नेमिचंद्र जैन : आधुनिक नाट्यालोचना के जनक – डॉ. अमरनाथ

हिंदी के आलोचक – 14

नेमिचंद्र

नेमिचंद्र जैन (जन्म 16.8.1919) की पहचान ‘तारसप्तक’ के कवि, प्रतिष्ठित पत्रकार और अनुवादक के रूप में भी है किन्तु नाटक और रंगमंच ही उनका मुख्य क्षेत्र है. अपने पिता की व्यापारिक विरासत को सम्हालने से इनकार करने वाले नेमिचंद्र जैन ने अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद मुक्तिबोध के साथ उसी विद्यालय में अध्यापन किया और साथ- साथ मार्क्सवाद का पाठ पढ़ा. कुछ दिन बाद वहाँ से वे कलकत्ता आए और ‘स्वाधीनता’ से भी जुड़े. उसके बाद संगीत नाटक अकादमी के सहायक सचिव बने, जेएनयू के कला अनुशीलन केन्द्र के वे फेलो रहे और बाद में 1965 से नियमित रूप से निकलने वाली नाटक और रंगमंच की मशहूर त्रैमासिक पत्रिका ‘नटरंग’ का उन्होंने आजीवन संपादन किया.  ‘तारसप्तक’ के अपने वक्तव्य में उन्होंने लिखा है, “साहित्य की प्रगतिशीलता में मेरा विश्वास है और उसके लिए एक सचेष्ट प्रयत्न का भी मैं पक्षपाती हूँ,  किन्तु कला की सच्ची प्रगतिशीलता कलाकार के व्यक्तित्व की सामाजिकता में है, व्यक्तिहीनता में नहीं.“

नेमिचंद्र जैन की प्रतिभा का विकास, कथा और खासतौर पर नाट्य साहित्य की समीक्षा में हुआ है, ‘अचानक हम फिर’, ‘रंगदर्शन : बदलते परिप्रेक्ष्य’, ‘जनांतिक’, ‘भारतीय नाट्य परंपरा’, ‘नए हिन्दी लघु नाटक’, ‘मोहन राकेश के सम्पूर्ण नाटक’, ‘अधूरे साक्षात्कार’, ‘दृश्य – अदृश्य’, ‘रंग परंपरा’, ‘रंगकर्म की भाषा’, ‘तीसरा पाठ’ आदि नेमिचंद्र जैन के प्रमुख समीक्षा ग्रंथ हैं.  नेमि जी ने दूसरी भाषाओं से दर्जनों नाट्यकृतियों, कहानियों, आलोचनात्मक ग्रंथों आदि का अनुवाद किया है. नाट्य साहित्य को समर्पित अपनी पत्रिका ‘नटरंग’ के माध्यम से उन्होने हिन्दी नाटक और रंगमंच के विकास तथा उसकी गतिविधियों और चुनौतियों पर लगातार हस्तक्षेप किया है. नाट्य साहित्य के मूल्यांकन में इस अकेली पत्रिका का अद्वितीय योगदान है.  इसके अलावा उन्होंने ‘मुक्तिबोध रचनावली’ का संपादन भी किया है.

नेमिचंद्र जैन, नाटक के अध्ययन और उसकी रचना प्रक्रिया को भी रंग प्रयोग से अभिन्न मानकर चलते हैं. प्रारंभ वे नाटक के अध्ययन से ही करते हैं लेकिन उसके विभिन्न तत्वों – आकार, पात्र, संवाद आदि का विवेचन वे रंगकर्म के संदर्भ में ही करते हैं. वे लिखते हैं, “ जब तक हिन्दी नाटक के अध्येता नाटक को एक व्यावहारिक कला के रूप में, उसे अभिनय –प्रदर्शन तथा दर्शक –वर्ग से प्रत्यक्षत: संबद्ध अभिव्यक्ति –माध्यम के रूप में नहीं समझेंगे, तबतक हिन्दी के साहित्यकार और रंगकर्मी के बीच, नाटककार और रंगकर्म के बीच तथा साहित्य और रंगकला के बीच मौजूद दूरी कम नहीं हो सकेगी. किसी भी सशक्त कलात्मक रंगमंच के विकास की यह सर्वथा तात्कालिक और अनिवार्य आवश्यकता है.” ( रंगदर्शन, पृष्ठ-31). शास्त्रीय आलोचना में उसके शास्त्रीय तत्वों को आधार बनाकर नाटक की आलोचना जाती थी. नेमिचंद्र जैन ने नाट्य प्रदर्शन के तत्वों पर बल देकर पूर्ववर्ती शास्त्रीय आलोचना की व्यर्थता सिद्ध कर दिया. वे सबसे पहले निर्देशक पर विचार करते हैं और उसके बाद रंगशिल्प, अभिनय आदि पर.  

 समकालीन हिन्दी नाटकों के महत्व का आकलन करते हुए उन्होंने लिखा है,  “समकालीन हिन्दी नाटकों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है उनके प्रस्तुतीकरण में अनेक प्रतिभाशाली और कल्पनाशील निर्देशकों का योगदान. बहुत बार निर्देशकों ने ही उपलब्ध नाटकों की रंगमंचीय और कलात्मक संभावना को पहचाना और फिर अपने प्रदर्शनों द्वारा उसे दूसरों के आगे उद्घाटित किया.” ( संकल्प : समीक्षा दशक, सं. निर्मला जैन, पृष्ठ- 72) आज जब नाट्य साहित्य पर सूचना क्रान्ति और इलेक्ट्रानिक मीडिया का सबसे ज्यादा और प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, नेमिचंद्र जैन ने इस विधा को शक्ति और गति देने का सर्वाधिक प्रयास किया है.

देवेन्द्रराज अंकुर ने नेमिचंद्र जैन का नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में किए गए योगदान का मूल्यांकन करते हुए लिखा है, “नेमिचंद्र जैन का कार्यकलाप रंगमंच की दुनिया में कम से कम छ: दशकों तक फैला हुआ है.  इसमें सन् 1965 से लगातार मृत्युपर्यन्त ‘नटरंग’ जैसी नाटक और रंगमंच से जुड़ी महत्वपूर्ण पत्रिका का प्रकाशन और संपादन करके रंगमंचीय दुनिया में आपने अपनी एक अलग पहचान बनाई. ‘नटरंग’ के हर अंक में हिन्दी और दूसरी भाषाओं के किसी एक नाटक, देश के सभी छोटे बड़े नगरों, शहरों और कस्बों में होने वाले नाटकों का रिपोर्ताज और चित्र, महत्वपूर्ण रंगकर्मियों के साक्षात्कारों के माध्यम से पूरे देश के रंगकर्म के बीच एक पुल की ऐतिहासिक भूमिका निभाई. आपने स्वयं भी जाकर वहाँ की रंग-गतिविधियों को देखा और उसके बाद अपने सैद्धांतिक और व्यावहारिक विश्लेषणों को ‘रंग दर्शन’, ‘दृश्य अदृश्य’, ‘तीसरा पाठ’, ‘रंगकर्म की भाषा’ और ‘भारतीय रंगमंच’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों के माध्यम से पूरी तरह से नई, ताजी, आधुनिक दृष्टि और चिन्तन को भारतीय रंगमंच के संदर्भ में प्रतिष्ठित किया. पहली बार उन्होंने नाट्य समीक्षा को उसके शास्त्रीय, पुस्तकीय और बने बनाए ढांचे से बाहर निकालकर सीधे- सीधे उसके प्रस्तुति पक्ष को रेखांकित किया. ऐसा नहीं कि उन्होंने नाटकों के साहित्यिक मूल्यों को पूरी तरह से नकारा हो वरन् इसके विपरीत उन्होंने एक खुली दृष्टि के तहत उन नाटकों को भी अपने विश्लेषण का आधार बनाया जो भले ही अपने लेखन और प्रकाशन काल में न खेले जा सके हों, तथापि जिनमें रंगमंचीय संभावनाओं के स्पष्ट इंगित दिखलाई पड़ते हों.

संक्षेप में कह सकते हैं कि नेमिचंद्र जैन यद्यपि स्वयं एक व्यावहारिक रंगकर्मी नहीं थे लेकिन उसके व्यवहार पक्षों के बहुत गहरे जानकार थे. इसीलिए वे इस दिशा में एक नई आलोचना पद्धति को स्थापित कर सके.” ( भारतीय रंगकोश, भाग दो, देवेन्द्रराज अंकुर की टिप्पणी से )

हृषिकेश सुलभ ने उनकी समीक्षा दृष्टि पर टिप्पणी करते हुए कहा है,  “नेमिचंद्र जैन ने साहित्यिक मूल्यों के साथ- साथ रंगमूल्यों के प्रश्न उठाए. नाट्यालेख को रंगमंच से काटकर परखने और विश्लेषित करने की परंपरा को अनुचित बताया. नाटक के पाठ के भीतर छिपे रंगतत्वों की खोज के लिए नाट्यालोचना के नए उपकरणों को आविष्कृत किया. ( इसके पहले) हिन्दी के पास रंगप्रस्तुति की समीक्षा की कोई परंपरा नहीं थी. साहित्यिक धारणाओं के आधार पर ही प्रस्तुतियों का मूल्यांकन होता आया था.

 नेमि जी ने नाटक रचे जाने की संपूर्ण प्रक्रिया के विविध आयामों को अपनी आलोचना –पद्धति में शामिल करते हुए उसके लिखे जाने, मंचित होने और दर्शकों तक पहुंचने के क्रम को एक सूत्र में बाँधा. उन्होंने इसे समग्र प्रक्रिया के रूप में रेखांकित किया. दृश्यकाव्य कहे जाने वाले नाटक की काव्यात्मक संवेदना के साथ- साथ रंगकर्म के व्यवहार –पक्ष को भी हमेशा महत्व दिया. नेमि जी की इस दृष्टि ने भारतेन्दु और पसाद जैसे नाटककारों तक पहुंचने के लिए रास्तों की खोज की.” (रंगायन-2, सबद vatsanurag.blogspot.com)

नेमिचंद्र जैने द्वारा दिल्ली में स्थापित ‘नटरंग प्रतिष्ठान’ का भी विशेष महत्व है. नाट्य संबंधी संग्रहशाला एवं ग्रंथालय के रूप में यह प्रतिष्ठान कार्यरत है और अनेक अलभ्य दस्तावेजों का भण्डार होने के कारण अध्येताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है.

नेमिचंद्र जैन ने नाट्य साहित्य की आलोचना के अलावा कथा साहित्य की भी आलोचना की है.  उन्होंने स्वातंत्र्योत्तर प्रतिनिधि उपन्यासों को चुनकर उनकी बड़ी ही संतुलित समीक्षा की है. वे उपन्यास हैं- ‘उसका बचपन’, ‘नदी के द्वीप’, ‘मैला आंचल’, ‘यह पथ बंधु था’, ‘बूँद और समुद्र’,  ‘झूठा –सच’, ‘भूले बिसरे चित्र’, ‘जयवर्धन’, और ‘चारुचंद्र लेख’.

फिलहाल, नाट्यालोचन के क्षेत्र में नेमिचंद्र जैन का आलोचना कार्य अप्रतिम है. उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अध्यापन भी किया था. इसके अलावा वे दैनिक ‘स्टेट्समैन’ के नाट्य समीक्षक, ‘दिनमान’ तथा ‘नवभारत टाइम्स’ के स्तंभकार भी रहे.  24 मार्च 2005 को उनका निधन हुआ.

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( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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