आरक्षण का मुद्दा – रामधारी खटकड़

रागनी

आरक्षण का मुद्दा देखा किसा माहौल बणा ग्या रै
हरे-भरे हरियाणे ने किस तरियां झुळसा ग्या रै – (टेक)

राजनीति का स्वार्थ मन म्हं, नेता फायदा ठा रे थे
जात-पात का नारा ला के आपस म्हं भिड्वा रे थे
टीवी ऊपर बयान दे-दे, आग दिलां म्हं ला रे थे
इक-दूजे ने दाबण खातर क्रोध में भरते जा रे थे
कोये-कोये नेता ऐसा देख्या जो आग म्हं घी गिरवा ग्या रै….

जगहां-जगहां पै जाम लगा दिए, जनता न्यू लाचार करी
शीशम-कीकर काट कै गेरी, दिखैं थी जो हरी-भरी
भीड़ उमड़ पड़ी शहरां म्हं, गाड्डी भर-भर त्यार करी
लाठी-फरसे ले हाथां म्हं, जोरां ते हुंकार भरी
सरकारी तंत्र खड्या-खड्या, वो आपणा गात बचा ग्या रै….

धींगा-मस्ती शुरू हुई फिर करड़ी लूट मचाई रै
ठा-ठा कै वें लेगे सब कुछ, पाछै आग लगाई रै
स्कूल फूक दिये बच्चों के भी, दया कति ना आई रै
इसे कुकर्म नै देख-देख कै रोवें लोग-लुगाई रै
हस्पताल भी न छोड्डे, काया म्हं चक्कर आ ग्या रै….

धन लुट ग्या और माणस मरगे, घर-घर म्हं कोहराम होया
अफवाह फैली बुरी-बुरी जब दहशत म्हं आवाम होया
हरियाणे की जो रोणक थी उसका काम तमाम होया
उसनै भी तो नहीं बचाए, वो गूंगा-बहरा राम होया
इसे मंजर कै आगे लोगो हिट्लर भी शरमा ग्या रै….

इब बसण-रसण की सोचो सारे, हटके फिर निर्माण करो
भाईचारा बिगड़ण ना द्यो, इक दूजे का मान करो
समाज का जो ताणा-बाणा, उसनै ना कुर्बान करो
‘रामधारी’ तुम छन्द बणा कै शांति का आह्वान करो
‘खटकडिय़ा’ तो कलम चला कै दिल का दर्द सुणा ग्या रै….


स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( मई-जून 2016), पेज -29

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