जापान में क्या देखा – श्री भदंत आनंद कौसल्यायन

किसी भी व्यक्ति के परिचय के लिए उसके साथ दीर्घकालीन सहवास आब श्यक है और किसी भी देश के परिचय के लिए वहाँ दीर्घकालीन निवास जापान में अपना न दीर्घकालीन निवास ही रहा और न कुछ कहने-सुनने लायक सामाजिक जीवन ही। तो भी दो-चार बातें सुनिए ।

जापान में बच्चे का नामकरण उसके पैदा होने के सातवें दिन किया जाता है। जापानियों की धारणा है कि जैसा नाम वैसा भविष्य, इसलिए आजकल विशेषज्ञ व लोग बच्चों का नाम खूब अच्छे-अच्छे और खूब चुन-चुनकर रखते हैं। कभी-कभी तो वे इतने दुरूह हो जाते हैं कि उनका उच्चारण और लेखन स्वयं बच्चों के लिए मुसीबत हो जाता है।

घर में बच्चा न हो तो ‘गोद’ ले लिया जाता है। कभी-कभी घर में बच्चा रहने पर भी बच्चा गोद लिया जाता है। पिता चाहता है कि उनकी बिटिया घर में ही रहे। वह किसी बच्चे को गोद लेकर उसी से उसकी शादी कर देता है।

जीवन की परिभाषा – आजकल लोग कुर्सी और मेज को सामाजिक पूर्ति मानते हैं। जापान में सामाजिक जीवन की देवी है ततमी अर्थात् चटाई ततमी का जापानियों के घरेलू जीवन पर बड़ा ही प्रभाव है- उनके उठने-बैठने से लेकर उनके घर की सजावट तक। लोग ततमी पर बैठते हैं तो हिन्दुओं की तरह पालथी मारकर नहीं, बल्कि कुछ-कुछ वैसे ही जैसे मुसलमान भाई नमाज पढ़ते समय । नई ततमी बड़ी मनोरम, सुन्दर और भीनी-भीनी खशबू देती है। जापानियों की कहावत भी है कि पत्नी और ततमी दोनों नई ही अच्छी लगती हैं। जापान में बच्चे के जन्म के एक सौ बीस दिन बाद उसके मुंह में कुछ खाद्य डाला जाता है। इसे आप जापानी बच्चों का अन्नप्राशन संस्कार कह सकते हैं । जापानियों का विश्वास है कि इस संस्कार के प्रभाव से बच्चा स्वस्थ रहेगा,मोटा-ताज़ा रहेगा और उसे कभी भोजन का अभाव न होगा।

जापानी जब स्कूल जाने लगते है तब चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं, ‘इत्ते मिम अर्थात् मैं जा रहा हूँ। वापस लौटने पर ‘तंदम्मा पैथि’ अर्थात् अभी आया बच्चों की बात चल रही है, लगे हाथ उनके सबसे बड़े आकर्षण की बात भी कह दें। वह है कमिशीबाई । कमिशीबाई किसी स्त्री का नाम नहीं है । मशीबाई आया नहीं कि बच्चे अपने-अपने घरों से निकलकर चौरस्ते पर इकट्ठे हुए नहीं। कमिशीबाई अपनी साइकल पर एक लकड़ी का चौखटा लगा लेती है। उसके पास एक बक्स भी रहता है जिसमें खट्टी-मीठी मिठाई रहती है। मिठाई खरीदने वाले बच्चे तमाशा देखने के समय प्रथम पंक्ति में खड़े रहने के अधिकारी होते हैं। कमिशीबाई एक के बाद दूसरी तस्वीर उस चौखटे में लगाता जाता है और दूसरी ओर से निकालता जाता है। वे तस्वीरें जो कहानी कहती हैं, यही कहानी यह कमिशीबाई भी सुनाता जाता है। इसे बच्चों का चलता-फिरता होता सिनेमा ही समझिए। बच्चों को अजहद पसन्द माता-पिता को प्रायः हो नापसन्द कारण स्पष्ट है। कमिशीबाई के आने पर बच्चे माता-पिता पैसों के लिए जो हैरान करते हैं !

पुलिस तक इन कमिशीबाइयों पर नजर रखती है, न जाने कैसी क्या कहानी हुरा जाएं। अद्भुत प्रचारक होते हैं ये। मिठाई और शिक्षण साथ-साथ ।प्रत्येक जापानी के घर में देव-स्थान जैसा एक स्थान रहता है जो धार्मिक न होने पर भी आदूत होता है। अतिथियों में प्रधान अतिथि को सदैव इसी आदृत से ठीक सामने उसी की ओर पीठ करके बैठना होता है।

दो आदमी खड़े हों तो जो दर्जे में नीचा हो, उसे बाई ओर खड़ा होना होता । जापान में दाई ओर ही सम्मान का स्थान है। जब पुरुष और स्त्री साथ-साथ ते है तो स्त्री को सदैव पति के बाईं ओर बैठना होता है। घर के मालिक को का पहला स्थान मिलना ही चाहिए।उठने-बैठने की यह व्यवस्था पर्याप्त प्राचीन है। राजा हमेशा दक्षिण की ओर बैठता है, क्योंकि दक्षिण दिशा सम्माननीय है।

बहुत देशों और वहां के लोगों के बारे में कहा जाता है कि जैसा देश वैसे यह कहावत जापानियों पर सबसे ज्यादा घटित होती है। लगता अपने देश के लिए ही बने हैं और उनका देश भी ठीक उन्हीं के लिए ।

जापान में एक फ्युजी पर्वत को छोड़ शायद सभी चीजें छोटे आकार की है। स्वयं जापानी तो हैं हीं । विदेशी यात्री को जापान में जो चीज सबसे पहले खटकती है, वह है जापानियों की रुचि। रेल में सोने की जगह इतनी छोटी कि कोई जरा भी लम्बा ..आदमी पैर फैलाकर न सो सके। हाथ-मुँह धोने के बरतन इतने नीचे कि हर किसी को दुहरा होना ही पड़े । जापानी घरों में मेज़-कुर्सी तो होती ही नहीं। खाने की चौकी चार इंच ऊंची।

आदत स्थान में रखा हुआ बीना पेड़ नीचे से ऊपर तक ज्यादा से ज्यादा अठारह इंच ऊंचा। घर में जिस पिछवाड़े को हम निकम्मा समझकर छोड़ देंगे उसी छोटी-सी जगह में जापानी एक छोटा-सा बाग लगा लेंगे जिसमें तालाब होंगे, नदियां होंगी, पुल होंगे, लैम्प लगे होंगे और बौने पेड़ों का एक जंगल होगा।

“आदमी को लगने लगता है कि प्रसिद्ध अंग्रेजी कथा ‘गुलिवज’ ट्रेवल्स’ का गुलिवर लिलिपुत में पहुंच गया। सातवीं शताब्दी के मध्य से जापान निहोन कहलाता है जिसका मतलब है।सूर्योदय का देश । कौन-सा देश सूर्योदय का देश नहीं हैं ? जो देश हमसे कुछ पश्चिम में हैं उनके लिए भारत भी सूर्योदय का ही देश है। हां, तो इस सूर्योदय के देश में आदमी के लिए जो सबसे अधिक लज्जा की बात है, वह है म्युसक्योनो रह जाना, जिसका मतलब होता है, रजिस्टर्ड न होना। इस तरह का व्यक्ति न किसी स्कूल में प्रवेश पा सकता है और न उसे कोई नौकरी ही मिल सकती है।

जापान में रजिस्ट्रेशन की पद्धति अत्यन्त विकसित है। सभी जापानियों को शहर, नगर अथवा गांव के आफिस में रजिस्टर्ड होना ही होता है। जब तक रजिस्ट्री न हो तब तक न किसी के जन्म का कोई कानूनी मूल्य है, न शादी का न तलाक का, न मृत्यु का, और न स्थान परिवर्तन का। यदि किसी को अदालत में कोई सजा मिलती है, तो वह भी रजिस्टर में दर्ज होती है ।

पहले प्रत्येक सामुराई अथवा सामरिक जाति का मुखिया किसी न किसी बौद्ध सम्प्रदाय में रजिस्टर्ड रहता था और प्रत्येक परिवार किसी न किसी बौद्ध मन्दिर में। जो परिवार रजिस्टर्ड रहे हैं, उनके सदस्यों का यह अधिकार रहा है, कि मरने पर उन मन्दिरों के पुजारी आकर उनका श्राद्ध कराएं और उनके शव को मन्दिर श्मशान भूमि में स्थान मिले। रजिस्टर्ड सदस्यों से भी यह आशा रही है कि वे भी मन्दिर के खर्च में सिद्ध हों।

किसी के विवाह-संस्कार से बौद्ध पुजारियों को प्राय: कुछ लेना-देना नहीं। रहा। इधर वे भी मन्दिरों में होने लगे हैं। हां, किसी के घर में शोक हो जाए तो के दाह-संस्कार के समय सूत्रपाठ किया जाता मृत व्यक्ति जापान में बौद्धों का, जो जापान की जनसंख्या के 70 प्रतिशत कहे जाते हैं, अग्नि-संस्कार ही होता है। उनकी भस्म का कुछ हिस्सा दाह-क्रिया की जगह पर रहता है, लेकिन कुछ हिस्सा मन्दिर में भी लाकर रख दिया जाता है। प्रतिवर्ष 15 जुलाई को जापान-भर में मृत व्यक्तियों का श्राद्ध मनाया जाता है। मृत पूर्वजों, सम्बन्धियों, मित्रों और विशेष रूप से पहले एक वर्ष में ही जो अपने सम्बन्धियों को छोड़कर चले गए हैं, ऐसे लोगों के लिए घरों तथा मन्दिरों दोनों जगह सूत्रपाठ किए जाते हैं । पूर्वजों को अर्पित किए गए फल-फूल दूसरे दिन किसी समीप की नदी अथवा समुद्र की भेंट चढ़ा दिए जाते हैं।

परस्पर एक-दूसरे की सहायता के लिए जापान में एक प्रथा प्रचलित है जो म्युजिन कहलाती है। मंडली के प्रत्येक सभासद का कर्तव्य है कि हर महीने मंडली सामूहिक कोष में एक निश्चित रकम डाले। यह मियाद दस महीने से तीस महीने तक की हो सकती है। जिस समय सभी सदस्य अपना-अपना हिस्सा डालने लिए एक जगह एकत्र होते हैं, उसी समय पर्ची भी डाली जाती है। जिस भाग्य वान के नाम की पर्ची निकल आती है उसी को वह सारी इकट्ठी रकम एक साथ मिल जाती है। यदि किसी को अधिक आवश्यकता हुई तो वह भाग्यवान् सदस्य को कुछ देकर उससे वह अधिकार खरीद लेता है। बारी-बारी से सभी सदस्यों को बराबर रकम मिल जाने के बाद वह क्रम फिर चालू कर दिया जाता है । यह

आपसी सहयोग-क्रम अनन्त काल तक चालू रह सकता है। में शायद ही कोई उनका मुकाबला कर सकता है। शादी-विवाह जैसे महत्त्वपूर्ण जापानियों में आपस में भेंट का बड़ा ही रिवाज है। भेंट लेने-देने के मामले अवसरों पर तो सभी देशवासी प्राय: एक-दूसरे को भेंट देते ही हैं, परन्तु जापानी
तो ऐसे अवसरों पर भी भेंट देते हैं, जैसे नये मकान के बनने पर, नया पता बदलने पर, नई नौकरी लगने पर काम से तो नहीं, किन्तु यदि यों ही किसी के यहां जाना हो तो खाली हाथ जाना न होगा और उसका भी धर्म है कि खाली हाथ न लौटने दे । अध्यापक, गुरु और वैद्य – इन तीनों पर यह पावन्दी लागू नहीं। वे बिना बदले में कुछ भी दिए कोई भी भेंट स्वीकार कर सकते हैं।

कुछ न कुछ भेंट देते रहना जापानियों की प्रकृति का एक अंग बन गया है। अपरिचित लोगों तक को कभी-कभी काफी मूल्यवान चीज़ों भेंट में दे दी जाती है। दाताओं का आनन्दित होना ही एकमात्र कारण समझ में आता है। जापान जाते समय मेरे अपने पास कुल 60 पौण्ड सामान था। लौटा तो 150 पौण्ड हो गया जापानी मित्रों की इसी प्रवृत्ति की कृपा से।

जापानियों में एक प्रथा है जो एक दृष्टि से अच्छी भी लगती है। जब कोई परिवार देखता है कि वह कर्जे के भार से इतना ऊब गया कि अब उसके चुका सकने की कोई आशा नहीं, अथवा परिवार के सदस्य से कोई ऐसी गलती हो गई। जिससे परिवार की इज्जत में स्थाई रूप से बट्टा लग सकता है, तो उस परिवार के सदस्य रातो-रात अपना सब सामान समेटेंगे और किसी को भी बिना कुछ पता दिए किसी अज्ञात स्थान के लिए निकल पड़ेंगे। यह प्रथा योनिगे’ कहलाती है, जिसका अर्थ है रात्रि-निष्क्रमण ।

निराश-प्रेमी युगलों की आत्म हत्याएं अतीत की मनोरम कथाएं बन गई हैं। अब कोई ‘हर-किरि’, पेट फाड़कर आत्महत्या भी नहीं करता। किसी समय ये दोनों बातें भी जापानी जीवन की खासियतें थीं।

एक खास पारिवारिक और सामाजिक संस्था है जो कदाचित जापान में ही है। यह ठीक-ठीक भारतीय आश्रम व्यवस्था का वानप्रस्थ आश्रम भी नहीं। कोई भी आदमी स्वेच्छा से परिवार के मुखियापन और समस्त कार्यभार से मुक्त हो जाता है। वह और उसकी भार्या दोनों इंक्यो कहलाते हैं।

जापानियों का सामान्य पेय है चाय, जिसमें न चीनी और न तिब्बतियों की. तरह नमक ही। इसके बाद दूसरे नम्बर पर है साके, चावल की सुरा जापान में पीकर गर्क हो जाने में कोई बुराई नहीं मानी जाती। यहां तक कि यदि आप किसी खास अवसर पर किसी के मेहमान हैं, और पोकर गर्क नहीं.
होते तो मेजबान को अच्छा नहीं लगता।

एक ओर तो जापानियों की चाय बिना चीनी के होती हैं और वे विशेष मिठाई-प्रिय भी नहीं होते; तो भी आश्चर्य है कि उनकी काफी सब्जियां क्यों चीनी में पगी होती हैं। प्याज चीनी में पगा हुआ। यह चीज़ जापान में ही खाने को मिलेगी । जापानियों का मानस अनेक सुन्दर-सुकोमल कथाओं के झीने-झीने तारों से बना हुआ है। एक लघु कथा इस प्रकार है :

एक आदमी था, जिसके दो ही काम थे—या तो मां की सेवा करना या बाग के फूलों की। समय पाकर उसकी माता का देहान्त हो गया। उसका दिल भारी हो गया। वह बाग में घूम रहा था। उसने देखा, बाग के फूलों की पंखुड़ियां बिखर-बिखरकर जमीन पर आ रही हैं। वह साधू हो गया और भी एकाकी ।

एक रात उसकी कुटी के दरवाजे पर ठक-ठक हुई। दरवाज़ा खोला। एक स्त्री खड़ी थी। संकोच और भय के साथ उसने उसे अन्दर आने दिया। बुढ़िया एक भिक्षुणी थी, सफेद वस्त्र पहने। उसके बाद तरुणियां आईं। एक से एक बढ़कर सुन्दर लिबास पहने।साधक ने सभी को बौद्ध धर्म का उपदेश दिया, वे प्रभावित हुईं। उनकी आंखें सजल हो आईं। वे जाने को हुईं ।साधक ने कहा, “अपना परिचय तो देती जाओ।” “हम उन्हीं फूलों की पंखुड़ियां हैं, जिन्हे तुम इतने दिन अपने बाग में प्रेम पूर्वक सींचते रहे।”

मैं जापान में महीना-भर रहा। दो-तीन चीजें नहीं देखीं- रोते हुए बच्च नहीं देखे, झगड़ती हुई स्त्रियां नहीं देखीं, मांस-मछली की दुकानों पर भी मक्खिय नहीं देखीं।

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