निंदा-रस – हरिशंकर परसाई

निंदा कुछ लोगों की पूंजी होती है। बड़ा लंबा-चौड़ा व्यापार फैलाते हैं वे इस पूंजी से। कई लोगों की ‘रिस्पेक्टेबिलिटी’ (प्रतिष्ठा) ही दूसरों की कलंक-कथाओं के पारायण पर आधारित होती है – निंदा रस से

भोला राम का जीव हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मक कहानी

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