देख कबिरा रोया…डा. सुभाष चंद्र

सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै

दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै

कबीर ने झूठ के घटाटोप को भेदकर सच्चाई को पा लिया था, इसलिए उनको ‘रोना’ इस बात पर आता था कि जिस आवाम की मेहनत से दुनिया रोशन है, उसकी हालत सबसे पस्त है। उन्होंने जान लिया था कि श्रम का और मनुष्यता का गहरा संबंध है। मनुष्य का शारीरिक से लेकर सांस्कृतिक तक समस्त विकास श्रम की संबंद्धता से ही संभव हो सका है। श्रम की गरिमा ही असल में मानवीय गरिमा है। श्रम के अवमूल्यन का मतलब है मनुष्य और उसकी मनुष्यता का अवमूल्यन। श्रम के प्रति सम्मान  किसी समाजार्थिक-व्यवस्था के अच्छे या बुरे चरित्र की कसौटी है।

देश की जो तरक्की दिखाई दे रही है उसमें श्रमिकों के पसीने की गंध है, लेकिन वह दयनीय हालात में जीवन जी रहा है। एक तरफ धन के अंबार लगे हुए हैं, दूसरी तरफ श्रमिकों की बस्तियों में घोर दरिद्रता व अभावों का पसारा है। एक तरफ ‘विकास’ का आथू आ रहा है, दूसरी तरफ श्रमिकों के जीवन-सत्व को इस ‘विकास’ ने चूस लिया। एक तरफ लोग अपनी ही चर्बी तले दबे जा रहे हैं, दूसरी तरफ श्रमिकों के शरीर कंकाल में तब्दील हो रहे हैं। श्रमिकों के ये हालात प्राकृतिक विपदा नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था के संस्थागत शोषण के कारण हुई है। रोजगार व सुरक्षा के जो अधिकार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अथवा उसके बाद श्रमिकों ने संघर्ष से प्राप्त किए थे, उनको शासन-व्यवस्था देश के विकास के नाम पर छीन रही है।

हरियाणा में भी श्रम कानूनों में ऐसे बदलाव हुए हैं जिनमें जहां चालीस से कम लोग काम करते हैं उसे कारखाना मानने से ही इंकार है। 300 की संख्या में कार्यरत श्रमिकों वाले कारखाने को मालिक अपनी मर्जी से बंद कर सकता है। 50 से कम श्रमिकों के लिए ठेकेदार को लाईसेंस की आवश्यकता नहीं है। इनसे शोषण को बढ़ावा मिल रहा है और श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा धराशायी हो रही है।

स्थानीय स्तर पर रोजगार संकट के कारण लोग रोजगार की तलाश में विस्थापित होने पर विवश हैं। प्रवासी मजदूर लेबरबाड़ों में इतनी सी जगह लेकर रह रहे हैं, कि अपनी शिफ्ट में वे नींद के लिए अपना शरीर फैला सकें। अकूत मुनाफा कूटने के लिए मालिकों को मजबूर कमजोर वर्क-फोर्स चाहिए। जिससे जितना मर्जी काम लिया जा सके, उसका वेतन मार लिया जा सके, इसलिए प्रवासी मजदूर की बेबसी को भुना रहे हैं। स्मार्ट सिटी पर तो पूरे तंत्र की ताकत लग रही है, लेकिन लेबर कालोनी की उसमें कोई जगह नहीं है।

विकास का महात्म्य गाते विकास-पट्ट श्रमिक को चिड़ा रहे हैं। मानो वह देश का हिस्सा ही न हो। क्या कभी ऐसे पट्ट लगेंगे जिस पर गांव-मोहल्ले-कस्बे की समस्याएं लिखी हों, जो हरेक को संकट-समस्याओं के बारे में चेताए। सही है कि शासक अपनी लस्सी को खट्टा क्यों कहैंगे, लेकिन क्या लोग ऐसा कर पायेंगें। ‘सारी दुनिया मांगने’ के गीत गाने वाला श्रमिक-आंदोलन आज रोटी के लिए नहीं, बल्कि रोटी की एक बुरकी के लिए लड़ रहा है। कार्ड प्राप्त करना ही एक उपलब्धि के रूप में देखा जाने लगा है।

1 मई दुनिया की श्रम-शक्ति का वो पर्व है, जब वह अमेरिका के उन मजदूरों से प्रेरणा प्राप्त करके विकास में अपना योगदान आंकती है और अपने संघर्षों का मूल्यांकन करती है। श्रमिकों के संघर्ष सिर्फ अस्तित्व मूलक नहीं, बल्कि मानवीयता को स्थापित करने के संघर्ष हैं। मई दिवस की परंपराओं को सिर्फ औद्योगिक मजदूरों को ही नहीं, बल्कि किसानों को भी अपनाने की जरूरत है। वैश्विक पूंजीवाद के कू्रर पैर मजदूर और किसान दोनों की हथेली को कुचल रहा है।

अनाज की कोठियां भरने वाला किसान आज खुद अपने पेट में दाना डालने के जुगाड़ के लिए सड़कों पर है। आजादी के बाद भारत के सकल घरेलु उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी 54-55 प्रतिशत थी, जो 2012-13 तक आते-आते घटकर 13 प्रतिशत रह गई। जबकि कृषि में देश की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी रोजगार प्राप्त करती है। इसका अर्थ है कि खेती से रोजगार प्राप्त करने वाली 60 प्रतिशत आबादी की आमदनी केवल 13 प्रतिशत है। यह आंकड़ा किसानी पर घोर संकट को रेखांकित करने के लिए काफी है।

जब किसान का ही कचूमर निकल रहा है तो खेती में सबसे निचले पायदान पर स्थित खेत-मजदूर की हालात का अनुमान लगाना कोई राकेट साईंस नहीं है। सफेद मक्खी फसलों को चट्ट कर दे या सूखा-बारिस से फसलें तबाह हो जाए। फसलों की तबाही का असर सिर्फ किसान पर नहीं बल्कि मजदूर पर भी होता है। मंहगाई ने दाल-रोटी या गंठा-रोटी के मुहावरे से दाल-गंठा तो बाहर कर ही दिया है, अब संकट रोटी व पानी पर मंडरा रहा है।

अपने संकट को टालने के लिए किसान सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए तड़प रहे हैं, और आरक्षण को ही किसानी-संकट के निदान के तौर पर देख रहे हैं। आरक्षण के इस शोर में रोजगार की बात गुम हो रही है। सरकारी क्षेत्र में जब नौकरी निरंतर घट रही हैं।

हरियाणा प्रदेश बनने के पचासवें साल में होना तो चाहिए था–पिछले पचास सालों में खोये-पाये का लेखा-जोखा,  सामाजिक-सांस्कृतिक तरक्की का हिसाब-किताब। लेकिन यहां हिसाब लगाना पड़ रहा है कि आरक्षण प्राप्त करने के संघर्ष के दौरान कितने हजार करोड़ की संपत्ति स्वाहा हो गई।

लोग कहने लगे हैं कि वे वहीं पहुंच गए, जहां से शुरु किया था, लेकिन हमारे शासकीय नीति-निर्माता व सूरजमुखी के फूल सरीखे बुद्धिजीवी समस्याओं की पूंछ पकड़ते हैं और अमूर्त शब्दावली में एक रहस्य का निर्माण करता है। ये बुद्धिजीवी विकसित देशों द्वारा फेंके गए सोच के कूड़े के ढेर में से खाली डिब्बे-बोतलें चुनकर समाधान के तौर पर पेश कर रहा है। लेकिन विकास की हुआं-हुआं का शोर करके भी वे व्यवस्था की सच्चाई को ढक नहीं पा रहे।

कबीर ऐसे दार्शनिक लेखक हैं, जिंहोंने अपने समय के अंतविर्रोधों को अभिव्यक्ति दी। सामाजिक भेदभाव, धार्मिक पाखण्ड के खिलाफ लोगों को जागृत किया। वे साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल बनकर उभरे। कबीर ने समस्याओं का रहस्यीकरण नहीं किया था, बल्कि उनको ठोस व लौकिक धरातल पर ही परखा। जातिगत घृणा व साम्प्रदायिकता के परिवेश में कबीर एक ऐसे लेखक हैं जिनमें समाज की संवेदना को जगाने की क्षमता है।

सामाजिक भेदभाव, साम्प्रदायिक घृणा, धार्मिक पाखंड, सामाजिक लिंगभेद के बरक्स सामाजिक सद्भाव, साम्प्रदायिक सौहार्द्र, धार्मिक सहिष्णुता तथा लैंगिक संवेदनशीलता की स्थापना के लिए काशी के इस जुलाहे की चेतना को धारण करने की जरूरत है।

इस अंक में कबीर पर विशेष सामग्री दी गई है, जिसमें कबीर साहित्य मर्मज्ञ विद्वान डा.सेवा सिंह का विशेष आलेख है जो कबीर वाणी में ब्राह्मणवादी विचारधारा से संघर्ष के विभिन्न बिंदुओं को उद्घाटित करता है। साथ कबीर के लोकप्रिय व प्रासंगिक पद दिए गए हैं।

खेत मजदूरों के जीवन संघर्ष तथा विभाजन पर केंद्रित कहानियां हैं। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की दशा को व्यक्त करता मुकेश कुमार तथा विकास की दौड़ में पीछे छूट गए समुदायों पर अरूण कैहरबा का लेख है।

कुलदीप कुणाल,रोजलीन, रमणीक, अनुराधा बेनीवाल, हरनाम सिंह, भूप सिंह भारती, संतराम उदासी की कविताएं, सुरेन्द्र गाफिल की गजलें तथा मुनीशवर देव, राजेश दलाल की रागनियां अपने समाज की विभिन्न सच्चाइयों को अपने में समेटे हैं। प्रदेश में आगजनी-हिंसा के दौरान पीडि़तों के अनुभवों व हालात पर सुरेंद्रपाल सिंह और सुधीरमणीक के खाके तथा रामधारी खटकड़ की रागनी है।

आजादी मेरा ब्रांड की लेखिका अनुराधा बेनीवाल के साथ कुरुक्षेत्र विवि में जीवन्त संवाद की पूरी कार्रवाई है। शहीद भगतसिंह के बनने की पृष्ठभूमि के साथ क्रांतिकारी घटनाओं को अपने में समेटे हुए प्रो. जगमोहन का वक्तव्य है। शिक्षा में मूल्यांकन के सवाल पर लेख है, धमाचौकड़ी में मगजपच्ची के लिए हरियाणा की पहेलियां हैं। महिला-दिवस, शहीदी-दिवस, जोतिबा फुले व आंबेडकर जयंती पर विभिन्न स्थानों पर हुए कार्यक्रमों की संक्षिप्त रिपोर्ट है।

‘तेरा चुन्न तेरा पुन्न’ के भाव के साथ अंक जैसा भी है अब आपके समक्ष है। आपकी प्रतिक्रियाओं की पत्रिका को स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका है।

स्रोत – सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा 5, मई-जून 2016

 

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