श्री भगवान सिंह : गाँधीवादी आलोचक – डॉ. अमरनाथ

हिन्दी के आलोचक – 43

श्री भगवान सिंह

बिहार के एक गाँव निखती कलाँ, जिला सिवान में जन्मे, पटना विश्वविद्यालय तथा जेएनयू में अध्ययन करने के बाद भागलपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर रहे श्रीभगवान सिंह (जन्म-1.1.1954) की ख्याति गांधी के अध्येता के रूप में है. स्वयं को गांधीवादी कहने में वे गौरव का अनुभव करते हैं.  

श्रीभगवान सिंह की आलोचनात्मक पुस्तकों में ‘तुलसी और गाँधी’, ‘हिन्दी साहित्य और नेहरू’, ‘आधुनिकता और तुलसीदास’, ‘आलोचना के मुक्त वातायन’, ‘गाँधी और हिन्दी राष्ट्रीय जागरण’, ‘गाँधी और दलित भारत जागरण’, ‘गाँधी और हमारा समय’, ‘गाँधी : एक खोज’, ‘समालोचना : पाठ- पुनर्पाठ’, ‘आलोचना के देसी ठाट’, ‘समय संवाद’ आदि प्रमुख हैं.

 ‘तुलसी और गाँधी’ उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण शोधपरक आलोचनात्मक कृति है. वस्तुत: यह तुलसी का गांधीवादी पुनर्पाठ है.  यह पुस्तक आठ अध्यायों में विभक्त है जिसके शीर्षक हैं- लोक संबद्धता, प्रजा वत्सलता, दलित पक्षधरता, नर-नारी पूरकता, वर्णाश्रम और सामाजिक समरसता, धर्म की सर्वोपरिता, समन्वय की अपरिहार्यता तथा रामराज्य और स्वराज्य में सादृश्यता. कहना न होगा, इन सारे अध्यायों में प्रतिपादित विषयों के माध्यम से लेखक ने एक ओर आज के वामपंथियों, दलितविमर्शकारों और नारीवादियों द्वारा तुलसी पर लगाए गए विभिन्न आरोपों का भरपूर प्रमाणों और तर्कों से जवाब दिया है तो दूसरी ओर यह भी प्रमाणित किया है कि किस तरह उक्त सभी मुद्दों पर गांधी ने तुलसी का उदारतापूर्वक प्रभाव ग्रहण किया है.

 ग्रंथ के आरंभ में ही अपने ‘झरोखा’ शीर्षक भूमिका में उन्होंने ग्रंथ में की जाने वाली अपनी स्थापनाओं का संकेत दे दिया है. दोनो मनीषियों में समानता के सूत्रों का संकेत करते हुए उन्होंने लिखा है कि, “ काल की दृष्टि से दोनो ( तुलसी और गांधी ) में एक लम्बा अंतराल है, किन्तु जहाँ धर्म प्रधान मध्यकाल में तुलसी, राजनीति को अपने लोक सरोकारों का एक महत्वपूर्ण अभिन्न अंग बनाते हैं, तो आधुनिक काल में गाँधी अपने तमाम राजनीतिक – सामाजिक सरोकारों में धर्म की अपरिहार्यता को स्वीकृति देते हैं. इस दृष्टि से तुलसी, गांधी की प्रभावशाली पूर्वपीठिका के रूप में सामने आते हैं, तो गाँधी उनका आधुनिक राजनीतिक संस्करण बनकर.” ( पृष्ठ-9)

प्रजा प्रतिबद्धता, वर्णाश्रम और सामाजिक समरसता, धर्म की सर्वोपरिता तथा रामराज्य और स्वराज्य में सादृश्यता को लेकर लेखक की स्थापनाओं में विवाद की गुंजाइश बहुत कम है. किन्तु दलित पक्षधरता, नर -नारी पूरकता और समन्वय की अपरिहार्यता आदि अध्यायों में तुलसी और गाँधी में अनिवार्य रूप से साम्य दिखाने के लिए लेखक ने कहीं- कहीं तर्क और प्रमाण को गौण बना दिया है और विषय के प्रति श्रद्धा के कारण अपनी अवधारणाओं को थोपने का प्रयास किया है. लेखक के गाँधीवादी पूर्वाग्रह का ही यह परिणाम है.

तुलसी के अलावा श्रीभगवान सिंह के मूल्याँकन का क्षेत्र आधुनिक साहित्य है. उन्होंने भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद, प्रसाद, महादेवी वर्मा, रामचंद्र शुक्ल, नंददुलारे बाजपेयी, रामविलास शर्मा, जैनेन्द्र, रामबृक्ष बेनीपुरी, सुभद्राकुमारी चौहान, नागार्जुन, नामवर सिंह, विजयदेवनारायण साही, विश्वनाथप्रसाद तिवारी और मैनेजर पाण्डेय तक के साहित्य पर लिखा है.

प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ का नायक ‘सूरदास’ उनकी दृष्टि में ‘गाँधी की साहित्यिक प्रतिमूर्ति’ है. (आलोचना के देसी ठाट, पृष्ठ-111). गाँधीवादी मूल्यों को जीने वाला सूरदास, उपन्यास में मशीनीकरण के विरुद्ध एक सशक्त योद्धा के रूप में हमारे सामने आता है, जो सत्य –अहिंसा के अस्त्र से पाण्डेपुर गाँव में जॉन सेवक द्वारा सिगरेट की फैक्ट्री लगाने के विरोध में दृढ़ता से खड़ा दिखायी देता है. ( आलोचना के देसी ठाट, पृष्ठ-111). इसी तरह जयशंकर प्रसाद के साहित्य से अनेक उद्धरणों को उद्धृत करते हुए वे घोषित करते हैं, “ वस्तुत: गाँधीजी की तरह प्रसाद भी आधुनिक याँत्रिक सभ्यता का विश्लेषण कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे दिखाई देते हैं कि मशीनी सभ्यता का अतिशय विकास मनुष्य जाति के लिए शुभ नहीं है.” ( आलोचना के देसी ठाट, पृष्ठ-115).

महाप्राण निराला के साहित्य कर्म का विश्लेषण करते हुए उन्होंने निराला पर गाँधीजी के व्यापक प्रभाव का जिक्र किया है और बताया है कि अछूतों के पृथक निर्वाचक मंडल की माँग के विरोध में गाँधी द्वारा अनशन किए जाने पर निराला ने ‘सुधा’ ( अक्टूबर, 1932 ) के संपादकीय में गाँधी का समर्थन किया था और लिखा था कि, “महात्मा गाँधी संसार के सर्वश्रेष्ठ पुरुष हैं.” उन्होंने यह भी लिखा कि, “ महात्मा जी भारत के लिए एक दैवी प्रसाद हैं.” ( उद्धृत, आलोचना के देसी ठाट, पृष्ठ-123) निराला पर गाँधी के इन प्रभावों को देखते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने स्वीकार किया है कि, “ सत्याग्रह द्वारा अंग्रेजी राज का विरोध, अछूतोद्धार के लिए उपवास, अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए प्रचार – निराला की दृष्टि में गाँधीजी को महापुरुष बनाने वाले ये तीन कार्य थे.” ( निराला की साहित्य साधना -2, पृष्ठ- 79).

श्रीभगवान सिहं ने गाँधी जी से इन रचनाकारों के मतभेद के बारे में लिखा है, “ जहाँ तक गाँधी जी के साथ इन रचनाकारों के मतभेद का प्रश्न है, इसे वैसे ही समझना चाहिए जैसे पिता- पुत्र में या भाई-भाई में भी कई बार मतभेद हो जाया करते हैं. कई मतभेदों के बावजूद पिता- पुत्र, भाई –भाई के संबंधों के सत्य को नकारा नहीं जा सकता. ठीक उसी तरह गाँधी के साथ इन रचनाकारों के मतभेदों के बावजूद समग्रता में इनकी सोच को गाँधी विरोधी नहीं कहा जा सकता.” ( आलोचना के देसी ठाट, पृष्ठ-128)

इसी तरह श्रीभगवान सिंह ने जैनेन्द्र द्वारा लिखित और 1969 ई. में प्रकाशित ‘महात्मा जी और मेरा सृजन” शीर्षक लेख का विस्तार से जिक्र किया है और बताया हैं कि किस तरह जैनेन्द्र ने अपने ऊपर गाँधी के व्यापक प्रभाव को स्वीकार किया है. श्रीभगवान सिंह ने ‘जैनेन्द्र का सृजन और गाँधी’ शीर्षक अपने लेख में जैनेन्द्र की कई कृतियो से उदाहरण देकर इस प्रभाव को दिखाया भी है.( आलोचना के देसी ठाट, पृष्ठ-132). रामबृक्ष बेनीपुरी के साहित्य का जिक्र करते हुए वे लिखते हैं, “बेनीपुरी द्वारा इतिहास में भारतीय स्त्री की शक्ति का अन्वेषण जो स्पष्टत: गाँधी जी के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलन में स्त्रियों की सहभागिता की साहित्यिक अभिव्यक्ति भी है और उसे त्वरा प्रदान करने वाली कला भी.” ( आलोचना के देसी ठाट, पृष्ठ-145).

श्रीभगवान सिंह ने आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के साहित्य का विस्तृत मूल्यांकन किया है और  अपना निष्कर्ष देते हुए लिखा है, “ अपने लेखन के आरंभिक दौर से ही नंददुलारे जी ने हिन्दी आलोचना में महात्मा गाँधी के रूप में जिस राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रवर्तन को रेखांकित करना शुरू किया उसी के निकष पर वे बींसवीं सदी के पूर्वार्ध के छायावाद समेत शेष हिन्दी साहित्य की विवेचना करते रहे. मार्क्सवाद, समाजवाद या प्रगतिवाद से उन्हें वितृष्णा नहीं रही, किन्तु इन सबकी एकाँगिता से असंतुष्ट वाजपेयी जी के साहित्यिक मूल्याँकन के केन्द्र में गाँधीवादी चिंतन ही रहा. सच कहा जाए तो वाजपेयी जी ने ही हिन्दी आलोचना में गाँधीवादी मूल्यों की वह आधारशिला रखी जिससे प्रेरित होकर नामवर सिंह जैसे मार्क्सवादी समीक्षक को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि, “राजनीतिक ढंग से जो कार्य गाँधीवाद ने किया, साहित्यिक ढंग से वही कार्य छायावाद ने किया.” ( छायावाद, पृष्ठ- 74).  सचमुच वाजपेयी जी ने गाँधीवाद की पीठिका पर खड़े होकर छायावाद की जिस राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना को उकेरा, वही बाद में रामविलास शर्मा, नामवर सिंह जैसे मार्क्सवादी आलोचकों की भी छायावाद के संबंध में साम्राज्यवाद, सामंतवाद विरोधी मूल्याँकन दृष्टि का पाथेय बनी. “(समालोचना, पाठ-पुनर्पाठ, पृष्ठ-53).

‘गाँधी और हिन्दी राष्ट्रीय जागरण’ पुस्तक में श्रीभगवान सिंह ने पर्याप्त प्रमाणों से यह रेखांकित किया है कि कैसे उत्तरी प्रान्त में उभरे हिन्दी जागरण को गाँधीजी ने अखिल राष्ट्रीय जागरण में बदल देने का ऐतिहासिक कार्य किया था. उन्होंने हिन्दी के विकास को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने की हमें दृष्टि दी. इस पुस्तक में गाँधीजी के साहित्य संबंधी चिन्तन पर भी प्रकाश डाला गया है. लेखक ने इसमें साहित्यिक रचनाओं को लेकर समय- समय पर गाँधीजी द्वारा की गई टिप्पणियों के आधार पर उनके सुसंगत साहित्य चिन्तन को सामने लाने का सफल प्रयास किया है.

श्रीभगवान सिंह हमारे समय के ऐसे विरले आलोचकों में हैं जो धोती-कुर्ता जैसे अपने पहनावे के माध्यम से भी भारतीयता और देसी ठाट का परिचय देते हैं.

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( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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