आती रहेंगीं बेटियां – कुलदीप कुणाल

कविता


आती रहेंगीं बेटियां

जीवन निरंतर चलता रहे
ये उसूल कुदरत ने बनाया था
और हमने वो उसूल तोड़ दिया।
फिर कुछ यूं हुआ की हमने कुदरत को सुनना छोड़ दिया ।
हमने जंगल से भी बदतर माहौल बनाया ।
युद्ध किए और खून बहाया ।
रिश्तों को मुनाफाखोरी में बदल दिया
बलात्कार किए
बहनो से अपने कपड़े धुलवाए
और माँओ को त्याग की मूर्ति बना
उनकी आज़ादी को निगल गए।
गर्भ पर दूरबीन तैनात कर दी गई
ताकि बेटियां पैदा ना हो।
मगर बिन बुलाई अनिच्छित बेटियां,
आती रही, आती रहेेंगीं।
समूचे जगत के कान में हौले से कहेगी
देखो मैं फिर आ गई।
बेटियां फिर भी आती रहैंगी, ये बताने
कि जगत में अब भी बहुत कोमलतम
बचा रह सकता है ।
बेटियां आती रहेगी
मृत पिताओं की स्मृतियों को जीवित रखने।
फिर से बुनने और अपने हिस्से का जीवन चुनने आती रहेेंगी बेटियां।
जाल कुतरने और खुस-फुस करने आती रहेेंगी बेटियां।
बूंद-बूंद जोडऩे और झूठ बोलने बेटियां आती रहेेंगी ।
इज्जत के आसमान में ओज़ोन बन आती रहेेंगी बेटियां।
शर्म सार ज़माने से नजऱ मिलाने
गाली खाने
और बेटों को रिझाने, आती रहेंगी बेटियां।
बेटियां ये बताने आती रहैंगी की प्यार जिस चिडिय़ा का नाम है,
असल में वो एक चिडिय़ा ही है।
उसे आजादी से उडऩे दो
और कतरा-कतरा जुडऩे दो समय के कटोरे में प्यार ।


स्रोत- सं. देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज- 20
 

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