कृष्ण बिहारी मिश्र : पत्रकारिता की अनुसंधानपरक समीक्षा के आचार्य – डॉ अमरनाथ

हिंदी के आलोचक – 28

कृष्ण बिहारी मिश्र

‘कल्पतरु की उत्सव लीला’ के रूप में रामकृष्ण परमहंस की अद्भुत जीवनी के प्रणेता और प्रतिष्ठित ललित निबंधकार डॉ.कृष्णबिहारी मिश्र (जन्म-1.7.1932) का नाम हिन्दी पत्रकारिता के आलोचक के रूप में भी पहली पंक्ति में रखा जा सकता है. यद्यपि उन्होंने कभी कोई पत्रकारिता नहीं की, किसी अखबार या पत्रिका का संपादन नहीं किया किन्तु उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने अनुसंधान, अध्ययन और समीक्षण से एक कीर्तिमान स्थापित किया है.  डॉक्टरेट की उपाधि के लिए शोध हेतु पत्रकारिता का क्षेत्र चुनना और इसके बाद उसमें इतना रम जाना कि बाद में भी पत्रकारिता केन्द्रित कई उत्कृष्ट पुस्तकों का प्रणयन करना विरल घटना है. ‘हिन्दी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि’ नामक उनकी कृति जो मेरे पास है, वह 2011 में प्रकाशित आठवां संस्करण है. किसी गंभीर शोध कृति के इतने पाठक अमूमन बहुत कम देखने को मिलते हैं. अपनी उक्त पुस्तक में ‘आभार’ शीर्षक भूमिका में वे खुद लिखते हैं, “प्रस्तुत पुस्तक कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट उपाधि के लिए स्वीकृत शोध –प्रबंध है. अनुसंधान का मूल विषय था कलकत्ता की हिन्दी पत्रकारिता : उद्भव और विकास. उद्देश्य था कलकत्ता की हिन्दी पत्रकारिता ( सन् 1826 से 1930 तक ) का अनुशीलन. प्रस्तुत प्रबंध चूँकि हिन्दी पत्रकारिता के पूरे परिदृश्य को स्पर्श करता है, पुनर्जागरण कालीन राष्ट्रीय चेतना, जातीय संस्कृति और खड़ी बोली –साहित्य की निर्माण –भूमि का अध्ययन प्रस्तुत करता है, इसलिए इसके मूल नाम को बदलकर पुस्तक को उपयुक्त नाम देकर प्रकाशित करना उचित प्रतीत हुआ.” (हिन्दी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण- भूमि, आभार, पृष्ठ-10)

“कलकत्ता जैसे भारतीय पत्रकारिता की जन्म भूमि रहा है वैसे ही हिन्दी पत्रकारिता का भित्ति –क्षेत्र रहा है. इस उत्स- भूमि को केन्द्र में रखकर हिन्दी पत्रकारिता के अतीत का विवेचन करना ही मेरा मुख्य उद्देश्य था. तथापि सामान्य रूप से हिन्दी पत्रकारिता के पूरे परिदृश्य पर मेरी दृष्टि रही है.” ( उपर्युक्त पृष्ठ- 14 )

 उन्होंने नवजागरण की हिन्दी पत्रकारिता का विस्तृत मूल्यांकन किया है. ‘हिन्दी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि’, ‘पत्रकारिता : इतिहास और प्रश्न’, ‘हिन्दी पत्रकारिता : जातीय अस्मिता की जागरण भूमिका’, ‘गणेश शंकर विद्यार्थी’, ‘हिन्दी पत्रकारिता : राजस्थानी आयोजन की कृती भूमिका’ आदि उनकी पत्रकारिता पर केन्द्रित विशिष्ट आलोचनात्मक पुस्तकें हैं. इसके अलावा उन्होंने ‘हिन्दी साहित्य : बंगीय भूमिका’ का संपादन किया हे. मैंने यहाँ उनके ललित निबंधो का जिक्र नहीं किया है जिसके लिए वे खास तौर पर जाने जाते हैं. उनके पत्रकारिता संबंधी कार्यों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि उन्होंने मूल सामग्री का पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ भरपूर उपयोग किया है, इसीलिए उनके कार्यों की प्रामाणिकता में किसी तरह के संदेह की गुंजाइश नहीं है. वे मिशनरी पत्रकारिता के समर्थक है और हर हाल में पत्रकारिता के मूल्यों की प्रतिष्ठा के प्रति प्रतिबद्धता के भी समर्थक हैं.

नवजागरण के गंभीर अध्येता आलोचक कर्मेन्दु शिशिर के शब्दों में, “डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र के पत्रकारिता संबंधी कार्यों की सबसे बड़ी विशेषता उनके द्वारा विपुल मात्रा में मूल सामग्री का किया गया उपयोग है. हिन्दी पत्रकारिता के अरण्य से गुजरते हुए एक तरह से जीवित इतिहास की उत्तेजक यात्रा का अहसास होता है. अनुभव की यह इकलौती उपलब्धि ही उनके कार्यों को मूल्यवान साबित करती है. दुर्लभ और अप्राप्य पत्रिकाओं के परिचय क्रम में वे उसके स्वरूप पर प्रकाश ही नहीं डालते बल्कि सामग्री की उदार प्रस्तुति भी करते हैं. उनकी समाहारी चयनधर्मिता से समय के विविध गवाक्षों का रोमांचक स्पर्श होता है, जो हमें परंपरा के दुर्लभ साक्ष्यों के समीप ले जाता है. ऐसा इसलिए संभव होता है क्योंकि डॉ. मिश्र विचार पक्ष को ही नहीं, उसके वस्तु पक्ष को भी यथातथ्य रखने में यकीन करते हैं. किसी भी विवेकशील शोधार्थी से यह बुनियादी अपेक्षा होती भी है.” ( गाँव की कलम, पृष्ठ-112)

कृष्णबिहारी मिश्र ऐसे भाग्यशाली लेखकों में हैं जिन्होंने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, आचार्य विश्वनाथपसाद मिश्र और आचार्य चंद्रबली पाण्डेय के सानिध्य में रहकर अध्ययन का संस्कार पाया है. उनके व्यक्तित्व के निर्माण में काशी और कलकत्ते की संयुक्त भूमिका है. वे कोलकाता जैसे महानगर में रहते हुए भी गाँव को जीते हैं। उनके रचनाकर्म का मूल्यांकन करते हुए विजयबहादुर सिंह और शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी ने जिस पुस्तक का संपादन किया है उसका नाम ‘गांव की कलम’ ठीक ही रखा है. इस समय कोरोना के आतंक से उनके यहाँ अड्डा नहीं जम पाता है किन्तु सामान्य समय में उनके यहाँ शाम की बतकही में बतरस का आनंद लेने के लिए रोज कोई न कोई पहुँच ही जाता है. वे अपने रोचक साहित्यिक संस्मरण सुनाते हुए कभी नहीं थकते. मिश्र जी में मैंने किसी तरह का राजनीतिक दुराग्रह नहीं देखा. मानवीय मूल्यों के अलावा उन्हें और कोई मूल्य आकर्षित नहीं करते. कोई वामपंथी हो या दक्षिणपंथी, अच्छा इंसान है तो मिश्र जी उससे मिलकर प्रसन्न होते हैं. उन्होंने बातचीत में मुझे बताया कि रामविलास शर्मा की किसी पुस्तक के लिए उन्होंने ढेर सारी सामग्री मुहैया करायी थी जिसके लिए उन्हें कई बार नेशनल लाइब्रेरी के चक्कर काटने पड़े थे और रामविलास शर्मा ने भी वामपंथियों के गढ़ कलकत्ते में मिश्र जी पर ही पर भरोसा किया था. इसी तरह शिवकुमार मिश्र से उनकी दोस्ती का मैं खुद गवाह हूँ।    

कृष्णबिहारी मिश्र की स्मरण शक्ति अद्भभुत है. अपनी इसी स्मरण शक्ति के बलपर उन्होंने कई रोचक  संस्मरण लिखे हैं. उनके निबंधों में भी उनकी स्मरण शक्ति की छाप महसूस की जा सकती है. भाषा उनकी संस्कृनिष्ठ है किन्तु बीच बीच में भोजपुरी की छौंक और सहज प्रवाह में पाठक बह जाता है.  काशी से अध्ययन करने के बाद वे कलकत्ता के बंगवासी कॉलेज में हिन्दी का अध्यापक बनकर आए और वहीं से अवकाश ग्रहण किया. कृपाशंकर चौबे के संपादन में ‘विरल सारस्वत साधना’ शीर्षक से उनके रचना कर्म पर एक अन्य पुस्तक 2018 में प्रकाशित हुई है जिसका ‘पुरोकथन’ रामबहादुर राय ने लिखा है. अपने ‘पुरोकथन’ में रामबहादुर राय ने मिश्र जी के व्यक्तित्व व रचना कर्म के मूल्यांकन का सार संकलित करते हुए लिखा है, “वे एक बहुआयामी रचनाकार हैं. उनकी छह दशकों की समस्त सारस्वत साधना की तीन श्रेणियाँ बनाई जा सकती हैं. पहली श्रेणी है आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चिंतन की, दूसरी श्रेणी है उनके लालित्यपूर्ण निबंधों की और तीसरी श्रेणी है पत्रकारिता के अध्ययन की.” मैंने यहां सिर्फ उनकी तीसरी श्रेणी की, पत्रकारिता के अध्ययन और अनुसंधान की चर्चा की है क्योंकि आलोचना का संबंध उसी से जुड़ता है.

आजादी के पहले की पत्रकारिता की ऊष्मा मिश्र जी को बार बार उद्वेलित करती है. वे उससे आज की पत्रकारिता की तुलना करते हुए दुखी होते हैं और अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं, “चहल पहल और विलास में डूबे आजाद देश के राजनेताओं को आजादी की आबो हवा रचने वाले तपस्वियों के बलिदान का बोध कराने वाले पत्रकार आज विरल हो गए हैं. मूल्यों के पहरुए अपनी भूमिका से स्खलित हो गए हैं.”( विरल साहित्यिक साधना, पृष्ठ-272) वे नि:संकोच कहते हैं कि, ” आज हिन्दी में असंख्य पत्र- पत्रिकाएं समृद्ध साज सज्जा के साथ निकल रही हैं, किन्तु एक भी ऐसी नहीं है जो हिन्दी के विवेक और प्रतिभा का समग्रता में प्रतिनिधित्व कर रही हों.” ( विरल सारस्वत साधना, पृ,ठ 273)

 मिश्र जी को भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार मिल चुका है. उनकी रचनात्मक भूमिका को देखते हुए भारत सरकार ने 2018 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया.

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

अमरनाथ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *