रविभूषण : आलोचना में वैकल्पिक भारत की तलाश – डॉ. अमरनाथ

हिन्दी के आलोचक – 38

रविभूषण

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के चैनपुर -धरहरवा गाँव में 17 दिसंबर 1946 को जन्मे और रांची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद से अवकाश ग्रहण करने वाले प्रो. रविभूषण की फिलहाल अभी तक सिर्फ दो आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हैं किन्तु उनका प्रचुर लेखन विभिन्न अखबारों तथा पत्र- पत्रिकाओं में विखरा पड़ा है. ‘प्रभात खबर’ नामक दैनिक समाचार पत्र में पिछले लगभग 26 वर्ष से विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक विषयों पर उनका नियमित स्तंभ प्रकाशित हो रहा है जो उनकी सूक्ष्म और वस्तुनिष्ठ आलोचना दृष्टि का परिचायक है. इसी तरह एक अन्य हिन्दी दैनिक ‘जनसंदेश टाइम्स’ में भी उनके नियमित स्तंभ प्रकाशित हो रहे हैं. वे प्रतिवर्ष ‘प्रभात खबर’ के शारदीय अंक का भी संपादन करते हैं. इसके अधिकाँश अंक विशेषांक के रूप में प्रकाशित हैं और संग्रहणीय हैं. विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपे उनके अनेक आलोचनात्मक लेख संकलन की प्रतीक्षा में हैं. वर्ष 2018 में उनकी जिन दो आलोचनात्मक पुस्तकों का एक साथ प्रकाशन राजकमल प्रकाशन से हुआ है उनके नाम हैं, ‘रामविलास शर्मा का महत्व’ और ‘वैकल्पिक भारत की तलाश’.

निरंतर अध्ययन, चिन्तन –मनन और लेखन में संलग्न रहने वाले रविभूषण की आलोचना- दृष्टि वैज्ञानिक भी है और व्यापक भी.  भारतीय राजनीति की भी उन्हें अच्छी समझ है. वे साहित्य को हमेशा समाज से जोड़कर देखते हैं. कभी- कभी तो संदेह होने लगता है कि वे वास्तव में साहित्य के व्यक्ति हैं या राजनीति अथवा संस्कृति के. रविभूषण हिन्दी के अकेले ऐसे आलोचक हैं जिनके चिन्तन का फलक बहुत व्यापक है. उन्होंने शिकागो स्कूल ऑफ इकोनामिक्स पर भी लिखा और अन्तिम किला गिरने की चिन्ता के नाम पर भारत की न्यायपालिका पर भी. कोरोना को लेकर जब दुनिया भर में हाहाकार मचा हुआ था और लोग इसके लिए चीन और अमरीका को जिम्मेदार बता रहे थे, रविभूषण ने नॉम चाम्स्की के हवाले से कोरोना को नवउदारवाद की उपज बताकर सबको चौंका दिया था। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं पर वे पत्र-पत्रिकाओं तथा समाचार- पत्रों में लगातार टिप्पणियाँ करते रहते हैं, किन्तु सक्रिय राजनीति में उन्होंने कभी हिस्सा नहीं लिया.

‘रामविलास शर्मा का महत्व’ पुस्तक में उनके द्वारा 1994 से 2012 के बीच समय- समय पर लिखे गए आठ लेख संकलित हैं. रविभूषण के सर्वाधिक प्रिय आलोचक रामविलास शर्मा ही हैं. उनके शब्दों में, “एक साथ कई मोर्चों पर उन्होंने (रामविलास शर्मा) लड़ाई लड़ी. साठ वर्ष तक साम्राज्यवाद का निरंतर विरोध करने वाला उनके समान विश्व में और कौन आलोचक, विचारक और चिन्तक है ?  उनकी चिन्ता में देश की प्रगति थी और विरोधी, प्रतिगामी ताकतों से उनका संघर्ष सुविदित है. साम्राज्यवाद से ‘आर्थिक और राजनीतिक संबंध-विच्छेद’ के बिना देश की प्रगति में उनका विश्वास नहीं था. हिन्दी में पहली बार उन्होंने सबाल्टर्न इतिहास की आलोचना की, उसकी सीमायें बताईं.“ ( भूमिका, पृष्ठ-8) उनकी दृष्टि में रामविलास शर्मा उन भारतीय लेखकों, विचारकों, बुद्धिजीवियों और मार्क्सवादी चिंतकों में अग्रणी हैं जिन्होंने अपने समय में लेखन के ज़रिये निरंतर और सार्थक हस्तक्षेप किया है, अपने समय और समाज की समस्याओं पर विचार किया है और उनके निदान भी सुझाए हैं. इसीलिए रामविलास शर्मा की आलोचना परंपरा को आगे बढ़ाने में रविभूषण जी आज भी निरंतर लगे रहते हैं.

 रविभूषण जी के अनुसार रामविलास शर्मा ने सदैव नये युग की आँखों को महत्त्व दिया. आज जब बहुत सारे युवाओं ने हथियार डाल दिए हैं, और लेखक-आलोचक उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद जैसी बहसों में लिप्त हैं, हमें रामविलास जी की अडिगता, अविचलता और मार्क्सवादी दर्शन में अटूट आस्था तथा जन-संघर्षों में विश्वास को याद करने की ज़रूरत है. उनके अनुसार भारतेंदु हरिश्चन्द्र, महावीरप्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और निराला की अगली कड़ी रामविलास शर्मा ही हैं.

 रामविलास शर्मा की हिन्दी जाति संबंधी अवधारणा से रविभूषण जी पूर्ण सहमति व्यक्त करते हैं. वे मानते हैं कि भाषा का प्रश्न मात्र सामाजिक – सांस्कृतिक प्रश्न नहीं है. यह राजनीतिक प्रश्न भी है. अंग्रेजी ने इसे राजनीतिक प्रश्न बना दिया है. हिन्दी को वे साम्राज्यविरोधी भाषा के रूप में रेखाँकित करते हैं और मानते हैं कि हिन्दी अपनी शक्ति के बल पर ही विकसित हुई है.

भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी आदि हिन्दी की बोलियों का संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल करने की माँग के विषय में रविभूषण जी की दो-टूक राय है, “हिन्दी प्रदेश में जिस प्रकार नए- नए प्रदेशों –पूर्वांचल, हरित प्रदेश, बुन्देलखंड आदि की माँग उठती है, उसी प्रकार बोलियों को हिन्दी से स्वतंत्र करने की माँग भी है. जिस प्रकार नए राज्यों के गठन से समस्याएँ हल नहीं होंगी, उसी प्रकार हिन्दी की बोलियाँ हिन्दी से अलग होकर न अपना भला करेंगी न हिन्दी का भला करेंगी. दोनो के बीच की पारस्परिकता और सौहार्दता नष्ट होगी. फायदा किसे होगा ? हिन्दी के कुछ बड़े लेखक भी इस अभियान में शामिल हैं, जबकि उन्होंने अपनी बोली में साहित्य सृजन नहीं किया है. हिन्दी से उसकी बोलियों के अलग होने के बाद हिन्दी भाषियों की संख्या स्वत: कम हो जाएगी. लाभान्वित कौन होगा ? बोलियों का विकास उसमें रचना कर्म के जरिए संभव है. पाँचवी –छठवीं कक्षा तक शिक्षा में अपनी बोलियों को स्थान दिलाने वाले क्या सचमुच सक्रिय हैं ? आज के विखंडन के दौर में एकता जरूरी है. हिन्दी से उसकी बोलियों को अलग कर उसे स्वतंत्र दर्जा दिलाने की माँग अनुचित है.” ( अपनी भाषा की लोकयात्रा, “विखंडन के दौर में भाषाई एकता की आवश्यकता” शीर्षक निबंध, पृष्ठ 162)

‘वैकल्पिक भारत की तलाश’ शीर्षक पुस्तक में रविभूषण जी के सपनों का भारत झिलमिलाता हुआ दिखाई देता है जिसको साकार बनाने के लिए एक सचेत बुद्धिजीवी की भूमिका निभाने में वे निरंतर लगे रहते हैं. इस पुस्तक में रविभूषण जी ने अपने उन आलेखों को शामिल किया है जो उन्होंने समय- समय पर एक चिंतनशील नागरिक और बौद्धिक के रूप में अपनी जि़म्मेदारी समझते हुए लिखा है. पुस्तक का विषय-क्रम देश के समय को एक-एक चरण में पार करते हुए आज तक आता है. दादाभाई नौरोजी और विवेकानंद से शुरू करते हुए वे आज़ादी, बाद की सत्ता और समाज के चरित्र से होते हुए राष्ट्रवाद तक आते हैं.

पुस्तक के बारे में वे लिखते हैं, “इस पुस्तक में संकलित सभी दस लेख नयी आर्थिक नीति और नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के बाद के हैं. 1991 से अबतक लिखे गय़े लेखों में से इन लेखों का चयन एक विशेष मकसद से किया गया है. वह मकसद वैकल्पिक भारत की तलाश का है.” ( वैकल्पिक भारत की तलाश, ‘इस पुस्तक के बारे’ में शीर्षक भूमिका, पृष्ठ-7)

इस पुस्तक में उनकी चिन्ता है कि आज़ादी के बाद हमने एक नया भारत बनाने की योजनाएँ बनाई थीं. एक शोषण-विहीन, स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, समतामूलक भारत जहाँ न कोई किसी की दया का मोहताज हो, न किसी को किसी से भय हो, न धर्म के नाम पर लोग मरें, न जाति के नाम पर कोई समाज की मुख्यधारा से बाहर रहे. लेकिन ऐसा हो न सका. हममें से अनेक आज भी उस आज़ादी को तरस रहे हैं जो उनके पुरखों ने गांधी, भगतसिंह की मौजूदगी में सोची थी. लोग बीमार हैं और अस्पतालों में उनके लिए जगह नहीं है.  जिन्हें अपने उद्धारक प्रतिनिधियों के रूप में चुनकर संसद और विधानसभाओं में भेजते हैं, वे अगले दिन उन्हें पहचानने से इनकार कर देते हैं.  जिस व्यवस्था के दायरे में वे अपने घर-परिवार के सपने बुनते हैं, वह एक दिन सिर्फ अपने लिए काम करती नज़र आती हैं. वैकल्पिक भारत कोई दिमागी शगल नहीं है, ज़रूरत है. जिन्हें अपने अलावा किसी और की भी चिंता है वे सब इस ज़रूरत को महसूस करते हैं.

 रविभूषण जी ने स्वामी विवेकानंद का मूल्यांकन करते हुए लिखा हैं, “1993 से अबतक बार- बार मैंने भाजपा के ‘हिन्दुत्व’ और ‘हिन्दू राष्ट्र’ की आलोचना की है. भाजपा विवेकानंद को अपना पथ- प्रदर्शक मानती है. विवेकानंद साम्प्रदायिक और धर्मांध शक्तियों की मृत्यु चाहते थे. ये शक्तियां आज कहीं अधिक फनफना रही हैं. विवेकानंद ने आस्था और कर्मकांड का विरोध किया था. उनका सारा बल, विवेक और तर्कशक्ति पर था. वे जाति- प्रथा और वर्ण-व्यवस्था के विरोधी थे. गरीबों और दलितों की स्वतंत्रता से उन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता जोड़ी थी. राष्ट्रप्रेम उनके लिए राष्ट्र के निवासियों से प्रेम था और उन्होंने हिन्दू धर्म की आलोचना भी की थी. आज जब उपभोक्तावाद चारो ओर फैल चुका है, विवेकानंद ने ‘भोग’ को ‘लाख फनों वाला सर्प’ कहा था. उन्होंने जिस ‘नए भारत का स्वप्न’ देखा था, वह नया भारत आजतक नहीं बना. नरेन्द्र मोदी जिस नए भारत ( न्यू इंडिया) की बात करते हैं, वह नया भारत कॉरपोरेट का भारत है. उस भारत में गरीबों और दलितों का कहाँ स्थान है ? विवेकानंद ने स्त्रियों को भी दलित वर्ग के अंतर्गत रखा. ‘अस्पृश्यता’ उनके लिए ‘मानसिक ब्याधि’ थी. ( वैकल्पिक भारत की तलाश, पृष्ठ- 8)

वे आगे लिखते हैं, “ इस पुस्तक के सभी लेख गहरी चिन्ता और बेचैनी से लिखे गए हैं. इन लेखों से संभव है, किसी को आपत्ति भी हो, पर क्या सचमुच वैकल्पिक भारत की तलाश नहीं की जानी चाहिए, जो भारत सही अर्थों में किसानों, मजदूरों, पिछड़ों, गरीबों, दलितों, स्त्रियों और आदिवासियों का हो ? इस पूँजीवादी व्यवस्था को बदले बिना क्या यह संभव है ? राजनीतिक दलों को इसकी कोई चिन्ता नहीं है, पर यह चिन्ता कवियों, लेखकों, आलोचकों, समर्पित पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों आदि को अवश्य होगी.” ( उपर्युक्त, पृष्ठ-11)

प्रेमचंद रविभूषण जी के सर्वाधिक प्रिय कथाकार हैं. प्रेमचंद के महत्व का आकलन करते हुए वे कहते हैं, “प्रेमचंद का केवल साहित्यिक पाठ नहीं होना चाहिए. वे भारतीय समाज के राजनैतिक-सामाजिक सांस्कृतिक और आर्थिक पाठ यानि समग्र पाठ के लिए हमें आमंत्रित करते है. 21वीं सदी के हमारे समय के ज्यादातर सवालों के संदर्भ में प्रेमचंद का साहित्य और उनके विचार सर्वाधिक प्रासंगिक है. प्रेमचंद राजनैतिक पार्टियों से बहुत पहले सामाजिक-आर्थिक न्याय की बात करते थे. उनके पास स्पष्ट इतिहास- दृष्टि, समाज- दृष्टि, वर्ग-दृष्टि और नैतिक- दृष्टि थी. वर्ण -व्यवस्था और सांप्रदायिक कट्टरता के वे मुखर विरोधी थे. प्रेमचंद एक नया भारत एक वैकल्पिक भारत की तलाश करते रहे. आज का समय प्रतिगामिता, कुतर्क, झूठ, उन्माद, अंधआस्था, मिथ्यावाद और छद्म राष्ट्रवाद का समय है, जिनसे संघर्ष की दृष्टि प्रेमचंद ने हमें दी है.“ ( जनसंस्कृति मंच के 15वें राष्ट्रीय सम्मेलन, पटना में बोलते हुए)

रविभूषण जी एक सुधी और ओजस्वी वक्ता भी हैं और सांस्कृतिक मोर्चे पर अधिक सक्रिय हैं.  उनका सारा लेखन सोद्देश्य होता है और वह उद्देश्य है एक समतामूलक शोषणविहीन समाज का निर्माण. वे लंबे समय तक नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा से संबद्ध रहे और आज भी ‘जन संस्कृति मंच’ के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं.

( लेखक कलकत्ता विशेवविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

अमरनाथ

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