डी.आर. चौधरी होने के मायने – सुरेंद्र पाल सिंह

2 जून को अलसुबह रोहतक से एक अजीज का फोन आया कि डी.आर. चौधरी का शायद इंतकाल हो चुका है। मेरे दिल ने तुरंत शायद को यकीन में बदल लिया क्योंकि कुछ अर्से से उनकी सेहत के हिसाब से इस बात का अंदेशा था। इसके बाद तो पत्रकारों व अन्य मित्रों के फोन की झड़ी लग गई।

डी.आर. चौधरी के लंबे सामाजिक जीवन के सैकड़ों पहलू हैं जिन पर अलग-अलग रूप से बहुत कुछ लिखा जा सकता है।लेकिन उनके बहुआयामी व्यक्तित्व पर मेरे व्यक्तिगत संस्मरण काफी कुछ कह पाएंगे इस उम्मीद से यह लेख लिखने का प्रयास किया गया है।

जीने का ढंग:

डी.आर. चौधरी अत्यंत गरीब परिवार से थे लेकिन पढ़ाई में तेज होने की वजह से उन्होंने संघर्ष करके एम ए तक की पढ़ाई टुकड़ों टुकड़ों में की। हिसार में बस अड्डे के पास तलाकी गेट है जो कभी पुराने शहर का एक बड़ा दरवाजा होता था। आज भी तोड़ दिए गए उस गेट की दाईं तरफ पहली मंजिल पर एक गोल खंडहरनुमा कमरा सा दिखाई देता है। वहां से गुजरते हुए वे बताते थे कि डीएन कॉलेज हिसार में पढ़ते हुए वह अपने कुछ सहपाठियों के साथ उस कमरे में रहते थे। अपने जीने के ढंग के बारे उनकी प्रेरणा का स्रोत ग्रीक दार्शनिक डायोजनिज़ था जिसके बारे अनेक किस्से उनकी जुबान से गाहे-बगाहे सुनने को मिल जाते थे। एक बार सिकंदर ने डायोजनीज़ को कुछ भी मांगने को कहा तो डायोजनीज़ ने जो धूप सेक रहा था सिकंदर से इतना ही मांगा की वह उसकी धूप के रास्ते से हट जाए। ऐसे कितने ही दृष्टान्त उनके साथ रहते हुए सुनने को मिलते थे जो साधारण लेकिन असाधारण होते थे। बहुत कम मित्रों को इस बात की जानकारी है कि डी.आर. चौधरी लंबे अरसे तक नए बुद्धिस्ट प्रकाशनों पर एक अंतर्राष्ट्रीय बुद्धिस्ट जर्नल में समीक्षा लिखते रहे थे। विपश्यना और ओशो का डायनेमिक मेडिटेशन का अभ्यास उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।

रोहतक में उनके निवास पर इतनी पुस्तकें हैं कि  एक कमरे और लॉबी में भी समाहित नहीं हो पा रही है। कई बार वे कहते थे कि रोहतक शहर में किताबों का इतना बड़ा संकलन किसी अन्य के पास नहीं है।  एच.पी.एस.सी. के सदस्य और चेयरमैन रहते हुए चौधरी देवीलाल ने कभी भी उन पर कोई दबाव नहीं डाला, क्योंकि चौधरी देवी लाल को विदित था कि ऐसा करना स्वीकार नहीं किया जाएगा। उम्मीदवारों को उनकी योग्यता के आधार पर नियुक्त किया गया ना कि उनके प्रभावी बैकग्राउंड के आधार पर। वे बताते थे कि किस प्रकार से एक बार राष्ट्रपति भवन की सिफारिश को भी उन्होंने दरकिनार कर दिया था। चंडीगढ़ में रहते हुए उनका आवास तो सरकारी था लेकिन तनख्वाह के हिसाब से बच्चों को पढ़ाना और गुजारा करना मुश्किल रहा। बच्चों के लिए साइकिल ही विलास की सामग्री थी। फरवरी 1990 में महम कांड को एक्सपोज करने और चुनाव को रद्द करवाने में उनकी मुख्य भूमिका साहस और जोखिम भरा काम था। ऐसे ही 1985 में जब ‘पींग’ अखबार में भजनलाल सरकार से जुड़े भ्रष्टाचार की रिपोर्ट छापने के बदले उन्हें झूठे मुकदमे में गिरफ्तार किया गया तो बिना घबराए कुछ पुस्तकें और कपड़े साथ लेकर पुलिस के साथ चल पड़े। जब पुलिस अधिकारी ने कहा कि इन चीजों की क्या आवश्यकता है जब  जमानत तो तुरंत मिल ही जाएगी तो उनका जवाब था कि उन्हें जमानत मांगनी ही नहीं है।

उनके लेख और पुस्तकें इस बात की गवाह है कि वे पक्के सेकुलर, समतावादी और उदारवादी सोच के व्यक्ति थे। उपेक्षित तबके और जनसाधारण उनकी सोच के केन्द्रबिन्दु थे। हरियाणा में बेहतर राजनीति और बेहतर संस्कृति के लिए उनके प्रयास सफलता और असफलता का मिश्रण रहे हैं। चौधरी देवी लाल को उन पर पूरा भरोसा था लेकिन ओमप्रकाश चौटाला को वे फूटी आंख नहीं सुहाए। चौधरी बंसीलाल के साथ मिलकर उन्होंने हरियाणा विकास पार्टी को ना केवल खड़ा किया बल्कि सत्तासीन करने में भी मुख्य भूमिका निभाई, लेकिन जल्द ही उनका मोहभंग हो गया। इसी प्रकार आम आदमी पार्टी के उभार में उनका विशेष उत्साह था जो लंबे समय तक नहीं टिक पाया। दिल्ली में अध्यापन करते हुए वे दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्ज़ एसोसीएशन में काफ़ी सक्रिय थे और उस वक़्त वामपन्थ से उनका सीधा जुड़ाव भी था। इन तमाम अनुभवों ने उनकी राजनीति के बारे समझ को अधिक गहरापन दिया ना कि निराशा का कारण।इस सम्बंध में एक उदाहरण देना मुनासिब होगा। सन 2011 में विधानसभा चुनावों से कुछ पहले पश्चिम बंगाल में घूमते हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में वामपंथी मोर्चे की बुरी तरह हार का अंदाज़ा लगा लिया था जिसके बारे मैं उनसे सहमत नहीं हो पा रहा था। लेकिन, जब चुनावों के नतीजे आए तो मुझे अहसास हुआ राजनीति के पारे को देख पाने की उनकी दृष्टि में ग़जब का पैनापन था। 

उनकी दो पुस्तकें विशेष रूप से चर्चित रही हैं। ‘हरियाणा एट क्रॉस रोड’ और ‘खाप पंचायत इन मॉडर्न एज’ जिसका हिंदी में ‘खाप पंचायतों की प्रासंगिकता’ शीर्षक से अनुवाद हुआ है। इन पुस्तकों की सामग्री और उनके विभिन्न लेखों में निहित विचार उनके दृष्टिकोण को समग्रता से समझने के माध्यम हैं। ऑनर किलिंग के विरोध में वे सशक्त रूप से खड़े रहे। राज्य में जितने भी ऐसे कांड हुए, डी आर चौधरी व्यक्तिगत रूप से वहाँ जाते थे और अपनी डायरी के नोट्स बनाते थे। खाप पर लिखी गई उनकी पुस्तक में ऑनर किलिंग के मामलों की एक लम्बी सूची दर्ज है। जाति/ गोत्र के नाम पर कबीलाई संस्कृति उनके विचार से हरियाणवी समाज के आगे बढ़ने में सबसे बड़े अवरोध हैं।

छात्र जीवन में सामाजिक गतिविधियों में रुझान के चलते भिन्न-भिन्न गतिविधियों में हिस्सा लेते हुए रोहतक स्थित मनमोहन और शुभा के घर अनेक बार जाना हुआ जहां लगभग रात भर पान-सुपारी, बीड़ी-सिगरेट और चाय के बड़े-बड़े रंग बिरंगे मगों के सहारे वैचारिक मंथन होता रहता था। इस मंथन की धुरी थे तीन व्यक्ति, जो ना तो धूम्रपान करते थे और ना ही पान-सुपारी का सेवन करते थे। केवल मात्र चाय की चुस्कियों के सहारे पूरी रात बहस मुबाहिसा करने वाली यें तीन खास शख्सियतें थी- डॉ. ओ. पी. ग्रेवाल, प्रो. सूरजभान और डी.आर. चौधरी। डी.आर. चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक होने के बावजूद अपने नाम के साथ प्रोफेसर शब्द चस्पा करने से परहेज करते थे। आमतौर पर बहस का मुख्य मुद्दा होता था हरियाणवी समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक बुनावट और इसमें प्रगतिशील परिवर्तन की संभावनाएं। अनेक अन्य मित्र भी इन गोष्ठियों में जुड़ते रहते थे और कभी कभार मैं भी लेकिन महज़ एक दर्शक की तरह जुड़ जाया करता था।

सन 1985-86 में दिल्ली में रहते हुए वहां विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की दीवारों पर काले रंग के पोस्टर दिखाई दिए जिसमें डी.आर. चौधरी को पुलिस के साथ हथकड़ी पहने हुए दिखाया गया था। बुद्धिजीवी तबकों ने इस बात का कड़ा प्रतिरोध किया कि एक पत्रकार को किस प्रकार झूठे मुकदमे में फंसा कर ‘पींग’ अख़बार में भ्रष्टाचार की स्टोरी छापने के बदले तंग किया जा रहा है। विरोध इस कदर हुआ कि भजनलाल सरकार को उन्हें बिना शर्त रिहा करना पड़ा।

छात्र जीवन के बाद बैंक अधिकारी के प्रोबेशन के दौरान सन 1988 में पानीपत में कुछ महीनों का ठहराव था तो वहां कुछ बस्तियों में अमानवीय स्तर की गंदगी और बदहाली के खिलाफ मेरी पत्नी गीता ने उन बस्तियों की महिलाओं की मोर्चाबंदी की तो उस सरगर्मी में कुछ स्थानीय मित्रों के साथ मिलकर एक कॉलेज या स्कूल के हॉल में राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों पर एक चर्चा का आयोजन किया गया जिसमें वक्ता के तौर पर डॉ. ओ पी ग्रेवाल और डी.आर. चौधरी आए थे। बीच बीच में उनसे प्रगति मैदान में वर्ल्ड बुक फेयर के दौरान कुछ हल्की फुल्की मुलाकातें हुई और हर मुलाकात के बाद यूं लगता रहा कि कभी उनके साथ फुर्सत और इत्मीनान के साथ बैठा जाए। 

सन 2009 में जब मेरा ट्रांसफर अमृतसर से चंडीगढ़ हुआ तो डी.आर. चौधरी उस वक्त बतौर हरियाणा प्रशासनिक रिफॉर्म कमीशन के सदस्य पंचकूला में हमारे पड़ोसी हो गए। धीरे-धीरे मिलने जुलने का सिलसिला इस कदर बढ़ गया कि कोई शाम ऐसी ना थी जब किसी ना किसी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधि के बहाने मुलाकात ना हो। रुचिका कांड के संदर्भ में हमारी पहल पर अनेक पब्लिक प्रोटेस्ट हुए, जिसमें चंडीगढ़ के 17 सेक्टर में एक बड़ा कैंडल मार्च भी शामिल है। डेमोक्रेटिक फोरम नाम के एक मंच के माध्यम से ना केवल भिन्न भिन्न प्रोटेस्ट में हिस्सेदारी होती थी बल्कि यह मंच बौद्धिक चर्चाओं का एक सक्रिय केंद्र बन गया था। यहां तक कि डी.आर. चौधरी की अगुवाई और सुझाव पर चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली के 17 सामाजिक संगठनों ने मिलकर ट्राइसिटी सोशल ऑर्गेनाइजेशन फेडरेशन (ट्राईसोफेड) की स्थापना पंजाब यूनिवर्सिटी के कैंपस में मिल बैठकर की, जिसके बैनर तले जनमुद्दों पर चंडीगढ़ में अनेक सामूहिक गतिविधियां आयोजित की गई।

पंचकूला-चंडीगढ़ में रहते हुए हमारी आपसी समझ और रुचियों का नतीजा था कि चंडीगढ़ स्थित टैगोर थियेटर में या कलाग्राम में या कहीं और मुश्किल से ही कोई ऐसा सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा जिसमें हम शामिल ना हुए हों। सरकारी गाड़ी का प्राईवेट प्रयोग उनके उसूल के ख़िलाफ़ था और ऐसे में घूमने फिरने के लिए मैं या मेरी पत्नी गीता उनके ड्राइवर होते थे।  

2013 में हरियाणा प्रशासनिक रिफॉर्म कमीशन की मियाद  पूरा होने के साथ ही डी.आर. चौधरी के सामने एक बड़ा सवाल था कि अब कहां जाकर बसा जाए, चंडीगढ़ या रोहतक? अभी तक लगातार टीवी चैनलों में जाना और चंडीगढ़ में अनेक सेमिनार और बौद्धिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हुए उनकी एक विशिष्ट माँग रहती थी। ऐसे में परिवार के सदस्यों और दोस्तों की कशमकश में उनकी स्पष्ट राय थी कि वे रोहतक को ही अपनी कर्मभूमि बनाकर वहीं पर ही रहेंगे।  उनका सपना था हरियाणा में सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव के लिए पूरा समय समर्पित करना।

रोहतक पहुंचते ही डी.आर. चौधरी ने राज्य में सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव की मुहिम के जुनून में मुझे भी रिटायरमेंट से 8 साल पहले नौकरी छोड़ कर हरियाणा इंसाफ सोसाइटी नाम के सामाजिक संगठन को खड़ा करने और उसमें काम करने के लिए रोहतक बुला लिया। इस संस्था को खड़ा करने के विचार के बीज मिर्चपुर में दलित उत्पीड़न और ऑनर किल्लिंग की बढ़ती हुई घटनाओं की पृष्ठभूमि में चंडीगढ़ में आयोजित किए गए एक सम्मेलन में अंकुरित हुए थे जिसमें सामाजिक सरोकार रखने वाले लगभग एक सौ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया था। इस संस्था के अंतर्गत अनेक बौद्धिक स्तर की गतिविधियां आयोजित की गई, विधानसभा चुनावों के लिए एक पब्लिक मेनीफेस्टो तैयार किया गया, भिन्न भिन्न मुद्दों पर सेमिनार रखे गए और राज्यभर की अनेक शिक्षण संस्थानों में उनको चर्चाओं के लिए बुलाया जाता था। लेकिन साल डेढ़ साल बाद ही डी.आर. चौधरी को स्किन की समस्या ने इतना बेचैन कर दिया कि उन्हें रात भर नींद नहीं आती थी।धीरे-धीरे इसी बीमारी ने मानसिक अवसाद का रूप ले लिया और इन परिस्थितियों में हरियाणा इंसाफ सोसाइटी को औपचारिक रूप से समेटना पड़ा। उसके बाद पिछले 5-6  वर्षों से डी.आर. चौधरी सामान्य स्वास्थ्य हासिल नहीं कर पाए।

एक यायावर

एक लंबे अंतराल के बाद सन् 2002 की गर्मियों में मैकलोडगंज की गलियों में उनसे आमना-सामना हुआ। चाय कॉफी के दौरान उन्होंने बताया कि वे लगभग हर साल गर्मियों में एक तिब्बतियन लाइब्रेरी और हॉस्टल में समय बिताते हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने कभी बाद में बताया कि एक बार वे लेह स्थित एक मॉनेस्ट्री में लंबे समय के लिए ठहर गए थे जहां उन्होंने भिक्षुओं को अंग्रेजी पढ़ाने की जिम्मेवारी ले ली थी। यह वह समय था जब मोबाइल फोन प्रचलन में नहीं थे और सामान्य दूरभाष सेवा भी सामान्य नहीं होती थी। उनके परिवार को इस दौरान उनकी घुमक्कड़ मिजाज़ के बारे में ज्ञान होने के बावजूद काफी चिंता में समय गुजारना पड़ा। इसी प्रकार बद्रीनाथ के दूर दराज़ के इलाक़ों में घूमने के दिलचस्प और साहसिक घुमक्कड़ी के किस्से उनकी जुबान से सुनने को मिलते थे। 

सन् 2012 में लेह में अंतरराष्ट्रीय बुद्धिस्ट कॉन्फ्रेंस मे हम डेलीगेट की हैसियत से शामिल हुए तो कॉन्फ्रेंस के बाद उनके घुमक्कड़ मिजाज के चलते हम पैंगोंग झील और अनेक ऐतिहासिक मॉनेस्ट्री देखते हुए खारदुंगला दर्रे को पार करके नुब्रा घाटी तक चले गए। इसी प्रकार उनके साथ सिक्किम में घूमते हुए नाथूला दर्रे तक जाना हुआ। हमारी भूटान यात्रा विशेष रुप से उल्लेखनीय है। आगरा और दक्षिण भारत में घूमते हुए जिंजी का किला उन्हें इतना रुचिकर नहीं लगा जितना कि पुदुचेरी का अरविंदों आश्रम।

उनके साथ घूमते हुए देखा कि नए इलाकों की सामाजिक सांस्कृतिक विशेषताओं को परखने की उनकी दृष्टि में विशेष पैनापन था। लद्दाख में लड़कियों की आजादी और युवक-युवतियों की मनपसंद शादियों ने उनको प्रभावित किया और पूरे लद्दाख भ्रमण के दौरान उनका प्रयास इस मुद्दे को ऐतिहासिक-सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से समझने का रहा। इसी प्रकार भूटान में प्रचलित हैप्पीनेस इंडेक्स ने उन्हें इतना आकर्षित किया कि थिंपू में सरकारी कार्यालय से हैप्पीनेस इंडेक्स  के बारे में कितने ही दस्तावेज इकट्ठे कर लिए। पुदुचेरी के अरविंदों आश्रम में उन्हें सबसे आकर्षक वहां की किताबों की स्टॉलें लगी। इस सिलसिले में यह दिलचस्प है कि डी.आर. चौधरी के आकर्षण बिंदु कुछ अर्से बाद किसी अखबार या पत्रिका में उनकी रचना के रूप में पढ़ने को मिल जाते थे। उदाहरण के तौर पर हैप्पीनेस इंडेक्स पर ‘द ट्रिब्यून’ में उनका लेख या मेवात के तावडू  में सांप्रदायिक तनाव पर हमारी टीम की रिपोर्ट के आधार पर उनका लेख, ना केवल दैनिक अखबार में बल्कि ‘मेनस्ट्रीम’ और ‘ईपीडब्ल्यू’ में भी पढ़ने को मिला।

क्यों आवश्यक है उनको याद करना:

हरियाणा राज्य में तेजी के साथ आर्थिक प्रगति हुई है लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक पिछड़ापन डी.आर. चौधरी और उनके चिंतक मित्रों के लिए एक चुनौती रहा है। उनके शब्दों में जातिवाद/ गोत्रवाद के नाम पर कबीलाई सोच, भ्रूण हत्या, बिगड़ता हुआ लिंगानुपात, ऑनर किलिंग आदि ऐसे झाड़ झंखाड़ हैं जिन्हें साफ किए बिना हरियाणा में एक स्वस्थ सामाजिक- सांस्कृतिक वातावरण पैदा करना मुश्किल काम है। इस संबंध में बंगाल का सामाजिक सुधार आंदोलन उन को प्रेरित करता था और बार-बार वे अपनी लेखनी से सामाजिक पिछड़ेपन को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हुए उन्हें निरुत्साहित करने के लिए वे नए औज़ारों को ईज़ाद करने और उनको प्रभावी बनाने के विमर्श को बढ़ावा देते थे।

हमारी जिम्मेवारी:

डी.आर. चौधरी, प्रोफेसर सूरजभान और डॉ. ओ. पी. ग्रेवाल ने सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन की एक मुहिम शुरू की थी।बारी बारी से तीनों विचारक हम से जुदा हो चुके हैं, लेकिन उनकी बौद्धिक संपदा हमारे लिए एक महत्वपूर्ण विरासत है। उनकी विचार श्रृंखला को आगे बढ़ाना प्रत्येक संवेदनशील और प्रबुद्ध व्यक्ति की नैतिक जिम्मेवारी है। कुरुक्षेत्र में स्थित डॉ. ओ. पी. ग्रेवाल संस्थान अन्य वैचारिक संस्थाओं के साथ मिलकर इस दिशा में प्रयास कर पाए तो ही डी.आर. चौधरी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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