पंछी भर इक नई परवाज़ – संतराम उदासी

पंछी भर इक नई परवाज़

भर इक नई परवाज़ पंछी! भर इक नई परवाज़
जितने छोटे पंख हैं तेरे
उतने लम्बे राह हैं तेरे
तेरी राहों में आखेटक ने किया है गर्द -गबार
पंछी! भर इक नई परवाज़
जिस टहनी पर वास तेरा है
उस टहनी का हाल बुरा है
तेरे उडऩे से पहले कहीं उड़ न जाये बहार
पंछी! भर इक नई परवाज़

झनक-झनक निकली हथकडिय़ाँ
पर तूने जोड़ी नहीं कडिय़ाँ
तेरे बच्चों तक फैला है बाजों का प्रहार

पंछी! भर इक नई परवाज़
तू लोहे में चोंच मढ़ाकर
डाल-डाल पर नजऱ गड़ाकर
खेतों में विखरे चुग्गे का बन जा पहरेदार
पंछी! भर इक परवाज़ .

 

पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री

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