डॉक्टर महावीर नरवाल

डॉक्टर महावीर नरवाल अपनी बेटी नताशा के साथ

जीवन के संग्राम और समाज बदलने के संघर्ष में कभी हार न मानने वाले डॉक्टर महावीर नरवाल सांसों की लड़ाई हार गए। उन्होंने रोहतक के पोजीट्रॉन अस्पताल में 9 मई को शाम 6:30 बजे आखिरी सांस ली और इस दुनिया को अलविदा कह गए। 3 मई की दोपहर उनके बेटे आकाश और दो मित्रों ने उन्हें हस्पताल चलने का आग्रह किया और उन्होंने तुरंत सहमति दी और मुस्कुराते हुए चल दिए अस्पताल की ओर। शायद यह उनकी आखिरी मुस्कान थी। इसमें आत्मविश्वास था अस्पताल से ठीक हो कर लौट आने का, लेकिन कोरोना ताकतवर निकला और डॉ नरवाल 71 वर्ष (जिसमें से लगभग 50 वर्ष उन्होंने साहसिक और संघर्षशील सामाजिक जीवन को दिए) की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गए। उनका जीवन विषेशकर युवा लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत की तरह है। आइए, उनके जीवनका संक्षिप्त परिचय जानें :

छात्र जीवन


डॉ महावीर नरवाल का जन्म 1 नवंबर 1949 को हरियाणा के ज़िला सोनीपत के गांव बणवासा में हुआ था। वे अपने पिता सूबेदार श्री प्रताप सिंह और माता श्रीमती फूलवती की पहली संतान थे। उन्होंने हाई स्कूल तक की शिक्षा जनता बुटाणा (तहसील गोहाना) गांव के सरकारी स्कूल से प्राप्त की। तत्पश्चात् सन् 1970 में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार (वर्तमान में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय) में बीएससी (कृषि ऑनर्स) में दाखिला लिया और गोल्ड मेडल प्राप्त किया। एमएससी में प्लांट ब्रीडिंग के विषय को चुन लिया और इसी विषय से हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से ही पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। छात्र जीवन में छात्रों के हितों के लिए होने वाले संघर्षों के प्रति उनका रुझान बढ़ा और हरियाणा छात्र संगठन के सक्रिय सदस्य बन गए। छात्रों की लड़ाई लड़ते हुए अनेक छात्रों के प्रेरणा स्रोत बन गए। उस समय तक हरियाणा छात्र संगठन के पास संघर्ष की क्षमता तो थी परंतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास नहीं हुआ था और न ही कोई विश्व दृष्टि विद्यमान थी। इस कार्य में डॉक्टर महावीर नरवाल अकेले नहीं थे। उन्हें इंद्रजीत सिंह की वैचारिक और सांगठनिक समझ और कौशल का साथ भी हासिल हुआ। दोनों छात्र व्यापक जीवन दृष्टि को समझने के प्रति भी आकर्षित हुए। इन कोशिशों के फलस्वरूप उनकी समझ छात्र संघर्षों को समाज परिवर्तन की सोच के साथ जोड़ गई। इस कारण उन्हें कुछ उदारवादी विचारों वाले प्राध्यापकों और प्रशासनिक अधिकारियों का साथ भी मिला और यहां तक की मदद भी मिली कि वह आपात्काल के दौरान पुलिस की पकड़ से कुछ दिनों तक बचते रहे लेकिन आखिरकार उन्हें पकड़ लिया गया और लगभग 1 साल तक जेल में रखा गया। इसी समय डॉ महावीर नरवाल के संपर्क में आए डॉक्टर सतीश कालरा बताते हैं कि महावीर नरवाल और वे स्वयं उच्च कोटि की पुस्तकें पढ़ने लगे थे। इन पुस्तकों में देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय, दामोदरन, मौरिस कॉनफोर्ड और शिव वर्मा जैसे प्रख्यात लेखकों की पुस्तकें नियमित रूप से पढ़ते और उन पर चर्चाएं भी करते थे। इन प्रक्रियाओं से डॉ महावीर नरवाल की संघर्ष करने की चेतना का विस्तार हुआ और विश्व दृष्टि बनती चली गई।

शिक्षक के रूप में


छात्र जीवन में अध्ययन और संघर्ष करते हुए डॉ महावीर नरवाल ने शिक्षक बनने की राह चुनी। पौध प्रजनन विषय में अध्यापन करते हुए उन्होंने बाजरे की नई किस्म तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे इस दौरान अपने छात्रों के साथ-साथ प्राध्यापकों में भी लोकप्रिय हो गए थे। वरिष्ठ प्राध्यापकों के साथ ही उनका मेलजोल रहता था। वह विश्वविद्यालय अध्यापक संघ के अध्यक्ष पद पर भी रहे। उनके सहयोगी डॉक्टर कालरा बताते हैं कि उन दिनों फैकल्टी का व्यवहार जाति-आधारित होता था। टीचर्स एसोसिएशन का जनतन्त्रीकरण करने में डॉक्टर नरवाल की खास भूमिका रही। अध्यापन कार्य के साथ-साथ उन्होंने शोध कार्य में बाजरे की नई किस्म की खोज करके उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

अभिभावक के रूप में


डॉ महावीर नरवाल का विवाह सुश्री नीलम से हुआ जो स्कूल में अध्यापिका थी। उनका दांपत्य जीवन बहुत लंबा नहीं चल सका। विवाह के 15 वर्ष बाद उनकी पत्नी नीलम का देहांत हो गया। अब डॉक्टर महावीर नरवाल पर अकेले ही दोनों बच्चों की ज़िम्मेदारी आ गई। पिता के साथ-साथ उन्हें मां की भूमिका भी निभानी पड़ी। जीवन के उस दौर में उनके नज़दीकी रहे डॉ वी बी अबरोल कहते हैं, “डॉ महावीर एक अच्छी मां थे।” बच्चों की परवरिश में सोच-विचार और संस्कार बनाने में भी डॉक्टर नरवाल की महती भूमिका रही। उनकी बेटी नताशा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की पढ़ाई के दौरान नारी मुक्ति की प्रगतिशील समझ और कार्यों से इस हद तक जुड़ी कि सी ए ए के विरोध में उठे आंदोलन में भाग लेते हुए झूठे मुकदमों का शिकार हुई और उसे जेल में भेज दिया गया। बेटी के जेल जाने पर डॉक्टर नरवाल कहते थे, “जेलों से डरने की ज़रूरत नहीं। मेरी बेटी जेल से और मज़बूत होकर निकलेगी।” उनका बेटा आकाश कोलकाता के उच्च कोटि के संस्थान सत्यजीत राय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान में एनिमेशन सिनेमा में डिप्लोमा कर रहा है।

सामाजिक जीवन


छात्र और कृषि वैज्ञानिक के रूप में अध्ययन और शोध कार्य करने के साथ डॉक्टर नरवाल ने छात्रों और प्राध्यापकों के हितों के लिए जो काम किए थे और जो वैज्ञानिक दृष्टि हासिल की थी, उसे प्रगतिशील जनतांत्रिक मूल्यों पर आधारित समाज बनाने के कार्यों से जोड़ दिया। कुछ साथी इन कार्यों में पहले से ही शामिल थे। वे डॉक्टर कालरा के साथ-साथ डॉक्टर ग्रेवाल, मनमोहन, शुभा और प्रोफेसर डीआर चौधरी के संपर्क में आए। अलग-अलग ज़िलों में डेमोक्रेटिक फोरम और प्रगतिशील विचार मंच बनने लगे। इस काम में भी डॉक्टर नरवाल सक्रिय रहे। विश्वविद्यालय की सीमाओं से बाहर ज्ञान और विज्ञान को गांव-शहर के आम आदमी के जीवन में उतारने के कार्यों में सार्थक हस्तक्षेप किया। सन् 1987 में हरियाणा में विज्ञान की समझ बढ़ाने, तार्किक सोच बनाने और जनतांत्रिक मूल्यों के संवर्धन के लिए कुछ बुद्धिजीवियों ने 1987 में भारत जन विज्ञान जत्थे के माध्यम से हरियाणा विज्ञान मंच की स्थापना की। डॉक्टर नरवाल इस कार्य में अग्रणी भूमिका निभा रहे थे। पत्रिका साइंस बुलेटिन निकाली गई और 1992 में हिसार में हुई ऑल इंडिया पीपल्स साइंस कॉन्ग्रेस में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। सन 1992 में हिसार जिले का साक्षरता अभियान शुरू हुआ उसमें भी उनकी अग्रणी भूमिका रही साक्षरता अभियानों के दौरान ही उन्होंने डॉ सतीश कालरा के साथ मिलकर कुछ गांवों का आर्थिक सर्वेक्षण करवाया और तकनीक की मदद से साधारण लोगों की आय बढ़ाने के प्रयोग शुरू किए
सेवानिवृत्ति के पश्चात् डॉक्टर नरवाल रोहतक आ गए। जाट आरक्षण में भड़की हिंसा से चिंतित होकर रोहतक में सद्भावना समिति का गठन किया गया। इस समिति के अध्यक्ष की भूमिका भी डॉक्टर नरवाल ने निभाई।

ज्ञान-विज्ञान आंदोलन में भूमिका


रोहतक में ज्ञान विज्ञान आंदोलन का राज्य केंद्र है। आंदोलन के संस्थान, अलग-अलग घटकों तथा जन संगठनों के कार्यालय यहीं स्थित हैं। इन संस्थानों में डॉक्टर नरवाल की सक्रिय तथा प्रमुख भूमिका की शुरुआत भारत ज्ञान-विज्ञान समिति के अध्यक्ष होने और इसके चलते ‘सर्च’ – राज्य संसाधन केंद्र के पदेन अध्यक्ष बनकर हुई। इन दो निकायों के मार्गदर्शक के रुप में डॉक्टर नरवाल पुस्तकालय आंदोलन पर सतत् विचार करते रहे। जन-विज्ञान केंद्र के रूप में चमारिया गांव में पहले से स्थित कार्यालय को विकसित करके संस्थान के तौर पर आगे बढ़ाने की परिकल्पना भी वह अपने साथियों के बीच प्रस्तुत करते रहे।

हाल ही में हरियाणा विज्ञान मंच (जो 1987 में स्थापित हुआ था) के अध्यक्ष पद का कार्यभार डॉक्टर नरवाल को सौंपा गया था। इस भूमिका में रहते हुए भी विज्ञान लोकप्रियकरण के बारे में अनेक रचनात्मक प्रस्ताव रखते रहे। उनके निकट सहयोगी बताते हैं कि वे सरकार की वित्तीय सहायता के बिना भी इस कार्य को कैसे किया जा सकता है, इस पर कई सुझाव देते थे।

अध्ययन एवं खेलों में रुचि


पहले भी ज़िक्र किया गया है कि छात्र जीवन में ही उच्च कोटि की पुस्तकों को पढ़ने और उन पर चर्चा करने का कार्य उनमें एक आदत के रूप में विकसित हो गया था। यह रुचि और आदत जीवन पर्यंत बनी रही। उनके बहनोई और वैचारिक मित्र डॉ सुरेंद्र पाल बताते हैं कि कुछ दिन पहले उनके सुझाव पर उन्होंने विलियम डेलरिंपल द्वारा लिखित पुस्तक अराजकता पढ़ी थी। पुस्तकें पढ़ने का सिलसिला अनवरत बना रहा। युवावस्था में खेल के प्रति भी रुचि विकसित हुई और कृषि विश्वविद्यालय में बिताए लंबे जीवन काल में वह बिलियर्ड्स और शतरंज खेलने के लिए हमेशा आतुर रहते थे।

चिंतन


डॉक्टर नरवाल की जीवन दृष्टि मार्क्सवादी थी। परिवार से समाज, देश और दुनिया को देखने का यह नज़रिया ही उन्हें किसान, मज़दूर, महिलाओं तथा मेहनतकश अवाम के प्रति संवेदनशील इंसान बनाता है और इतने व्यापक संघर्षों के लिए प्रेरणा प्रदान करता है। डॉक्टर नरवाल सही मायने में बेहतर समाज के निर्माण के वृहद् कार्य में लगे व्यक्तियों में से एक थे।

हम उनके जीवन से प्रेरणा लेकर उनके सपनों और विचारों को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराते हैं।

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