिल दृष्टिकोण’ जागृत करे। ब्रेख्त के थियेटर की अवधारणा और विचारों का बीसवीं सदी के नाटक लेखन पर बहुत प्रभाव पड़ा। ब्रेख्त ने नाटक, थियेटर और साहित्य को देखते और समझने का एक नजरिया दिया।

ब्रेख्त की परम्परागत नाटक का अवलोकन एवं उस पर उनकी टिप्पणीयां आज भी प्रासंगिक हैं। मास-मीडिया, राजनैतिक प्रचार एवं बाजार का सम्मोहन आज हम सब पर हावी है। हमारी विवेचनात्मक और मौलिक सोच की क्षमताएं सुला दी गई हैं। ऐसे में ब्रेख्त द्वारा सुझाए तरीके, तकनीकें उनके दिए गए ्र-द्गद्घद्घद्गष्ह्ल और जटिल दृष्टिकोण हमारे लिए इस सम्मोहन को तोड़ने में कारगर साबित हो सकते हैं। जो हमें सामान्य, परिचित, जाहिर, निर्विवाद, सादी सी वास्तविकता लग रही है। इसके पीछे आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक धागों का क्या उलझा हुआ ताना-बाना है, वो समझने की कोशिश करें।

 ब्रेख्त की कविताएं देखने में बिल्कुल सादा, न्यूनतम, अनलंकृत शैली और भाषा में बात करती हैं। उनकी कविताओं में लोक गीतों की सादगी व मिट्टी की गंध है। वहीं आम व्यक्ति की भाषा वाली बाधा पर तीक्ष्ण प्रहार करने की क्षमता है। उनकी कविताएं, व्यंजनाओं, प्रतीकों में नहीं उलझती। वे जैसे सीधी बात कर रही हैं, मगर बात हमें अंदर तक भेद देती है। उनके नाटकों में भी बहुत सारे गीत आते हैं, जो लोक गीतों जैसे ही लगते हैं। उनकी  बहुत सी अभिव्यक्तियां, मुहावरों जैसी लगती हैं। आम भाषा में विडम्बनाओं को अभिव्यक्त करने की कमाल की क्षमता ब्रेख्त में थी।

                ब्रेख्त एक नाटककार, कवि, चिंतकों के तौर पर आज भी न सिर्फ साहित्य जगत के लिए, बल्कि बौद्धिक जगत के लिए सार्थक एवं प्रासंगिक है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज- 31 से 33

 

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