आफत – कुलदीप कुणाल

कविता


आफत

आफत का क्या पता हुज़ूर जाने कब टपक पड़े…
राजधानी में एक बम धमाका हुआ और टूट पड़ी आफत,.
रसोई में नमक ख़त्म और हो गया टंटा…
क्या मुंह लेकर जाये बीवी, मियां के आगे…
आफत से तो अब कोई भी दूर नहीं जनाब…
आप भी नहीं…
आफत के पास बहुत बड़ी दूरबीन है,
ओजोन से झांकती है आफत…
अभिनेता को संवाद भूल गए मंच पर तो हो गयी आफत…
वैसे इम्प्रोवाइजेशन अच्छा जुगाड़ है….
हर कोई कर रहा है इम्प्रोवाइजेशन….
हर कोई कर रहा है अभिनय,
मगर फिर भी देखिये कितना खराब अभिनय है हमारी फिल्मों में…
और आफत हमारी रगों में दौड़ती है…
किसी सिरफिरे ने पूछ लिया सवाल और लीजिये हो गयी आफत…
मच गया बवाल…
भोपाल अच्छा शहर है वैसे बशर्ते वहाँ आफत ना हो तो…
वैसे तो हर गाँव-शहर अच्छा है बिना आफत के…
राजधानी भी कहाँ बुरी है…
पर यहां तो बाराह्मासों आफत का मौसम है…
दिल्ली दिल है साहब देश का…
और इस देश को दिल की बीमारी है,..
बस यही एक आफत है…


स्रोत- सं. देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज- 21

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