प्रो. गिरीश रस्तोगी : नाट्य समीक्षक और प्रख्यात रंगकर्मी – डॉ. अमरनाथ

हिंदी के आलोचक – 25

गिरीश रस्तोगी

बदायूँ (उ.प्र.) में जन्म लेने वाली, लखनऊ में पढ़ीं-लिखीं और गोरखपुर विश्वविद्यालय में शिक्षक रहीं प्रो.गिरीश रस्तोगी ( 12.07.1935- 16.01.2015) की ख्याति ‘रूपान्तर’ रंगमंच के नाते अधिक है. वे ‘रूपान्तर’ की संस्थापक- संचालक आदि सबकुछ थीं. उन्होंने नाटक के क्षेत्र में अनेक नए प्रयोग किए.  बेशक उन्होंने नाट्य समीक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है. ‘बीसवीं शताब्दी का हिन्दी नाटक और रंगमंच’, ‘हिन्दी नाटक का आत्म संघर्ष’, ‘हिन्दी नाटक : सिद्धांत और अध्ययन’, ‘आधुनिक हिन्दी नाटक’, ‘समकालीन हिन्दी नाटककार’, ‘समकालीन हिन्दी नाटक की संघर्ष चेतना’, ‘नाटक और रंग-परिकल्पना’, ‘हिन्दी नाटक और रंगमंच : नयी दिशाएं नए प्रश्न’, ‘रंगभाषा’, ‘मोहन राकेश और उनके नाटक’ आदि उनकी नाट्य समीक्षा से संबंधित कृतियाँ हैं.  उन्होंने ‘ध्रुवस्वामिनी’, ‘अंधायुग’, ‘तांबे के कीड़े’, ‘कोणार्क’, ‘पहला राजा’, ‘लहरों के राजहंस’, ‘आधे अधूरे’, ‘कर्फ्यू’, ‘आठवाँ सर्ग’, ‘हानूश’, ‘कबिरा खड़ा बजार में,’ ‘एक और द्रोणाचार्य’, ‘कोर्टमार्शल’ आदि हिन्दी की प्रमुख नाट्यकृतियों की सुन्दर समीक्षाएं की हैं. ‘रूपान्तर’ के माध्यम से उन्होंने इनमें से अधिकांश की नाट्य प्रस्तुतियाँ भी की हैं, इसीलिए उनके द्वारा की गई समीक्षाएं रंगमंच को ध्यान में रखकर की गई हैं और बहुत ही व्यावहारिक हैं. गिरीश रस्तोगी के अनुसार, ‘ भारतेन्दु और प्रसाद हिन्दी के दो ऐसे नाटककार हैं जिनमें भारतीय लोक परंपराएं, शास्त्रीय एवं सास्कृतिक परंपराएं ही नहीं, बल्कि हमारा समूचा राष्ट्रीय संघर्ष, चरित्र और आधुनिक भारतीय द्वंद्व चेतना अन्तर्निहित है.” ( हिन्दी नाटक का आत्म संघर्ष, पृष्ठ 55) मोहन राकेश की प्रशंसा करते हुए, उनके नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ के विषय में वे लिखती हैं, “आषाढ़ का एक दिन मोहन राकेश का पहला और सर्वोत्तम नाटक ही नहीं, आज के हिन्दी नाटक की पहली महत्वपूर्ण उपलब्धि भी है. यह नाटक राकेश को हिन्दी के शीर्षस्थ नाटककारों में प्रतिष्ठित करता है और हिन्दी नाटक और रंगमंच को भारतीय नाटकों और रंगमंच के समकक्ष लाता है.” (हिन्दी नाटक का आत्म संघर्ष, पृष्ठ 132).

 गिरीश रस्तोगी आज के हिन्दी नाटक के बारे में कुछ सवाल उठाती हैं जो निश्चित रूप से हमें सोचने के लिए मजबूर करते हैं, जैसे, आधुनिक हिन्दी नाटक बार- बार, आज तक इतिहास, पुराण, अतीत की ओर, साथ ही नाटक और काव्य के आन्तरिक सघन लयात्मक उपयोग की ओर लौटता रहा है, दूसरे, हिन्दी नाट्य लेखन, कथ्य और शिल्प के विषय में अनिश्चय की स्थिति में रहा है और बार बार नवीनता की तलाश में, प्रयोगों में उलझा रहा है और इस अनिश्चित स्थिति के कारण प्राय: शिल्प-रचना तंत्र या रंगमंचीय प्रयोगों की सतर्कता उसमें बढ़ती गई है. तीसरे, रंगमंच और निर्देशक के बीच के अंतराल ने नाटककार को क्षुब्ध किया है और यह सोचने के लिए विवश किया है कि क्या कवि और कथाकार की तरह नाटककार का कोई अस्तित्व नहीं है?

गिरीश रस्तोगी ने ‘बाण भट्ट की आत्मकथा’ और ‘रागदरबारी’ जैसे उपन्यासों का क्रमश: ‘बाण भट्ट’ तथा ‘रंगनाथ की वापसी’ नाम से नाट्यरूपान्तर किया है और वे उनकी अनेक सफल नाट्य -प्रस्तुतियाँ कर चुकी हैं. नाट्य भाषा पर उन्होंने विशेष काम किया है और इस क्षेत्र में उनकी सजगता की छाप उनकी रंग-प्रस्तुतियों पर देखी जा सकती हैं. उनका विश्वास है कि कलाकार भाषा को बदल कर ही पुराने कथानकों को नया रूप दे सकता है.

नाट्यलोचन के अतिरिक्त गिरीश रस्तोगी जी ने ‘प्रसाद का कथा साहित्य’, ‘मुक्तिबोध और अँधेरे में’,  ‘भारतेन्दु और अँधेरनगरी’, ‘उदयशंकर भट्ट’, ‘भुवनेश्वर’ जैसे आलोचना ग्रंथों के माध्यम से साहित्य की अन्य विधाओं की भी समीक्षा की है.

गोरखपुर को नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में पहचान दिलाने वाली प्रो. गिरीश रस्तोगी ही थीं. उन्होंने मुझे एम.ए. की कक्षाओं में पढ़ाया था. वे एक बेहतरीन शिक्षक थीं.

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

अमरनाथ

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