पुरुषोत्तम अग्रवाल : देशज आधुनिकता के व्याख्याता -डॉ. अमरनाथ

हिन्दी के आलोचक – 45

पुरुषोत्तम अग्रवाल

ग्वालियर ( म.प्र.) में जन्मे, ग्वालियर और जेएनयू में पढ़े-लिखे तथा जेनयू में ही शिक्षक रहे हमारे समय के विशिष्ट आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल( जन्म-25.08.1955) प्रभावी वक्ता भी हैं. वे ज्वलंत सामाजिक – सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विषयों पर विभिन्न टी.वी. चैनलों की परिचर्चाओं में अपनी प्रखर और विचारोत्तेजक बहसों के लिए भी जाने जाते हैं. हिन्दी और अंग्रेजी, दोनो भाषाओं पर उनका समान अधिकार है. उनकी आलोचना और चिन्तन का दायरा इतना विस्तृत है कि उन्हें सभ्यता- समीक्षक कहा जा सकता है. पुरुषोत्तम अग्रवाल पर मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव है किन्तु, मार्क्स से भी अधिक प्रभाव उनपर गाँधी का है.

‘संस्कृति : वर्चस्व और प्रतिरोध’, ‘तीसरा रुख’, ‘विचार का अनंत’, ‘शिवदान सिंह चौहान’, ‘निज ब्रह्म विचार’, ‘कबीर : साखी और सबद’, ‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ ‘मजबूती का नाम महात्मा गाँधी’ (पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित लम्बा व्याख्यान ) आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं.

‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर और उनका समय’ पुरुषोत्तम अग्रवाल की सर्वाधिक चर्चित आलोचनात्मक कृति है. जहाँ कबीर पर हिन्दी में अनेक पुस्तकें लिखी जा चुकी हों, जिसमें हजारीप्रसाद द्विवेदी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘कबीर’ भी शामिल हो, वहाँ कबीर पर फिर से कुछ लिखने का साहस करना और अपनी मौलिक स्थापनाओं के लिए चर्चित होना एक असाधारण घटना है.  इस पुस्तक में कबीर की कविता की समीक्षा के बहाने पुरुषोत्तम अग्रवाल की स्थापना है कि साम्राज्यवाद के जरिए बाकी समाजों में पहुँची यूरोपीय आधुनिकता ने उन समाजों की जड़ता को तोड़ने वाली प्रगतिशील भूमिका नहीं, बल्कि देशज आधुनिकता को अवरुद्ध करने की भूमिका निभाई थी. इस अवरोध के कारण भारत समेत तमाम गैर यूरोपीय समाजों में जो सांस्कृतिक संवेदना –विच्छेद उत्पन्न हो गया है, उसे दूर किए बिना न तो अतीत को ठीक से समझा जा सकता है, न ही भविष्य की संभावनाओं और चुनौतियों को. वे मानते हैं कि देश भाषा स्रोतों से संवाद किए बिना भारतीय इतिहास को समझना असंभव है. उनकी स्थापना है कि कबीर तथा अन्य संतों को हाशिए की आवाज देशज आधुनिकता और भक्ति के लोकवृत्त ने नहीं, औपनिवेशिक आधुनिकता ने बनाया है.

आधुनिक होने का दावा करने वाले पश्चिमी समाज को, कबीर के बहाने भक्ति आन्दोलन की आधुनिकता के महत्व से परिचित कराने में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है. उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय, इमोरी विश्वविद्यालय, राइस विश्वविद्यालय, अमेरिकन एकेडमी ऑफ रिलिजन आदि के विभिन्न मंचों पर कबीर की भक्ति तथा अन्य विषयों पर  अनेक व्याख्यान दिए और भारतीय भक्ति आन्दोलन के महत्व को रेखांकित किया.

‘संस्कृति : वर्चस्व और प्रतिरोध’ पुस्तक के एक निबंध ‘जातिवादी कौन ?’ की कुछ पंक्तियाँ वे स्वयं उद्धृत करते हुए लिखते हैं, “ समाज को बदलने की कोई भी सार्थक यात्रा खुद से आरंभ होती है. यह आरंभ में ही समझ लेना हितकारी होगा कि भारतीय समाज की बनावट ही ऐसी है कि यहाँ न धक्कामार ब्राह्मणवाद चल सकता है न धक्कामार गैर –ब्राह्मणवाद. किसी धार्मिक, सांस्कृतिक या भाषाई अल्पसंख्या के विरुद्ध सतत घृणा के आधार पर कोई दूरगामी राजनीति भारत में संभव नहीं है. यह अल्पसंख्या चाहे मुसलमानों / ईसाइयों की हो, चाहे ब्राह्मणों की.” ( ‘संस्कृति : वर्चस्व और प्रतिरोध’ की भूमिका से )

उनकी पुस्तक ‘निज ब्रह्म विचार : धर्म, समाज और धर्मेतर अध्यात्म’  ‘जनसत्ता’ में ‘मुखामुखम’ स्तंभ के अन्तर्गत प्रकाशित छब्बीस लेखों का संग्रह है जिसमें पुस्तक के शीर्षक के अनुसार ही सामग्री है. पुरुषोत्तम अग्रवाल लक्ष्य करते हैं कि सावरकर और जिन्ना दोनो नास्तिक थे, लेकिन धर्म को दोनो ने जिस तरह अपनाया, वह आज भी चिन्ता और चिन्तन का विषय है. भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में धर्म, राजनीति के लिए हथियार का काम करता है. जवाहरलाल नेहरू और कार्ल मार्क्स के विचारों के आलोक में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इस पुस्तक में धर्म और अध्यात्म के आपसी संबंधों को समझने की कोशिश की है.

इस तरह पुरुषोत्तम अग्रवाल की छवि आलोचक से अधिक एक चिन्तक की है. उनके निम्नलिखित कथन से उनकी विचारधारा को समझा जा सकता है. अपने समय की यथास्थिति पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं,

“किसी समाज के बुद्धिविरोधी समाज में बदल जाने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि ‘बुद्धिजीवी’ शब्द धिक्कार के लिए बरता जाने लगे. संसद में मंत्रीजी ‘बुद्धिजीवी आतंकवाद’ जैसी शब्दावली का प्रयोग करें. यह बात किसी एक राजनैतिक दृष्टि तक सीमित हो, ऐसी बात नहीं है. बुद्धिजीवियों को ‘गण- शत्रु’ मानने का इतिहास वामपंथी राजसत्ताओं और विचारधाराओं का भी रहा है. हमारी मौजूदा हालत इसलिए और भी दुखद लगती है क्योंकि भारतीय समाज और सत्तातंत्र पारंपरिक रूप से इस लिहाज से विलक्षण रहा है कि यहाँ निरक्षर व्यक्ति भी विद्वानों, गुणियों का सम्मान करता रहा है.  रावण और अन्य ऐसे राजाओं को अत्याचारी मानने का एक कारण यह भी रहा है कि वे अपने समय के बुद्धिजीवियों ( अर्थात ऋषियों )  को सताते थे.  इसलिए यह और भी दुखद लगता है कि अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों से एकदम उलट हम अपनी शिक्षा पद्धति तक को एक बुद्धिविरोध की नर्सरी ही बनाए दे रहे हैं. बुद्धि और संवेदना की घोर उपेक्षा करते हुए राजनेता, कारपोरेट और ‘ओपीनियन मेकर्स’- सब के सब ‘स्किल डेबलपमेंट’ के गीत गा रहे हैं. इसी को कसौटी बनाकर सरकार को जाँच रहे हैं.” ( आउटलुक, 17 जुलाई 2017 में प्रकाशित, ‘सवाल करके बवाल ना करें, वाट्सऐप बाँच लेवे हैं’, शीर्षक टिप्पणी से )

हाल ही में उनके द्वारा लिखित और संपादित पुस्तक ‘कौन है भारत माता’ प्रकाशित हुई है और खूब चर्चित भी. इस पुस्तक में पं. जवाहरलाल नेहरू के चुने हुए लेख संकलित हैं. यह किताब नेहरू और उनकी विचारधारा को समझने का अवसर तो देती ही है, पुरुषोत्तम अग्रवाल की विचारधारा को भी समझने का एक बेहतरीन जरिया है. इस पुस्तक पर आई टिप्पणियों का जवाब देते हुए उन्होंने ‘द लल्लनटाप’ के पोर्टल पर कहा है,

“निश्चित ही राष्ट्रवाद एक बहुत दिलचस्प अवधारणा है, जो किसी देश के इतिहास के एक ख़ास दौर में ज़िन्दगी, उन्नति, ताक़त और एकता का संचार करता है, वहीं दूसरी ओर, यह एक तरह की संकीर्णता भी लाता है, क्योंकि लोग सोचने लगते हैं कि उनका देश बाक़ी दुनिया से कुछ अलग है. तब राष्ट्रवाद का सन्दर्भ बदल जाता है और कोई केवल अपने संघर्षों, अपनी ख़ासियतों, अपनी असफलताओं को ही सोचता रहता है और दूसरे विचारों को उसमें जगह नहीं मिलती. नतीजा यह होता है कि वही राष्ट्रवाद जो कि लोगों की उन्नति का प्रतीक है, एक तरह से उसी उन्नति के दिमाग़ी ठहराव का प्रतीक बन जाता है. जब राष्ट्रवाद सफलता पाता है तो कभी-कभी वो अपना फैलाव आक्रामक अन्दाज़ में करने लगता है और दुनिया के लिए ख़तरा बन जाता है. आप चाहे जिस विचार के हों, आप इस निष्कर्ष पर ज़रूर पहुँचेंगे कि एक प्रकार का सन्तुलन बनाना बहुत ज़रूरी है. वरना कोई चीज़ जो अच्छी थी, एक बुराई भी बन सकती है. संस्कृति बुनियादी तौर पर अच्छी चीज़ है, लेकिन कभी-कभी ग़लत नज़रिये से चीज़ों को देखने के कारण न केवल जड़ता बल्कि संघर्ष और नफ़रत को पोषित करनेवाली भी हो जाती है. आपको ये सन्तुलन कैसे मिलेगा, मुझे नहीं पता. इस समय की राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं के अलावा, सम्भवतः ये आज की सबसे बड़ी समस्या है, क्योंकि इसके पीछे मनुष्य की आन्तरिक चेतना का भयंकर संघर्ष छिपा है, ऐसी खोज की बेचैनी छुपी है जिसमें वह चेतना सफल नहीं हो पा रही है.” ( mayank.kumar@lallantop.com, Feb.16,2021)

पुरुषोत्तम अग्रवाल ने ‘नाकोहस’ नाम से उपन्यास भी लिखा है और ‘स्कोलेरिस की छाँव में’ शीर्षक से व्यंग्य भी. ‘हिन्दी सराय : अस्त्राखान वाया येरेवान’ शीर्षक उनका यात्रा-ख्यान भी प्रकाशित है.  एक फिल्म समीक्षक और स्तंभकार के रूप में भी पुरुषोत्तम अग्रवाल का लेखन महत्वपूर्ण है.

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

अमरनाथ

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