पुरुष और परमेश्वर – रामवृक्ष बेनीपुरी

रामवृक्ष बेनीपुरी

पुरुष और परमेश्वर में महत्ता किसको यह विवाद आज का नहीं, आदि युग से चला आ रहा है। एक पक्ष ने कहा-मैं ही सब कुछ हूँ, और संसार मेरा है। दूसरे ने कहा- यदि वह कहीं हो भी, तो वह मैं ही हूँ। और तीसरे ने आत्मार्पण किया- जो कुछ हो, तुम्हीं हो! तुम्हारी शरण हूँ, चाहे जो उपयोग करो।

भक्त ने कहा- भगवान ने अपने रूप में मनुष्य का निर्माण किया।

दर्शन ने कहा- मनुष्य ने अपने रूप में भगवान की रचना की।

जब मनुष्य ने सपनाना सीखा, ईश्वर का प्रारम्भ तभी से हुआ। ज्यों-ज्यों सपनों में वृद्धि हुई, भगवान की महत्ता में भी वृद्धि होती गई।

सपने धुँधले पड़ रहे हैं; भगवान भी धुंधला पड़ता जा रहा है।

सपनों में परिवर्तन;- भगवान में परिवर्तन।

अतीत काल के मानव को एक भगवान से सन्तोष नहीं था वह अनेक भगवान खोजता रहा।

उसने अनेक भगवान खोजे-उसे अनेक भगवान मिले।

पृथ्वी की नन्ही दूब से लेकर आकाश इन्द्रधनुष तक में भगवान – भगवान ही दिखे।

भगवान के पीछे वह इतना पागल हुआ कि अर्द्धचेतन अवस्था में उसने अपने को भगवान ही मान लिया। उसके भगवान बने उसके वे विश्वास; जिनके बिना वह जी नहीं सकता था।

उसके भगवान बने उसके वे भय, जिनसे बढ़कर स्थूल सत्य उसे और कुछ नहीं मालूम होता था। भगवान को आदमी ने बनाया, यह कहना उतना ही ग़लत है; जितना यह सुनना कि भगवान ने आदमी को बनाया। आदमी हमेशा भगवान की खोज में रहा है, और हमेशा उसकी खोज में रहेगा।

भगवान एक सपना है।

भगवान एक आकाँक्षा है, जिससे मानव जीवन ओत-प्रोत बना है।

जीवन एक सपना है, जिससे हम-तुम ओत-प्रोत हैं।

अपने सपने का ही नाम हमने आत्मा दे रखा है।

इसीलिए आत्मा हमेशा भगवान का सपना देखती रहती है।

जैसा आत्मा का सपना, उसी रूप का उसका भगवान।

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ध्यानावस्थित होकर, एकान्त में; मानव खड़ा था अपने संसार को भूला हुआ। अपना संसार-वह आप भी उसे समझ नहीं सकता था। विस्मय में, प में वह चिल्ला उठा –

‘भगवन्! मेरी सहायता करो। तुम्हारे बिना मेरा सहायक कौन है? मुझे ज्ञान दो- क्योंकि तुम्हीं ज्ञान के आगार हो! प्रकाश दो-क्योंकि तुम्हीं तो प्रकाश-पुंज हो।

मानव चिल्लाता रहा; भगवान चुप रहा।

मानव ने खेती प्रारम्भ की। बड़े जतन से, श्रम से, उसने खेत जोते; किन्तु वर्षा हो नहीं रही थी, वह चिल्ला उठा –

‘भगवान्, भगवान मेरी सहायता करो। अपने बादलों को मेरे खेत में बरसने की आज्ञा दो।”

उत्तर में सूखी झंझा बहती रही।

मानव ने युद्ध भूमि के चक्र-व्यूह में अपने को प्रतिद्वन्द्वी मानव के सामने पाया। भय से वह चिल्ला उठा –

“भगवान, भगवान, मेरी सहायता करो। इस नर-पिशाच के सम्मुख मेरी रक्षा करो, मुझे विजयी बनाओ। रघुवर, तुमको मेरी लाज!”

युद्ध-भूमि में रुंड-मुंड बिखरे थे – वीरों की लोथ पर चील-कौवे भोज मना रहे थे।

आत्मा के स्वप्न देखने वालों को परमात्मा इन्हीं रूपों में प्राप्त होते रहे हैं।

यदि कभी वर्षा हो गई: विजय मिली-तो फिर स्वप्न को सत्य क्यों नहीं मान लिया जाए। भगवान तुम महान हो। भगवान मेरे रक्षक हैं फिर डर किसको?” “राखनहार भये भुज चार तो का होई हैं दो भुजा के बिगारे?”

प्रार्थना! यज्ञ यज्ञ प्रार्थना!

भगवान में मानव इतना भूला कि वह मानव को ही भूल गया। पुराने पैगम्बर ने चिल्लाकर कहा –

‘खुदा ने कहा- उस आदमी पर अभिशाप, जो आदमी पर विश्वास करता है और जिसका हृदय भगवान से अलग रहता है।”

आदमी पर अविश्वास, भगवान में विश्वास। किन्तु जब आदमी पर विश्वास नहीं, तो भगवान पर कैसे विश्वास हो? क्योंकि भगवान और आदमी आखिर एक ही सिक्के के दो रूप हैं न!

मानव-कल्पना का ही रहस्यवादी प्रतीक है भगवान की कल्पना विशुद्ध भगवान का अर्थ है, विशुद्ध मानव।

स्वप्न भगवान का अर्थ है, स्वप्न-मानव।

सर्व सत्ताधारी भगवान वह निरंकुश राजा है, जो प्रजा का उत्पीड़न या शोषण करता है।

सर्वज्ञ भगवान वह पुरोहित है, जो जनता के अज्ञान पर अपना व्यापार चलाता है।

राजनीति में भगवान का काम षड्यन्त्र करता है; सम्पत्ति में भगवान का काम अधिकाधिक को दरिद्र बनाना है।

मानव ने भगवान को अपने से महान कभी नहीं बनाया।

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मानव ने महान और सुन्दर भगवान बनाये हैं-इससे मानव की महान और सुन्दर शक्तियों को पता चलता है।

जब मानव आँधी, अन्धकार या प्रकाश की अभ्यर्थना या उपासना करता था, वह अपने प्रति ज्यादा ईमानदार था, वह अधिक सरल था, उसके ज्ञान पर पर्त नहीं पड़ी थी।

जब उसने इन में देवत्व या ईश्वरत्व की कल्पना की, वह भूल-भुलैया में फँसा।

जब तक मानव मस्तिष्क कल्पना के फेर में है, हर पदार्थ उसके सामने काल्पनिक रूप पकड़ कर आया करता है। मानव-चक्षु से पर्दा हटने दीजिए; वह सब कुछ स्पष्ट देखने लगेगा। मानव-मन जब स्वाभाविकता को स्वभावत: ग्रहण करने में सक्षम हो जायेगा, सभी काल्पनिक देव आप-से-आप काफूर हो जायेंगे।

मानव विचार में असीम बल है। आदमी जैसा सोचता है, संसार को उस के अनुरूप ढलना होता है। वह संसार को अपने निकट बुलाता है, उस पर अपन मंत्र पढ़ता है, संसार उसके सामने करबद्ध प्रार्थी होता है। अपने विचार-बल से मानव संसार की सृष्टि करता है।

जब तक मानव स्वयं मानव के संहार में लीन हैं, वह ऐसे भगवान क सृष्टि करेगा ही, जो संसार का संहारकर्त्ता है। कर्त्ता और भर्त्ता के रूप में भी वह भगवान बनाता है; कर्त्ता, वह जो नब्बे अभागे और दस भाग्यवान की सृष्टि करे भर्त्ता, जो गरीबों का पालन करे, जिसमें वे धनियों के पैर दबावें।

समाज के विचार ही भगवान के विचार हैं। समाज की आत्मा ही भगवान की आत्मा है- जनता का दृष्टिकोण ही भगवान को दृष्टिकोण हुआ करता है। भगवान निर्माता के रूप में मानव ने अपनी अपरम्पार प्राकृतिक शक्ति क परिचय दिया है।

अब वह मानव-निर्माता के रूप में अपने कौशल का परिचय दे।

अब मानव, मानव की उपासना करे, मानव की वन्दना करे। भगवान की स्तुतियाँ बहुत हुई; हमारी कविता और गीत अब मानव की अलिखित यशोगाथ को छन्दोबद्ध करें। मानव की खोज में मानव को साधना दौड़े-उच्च्छ्वसित चंचल, क्रियाशील मानव मस्तिष्क अपने ही लिए अपने पुष्पित और फलित करे

शोधक, अन्वेषक, कवि और दार्शनिक मानव ने राह चलते कितने देव और ईश्वर बनाये। अब वह अपने लक्ष्य के निकट आ पहुँचा है, वह मानव का निर्माण करे!

मानव, जिसकी शक्तियों के समक्ष छप्पन कोटि देव और दवादिदेव भगवान ही नत मस्तक हों!

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हम फिर सपने देखें सपना देखना कोई लज्जा की बात नहीं।

आज की दुनिया में बहुत से सपने देखने को हैं-नये सुनहले सपने हमें एक नवीन सौन्दर्य का सपना देखना है- नये दिन और उसके नूतन कर्तव्यों के, उसके नये प्रयत्नों और नये साहसों के सौन्दर्य का सपना देखना है। हमे लज्जित नहीं होना है। लज्जित नहीं होना ही, नये मानव के लिए एक नई कला है। लज्जित नहीं होना ही, उस नये संगीत का शिलान्यास देना है, जो मानव हृदय के स्वाभाविक उच्छ्वासों का प्रतीक होगा।

मानव की शक्ति के तीन सपने हैं
काम करने का सपना;
रात का सपना;
छलना का सपना;

इन सपनों में एक ही अमर सपना है- काम करने का सपना। सृजनात्मक शक्ति का यही सच्चा सपना है। इस सपने का ही नाम जीवन है।

चाहिए ऐसा सरल स्वभाव मानव,
जिसमें सरल साहस हो;
मानव, जिसमें सरल धुन हो;
मानव, जिसमें मानवोचित अनुभूति हो;
मानव, जो सीधा देखे;
मानव, जो सीधा सोचे;
सरल मानव, जो सीधा काम करे!

चाहिए जीवित मानव-जो हमें मृत्यु से बचावे परमात्मा की ओर हमने बहुत देखा, अब अपने पुरुषार्थ की और देखें।

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