ए अरविन्दाक्षन : नयी आलोचना का आलोचनात्मक विवेक- डॉ.अमरनाथ

हिंदी के आलोचक – 40

ए.अरविन्दाक्षन

ए. अरविन्दाक्षन ( 10.6.1949 ) के रूप में मशहूर प्रो. अप्पुकुट्टन अरविन्दाक्षन कवि और अनुवादक के साथ- साथ एक प्रतिष्ठित आलोचक भी है. अमूमन देखा जाता है कि दक्षिण के प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वानों और साहित्यकारों की शिक्षा उत्तर भारत के काशी और प्रयाग जैसे शिक्षा केन्द्रों से मिली होती है. प्रो. ए. अरविन्दाक्षन दक्षिण के अकेले ऐसे साहित्यकार हैं जिनका जन्म केरल में हुआ, वहीं शिक्षा हुई और उन्होंने वहीं पर अध्यापन भी किया, किन्तु उनकी भाषा अथवा भाषण को सुनकर कोई उन्हें अहिन्दीभाषी मानने के लिए सहमत नहीं होगा. उनकी सूक्ष्म और पैनी आलोचना-दृष्टि, विश्लेषण-क्षमता तथा संवेदनशीलता उन्हे आलोचक के रूप में अलग और विशिष्ट पहचान दिलाती है. उनके पास सही अर्थों में आलोचनात्मक विवेक है. वे बहुभाषाभाषी ही नहीं हैं, बल्कि, हिन्दी, मलयालम और अंग्रेजी साहित्य के गहरे अध्येता भी हैं और उसका स्पष्ट प्रभाव उनके सृजन पर दिखाई देता है.

प्रो. अरविन्दाक्षन की आलोचना का क्षेत्र आधुनिक साहित्य है. अज्ञेय उनके प्रिय कवि हैं. ‘महादेवी वर्मा के रेखा चित्र’, ‘अज्ञेय की उपन्यास यात्रा’, ‘महादेवी वर्मा’, ‘समकालीन हिन्दी कविता’, ‘कविता का थल और काल’, ‘आधार शिला’, ‘कविता सबसे सुन्दर सपना है’, ‘कविता आज’, ‘राग लीलावती’, ‘रचना के विकल्प’, ‘प्रेमचंद : भारतीय कथाकार’, ‘समकालीन कविता की भारतीयता’, ‘विश्वनाथप्रसाद तिवारी : सृजनात्मकता का विस्तार’, आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियां हैं. ‘नागार्जुन’, ‘प्रेमचंद के आयाम’, ‘हमारे समय में मुक्तिबोध’, ‘अनुवाद : अनुसृजन’, ‘उपन्यास शिल्पी : गिरिराज किशोर’, ‘कविता अज्ञेय’, ‘निराला : एक पुनर्मूल्यांकन’ आदि कृतियों का उन्होंने संपादन किया है. मैं उनके विपुल कविता संग्रहों, मलयालम, कोंकणी और बंगला से किए गए उनके अनुवाद कार्य तथा मलयालम की कृतियों का जिक्र यहां नहीं कर रहा हूं.

प्रो. अरविन्दाक्षन ने श्रेष्ठ कविता के गुणों का विश्लेषण करते हुए लिखा है, “ कवि होने के कारण रचना के दौरान झेले गए आत्मसंघर्ष का अपना महत्व है. कविता को वागाडम्बर का चमत्कार न मानकर परिवेश –संपृक्ति मानने के पीछे निहित मूल्य –दृष्टि ही ग्राह्य है. अक्सर यह देखने को मिलता है कि जीवन की व्यावहारिकता मूल्य-दृष्टि को रौंदती –कुचलती जाती है. तब व्यावहारिकता को कुचलने की आत्मशक्ति अर्जित करना कवि का दायित्व बन जाता है, क्योंकि वह शब्दों की क्रीड़ा नहीं कर रहा है. यह बोध निराला में था.” ( समकालीन हिन्दी कविता, पृष्ठ- 49) 

प्रो. अरविन्दाक्षन रचना के मूल्यांकन के लिए बाहर से मानदंड लाने के आग्रही नहीं हैं. रचना को देखने और समझने की उनकी दृष्टि बहुत व्यापक है. साहित्य का अनुशीलन करते समय उनकी दृष्टि जल और जमीन जैसे जीवन के अनिवार्य तत्वों पर रचित साहित्य पर पहले जाती है और वे “जल और जमीन की बिम्बात्मकता बनाम साहित्य की पारदर्शी संवेदना” शीर्षक लेख लिखते हैं. इसमें वे वर्तमान पूंजीवादी सभ्यता की सीमाओं और उसके भयावह परिणाम की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं. वे विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कविता ‘आरा मशीन’ की समीक्षा के बहाने यंत्र संस्कृति के दूरगामी परिणाम की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि  “विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की यह कविता मात्र प्राकृतिक संपदा के नष्ट होने से उत्पन्न भीषणता को ही शब्द नहीं दे रही है, बल्कि यह मानवीयता के विरुद्ध हो रहे विध्वंस के प्रतिपक्ष में अपना अस्तित्व-तर्क प्रस्तुत कर रही है.”( पारिस्थितिक संकट और समकालीन रचनाकार, पृष्ठ-20)  इसी तरह अरुण कमल की कविता ‘गंगा को प्यार’ की समीक्षा के बहाने वे जोर देकर कहते हैं कि गंगा का जीवनदायिनी स्वरूप हमारी सभ्यता का सबसे भव्य यथार्थ है.

किन्तु इस व्यापकता के साथ ही उनकी निरीक्षण की दृष्टि अत्यंत सूक्ष्म होती है. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी द्वारा लिखे गए पोस्टकार्ड पर उनकी प्रतिक्रिया उल्लेखनीय है. वे लिखते हैं, ” कार्ड मैं ध्यान से देखता था. उनकी लिखावट मुझे अच्छी लगती थी. उस लिखावट में कलात्मकता और सहजता दोनो थी. कुछ समय के बाद मैंने अनुभव किया कि उनकी लिखावट में आत्मीयता भी है. शब्दों में, शब्दों के बीच के मौन में एक सहज व्यक्ति की आत्मीयता मैंने महसूस की.” ( विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : साहित्य का स्वाधीन विवेक, पृष्ठ -29)

प्रो. अरविन्दाक्षन की मातृभाषा मलयालम है. स्वभाविक है कि अपनी समीक्षाओं में वे हिन्दी और मलयालम के बीच समानता के सूत्र ढूंढने तथा उनका तुलनात्मक विश्लेषण करने में समय- समय पर बहुत रस लेते है. इस दृष्टि से वे दोनो भाषाओं के साहित्य के बीच सेतु निर्मित करने वाले समीक्षक हैं। मलयालम काव्य में सर्वधर्म समभाव का विश्लेषण करते हुए वे लिखते हैं, “ मलयालम की रोमांटिक कविता के सशक्त कवि कुमारन आशान हैं. हिन्दी के किसी एक कवि के साथ उनकी तुलना अस्वाभाविक लगती है. जयशंकर प्रसाद और निराला के सम्मिलित गुण उनमें पाए जा सकते हैं.” ( भारतीय काव्य में सर्वधर्म समभाव, पृष्ठ-99)

उन्होंने कोचीन के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में स्थित हिन्दी विभाग को अपने परिश्रम और सूझ-बूझ से इतना समृद्ध बना दिया कि हिन्दी क्षेत्रों में भी ऐसे समृद्ध विभाग बहुत कम देखने को मिलते हैं. समूचे केरल में उनके विद्यार्थी फैले हुए हैं. हिन्दी के प्रति अपनी निष्ठा से भी उन्होंने एक सच्चे हिन्दी सेवी का परिचय दिया है. अवकाश ग्रहण करने के बाद भी वे केरल में ही रहते हैं और साहित्य- सेवा में पूरी निष्ठा से लगे हैं.

      ( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

अमरनाथ

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