रामचंद्र शुक्ल : हिन्दी आलोचना के पथिकृत आचार्य – डॉ. अमरनाथ

हिन्दी के आलोचक – 6

रामचंद्र शुक्ल

बस्ती (उ.प्र.) जिले के ‘अगोना’ नामक गाँव में जन्म लेने वाले, मात्र हाई स्कूल तक की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने वाले और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद पर विराजमान रहे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ( 4.10.1884-2.2.1941) हिन्दी के सबसे महान आलोचक के रूप में प्रतिष्ठित हैं. उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य समीक्षा सिद्धान्तों को आत्मसात करके हिन्दी समीक्षा को एक सर्वमान्य और पुष्ट आधार प्रदान किया है. उनके बाद विकसित हिन्दी समीक्षा की सभी प्रवृत्तियां किसी न किसी रूप में उनसे प्रभावित हैं.

रामचंद्र शुक्ल की प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘जायसी ग्रंथावली की भूमिका’, ‘तुलसीदास’, ‘सूरदास’, ‘रसमीमांसा’, ‘चिन्तामणि भाग-2’, ‘चिन्तामणि भाग-3’, ‘चिन्तामणि भाग-4’ आदि. 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल में भावयित्री प्रतिभा अत्यंत समृद्ध थी. इसीलिए वे समीक्षा के क्षेत्र में नए पथ के निर्माता सिद्ध हुए. बचपन में ही तुलसी की कविता सुन सुन कर आनंद लेना, घर में नौकरी का वातावरण होते हुए भी साहित्यास्वादन की ओर झुकना, कालिदास, भवभूति, वाल्मीकि आदि की कविताएं सुन -सुन कर आनंद-विभोर हो जाना आदि बातें यह सिद्ध करती हैं कि उनमें भावयित्री प्रतिभा जन्मजात थी. आचार्य शुक्ल में समीक्षक की सहज प्रवृत्तियाँ- सहृदयता, गंभीरता, स्वतंत्र चिन्तन, अन्तर्मुखता, तथ्यातथ्यनिरूपण की प्रवृत्ति, उत्कट जिज्ञासा आदि बचपन से ही विद्यमान थी. निर्भीकता, आत्म-विश्वास, एवं स्वातंत्र्यवृत्ति, आचार्य शुक्ल की सबसे बड़ी विशेषताएं हैं. यही कारण है कि आचार्य शुक्ल नें भारतीय और पाश्चात्य समीक्षा सिद्धान्तों का गहन अध्यययन अनुशीलन करके उनपर स्वतंत्रतापूर्वक अपना निर्णय दिया और समीक्षा की एक स्वतंत्र दृष्टि विकसित की.

प्रकृति के प्रति प्रेम आचार्य शुक्ल के व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता है. उन्होंने प्रकृति मात्र के स्वतंत्रवर्णन को भी रसानुभव कराने में पूर्म समर्थ माना है. प्रकृति के प्रति इस रागात्मक लगाव के मूल में उनके निवास स्थान, उनकी मित्र- मंडली, उनकी रागात्मक एवं सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति एवं युग प्रवृत्तियों का व्यापक योग है. मिर्जापुर के एक कवि सम्मेलन में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा है, “ मैं मिर्जापुर की एक एक झाड़ी, एक एक टीले से परिचित हूं. उनके टीलों पर चढ़ा हूँ. बचपन मेरा इन्हीं झाड़ियों की छाया में पला है. मैं इन्हें कैसे भूल सकता हूँ ? लोगों की अन्तिम कामना यही रहती है कि वे काशी में मोक्ष लाभ करें, किन्तु मेरी अन्तिम कामना यही है कि अन्तिम समय मेरे सामने मिर्जापुर का यही प्रकृति का शिलाखंड हो जो मेरे मन के भीतर- बाहर बसा हुआ है.” ( साहित्य संदेश, शुक्लांक, आचार्य रामचंद्र शुक्ल : एक झाँकी, पं. केशवचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-371)

आचार्य शुक्ल आधुनिक युग की कृत्रिमता एवं यान्त्रिकता से बहुत क्षुब्ध थे. आधुनिक सभ्यता की कृत्रिमता ने मनुष्य को प्रकृति से बहुत दूर ढकेल दिया है. शुक्ल जी को मनुष्य की जीवनी शक्ति नष्ट होती दिखायी दे रही थी. उसके समुचित विकास के लिए केवल नरता का क्षेत्र उन्हें अपूर्ण प्रतीत हो रहा था. यान्त्रिक जीवन की कृत्रिमता में मनुष्य अपने हृदय पक्ष को खोता जा रहा था. फलत: उन्होंने भी रूसो, रस्किन, वर्ड्सवर्थ की भाँति युग को पुन: प्रकृति की ओर लौटने का संदेश दिया. उन्होंने प्रकृति को मानव जीवन के समानान्तर उसके जीवन को प्रभावित एवं प्रेरित करने वाला एक तत्व माना और उसके स्वतंत्र वर्णन में रस-निष्पत्ति की स्थिति को स्वीकार करते हुए रस सिद्धांत को व्याप्ति प्रदान की.

रस सिद्धांत की पूर्णता के प्रति विश्वास

आचार्य रामचंद्र शुक्ल मूलत: रसवादी समीक्षक हैं. ‘रस मीमांसा’ नामक ग्रंथ तथा अपनी व्यावहारिक समीक्षा के द्वारा उन्होंने रस सिद्धांत को और अधिक पुष्ट और समृद्ध किया है.  रस सिद्धांत को उन्होंने काव्यालोचन का मानदंड निश्चित किया और हृदय की मुक्तावस्था को कविता की श्रेष्ठता का प्रतिमान स्थिर किया. रस दशा की व्याख्या करते हुए उन्होंने उसे लोक हृदय में लीन होने की दशा से अभिन्न बताया. इस प्रकार उन्होंने रसवाद को आध्यात्मिकता के चंगुल से निकालकर लोक सामान्य भावभूमि पर प्रतिष्ठित कर वैज्ञानिक आधार दिया जिससे वह अधिक पूर्ण और विश्वसनीय हो सका. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि वे काव्य के क्षेत्र में अव्यक्त और अज्ञात की अनुभूति से सदा व्याकुल रहने वाले कवियों को काव्य क्षेत्र से हटकर किसी धर्म भावना या दर्शन के क्षेत्र में जाने की सलाह देते थे, क्योंकि उनके मत से काव्य का क्षेत्र मनुष्य या मनुष्येतर वाह्य प्रकृति के पारस्परिक संबंधों का क्षेत्र है, अज्ञात और अव्यक्त रहस्यों का लोक नहीं.

संस्कृत के आचार्यों ने प्राय: रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया पर ही विचार किया है पर शुक्ल जी ने रस प्रक्रिया को विवेचन के लिए उठाया ही नहीं. इसका कारण यही है कि पिष्ट पेषण मात्र उनका लक्ष्य नहीं था. इस विषय पर अभिनव गुप्त अत्यंत गहन और सुलझा हुआ विश्लेषण पहले ही कर चुके थे.

आचार्य शुक्ल की समीक्षा को दो रूपों में देखा जा सकता है –व्यावहारिक आलोचना और सैद्धांतिक आलोचना. व्यवहारिक आलोचना  का प्रौढ़तम रूप तुलसी एवं जायसी ग्रंथावली की भूमिकाओं, ‘भ्रमरगीत सार’ की भूमिका तथा ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में देखा जा सकता है तथा सैद्धांतिक समीक्षा की प्रौढ़तम कृति ‘रसमीमांसा’ है. समीक्षा के इन दोनो रूपों के माध्यम से उन्होंने रस सिद्धांत की ही प्रतिष्ठा की है.

हमारे यहाँ रस को आनंदस्वरूप ही कहा गया था. शुक्ल जी ने मात्र आनंदवाद का खंडन करते हुए कहा है, “ मेरी समझ में रसास्वादन का प्रकृत स्वरूप आनंद शब्द से व्यक्त नहीं होता. लोकोत्तर अनिर्वचनीय आदि विशेषणों से न तो उसके वाचकत्व का परिहार होता है न प्रयोग का प्रायश्चित्त होता है. क्या क्रोध, शोक, जुगुप्सा आदि आनंद का रूप धारण करके ही श्रोता के हृदय में प्रकट होते हैं, अपने प्रकृत रूप का सर्वथा विसर्जन कर देते हैं? उसे कुछ भी लगा नहीं रहने देते? इस आनंद शब्द ने काव्य के महत्व को बहुत कुछ कम कर दिया है. उसे नाच तमाशे की तरह बना दिया है.” ( रसमीमांसा, पृष्ठ-80)

इसी प्रकार आचार्य शुक्ल ने रस सिद्धान्त की मनोवैज्ञानिक व्याख्या करते हुए उसे काव्य की आत्मा के रूप में स्वीकार किया और उन्होंने यह विश्वास प्रकट किया कि इस रससिद्धान्त के मानदंड पर नई पुरानी सभी प्रकार की कविताओं की पूर्ण और उपयुक्त समीक्षा हो सकती है.

आचार्य शुक्ल के अनुसार रीति, अलंकार, ध्वनि, वक्रोक्ति, गुण और औचित्य काव्यसिद्धांतों की स्थिति वहीं तक मान्य है जहाँ तक ये रस के पोषक या उपकारक बन कर उपस्थित हों. उनका कथन है, “ मैं अलंकार को केवल वर्णन प्रणाली मानता हूँ जिसके अन्तर्गत करके किसी वस्तु का वर्णन किया जाता है. वस्तु निर्देश अलंकार का काम नहीं.” ( चिन्तामणि, भाग -2, पृष्ठ-189) काव्य का आभ्यंतर स्वरूप या आत्मा भाव या रस है. अलंकार उसके बाह्य स्वरूप हैं. रीति केवल संघटना है, शरीर का अंग विन्यास है. दुस्साध्य या कृत्रिम वक्रता शब्दालंकारों के आधिक्य की भाँति निरर्थक होती है और रसानुभूति में अवरोधक भी. ध्वनि को काव्य की आत्मा नहीं माना जा सकता. क्योकि इसमें अतिव्याप्ति दोष है. औचित्य, रस का रक्षक है. उसकी अनुपस्थिति में रस, रसाभास के स्तर तक पहुँच सकता है.

इस प्रकार रस सिद्धांत आचार्य शुक्ल की समीक्षा का मूलाधार है. उनका विचार है कि “ शब्द शक्ति, रस और अलंकार-ये विषय विभाग काव्य समीक्षा के लिए इतने उपयोगी हैं कि इनको अंतर्भूत करके संसार की नई पुरानी सब प्रकार की कविताओं की बहुत ही सूक्ष्म, मार्मिक और स्वच्छ आलोचना हो सकती है.”( चिन्तामणि- भाग -2, पृष्ठ-189)

साधारणीकरण की ओर लोगों का ध्यान सबसे पहले आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ही आकृष्ट किया. इसके पूर्व साधारणीकरण पर चलते ढंग से विचार किया गया था. भट्टनायक और पंडितराज जगन्नाथ द्वारा पल्लवित इस साधारणीकरण के सिद्धान्त का आचार्य शुक्ल ने मौलिक ढंग से प्रतिपादन किया. उनका कथन है, “जबतक किसी भाव का कोई विषय इस रूप में नहीं लाया जाता कि वह सामान्यत: सबके उसी भाव का आलंबन हो सके तबतक उसमें रसोद्बोधन की पूर्ण शक्ति नहीं आ पाती. इस रूप में लाया जाना ही हमारे यहाँ साधारणीकरण कहलाता है.” ( रसमीमांसा, पृष्ठ-144)

इस प्रकार साधारणीकरण का अभिप्राय यह है कि किसी काव्य में वर्णित आलंबन केवल भाव की व्यंजना करने वाले पात्र ( आश्रय ) का ही आलंबन नहीं रहता बल्कि पाठक या श्रोता का भी, एक नहीं अनेक पाठकों और श्रोताओं का भी आलंबन हो जाता है. अत: उस आलंबन के प्रति व्यंजित भाव में पाठकों या श्रोताओं का भी हृदय योग देता हुआ उसी भाव का रसात्मक अनुभव करता है.

इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि आचार्य शुक्ल आलंबनत्वधर्म के साधारणीकरण की प्रतिष्ठा भी करते हैं. उन्होंने लिखा है, “साधारणीकरण आलंबनत्व धर्म का होता है.”(रसमीमांसा, पृष्ठ-217)  उनका विचार है कि ऐसी स्थिति में आलंबन में लोक सामान्य धर्म की प्रतिष्ठा होती है.” (रसमीमांसा, पृष्ठ-218)

भाव को शुक्ल जी ने बड़ा महत्व दिया है. साथ ही उसकी मौलिक ब्याख्या भी की है. भाव की परिभाषा देते हुए उन्होंने लिखा है, “ प्रत्ययबोध, अनुभूति और वेगयुक्त प्रवृत्ति- इन तीनों के गूढ़ संश्लेष का नाम भाव है.” (रसमीमांसा, पृष्ठ-135)

डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, “प्राचीन साहित्य शास्त्री स्थायी भावों को रस रूप में प्रकट करके साहित्यिक प्रक्रिया का अंत निष्क्रियता में कर देते थे. शुक्ल जी ने भाव की मौलिक व्याख्या करके निष्क्रिय रस निष्पत्ति की जड़ काट दी है.” ( आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, पृष्ठ-220)

आचार्य शुक्ल ने काव्यानंद की अभिव्यक्ति की दो अवस्थाएं स्वीकार की है.-साधनावस्था और सिद्धावस्था. इसी आधार पर उन्होंने काव्य के दो विभाग किए हैं-1.आनंद की साधनावस्था या प्रयत्न पक्ष को लेकर चलने वाले काव्य और 2. आनंद की सिद्धावस्था या उपभोग पक्ष को लेकर चलने वाले काव्य. इनमें प्रथम कोटि अर्थात प्रयत्न पक्ष को लेकर चलने वाले काव्य को उन्होंने उत्कृष्ट माना है.

आचार्य शुक्ल ने रीति ग्रंथों का पहली बार जमकर विरोध किया और उन्होंने साहित्य पर पड़ने वाले उसके बुरे प्रभावों का रहस्योद्घाटन किया. रीति ग्रंथों में काव्य का क्षेत्र अत्यंत संकीर्ण हो गया था. वे अनावश्यक रूप से हर स्थान पर अध्यात्म के चित्रण के भी विरोधी थे. उन्होंने लक्ष्य किया कि, “ आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं.” ( हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ -59) और स्पष्ट शब्दों में कहा, “अध्यात्म शब्द की मेरी समक्ष में काव्य या कला के क्षेत्र में कोई जरूरत नहीं है. “(रसमीमांसा, पृष्ठ- 59)

काव्य भाषा

आचार्य शुक्ल ने काव्यभाषा की चार विशेषताओं का उल्लेख किया है, – 1.मूर्ति-विधान 2. जातिसूचक शब्दों की अपेक्षा रूप-ब्यापारसूचक शब्दों का प्रयोग 3.वर्ण-विन्यास  4. व्यक्तियों के नामों के स्थान पर उनके रूप, गुण या कार्यबोधक शब्दों का व्यवहार. ‘चिन्तामणि’ में उन्होंने लिखा है, “भावना को मूर्तरूप में रखने की आवश्यकता के कारण कविता की भाषा में दूसरी विशेषता यह रहती है कि उनमें जाति संकेत वाले शब्दों की अपेक्षा विशेष रूप व्यापारसूचक शब्द अधिक रहते हैं.” (रसमीमांसा, पृष्ठ- 34) तात्पर्य यह कि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग तथा ऐसे शब्दों का समावेश जो किन्हीं संयुक्त व्यापारों की सूचना देते हैं- कविता में वाँछित नहीं.

कविता में लाक्षणिक भाषा के प्रयोग को शुक्ल जी आवश्यक मानते हैं क्योंकि अगोचर बातों या भावनाओं को भी, जहाँ तक हो सकता है कविता स्थूल गोचर रूप में रखने का प्रयास करती है. इस मूर्तिविधान के लिए वह भाषा की लक्षणा शक्ति से काम लेती है.

काव्य भाषा की तीसरी विशेषता ‘वर्ण-विन्यास’ से शुक्ल जी का तात्पर्य है, शब्दों की मधुरता, कोमलता, संगीतात्मकता, लयात्मकता तथा शब्दालंकारों का प्रयोग आदि. इससे नाद सौन्दर्य उत्पन्न होता है और नाद सौन्दर्य से कविता की आयु बढ़ती है.

शब्द शक्तियों के विषय में आचार्य शुक्ल ने टिप्पणियों में ही विवेचन किया है. शुक्ल जी के अनुसार लक्षणा और व्यंजना शक्तियों के माध्यम से लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ की प्राप्ति अभिधा के मार्ग पर चलकर ही होती है. उनका निष्कर्ष है, “अब प्रश्न यह है कि काव्य की रमणीयता किसमें रहती है ? वाच्यार्थ में अथवा लक्ष्यार्थ में या व्यंग्यार्थ में.  इसका बेधड़क उत्तर यही है कि वाच्यार्थ में, चाहे वह योग्य हो अथवा अयोग्य और अनुपपन्न. मेरा यह कथन विरोधाभास का चमत्कार दिखाने लिए नहीं है, सोलह आने ठीक है.”( इन्दौर वाला भाषण, पृष्ठ-13)

आचार्य शुक्ल की व्यावहारिक समीक्षा

शुक्लजी की व्यावहारिक समीक्षा उनकी सैद्धांतिक मान्यताओं पर आश्रित हैं. डॉ. रामदरश मिश्र के शब्दों में, “आलोचक में – विशेषतया व्यावहारिक समीक्षा लिखने वाले आलोचक में सबसे पहली विशेषता होनी चाहिए उसकी रसग्राहिका शक्ति, अर्थात वह कविता में व्यक्त गूढ़ से गूढ़ भावों को ग्रहण कर सके. इसे रसवत्ता भी कह सकते हैं. दूसरी विशेषता यह होनी चाहिए कि वह ग्रहण किए हुए भावों का बौद्धिक विवेचन कर सके और तीसरी विशेषता यह होनी चाहिए कि उसके पास एक दृष्टि हो. शुक्ल जी में ये तीनों विशेषताएं अत्यंत उत्कर्ष को पहुँची हुई हैं.”( हिन्दी समीक्षा : स्वरूप और संदर्भ, पृष्ठ-46)

डॉ. देवराज की टिप्पणी है, “शुक्ल जी की सबसे बड़ी विशेषता है, रसग्राहिता. उनकी जैसी ठोस रसज्ञता वाले पाठक और आलोचक बहुत कम पैदा होते हैं. जो कोई भी शुक्ल जी के गहरे संपर्क में आता है, वह उनकी इस शक्ति से चकित और अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता. स्वदेश में अथवा विदेश में रसग्राहिता के ऐसे असंदिग्ध क्षमता सम्पन्न समीक्षक कम मिलेगे. कौन सा काव्य वस्तुत: सुन्दर वस्तुत: महान है इसे पहचानने में शुक्ल जी की अंतर्भेदिनी दृष्टि कभी धोखा नहीं खाती, भले ही वे सदैव इस दृष्टि का सफल विवेचनात्मक मंडन प्रस्तुत न कर सकें.” ( साहित्य चिंन्ता, पृष्ठ- 167)

आचार्य शुक्ल की व्यावहारिक आलोचनाओं का उत्कृष्ट स्वरूप सूर, तुलसी और जायसी पर लिखे गए उनके प्रबंधों में दिखायी पड़ता है. इसके अतिरिक्त ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में हिन्दी साहित्य के सभी प्रमुख साहित्यकारों के परिचयात्मक विवेचन में भी शुक्ल जी की व्यावहारिक समीक्षा पद्धति का स्वरूप देखा जा सकता है.

शुक्ल जी ने सूर, तुलसी और जायसी की कृतियों की सर्वांगीण व्याख्या करते समय यह दिखाने की चेष्टा की है कि इन कवियों की मुख्य-मुख्य प्रवृत्तियाँ क्या हैं, उनकी परंपराएं क्या रही हैं, उनका क्रमिक विकास कैसे हुआ, उस विकास में कवि विशेष का क्या योग और स्थान है, कवि की भाव संपत्ति कितनी समृद्ध और गहरी है, उस भाव संपत्ति का मानव -जीवन के कितने क्षेत्रों से संबंध है. शुक्ल जी के सामने मुख्य रूप से कृति ही रहती है. कृति का गहरा अध्ययन –मनन करने के पश्चात वे यह देखना चाहते हैं कि कृति का संबंध मानव- जीवन के मार्मिक स्थलों या गहरी संवेदनाओं से किस सीमा तक है?

सूर, तुलसी और जायसी में सूर मुक्तक पद लिखने वाले हैं और शेष दो प्रबंधकार हैं. तुलसी और जायसी के प्रबंध काव्यों –‘रामचरितमानस’ और ‘पद्मावत’ को प्रबंध काव्य की कसौटी पर और ‘सूर सागर’ को मुक्तक काव्य की कसौटी पर रखकर परखा गया है. इन तीनो महाकाव्यों के अतिरिक्त हिन्दी साहित्य के अन्य कवियों की कृतियों के संबंध में शुक्ल जी ने अपने इतिहास में बड़ी मार्मिकता से विचार किया है. रीतिकालीन कवियों में घनानंद आदि भावों की सच्चाई और उसकी मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण शुक्ल जी की श्रद्धा प्राप्त कर सके हैं. किन्तु अन्य कवि कलाबाजी दिखाने के कारण स्वाभाविक कवियों की कोटि में नहीं खड़े किए गए. शुक्ल जी ने ठाकुर, बोधा, द्विजदेव जैसे कवियों की भाव सहजता को विशेष महत्व दिया और बिहारी की ऊहात्मक पद्धति और कृत्रिम उछलकूद का उपहास किया है.

शुक्ल जी ने विशेष उपेक्षा की कबीर, केशव और आधुनिक गीतकारों की. कबीर के काव्यत्व में ही संदेह व्यक्त किया. उनकी दृष्टि में केशव कलावादी कवि हैं, उनमें हृदय की झलक कम है. हवाई उड़ान, लोक जीवन के व्याप्त क्षेत्र से असंबद्धता तथा अपनी गीति शैली के कारण छायावादी-रहस्यवादी कवि शुक्ल जी की मान्यता के पात्र नहीं बन सके हैं.

डॉ. रामचंद्र तिवारी के शब्दों में, “ शुक्ल जी की व्यावहारिक समीक्षा, बुद्धि और हृदय के संतुलन पर आश्रित है. वह शास्त्रीय, नैतिक, मनोवैज्ञानिक और लोकमांगलिक दृष्टियों के सामंजस्य से प्रेरित और अनुप्राणित है. उनका विवेचन स्वच्छ, स्पष्ट और विश्वसनीय है. वह जीवनगत मूल्यों का निरंतर ध्यान रखते हुए काव्य के वायवीपन पर प्रहार करने वाली है. वह भावों और मार्मिक तथ्यों के चयन को काव्य का तत्व मानकर चलती है. वह आलोच्य कृति को बराबर सामने रखकर उसकी विशेषताओं और बारीकियों का सूक्ष्मतम विश्लेषण करती है. वह रहस्यमयता, आवेगशीलता, प्रदर्शनप्रियता और चमत्कारिता का प्रबल विरोध करती हुई एक मर्यादित, भावनिष्ठ, बुद्धिसंगत, तर्कपूर्ण और प्रभावोत्पादक पद्धति को विकसित करने वाली है. “ ( हिन्दी का गद्य साहित्य, पृष्ठ- 259)

आचार्य शुक्ल और प्रमुख पाश्चात्य समीक्षक

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पाश्चात्य समीक्षा शास्त्र का भी गहन अध्ययन किया था. पाश्चात्य विचारकों में से आई.ए. रिचर्ड्स, एवरक्राम्बी, जोजेफ एडीशन आदि के महत्व को उन्होंने सादर स्वीकार किया है और अपनी मान्यताओं की पुष्टि में उन्हें उद्धृत किया है. इसी तरह पश्चिम के क्रोचे, डंटन, ब्रैडले आदि की मान्यताओं का उन्होंने खंडन भी किया है.

पश्चिमी समीक्षा में आई.ए. रिचर्ड्स की मान्यताओं से आचार्य शुक्ल सर्वाधिक प्रभावित हैं. रिचर्ड्स मूल्यवादी समीक्षक हैं. उनके अनुसार समीक्षा सिद्धांत के आधार भूत स्तंभ दो हैं-1. मूल्य का लेखा और 2. सम्प्रेषण व्यापार का विवेचन. आचार्य शुक्ल, साहित्य का जीवन से अविच्छिन्न संबंध मानते हैं. उन्होंने लिखा है, “काव्य का लक्ष्य है जगत और जीवन के मार्मिक पक्ष को गोचर रूप में लाकर सामने रखना जिससे मनुष्य अपने व्यक्तिगत संकुचित घेरे से अपने हृदय को लिकाल कर उसे विश्व व्यापिनी और त्रिकालवर्तिनी अनुभूति में लीन करे. इसी लक्ष्य के भीतर जीवन के ऊँचे से ऊँचे उद्देश्य आ जाते हैं.” ( इन्दौर वाला भाषण, पृष्ठ-50)

रिचर्ड्स की मूल्य संबंधी धारणाओं का संबंध नीति तत्व से है, इसीलिए वे जीवन का तथा काव्य का संबंध नीति से स्थापित करते हैं. इसी संदर्भ में उन्होंने ब्रेडले के कला कला के लिए के सिद्धांत का विरोध किया था. आचार्य शुक्ल भी रिचर्ड्स की उक्त मान्यतों का पूरी तरह समर्थन करते हैं. इसी तरह अपने ग्रंथ ‘प्रिंसिपल्स आफ लिटरेरी क्रिटिसिज्म’ के चतुर्थ अध्याय में रिचर्ड्स ने सम्प्रेषण व्यापार का महत्व स्पष्ट करते हुए कलाकार की सम्प्रेषण के प्रति सजगता का विवेचन किया है. आचार्य शुक्ल की मान्यताएं भी ऐसी ही हैं और उन्होंने अपनी सम्प्रेषण सम्बंधी मान्यताओं की पुष्टि में रिचर्ड्स को उद्धृत किया है.

आचार्य शुक्ल ने पश्चिम के एक अन्य विद्वान जोजेफ एडीशन के ‘द प्लीजर्स आफ इमैजिनेशन’, ‘द प्लीजर्स आफ साइट’, ‘द व्यूटी आफ द नेचुरल वर्ल्ड’, ‘नेचर एण्ड आर्ट’ आदि ग्यारह निबंधो का ‘कल्पना का आनंद’ नाम से अनुवाद किया और काव्य -सृजन के क्षेत्र में कल्पना के महत्व को रेखांकित किया. रसात्मक बोध के विविध रूपों के विवेचन में एडीशन की मान्यताओं का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है.

इसी तरह आचार्य शुक्ल ने एवरक्राम्बी, ( Lascelles  Abercrombie) के प्रेषणीयता के सिद्दांत ( Communicability) की भी प्रशंसा की है.

आलंबन के लोकधर्मी स्वरूप एवं रससिद्धांत के प्रति अटूट निष्ठा के कारण आचार्य शुक्ल ने उन सभी कला सिद्धांतों का विरोध किया है जो इससे भिन्न मान्यताओं पर आधृत थे. पाश्चात्य कला सिद्धांतों में उन्होंने अभिव्यंजनावाद, कलावाद, व्यक्तिवैचित्र्यवाद, अंतश्चेतनावाद, प्रतीकवाद, संवेदनावाद तथा टालस्टॉय के आदर्शवाद का विरोध किया है.

क्रोचे के अभिव्यंजनावाद के विषय में उन्होंने लिखा है “ अभिव्यंजनावाद, अनुभूति या प्रभाव का विचार छोड़ केवल वाग्वैचित्र्य को पकड़ कर चला है, पर वाग्वैचित्र्य का हृदय की गंभीर वृत्तियों से कोई संबंध नहीं. वह केवल कुतूहल उत्पन्न करता है.” ( चिन्तामणि, भाग-2, पृष्ठ-97) और इसीलिए आचार्य शुक्ल ने “ योरप का यह अभिव्यंजनावाद हमारे यहाँ के पुराने वक्रोक्तिवाद का ही नया रूप या विलायती उत्थान है. “(चिन्तामणि, भाग-2, पृष्ठ-98) कहकर इसका विरोध किया है.

आचार्य शुक्ल ने कला कला के लिए के सिद्धांत का भी विरोध किया. वे कला का उद्देश्य लोकमंगल की साधना मानते थे. उनकी दृष्टि में काव्य, जीवन को उदात्त बनाने का माध्यम है. उसके द्वारा मंगल का विधान हो सकता है. जब हम कला को ही अन्तिम लक्ष्य मान लेंगे तो भाव तत्व या विषय तत्व उपेक्षित हो जाएगा और परिणाम यह होगा कि कवि चमत्कार को ही महत्व देने लगेंगे, कविता पच्चीकारी बन जाएगी और सब मिलाकर काव्य का लक्ष्य छोटा हो जाएगा.

डंटन( Theodare Watts Dunton) महोदय के व्यक्तिवैचित्र्यवाद का आचार्य शुक्ल ने पूर्ण तत्परता से खंडन किया है. डंटन ने पाश्चात्य समीक्षा क्षेत्र में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि श्रेष्ठ काव्यकृति वह है जिसमें व्यक्ति के वैचित्र्य को महत्व दिया जाय अर्थात ऐसे पात्रों की रचना की जाए जो असामान्य हों.

संभवत: डंटन का तात्पर्य यह था कि पात्र रचना करते समय परिस्थितियों के उतार -चढ़ाव के साथ पात्रों में मनोवैज्ञानिक परवर्तन दिखाया जाना चाहिए. कोई भी पात्र आदि से अंत तक एकरस नहीं होना चाहिए.

आचार्य शुक्ल ने इसे इस रूप में लिया कि कलाकार को प्रयत्नपूर्वक असामान्य पात्रों की रचना करनी चाहिए. व्यक्तिवैचित्र्यवाद की यह व्याख्या करके आचार्य शुक्ल ने इसका विरोध किया. विरोध का कारण यह था कि इससे साधारणीकरण के सिद्दांत का खंडन हो जाता था. साधारणीकरण ऐसे आश्रय या आलंबन का ही हो सकता है जिनमें सामान्य मानवीय कार्य की प्रतिष्ठा की गई हो. ऐसे पात्र जो सब प्रकार से विचित्र होंगे, साधारणीकरण का आधार नहीं बन सकते. साधारणीकरण न होने का अर्थ है-रस प्रक्रिया का विरोध. शुक्ल जी इसे कदापि स्वीकार नहीं कर सकते थे.

इसके अतिरिक्त आचार्य शुक्ल ने फ्रायड के मनोविश्लेषणवाद, हीगेल तथा टालस्टॉय के आदर्शवाद आदि का भी खंडन किया और इस तरह उन्होंने एक ऐसे समीक्षा-सिद्धांत का आधार विकसित किया जिसकी पुष्ट नींव पर परवर्ती हिन्दी समीक्षा का विशाल भवन निर्मित हो सका.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘जायसी ग्रंथावली’ के पाठ का प्रामाणिक और सफल संपादन करके और उसकी विस्तृत भूमिका लिखकर हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि में असाधारण योगदान किया है. जायसी पर लिखी गई शुक्ल जी की यह आलोचना आज भी मील का पत्थर बनी हुई है.

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( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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