अनिल कुमार पाण्डेय

ऐसी हो पत्रकारिता और मीडिया की शिक्षा – अनिल कुमार पाण्डेय

अनिल पाण्डेय

देश में पत्रकारिता शिक्षा के औपचारिक श्रीगणेश के बाद इसमें कई आमूल-चूल परिवर्तन देखने को मिले हैं। कभी महज पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले संस्थान आज पत्रकारिता सहित मीडिया शिक्षा के विभिन्न कोर्स संचालित कर रहे हैं। भारतीय पत्रकारिता शिक्षा ने अपनी सौ साल की यात्रा में कई उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। पत्रकारिता शिक्षा भी तकनीकी की तरह ही परिवर्तनशील है। नई तकनीकों के आगमन और पुरानी तकनीकों के प्रस्थान की तरह ही आज की दौर में पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा में नए विषयों का जुड़ाव-घटाव आवश्यक है। हाल ही में भारत सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू किया गया है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहीं भी मीडिया या पत्रकारिता शब्द का जिक्र नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति से प्रेरणा लेते हुए पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा के भविष्य के बारे में भी सोचा जाना आवश्यक है। भारत में पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा का भविष्य उज्जवल और असीम संभावनाओं से भरा हुआ है। बस कुछ दाल में नमक के बराबर परिवर्तन की दरकार है।

देश में पत्रकारिता शिक्षा का स्वरूप समयानुरूप बदलता रहा है। पत्रकारिता शिक्षा अपने प्रारंभ से ही अन्य विषयों की भाँति पारंपरिक पठन-पाठन पर ही केन्द्रित रही है। समयांतर में पत्रकारिता शिक्षा में मीडिया विषयक अध्ययन भी इसका अभिन्न हिस्सा बन गया। बेहतर शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए बाद के वर्षों में विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभागों एवं संस्थानों में मीडिया लैब और छोटे-मोटे स्टूडियो स्थापित करने के साथ ही प्रैक्टिकल एक्सपोजर के लिए इंटर्नशिप को पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया। पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षण में इन प्रयोगों से न केवल पत्रकारिता एवं मीडिया पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी हुई बल्कि के विद्यार्थियों को भी विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी के अवसर भी हासिल हुए। बाद में लागू च्वॉइस बेस्ट क्रेडिट सिस्टम ने पत्रकारिता एवं मीडिया पाठ्यक्रम की गुणवत्ता में और बढ़ोतरी की। हालांकि कुछ ही विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में च्वॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम लागू है। च्वॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम में कोई भी विद्यार्थी अपने कोर्स के कुछ विषयों के स्थान पर किसी अन्य कोर्स के एक या दो मनचाहे विषयों को चुन सकता है। साथ ही क्रेडिट स्कोर आधारित पाठ्यक्रम में विद्यार्थी कई तरीकों से क्रेडिट स्कोर जुटाकर सफलतापूर्वक अपना कोर्स सफलतापूर्वक संपन्न कर सकता है। इसी तारतम्य में भारत सरकार द्वारा लागू नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी कई ऐसी व्यवस्थाएँ हैं जिन्हें अमल में लाने से यह नीति देश की शिक्षा व्यवस्था को गुणवत्तोन्मुखी शिक्षा की दिशा की ओर अग्रसर करेगी। नई शिक्षा नीति के आगमन से पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा का परिदृश्य बदलने की पूरी संभावना है। भले ही इसमें इनके संदर्भ में कुछ न लिखा गया हो।

पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा के बदलते वर्तमान परिदृश्य के दृष्टिगत विश्वविद्यालयों एवं मीडिया संस्थानों में संचालित पत्रकारिता और मीडिया के कोर्सों को अधिक गुणवत्तापूर्ण, प्रभावी और रोजगारपरक बनाने के लिए इनमें बदलाव आवश्यक हैं।

कोर्स सहित उनके पाठ्यक्रमों में हों बदलाव

देश में पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा के नाम पर देशभर के सैकड़ों विश्वविद्यालयों के विभिन्न विभागों और मीडिया संस्थानों में भिन्न-भिन्न नामों से सैकड़ों पत्रकारिता एवं मीडिया के कोर्स संचालित हैं। एक जैसे पत्रकारिता एवं मीडिया पाठ्यक्रमों के बावजूद विश्वविद्यालय कला में स्नातक और परास्नातक के साथ ही विज्ञान में स्नातक और परास्नातक की उपाधियाँ दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ स्थित एक विश्वविद्यालय तो मीडिया अध्ययन और जनसंचार में अलग-अलग एम.फिल. की उपाधियाँ प्रदान करता है। इन दोनों एम.फिल. उपाधियों के पाठ्यक्रमों में कितना अंतर होगा यह कहना मुश्किल है। आज आवश्यकता है रोजगारोन्मुखी मीडिया कोर्सों के साथ बेहतर पत्रकारिता पाठ्यक्रमों की जो पत्रकारिता एवं जनसंचार के सैद्धांतिक पक्षों के साथ ही प्रायोगिक अभ्यासों से भी भरपूर हों। ताकि इनमें अध्ययनरत् विद्यार्थी मीडिया उद्योग की आकांक्षाओं एवं जरूरतों के मुताबिक बेहतर पत्रकार एवं मीडिया व्यवसायी बन सकें।

पत्रकारिता एवं मीडिया कोर्सों के पाठ्यक्रमों में बदलाव आज के समय की जरूरत है। आजकल लोग डॉक्टर, इंजीनियर, वकील की तरह ही पत्रकारों एवं मीडियाकर्मियों से भी व्यावसायिक दक्षता की अपेक्षा करते हैं। पत्रकारिता कभी मिशन थी, लेकिन आज विशुद्ध व्यवसाय है। पत्रकारिता के उद्देश्य आज भी उतने ही पवित्र हैं, जितने अपने प्रारंभिक दौर में थे। हालांकि व्यावसायिकता की अंधी दौड़ में ये पवित्र उद्देश्य खो से गए लगते हैं। बावजूद इस सबके पत्रकारिता एवं मीडिया के विद्यार्थियों को व्यावसायिक दक्षता हासिल करना डॉक्टर, वकीलों की तरह ही आवश्यक है। ऐसे में जरूरी है कि हम ऐसे कोर्स तैयार करें जिनमें नई तकनीकों के समावेश के साथ ही कंटेट को भी भरपूर स्थान मिले और वे पत्रकारिता के पवित्र उद्देश्यों को उद्घाटित करने वाले हों। अच्छे और सच्चे उद्देश्यों के साथ भी पत्रकारिता में अर्थाजन आज भी संभव है। निश्चित रूप से पत्रकारिता इस व्यावसायिक दौर में भी बाजार, कॉरपोरेट और सरकार के लिए नहीं है। पत्रकारिता आज भी समाज के लिए ही है। पाठ्यक्रमों में बदलाव भर से पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षण की गुणवत्ता शतगुणित हो जाएगी; ऐसा भी नहीं है। पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए देश में एक मीडिया एजुकेशन काउंसिल की नितांत आवश्यकता है जो राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, बार काउंसिल ऑफ इंडिया की तरह न केवल कोर्सों के पाठ्यक्रमों का नियमन करे बल्कि संभव हो तो पत्रकारों के पंजीयन के लिए एक राष्ट्रीय एजेंसी का भी काम करे। मीडिया एजुकेशन काउंसिल की स्थापना से न केवल पत्रकारिता और मीडिया कोर्सों के पाठ्यक्रमों में सुधार होगा, बल्कि मीडिया उद्योग की जरूरतों के अनुसार पत्रकार एवं मीडियाकर्मी भी बड़ी संख्या में उपलब्ध हो सकेंगे।

संसाधनों से लैस हो मीडिया लैब / स्टूडियो

न केवल नए पत्रकारिता एवं मीडिया कोर्सों की आमद और मौजूदा कोर्सों में बदलाव से पत्रकारिता और मीडिया शिक्षण के उद्देश्यों की समग्रता से पूर्ति होगी बल्कि इसके लिए हमें शिक्षण संस्थानों के मीडिया लैब एवं स्टूडियो को भी अत्याधुनिक संसाधनों से लैस करना होगा। पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों के मीडिया लैब में बेहतर संसाधनों सहित कुछ मूलभूत उपकरणों का होना हर हाल में अनिवार्य होना चाहिए। देखा गया है कि कई विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग एवं संस्थान अध्ययनरत विद्यार्थियों को प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल मीडिया में काम करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण ही नहीं देते। लेखन शैली सुधारने या भाषाई पक्ष पर तो बिल्कुल भी ध्यान नहीं होता है। ऐसे में विश्वविद्यालय, महाविद्यालय स्तर पर भाषा प्रयोगशाला के साथ ही स्टूडियो में आधारभूत प्रोडक्शन उपकरणों का होना पत्रकारिता एवं मीडिया पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए।

भारतीय भाषाओं में तैयार हो पुस्तकें

वर्तमान में डिजिटल मीडिया के असीम विस्तार ने मीडिया के क्षेत्र में योग्य पेशेवरों की माँग बढ़ा दी है। ऐसे में योग्य पेशेवरों को तराशने के लिए उचित शिक्षण-प्रशिक्षण आवश्यक है। पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा पेपर-पेन आधारित पारंपरिक मीडिया शिक्षा से कहीं आगे की-बोर्ड और चमचमाती टचस्क्रीन तक का सफर तय कर चुकी है। तकनीक ने मीडिया के क्षेत्र को व्यापक बनाया है। पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा अब केवल शैक्षणिक संस्थानों तक ही सीमित नहीं रही है। प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बड़े मीडिया संस्थान भी अब पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं। अब तो कई मीडिया संस्थानों के अपने विश्वविद्यालय भी हैं। इतने बड़े स्तर पर मीडिया संस्थानों का खुलना पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा के प्रति लोगों के प्रति बढ़ते रुझान का परिचायक है। हालांकि पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षण-प्रशिक्षण के बढ़ते दायरे के बीच अफसोस इस बात का है कि हमारे यहाँ के विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों का अध्ययन-अध्यापन विदेशी पुस्तकों पर निर्भर है। भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता एवं मीडिया की कुछ एक पुस्तकों को छोड़ दें तो स्तरीय पुस्तकों का अभाव है। ऐसे में भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता करने का सपना संजोने वाले विद्यार्थी अपनी माँ बोली में पुस्तकें न पाकर कई बार हतोत्साहित हो जाते हैं। मैंने भी अपने अध्ययन-अध्यापन के दौरान कुछ इसी तरह की स्थितियों से दो-चार हुआ हूँ। विदेशी पुस्तकों में स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों-परिस्थितियों के संदर्भों का होना स्वाभाविक है। ऐसे में इन पुस्तकों के अध्ययन के बाद पत्रकारिता एवं मीडिया का विद्यार्थी, पत्रकार या मीडियाकर्मी की हैसियत पाने के बाद पत्रकारिता की पश्चिमी दृष्टि से ही हर घटनाक्रम को देखने-परखने की कोशिश करता है।

पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित केविन कार्टर का सुडान में दम तोड़ते बच्चे के इंतजार में नजरें गड़ाए गिद्ध और उस बच्चे की तस्वीर से तो पत्रकारिता एवं मीडिया में रुचि रखने वाला हर व्यक्ति परिचित होगा। जबकि भारतीय पत्रकारिता की चिंतन दृष्टि इससे बिल्कुल भिन्न है। व्यावसायिक होना अच्छी बात है, लेकिन कई बार समय-परिस्थिति आपसे अच्छे इंसानी व्यवहार की भी आशा रखती है। भारत केन्द्रित पत्रकारिता एवं मीडिया के लिए जरूरी है कि विद्यार्थी भारतीय संदर्भों पर आधारित भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता एवं मीडिया की पुस्तकों का अध्ययन करें। ऐसे में आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं में भारत की परिस्थितियों के अनुरूप पुस्तकों का लेखन किया जाए। इसके लिए विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभागों को जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

इंटर्नशिप हो पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा

पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षण-प्रशिक्षण में इंटर्नशिप का अपना योगदान है। देश के कई नामचीन पत्रकारों ने इंटर्नशिप के दौरान ही अपनी रुचि और दक्षता को पहचान कर पत्रकारिता एवं मीडिया के क्षेत्र में अपना मुकाम हासिल किया है। मीडिया संस्थानों में इंटर्नशिप करने वाले अनेक लोगों को एक ओर जहाँ नौकरी मिली तो कई लोगों को बेहतर व्यावसायिक प्रशिक्षण। पहले केवल मेडिकल स्टूडेंट्स को ही कोर्स करते समय इंटर्नशिप दी जाती थी, लेकिन इंटर्नशिप की महत्ता को देखते हुए आजकल यह लगभग सभी व्यावसायिक कोर्सों का हिस्सा बन गई है। इंटर्नशिप के अंतर्गत किसी विद्यार्थी को कुछ समय के लिए किसी मीडिया संस्थान यथा समाचार पत्र-पत्रिकाएँ, समाचार चैनल, एफ. एम स्टेशन के साथ काम करने का अनुभव हासिल करना होता है। इंटर्नशिप का लक्ष्य व्यावहारिक ज्ञान हासिल करना है। बहुत सी बातें पुस्तकों में नहीं लिखी होती हैं, लेकिन इन बातों को पत्रकारिता एवं मीडिया जगत में घटना की स्थिति-परिस्थिति के हिसाब से अपनाया जाता है। पत्रकारिता एवं मीडिया पाठ्यक्रम भी व्यावसायिक कोर्सों के दायरे में आते हैं इसलिए स्नातक उपाधि या आनर्स पाठ्यक्रमों के साथ ही परास्नातक पाठ्यक्रमों में इंटर्नशिप को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। भले ही इंटर्नशिप की अवधि पंद्रह दिन से एक-दो महीने की ही क्यों न हो? इंटर्नशिप करने से न केवल मीडिया उद्योग में काम के तौर-तरीकों के बारे में जानकारी मिलती है बल्कि इंटर्नशिप से तकनीकी ज्ञान, टाइमिंग एटीकेट्स, सॉफ्ट स्किल, टीम में कैसे काम करते हैं; जैसी चीजें भी सीखने को मिलती है।  इंटर्नशिप के बाद विद्यार्थी के दो गुना अधिक उत्साह एवं आत्मविश्वास कारण किसी भी मीडिया संस्थान से जुड़ने की संभावना भी दोगुना बढ़ जाती है। नए दोस्त मिलते और नेटवर्क  का दायरा बड़ा होता जाता है।कई बार तो इन्हीं नेटवर्क की मदद से अच्छी नौकरी भी मिल जाती है।

विशेषज्ञों के व्याख्यान हों अनिवार्य

 पत्रकारिता एवं मीडिया विषयक शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए प्राध्यापकों के साथ मीडिया उद्योग के विद्वान-विशेषज्ञों के समय-समय पर व्याख्यान होने आवश्यक हैं। अक्सर देखने में आता है कि पत्रकारिता विभागों में सुविधा के अनुसार मीडिया विशेषज्ञों को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया जाता है। इन व्याख्यानों की संख्या और अवधि का शायद ही कोई हिसाब-किताब होता होगा। जबकि होना यह चाहिए कि कोर्स के पाठ्यक्रम के अनुरूप मीडिया विशेषज्ञों के व्याख्यानों की संख्या एवं अवधि पूर्व निर्धारित हो। विशेषज्ञ सुविधा के अनुसार नहीं बल्कि निर्धारित योग्यता एवं अनुभव के आधार पर व्याख्यान के लिए आमंत्रित किए जाने चाहिए। साथ ही हर किसी मीडियाकर्मी या पत्रकार के आगे वरिष्ठ लिखकर उन्हें आमंत्रित करने की परंपरा से भी बाहर आने की भी जरूरत है। प्राध्यापकों एवं मीडिया के विद्वान-विशेषज्ञों के परस्पर शैक्षणिक सहयोग से ही पत्रकारिता एवं मीडिया विषयक अध्ययन-अध्यापन अपने उद्देश्यों के अनुरूप समग्रता को प्राप्त करेगा।

मीडिया कन्वर्जेंस पर भी हों कोर्स

कोरोना की प्रलंयकारी महामारी ने इंसानी तौर-तरीकों में कई ऐसे परिवर्तन कर दिए हैं जिनकी आज तक किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। किसी ने शायद ही सोचा होगा  कि आकाशवाणी के समाचार, समाचार वाचक द्वारा उसके अपने घर से ही पढ़े जा सकते हों। इसी तरह से किसी एंकर के घर का एक कोना न्यूज़ चैनल के स्टूडियो में तब्दील हो जाएगा; शायद ही किसी ने इसकी कल्पना की हो। कोरोना महामारी ने अन्य उद्योगों की तरह ही मीडिया उद्योग को भी कई झटके दिए हैं। एक ओर तो प्रिंट मीडिया की कमर तोड़ दी वहीं दूसरी ओर डिजिटल मीडिया के उभार ने वैश्विक मीडिया परिदृश्य को ही बदल दिया। फ्री में मिलने वाले ई-पेपर, पे-वॉल के पीछे चले गए। विज्ञापन से मिलने वाला राजस्व भी डिजिटल मीडिया के बूम के चलते प्रिंट मीडिया से बिदक कर उसके खेमें में चला गया। कोरोना महामारी के प्रभाव के कारण मीडिया जगत में होने वाले यह परिवर्तन अल्पकालिक नहीं है। मेरी दृष्टि में ये परिवर्तन युगांतकारी और टिकाऊ हैं। आज हर मीडिया, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सभी को बेव आधारित डिजिटल मंचों के साथ ही सोशल मीडिया मंचों पर आना ही होता है। आज का, और आने वाला समय मीडिया कन्वर्जेंस का है। तकनीकी ने सभी माध्यमों को एक ही चौराहे पर ला खड़ा किया है। कंप्यूटर, इंटरएक्टिव टी.वी, टैबलेट एवं स्मार्टफोन ये सभी वही चौराहे हैं जहाँ से सभी मीडिया के तक एक साथ, समान रूप से पहुँच के रास्ते जाते हैं। मीडिया कन्वर्जेंस ने जहाँ लोगों के बीच नॉलेज गैप को कम किया है वहीं रोजगार के भी लाखों अवसर उपलब्ध कराए हैं। ऐसे भी मीडिया तकनीकों के शिक्षण के साथ ही डिजिटल कंटेंट निर्माण जो सोशल मीडिया मंचों के लिए मुफीद हो पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कई निजी एवं सरकारी विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों ने मीडिया कन्वर्जेंस आधारित विशेष पाठ्यक्रम तैयार किए हैं। अन्य विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता एवं मीडिया विभागों सहित संस्थानों को भी कुछ इसी तरह के नए कोर्सों को अपनाने की आवश्यकता है।

आज पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा, मीडिया के किसी एक पक्ष के बनिस्बत मीडिया के समग्र अध्ययन पर आधारित हो चली है। पत्रकारिता एवं मीडिया के किसी एक आयाम में निपुणता के साथ ही अन्य आयामों पर कार्यकारी दक्षता आज मीडिया उद्योग की माँग है। मेरा मानना है कि पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षण में यदि उपरोक्त बिन्दुओं को अंगीकार कर लिया जाए तो न केवल विश्वविद्यालयों और संस्थानों के पत्रकारिता विभागों में पत्रकारिता एवं मीडिया शिक्षा रोजगारोन्मुखी कोर्स एवं रुचिकर पाठ्यक्रम तैयार होंगे बल्कि भारतीय चिंतन से ओत-प्रोत मीडिया संस्थानों को निष्पक्ष पत्रकार, दक्ष मीडिया प्रोफेशनल्स एवं की-बोर्ड के सच्चे सेवादार मिल सकेंगे।

अनिल कुमार पाण्डेय,
मीडिया प्राध्यापक, गवर्नमेंट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज सेक्टर-1, पंचकूला, हरियाणा
संपर्क –  8319462007

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