परमानंद श्रीवास्तव : नई आलोचना के प्रमुख स्तंभ – डॉ. अमरनाथ

हिंदी के आलोचक – 26

परमानन्द श्रीवास्तव

बाँसगाँव, गोरखपुर में जन्मे, आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. और गोरखपुर विश्वविद्यालय से पीएचडी और डीलिट् करने वाले तथा गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रेमचंद पीठ के आचार्य रहे परमानंद श्रीवास्तव (10.2.1935-5.11.2013) नई आलोचना के एक प्रमुख संतंभ हैं. देशभर की साहित्यिक संगोष्ठियों में अपनी भागीदारी, ओजस्वी वक्तृत्व-कला, पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और नई प्रतिभाओं की तलाश व उन्हें अवसर प्रदान करने की पहल के कारण परमानंद श्रीवास्तव अपने समय में लगातार चर्चा के केन्द्र में रहे.

 परमानंद श्रीवास्तव कवि भी है और आलोचक भी. उन्होंने कहा भी है कि कविता और आलोचना दोनो उनके हृदय-संवेदना की चीजें हैं और बौद्धिक संवेदना उसी से स्फूर्ति पाती है. यहाँ मेरा उद्देश्य सिर्फ उनके आलोचना कर्म का संक्षिप्त और परिचयात्मक विश्लेषण से है.

परमानंद श्रीवास्तव की प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ हैं, ‘नयी कविता का परिप्रेक्ष्य’, ‘कविकर्म और काव्य भाषा’, ‘समकालीन कविता का व्याकरण’, ‘शब्द और मनुष्य’, ‘समकालीन कविता का यथार्थ’, ‘कविता का अर्थात’, ‘कविता का उत्तरजीवन’, ‘कविता का पाठ और काव्यमर्म’, समकालीन कविता : नए प्रस्थान’,  ‘हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया’, ‘जैनेन्द्र के उपन्यास’, ‘उपन्यास का पुनर्जन्म’, ‘उपन्यास का जनपद और उपन्यास की मुक्ति’, ‘उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा’, ‘आलोचना की संस्कृति’, ‘अंधेरे समय में शब्द’, ‘प्रतिरोध की संस्कृति और साहित्य’, ‘उत्तर समय में साहित्य’, ‘दूसरा सौन्दर्यशास्त्र क्यों ?’ ‘उपन्यास के विरुद्ध उपन्यास’, ‘आलोचना का स्वराज’, ‘आलोचना का रहस्यवाद’, ‘अतल का अंतरीप’, और ‘समकालीन संप्रेषण का संकट’. इसके अलावा ‘निराला’ और ‘जायसी’ शीर्षक से उन्होंने साहित्य अकादमी के लिए विनिबंध भी लिखा है.

उन्होंने ‘समकालीन हिन्दी कविता’, ‘समकालीन हिन्दी आलोचना’, ‘महादेवी’, ‘निराला की कविताएं : मूल्यांकन और मूल्यांकन’, ‘शेखर एक जीवनी का महत्व’ तथा ‘प्रतिनिधि कविताएं : केदारनाथ सिंह’ जैसी कृतियों का संपादन किया है. ‘उजली हँसी के छोर पर’, ‘अगली शताब्दी के बारे में’ ‘चौथा शब्द’ तथा ‘एक अनायक का वृत्तांत’ उनके काव्य संग्रह हैं और ‘रुका हुआ समय’ उनकी कहानियों का संग्रह है.  ‘मेरे साक्षात्कार’ शीर्षक से उनका साक्षात्कार तथा ‘एक विस्थापित की डायरी’ शीर्षक से उनकी डायरी भी प्रकाशित है. कुछ वर्ष तक उन्होंने ‘आलोचना’ तथा ‘साखी’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है.  

 अपने समय के साहित्य से निरंतर जुड़े रहने वाले परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना का प्रधान क्षेत्र आधुनिक साहित्य है और उसमें भी मुख्य रूप से कविता की आलोचना. उन्होंने मध्ययुगीन सूफी कवि जायसी पर भी बेहतरीन पुस्तक लिखी है. जायसी का मूल्यांकन करते हुए उन्होंने सर्वाधिक प्रशंसा जायसी के काव्य के लोकपक्ष, खासतौर पर उनकी लोकसंस्कृति और लोकभाषा का किया है. आधुनिक कवियों में उन्होंने निराला, अज्ञेय, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, कुंवरनारायण, सर्वेश्वर, श्रीकान्त वर्मा, केदारनाथ सिंह, धूमिल, कुमार विकल, अरुण कमल, आलोकधन्वा, अशोक वाजपेयी, विनोदकुमार शुक्ल, लीलाधर जगूड़ी, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी और ज्ञानेन्द्रपति तक की कविताओं की समीक्षा की है.

 ‘शब्द और मनुष्य’ परमानंद जी की महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृति है. इसमे 1980 से लेकर 1987 के बीच लिखे गए उनके आलोचनात्मक निबंध संकलित हैं. इस पुस्तक में समकालीन कविता और काव्य मूल्यों की पड़ताल के बहाने एक लंबे काव्यात्मक संघर्ष को समझने की कोशिश की गई है. पुस्तक में जीवन राग, जीवन संशक्ति और जीवन धर्मिता को समकालीन कविता के विवेचन में लगभग प्रतिमान की तरह स्वीकार किया गया है. इस पुस्तक के प्रयोजन को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है, “आज की कविता यदि समय की जटिलताओं के साक्षात के प्रति सजग या प्रतिबद्ध है तो उसे अनुभव और रूप की विविधता में जीवन यथार्थ की अभिव्यक्ति की संभावनायें खोजनी होंगी. निजी और सामाजिक के बीच का द्वंद्व समृद्ध विवेक, समझ और संवेदना का विस्तार और जीवन -दृष्टि ( व्यापक अर्थ में कहें, एक प्रकार की विश्वदृष्टि ) -आज की कविता कहाँ तक इन्हें अपने अनुभव लोक और रूपतंत्र के भीतर साध पा रही है और कहाँ वह कुछ खास अभिप्रायों, काव्यरूढ़ियों, रेटारिक-जैसी आलंकारिक युक्तियों में सिमटकर रह गई है-यह देखने की कोशिश इस पुस्तक का खास प्रयोजन है.” ( ‘शब्द और मनुष्य’, भूमिका भाग )

आलोचना के क्रम में परमानंद जी, सबसे पहले रचना को समग्रता में देखते हैं और उसे एक संश्लिष्ट सृष्टि मानकर उसका मूल्यांकन करते हैं. वे इसे आलोचक का दायित्व मानते हैं कि वह ‘असली और नकली कविता’ तथा ‘चालाक और ईमानदार लेखन’ की पहचान करे और उसके भेद को भी स्पष्ट करे.

अच्छी आलोचना के बारे में परमानंद जी कहते हैं, “अच्छी आलोचना तो वह है जो यथार्थ को लेकर प्रश्न पूछती है, सवाल उठाती है, हस्तक्षेप करती है. अगर आलोचना भी हमारी संवेदना, हमारे विवेक का विस्तार या विकास नहीं करती तो उसकी सामाजिक सार्थकता में भी मुझे संदेह है. आलोचना को आलोचना होते ही एक ‘जवाबदेही’ भी होना है.” ( मेरे सक्षात्कार, पृष्ठ-48)

परमानंद जी के शब्दों में, “आलोचना कोई साझा कार्यक्रम नहीं है. वह मेरे लिए रचनात्मक कार्य है और मेरा स्वधर्म है, आपद्धर्म नहीं.” ( आलोचना कोई साझा कार्यक्रम नहीं है, ओम निश्चल से बातचीत, मेरे साक्षात्कार, पृष्ठ-151) वे अन्यत्र कहते हैं, “आलोचना एक बड़ी रचना की तरह है क्योंकि वह जोखिम उठाती है तथा अच्छे और महान साहित्य में फर्क करती है. सबसे पहले वह एक सघन आस्वाद है, फिर विश्लेषण और फिर मूल्यांकन.” ( अनिल त्रिपाठी से बातचीत, मेरे साक्षात्कार, पृष्ठ-13)

परमानंद श्रीवास्तव की मान्यता है कि, “आज यदि सचमुच हम अपेक्षाकृत बदली हुई काव्य-रुचि के आधार पर इस पूरे काव्य- विकास को समझना चाहते हैं तो सिर्फ भाषाई विन्यास को देखना मुख्य समस्या को अधूरा देखना होगा. भाषाई विन्यास के साथ ही भाव –बोध, विचारधारा, जीवन-मूल्य, वर्ग-संस्कार जैसी चीजें जुड़ी हुई हैं.  सामाजिक यथार्थ को हम कहाँ से और किस आग्रह से देख रहे हैं वह समूचा परिप्रेक्ष्य महत्वपूर्ण होता है.” ( शब्द और मनुष्य, पृष्ठ-191)

‘कविता का उत्तर जीवन’ की भूमिका में वे लिखते हैं, “कविता संगीत की हद को भी छूना चाहती है, इससे पहले वह समय की तात्कालिक जटिलताओं से भी बच नहीं सकती. देखते देखते कविता को सस्तेपन की ओर, भद्दी तुकबंदियों की ओर और अश्लील मनोरंजन तक सीमित करने का जो दुष्चक्र सांप्रदायिक ताकतों के एजेंडा पर है, उसे देखते हुए भी कहा जा सकता है कि कविता की जीवनी- शक्ति असंदिग्ध है. यही समय है कि गालिब, मीर, दादू, कबीर भी हमारे समकालीन हो सकते हैं.” ( कविता का उत्तरजीवन, पूर्वकथन ) वे मानते हैं कि कविता वस्तुत: शब्दों में और शब्दों से तो लिखी जाती है पर साथ ही अपने आस पास वह स्पेस भी छोड़ती चलती है जिसे पाठक अपनी कल्पना और समय के अनुरूप भर सकता है.

परमानंद जी ने कविता के अलावा कहानी, नाटक, उपन्यास आदि विधाओं से संबंधित साहित्य की भी गंभीर आलोचना की है लेकिन उन्हें कविता और कहानी की आलोचना में विशेष सफलता मिली है. ’कहानी की रचना प्रक्रिया’ उनकी कहानी की आलोचना पर केन्द्रित महत्वपूर्ण पुस्तक है. इसी तरह ‘उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा’ शीर्षक अपनी पुस्तक में उन्होंने हिन्दी के प्रमुख उपन्यासों का नए ढंग से मूल्यांकन किया है.  ‘गोदान’, ‘शेखर : एक जीवनी’ से लेकर गिरिराज किशोर के ‘जुगलबंदी’ से गुजरते हुए वे उपन्यास के यथार्थ के साथ- साथ रचनात्मक भाषा का प्रश्न भी उठाते हैं. जाहिर है, उनकी चिन्ता में कथ्य के साथ- साथ शिल्प भी है और वे रचना को एक समग्र अन्विति के रूप में देखते हैं.

डॉ. कृष्णचंद्र लाल ने उनकी आलोचना की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए लिखा है,  “उनकी ( परमानंद श्रीवास्तव की) समीक्षा न तो नयी समीक्षा की तरह ‘नीबू निचोड़वादी’ समीक्षा है, न कविता के अवयवों को तार- तार कर उसे विखरा देने वाली शैली वैज्ञानिक समीक्षा. वे भाषा के माध्यम से कविता में अंत:प्रवेश को सार्थक और महत्वपूर्ण मानते हैं तथा कविता के मर्म तक पहुँचना उनका अभीष्ट है. उनका मानना है कि ‘कविता प्रतिमानों से नहीं बनती है’ बल्कि वह ‘प्रतिमानों से हर हालत में बड़ी होती है’ और ‘उससे भी बड़ा है जीवन- दुनिया की तमाम महत्वपूर्ण कविताएं मिलकर जिस जीवन-समग्रता को पाना चाहती हैं और जो निरंतर कवियों के लिए चुनौती है’. उनकी दृष्टि में कविता में अभिव्यक्त संश्लिष्ट एवं जटिल जीवन- यथार्थ को उसकी समग्रता में  उपलब्ध करना आलोचना का उद्देश्य है.” ( सहचर, फरवरी 1996, पृष्ठ-9) वे इसी क्रम में आगे लिखते हैं, “परमानंद जी की कविता संबंधी आलोचना समकालीन हिन्दी कविता को समझने और मूल्यांकन की नवीन दृष्टि विकसित करने के लिए बहुत उपयोगी है. उनकी आलोचना में न तो कठमुल्लापन है, न फतवे देने की प्रवृत्ति. वे विकसनशील समीक्षा-दृष्टि वाले समीक्षक हैं किन्तु उनकी समीक्षाओं में अराजकता या विचारों में घालमेल की प्रवृति नहीं है.” (उपर्युक्त, पृष्ठ- 10)

डॉ. कृष्णचंद्र लाल के शब्दों में, “परमानंद जी को नयी रचनाशीलता की अचूक पहचान थी. वे जिस नए रचनाकार का नाम ले लेते थे, वह कालांतर में अपनी रचनात्मकता का श्रेष्ठ प्रमाण भी देता था……. कुल मिलाकर परमानंद जी का कथेतर गद्य, विशेष रूप से आलोचनात्मक गद्य बहुत समृद्ध और समीक्षा दृष्टि को सम्पन्न करने वाला है. उनकी विशिष्ट आलोचना भाषा और शैली अलग से अपनी चमक का पता देती है. वह ऐसी गद्य भाषा है जो परमानंद जी की ही भाषा होने का प्रमाण देती है.” ( शहरनामा गोरखपुर, पृष्ठ- 176)

डॉ. लाल ने अन्यत्र एक प्रसंग का उल्लेख बहुत रोचक ढंग से किया है, “परमानंद जी का संपूर्ण व्यक्तित्व एक साहित्यिक व्यक्तित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है. कविता और काव्यात्मकता से उनका इतना गहरा रिश्ता है कि वे खूबसूरत चेहरे में भी काव्यात्मकता की तलाश करते हैं. एक बार एक सुन्दर युवती की बात चलने पर उन्होंने कहा, ‘उसका चेहरा बड़ा काव्यात्मक है.’ मैं थोड़ी देर तक सोचता रहा कि परमानंद जी को चेहरा आकृष्ट कर रहा है या काव्यात्मकता ?”( सहचर, फरवरी 1996, भूमिका, पृष्ठ-2)

लेखक संगठनों की भूमिका और उसमें अपनी भागीदारी के बहाने अपनी विचारधारा के बारे में मदन मोहन के एक प्रश्न का जवाब देते हुए उन्होंने कहा है, “प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा हूं और जो समान विचारधारा वाले साहित्यिक -सांस्कृतिक संगठन हैं उनमें अक्सर जाता रहता हूँ. उनके कई आयोजनों में. सबको मिलाकर एक बड़े पाठक समुदाय का पता चलता है और उससे संवाद करने की इच्छा बनी रहती है. जो बहुत घोषित रूप से फ्री थिंकर्स सरीखे हैं उनमें दूसरों को पढ़ने का चलन ही नहीं है. अक्सर वे रुग्ण आत्मग्रंथि के शिकार हैं. हमारे इन लेखक संगठनों में कुछ साझेदारी के काम भी हैं. पिछले दिनों साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लड़ने का हमारा एक संयुक्त मोर्चा जैसा बना जिसमें रंगकर्मी, गायक, शिल्पकार, चित्रकार भी शामिल थे. यह पक्षधरता सामाजिक महत्व की है और छोटी चीज नहीं है. इसके लिए खतरा भी उठाना पड़ता है, प्रलोभन भी छोड़ने पड़ते हैं. संगठन से जुड़कर भी मैंने रचनात्मकता के रूप में कुछ खोया नहीं है. पाया बहुत कुछ है. जैसे असंख्य पाठक. उनसे संवाद कई बार सार्थक जीवंत जान पड़ा है.” ( मदन मोहन से बातचीत, सहचर, फरवरी 1996, पृष्ठ-79)

मुझे लगता है कि हिन्दी की नई कविता पर प्रेषणीयता का अभाव, लय और तुक की उपेक्षा और उसके कारण लोकप्रियता में आई कमी का जो आरोप लगता है उसके पीछे परमानंद श्रीवास्तव जैसे आलोचकों की भी भूमिका है. परमानंद जी की अपनी कविताएं भी इसी श्रेणी की हैं और उन्होंने ‘रबर और केचुआ’ छंद वाली ऐसी कविताओं की सराहना भी की है. मुझे तो उनकी पुस्तकों के नाम तक अबूझ पहेली जैसे लगते हैं जैसे ‘शब्द और मनुष्य’, ‘कविता का अर्थात’, ‘उपन्यास का पुनर्जन्म’, ‘अतल का अंतरीप’, ‘कविता का उत्तरजीवन’, ‘चौथा शब्द’, ‘उजली हँसी के छोर पर’ आदि. कम से कम शीर्षक पढ़कर विषय के बारे में कुछ न कुछ अनुमान तो होना ही चाहिए.

नई से नई प्रतिभाओं को अवसर और सम्मान देना परमानंद जी के स्वभाव का हिस्सा था. एम.ए. की कक्षाओं में मुझे उनसे पढ़ने का अवसर मिला. दुबले पतले और नाटे कद के बावजूद उनकी आवाज बहुत बुलंद होती थी. विद्यार्थियों के लिए भी वे सर्वाधिक सहजता से उपलब्ध होने वाले और सहज ही घुलमिल जाने वाले शिक्षक थे.

परमानंद श्रीवास्तव के रचना कर्म पर केन्द्रित ‘सहचर’ का एक विशेषांक वर्ष 1996 में प्रकाशित हुआ था जिसका संपादन डॉ. कृष्णचंद्र लाल ने किया था. बाद में ‘कठिन समय में शब्द’  शीर्षक से वह पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ. उनके ऊपर हाल ही में ‘पतहर’ पत्रिका का भी एक विशेषांक आया है. इसके अलावा देवेन्द्र आर्य द्वारा संपादित ‘प्रतिमानों के पार’ नाम से उनपर केन्द्रित एक पुस्तक भी प्रकाशित है.  

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

अमरनाथ

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