वर्जीनिया को पढ़ते हुए – कुलदीप कुणाल

कविता


वर्जीनिया को पढ़ते हुए

एक अदद कमरे की ज़रूरत है
एक प्याली कॉफ़ी जहां हो
एक प्याली कॉफ़ी और कुछ किताबें
कुछ देर का बेबाक लेटना
कुछ अन्दरूनी कपड़े !
कुछ अंदरुनी कपड़े ?
कुछ अंदरुनी कपड़े फ़ेंक दिए जाएं बेधड़क
या सुखा दिए जाएं लापरवाह
जो दबे रहते हैं घर की किसी अलमारी में़, एक रहस्य की तरह
जो बाज़ारों में बिकते हैं नुमाइश होकर
जिन्हें खुले में सूखता देख पिताओं की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं
और सभ्यता की सांस फूलने लगती है।


स्रोत- सं. देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज- 21

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