सेक्युलरिज़म अथवा धर्मनिरपेक्षता – रमणीक मोहन

{ इस लेख के मूल में यह विचार है कि पश्चिमी देशों में भी (जहाँ से असल में सेक्युलरिज़म का सिद्धांत आया) यह सिद्धांत तमाम कोशिशों के बावजूद अपनी पूर्ण शुद्धता में लागू नहीं हो पाया है। भारत का सन्दर्भ और परिप्रेक्ष्य वैसे भी उन से अलग है। यहाँ राज्य और चर्च (धर्म) के बीच ऐतिहासिक रूप में वैसे संघर्ष और टकराव की स्थितियाँ नहीं रहीं जैसी कि पश्चिम में। न ही वहाँ की तरह शायद धर्म और विज्ञान के बीच द्वंद्व रहा। पश्चिम के किसी एक देश में धर्मों और मत-मतान्तरों की भी सम्भवत: वैसी बहुलता नहीं रही जैसी कि भारत में है। यह एक मुख्य कारण है कि ‘सेक्युलरिज़म’ के सवाल को यहाँ अलग अर्थ के साथ देखा जाता रहा है। हमें धर्म के प्रति, लोगों के धार्मिक विश्वासों के प्रति अपने नज़रिये पर भी विचार करना होगा। लेख को व्यापक चर्चा के लिए प्रस्थान-बिंदु के रूप में लिया जा सकता है। }  


पश्चिमी संसार, ख़ास कर ग्रेट ब्रिटन और संयुक्त राज्य अमेरिका के सन्दर्भ में जब सेक्युलरिज़म की बात होती है तो ग्रेट ब्रिटन के ज्यॉर्ज हॉलिऑक (1817-1906) तथा चार्ल्स ब्रैड्लॉ (1833-1891) का ज़िक्र आए बिना नहीं रह सकता। इसी सन्दर्भ में सत्रहवीं शताब्दी इंग्लैण्ड के दार्शनिक जॉन लॉक द्वारा प्रतिपादित सामाजिक अनुबन्ध के विचार तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के बिल ऑव राइट्स में हुए पहले संशोधन (फ़र्स्ट अमेण्ड्मेन्ट) के हवालों का ज़िक्र भी इस सिद्धांत की शुरुआती पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में लाज़िम समझा जा सकता है। 

हॉलिऑक द्वारा 1851 में दी गई ‘सेक्युलरिज़म’ शब्द की परिभाषा को एक तरह से ‘मूल परिभाषा’ माना जा सकता है, जिस के तहत पाँच पहलू चर्चा में आते हैं: 
विज्ञान मनुष्य का सच्चा मार्गदर्शक है।
नैतिकता का उद्भव धार्मिक नहीं है।
तर्क एवं विवेक ही एकमात्र आधिकारिक है।
विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है।
भावी जीवन की अनिश्चितताओं के मद्देनज़र हमारे सभी प्रयास मनुष्य के इसी जीवन के लिए हैं।  

यहाँ विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अलावा बुनियादी तौर पर कहा जा रहा है कि – (क) नैतिकता को धर्म से अलग कर के देखा जाए – यानी नैतिकता का मूल अकेले धर्म में नहीं है। निहितार्थ यह, कि नैतिकता का सामाजिक आधार भी हो सकता है। (ख) विज्ञान को सच्चा मार्गदर्शक माना जाए (न कि ईश्वर को, जैसा कि आम तौर पर माना जाता था)। (ग) तर्क और विवेक को महत्व दिया जाए (न कि विश्वास को?)। (घ) इसी जन्म और जीवन को न कि किसी पारलौकिक संसार को सत्य माना जाए। 

ऊपर दिए गए घटकों में से आख़री यानी (घ) को पश्चिमी सन्दर्भ में सेक्युलरिज़म का प्रचलित, शब्दकोशीय अर्थ माना जाता है – ‘सेक्युलर’ का अर्थ है “वह, जो इस संसार से सम्बद्ध है या अध्यात्मिक नहीं है, जिस का सम्बन्ध धर्म से नहीं है” – यानी वह जो लौकिक (या इहिलौकिक) है, जिस का आधार और कार्यक्षेत्र यही संसार है, और जो धर्म से इतर है; और ‘सेक्युलरिज़म’ की धारणा के मुताबिक “राज्य, नैतिक मूल्यों, शिक्षा आदि को धर्म से स्वतन्त्र होना चाहिए” (चेम्बर्स डिक्श्नरी)। 

पश्चिमी संसार से तीन देश : राजनैतिक सन्दर्भ, तीन परिप्रेक्ष्य  

संयुक्त राज्य अमेरिका, फ़्रांस और ग्रेट ब्रिटन पश्चिमी संसार के तीन देश हैं जिन के बारे में इस सन्दर्भ में बात हो तो भारत में ‘सेक्युलरिज़म’ की चर्चा करते हुए कुछ सबक लेने में मदद मिलेगी। हम मुख्य तौर पर राजनैतिक – और बाद में सामाजिक – सन्दर्भ में बात करेंगे। 

मोटे तौर पर इन्हीं देशों के दार्शनिकों, राजनीतिज्ञों और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने ‘सेक्युलरिज़म’ के विचार को बल दिया। यहाँ राजनैतिक सन्दर्भ में ‘सेक्युलरिज़म’ राज्य और धर्म (चर्च) के बीच एक दीवार के रूप में प्रतिबिम्बित होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान के प्रथम संशोधन (1789) में अन्य बातों के अलावा यह भी कहा गया कि संयुक्त राज्य अमेरिका की कांग्रेस यानी विधायिका द्वारा किसी धर्म की स्थापना सम्बन्धी कोई कानून नहीं बनाया जाएगा – यानी राज्य किसी धर्म की स्थापना का काम नहीं करेगा।1802 में लिखे एक पत्र में संयुक्त राज्य अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति टॉमस जेफ़र्सन इस संशोधन की चर्चा करते हुए ही राज्य और चर्च के बीच पृथकता की एक दीवार का ज़िक्र करते हैं। यानी राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। राज्य धर्म से अलग रहेगा। धर्म में आस्था और विश्वास की व्यक्तिगत स्तर पर आज़ादी रहेगी, राज्य किसी धर्म की पैरवी नहीं करेगा। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका में राज्य को धर्म से अलग रखने की इस कवायद के लिए असल में सालों-दशकों का संघर्ष करना पड़ा – तब ही कहीं जा कर राज्य-स्थापित और राज्य-सम्बद्ध चर्चों की पकड़ कमज़ोर हुई, और उन्हें ‘अस्थापित’ किया जा सका – चर्चों के लिए आमजन द्वारा दिये जाने वाले टैक्स समाप्त हो सके और सरकार का उन के बनाए रखे जाने की प्रक्रिया से जुड़ाव समाप्त हुआ।

फ़्रांस की क्रांति का भी यही दौर है। 1789 की क्रांति से पहले यहाँ रोमन कैथॉलिसिज़म को राज्य-धर्म का दर्जा हासिल था। 1795 तक यहाँ भी चर्च और राज्य के बीच दीवार का सिद्धांत लागू होने को आया मगर बात बीच में ही रह गई और यह पूरे स्थायित्व के साथ तो बीसवीं सदी की शुरुआत में ही लागू हो पाया। बीसवीं सदी के दौर तक भी फ़्रांस का राज्य चार आधिकारिक धर्मों – रोमन कैथॉलिसिज़म, कालविनिज़म, लूथर की प्रोटेस्टैंटिज़म और जुडाइज़म को वित्तीय सहायता करता रहा। सम्पूर्ण जनता पर लगे करों से एकत्र धन से चर्च, सिनागॉग तथा अन्य धार्मिक इमारतों का निर्माण होता रहा। 1879 में कहीं जा कर फ़्रांस के राज्य ने धीरे-धीरे ‘सेक्युलराइज़ेशन’ के प्रोग्राम के तहत अस्पतालों की प्रशासनिक समितियों आदि से पादरियों को हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू की और 1880 में अस्पतालों में इसाई साध्वियों (नन्ज़) के स्थान पर सामान्य महिलाओं को लगाना शुरू किया गया। 1881-82 में सब स्कूलों में धार्मिक शिक्षा की मनाही और धार्मिक संस्थाओं को स्कूलों में धार्मिक शिक्षण के लिए मिली इजाज़त पर रोक के नियम-कानून बने। इस पूरी प्रक्रिया के चलते आख़िर 1905 में कहीं जा कर राज्य और धर्म के बीच दीवार वाले विचार के तहत कानून पास हुआ जिस के अन्तर्गत राज्य द्वारा धार्मिक समूहों को वित्तीय सहायता दिया जाना समाप्त हुआ। यह वह साल है जिसे फ़्रांस के बाकायदा सेक्युलर राज्य हो जाने का साल कहा जा सकता है। 

इंग्लैण्ड (या कहें कि ग्रेट ब्रिटन) का अनुभव अलग ही है। इसे सेक्युलर राज्य नहीं कहा जा सकता। यहाँ चर्च और राज्य में प्रभुत्व के लिए संघर्ष चला। आख़िर में पादरी के मुकाबले राजा का पलड़ा भारी रहा, राज्य का चर्च पर न कि चर्च का राज्य पर प्रभुत्व हुआ। लेकिन यहाँ राज्य और चर्च के बीच दीवार नहीं है। उत्तरी आयरलैण्ड, स्कॉट्लैण्ड और वेल्स में कोई स्थापित चर्च नहीं है मगर इंग्लैण्ड में चर्च ऑव इंग्लैण्ड वहाँ का स्थापित राज्य-धर्म है। आज भी महारानी एलिज़ाबेथ डिफ़ेण्डर ऑव द फ़ेथ यानी चर्च ऑव इंग्लैण्ड की रक्षक है। 26 पादरी हाउस ऑव लॉर्ड्स के सदस्य (द लॉर्ड्स स्पिरिचुअल ) होते हैं। वे सम्पूर्ण ग्रेट ब्रिटन को प्रभावित करने वाली चर्चाओं का ही हिस्सा नहीं होते, वे सदन में वोट भी कर सकते हैं। संसद की शुरुआत प्रार्थनाओं से होती है। राजा/रानी की प्रभुता की अभिव्यक्ति ‘द क्राउन इन पार्लियमेंट अण्डर गॉड’ वाक्यांश के माध्यम से होती है। राजा/रानी सम्पूर्ण ग्रेट ब्रिटन में प्रोटेस्टैंटिज़म को संरक्षित रखने के लिए बंधे हैं। चर्च ऑव इंग्लैण्ड के अपने स्कूल भी हैं – प्राइमरी स्कूलों में 25% इन के हैं। लेकिन यह भी देखने में आया है कि चर्च में लोगों का जाना काफ़ी घट रहा है। पहले से अधिक संख्या में लोग अब यह कहने को तैयार हैं कि उन के कोई धार्मिक विश्वास नहीं हैं। कुछ लोग इसे एक ग़ैर-सेक्युलर राज्य में लोगों के सेक्युलर होने की प्रक्रिया के तौर पर देखते हैं। 

कुछ बातें जो हमारे लिए इन देशों के अनुभव से सीखने वाली हो सकती हैं:

  1. ध्यान दें कि इन देशों – ख़ास कर फ़्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका – में ‘सेक्युलरिज़म’ के प्रति एक मज़बूत बौद्धिक एवं व्यावहारिक नज़रिये के बावजूद इन के असल में सेक्युलर राज्य बनने की प्रक्रिया लम्बी रही। चर्च की पकड़ और ताक़त को ढीला करने में निरन्तर संघर्ष करने पड़े। 
  2. यह भी ध्यान देने की बात है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान के जिस पहले संशोधन को राज्य और धर्म की पृथकता का सूचक माना जाता है, उसी में यह भी कहा गया है कि विधायिका द्वारा कोई ऐसा कानून नहीं बनाया जाएगा जो किसी धर्म के स्वतन्त्र प्रयोग/चुनाव  (एक्सरसाइज़) को रोके ( Congress shall make no law respecting an establishment of religion, or prohibiting the free exercise thereof…..) । 
  3. अमेरिका में राष्ट्रपति ओहदे की शपथ भगवान के नाम पर भी ले सकता है – इसे व्यक्तिगत मसला माना जा सकता है लेकिन सवाल तो उठता है कि राष्ट्रपति राज्य और धर्म की पृथकता के सिद्धांत का भी एक प्रतीक हो, तो यह आशा की जानी चाहिए या नहीं? हम बहुत बार राष्ट्रपति को अपने भाषणों में ‘God Bless America’, ‘God be with you’ कहते हुए भी सुनते हैं। In God We Trust 1956 में पारित अमेरिका का आधिकारिक मॉटो है। यह वहाँ की करंसी पर 1957 से मुद्रित हो रहा है। 2006 में एक बार फिर इसे अनुमोदित किया गया। 
  4. इतनी लम्बी सेक्युलर परम्परा के बावजूद आज भी ये राज्य सेक्युलर होने की प्रक्रिया में समस्याओं से जूझ रहे हैं। राज्य और चर्च (धर्म) के बीच दीवार के विचार के बावजूद यह दीवार पूरी तरह खड़ी ही रही हो, ऐसा नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने 1971 में यहाँ तक कहा कि राज्य और चर्च के बीच पक्के तौर पर पूर्ण पृथकता सम्भव नहीं है और सरकार तथा धार्मिक संस्थाओं के बीच कोई न कोई रिश्ता हो, इस बात से बचा नहीं जा सकता। पृथकता की लकीर एक “दीवार” न हो कर किसी विशेष सम्बन्ध की परिस्थितियों पर निर्भर एक धुंधला, अस्पष्ट बैरियर है। यानी यह सम्भव नहीं है कि राज्य और चर्च पूरी तरह से हर परिस्थिति में पृथक ही रहें। 
  5. धर्म और राज्य में पृथकता एक मसला है, मगर लोगों के जीवन में धर्म की भूमिका और अहमियत दूसरी बात है – और यह मसला पेचीदा है । यह बात यहाँ से स्पष्ट होती है कि फ़्रांस, जिसे धर्म और राज्य के बीच पृथकता का तथा सेक्युलरिज़म का शायद सब से बड़ा सन्देशवाहक कहा जा सकता है, इस सदी में भी समस्याओं से जूझ रहा है। जब धर्म और धार्मिक संकेत-चिह्न हमारे रोज़मर्रा का हिस्सा हों, बड़ी आबादी की पहचान से जुड़े हों, तो राज्य क्या रुख़ अपनाए? स्कूलों में धार्मिक चिह्नों के प्रयोग के निषेध का मामला फ़्रांस में पहले 1989 और फिर 2004 तथा 2010 में गरमाया रहा [यह विशेष तौर पर मुस्लिम महिलाओं द्वारा बुर्क़े के इस्तेमाल को ले कर था। 2004 में सिर के रूमाल (हेड्स्कार्फ़) को ले कर करीब 150 मुस्लिम लड़कियों के सामने स्कूल से निष्काशन का ख़तरा था। 2010 में कानून पास हुआ कि मुँह को ढकने वाले पर्दे का सार्वजनिक स्थानों – जैसे कि स्कूलों और अस्पतालों – में निषेध होगा – मगर निजी इमारतों और गलियों (स्ट्रीट्स) में नहीं। 2011 में यह शर्त पूरे बुर्के पर भी लागू कर दी गई।] दूसरी ओर, वहाँ ईसाई कैथलिक पर्वों की छुट्टियाँ स्कूलों में अब भी होती हैं। अल्सेस मोरेल के इलाके में (जो पहले किसी ज़माने में शायद प्रशिया के अधिकार-क्षेत्र में था) अब भी आधिकारिक तौर पर स्वीकृत धर्म हैं। 2010 में हुए एक आंशिक जनमत संग्रह के मुताबिक़ 27% लोग अब भी ईश्वर में विश्वास रखते हैं और 33% किसी अलौकिक शक्ति में, जब कि 40% इन दोनों में से किसी को नहीं मानते। कुछ लोगों का मत है कि ये सब उदाहरण दिखाते हैं कि फ़्रेंच सेक्युलरिज़म अभी तक अंतर्विरोधों में चल रहा है। 

एक मतानुसार पश्चिमी देशों में राज्य को पूरी तरह से धर्म से अलिप्त माना जाता है। मगर क्या असल में ऐसा है? क्या इन देशों में धर्म-ग्रंथ के आधार पर शपथ लेने का विकल्प प्रतिबंधित है और केवल संविधान की ही शपथ लेना अनिवार्य है? शादी के पंजीकरण की बात को अलग रख दें, तो क्या धार्मिक रीति रिवाजों से की गई शादी स्वीकार्य नहीं है और समान नागरिक पद्धति से शादी करना अनिवार्य है? दूसरे शब्दों में, क्या यह सम्भव है कि समाज तो धार्मिक हो, व्यक्तिगत जीवन में बड़े पैमाने पर लोग धर्म को मानें लेकिन राज्य-व्यवस्था में धर्म बिल्कुल भी परिलक्षित न हो? ऐसा होना इस लिए सम्भव नहीं लगता क्योंकि धर्म केवल अमूर्त ईश्वर में विश्वास तक सीमित नहीं है। 

एक राज्य सेक्युलर हो सकता है मगर ज़रूरी नहीं कि एक समाज पूरी तरह सेक्युलर हो गया हो। अब भी बहुत बड़ी संख्या में लोग फ़्रांस, इंग्लैण्ड और अमेरिका में इसाई धर्म को मानते हैं। गिरजाघरों में जाना कम हो गया हो मगर ज़रूरी नहीं कि ईश्वर या किसी अलौकिक शक्ति में या अपने-अपने धर्म के सिद्धांतों में विश्वास घट गया हो। यह बात भारत में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहाँ धर्मों की बहुतायत है – और शायद पश्चिम के मुकाबले, आज के दिन, आमजन की ईश्वर-देवी-देवताओं और धर्म में आस्था भी अधिक है। 

भारत में  

भारत में धर्मों की बहुतायत है। हमारे संविधान में ‘सेक्युलर’ राज्य का ज़िक्र 1976 में कहीं जा कर आया – हम यह भी जानते हैं कि किन हालात में। मगर व्यवहार में यहाँ का सेक्युलरिज़म पश्चिम के सेक्युलरिज़म से अलग रहा। राज्य और धर्म के बीच कोई दीवार नहीं रही। ऊपर चर्चा में आए पश्चिमी देशों के इतिहास और अनुभवों से शायद यह निकल कर आता है कि सेक्युलर राज्य और धर्म के बीच की दीवार होते हुए भी व्यवहार में राज्य का पूरी तरह सेक्युलर रहना हमेशा सम्भव नहीं हो पाया है। भारत की अलग किस्म की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के चलते ही संविधान सभा की बहसों से निकल कर आया होगा कि हम स्वयं को पश्चिमी अर्थ में सेक्युलर राज्य न कहें। विभिन्न राजनैतिक चिन्तकों ने इस सन्दर्भ में सेक्युलरिज़म को परिभाषित किया है। राधाकृष्णन ‘सेक्युलर राज्य’ को भारत के सन्दर्भ में इस प्रकार परिभाषित करते हैं – “भारत को सेक्युलर राज्य कहने का यह अर्थ नहीं है कि हम किसी अनदेखी स्पिरिट को या जीवन में धर्म की प्रासंगिकता को नकारते हैं या अधार्मिकता को ऊँचा कर के देखते हैं। इस का यह अर्थ नहीं है कि सेक्युलरिज़म स्वयं एक धर्म बन जाता है या राज्य दैविक विशेषाधिकार अख़्तियार कर लेता है। ….. हमारा मानना है कि किसी एक धर्म को विशेष दर्जा न दिया जाए।” “When India is said to be a secular state, it does not mean that we reject the reality of an unseen spirit or the relevance of religion to life, or that we exalt irreligion. It does not mean that secularism itself becomes a positive religion or that the state assumes divine prerogatives…. We hold that not one religion should be given preferential status” (Recovery of Faith). 

एक और जगह वे कहते हैं – “Secularism here does not mean irreligion or atheism or even stress on material comforts. It proclaims that it lays stress on the universality of spiritual values which may be attained by a variety of ways” (quoted in Foreword to ‘The National Culture of India’ by Abid Hussain’). 

अ‍म्बेडकर के अनुसार संविधान में सेक्युलर राज्य के विचार का अर्थ धर्म का उन्मूलन नहीं है, बल्कि इस के निहितार्थ थे कि “सरकार कोई एक धर्म लोगों पर थोप नहीं सकती।”  (The idea of a secular State in the Constitution did not mean abolition of religion, rather it implied the “Government could not thrust any particular religion on the people.”) 

जवाहरलाल नेहरू के मुताबिक एक सेक्युलर राज्य में “राज्य सब धर्मों की रक्षा करता है लेकिन अन्य की कीमत पर किसी एक को तरजीह नहीं देता और स्वयं किसी धर्म को राज्य-धर्म के तौर पर अख़्तियार नहीं करता” ( In a secular State, “the State protects all religions but does not favour one at the expense of others and does not itself adopt any religion as the State religion” – quoted in ‘Nehru and Democracy’ by D.E.Smith). 

रोमिला थापर के मुताबिक़ “Secularism neither denies nor rejects religion, but insists on the priority of social ethos based on equal and universal human rights, and social justice in uniform civil laws.” 

इन सभी विचारकों की मूल भावना को लें तो सेक्युलरिज़म और सेक्युलर राज्य की ओर से धर्म का नकार नहीं है लेकिन राज्य किसी धर्मविशेष के प्रति उदार नहीं होगा, वह स्वयं कोई धर्म स्थापित नहीं करेगा, और सर्वधर्म समभाव का नज़रिया रखेगा। यानी कोई एक राज्य-धर्म नहीं है – पश्चिमी सेक्युलर देशों की ही तरह – मगर धर्म का नकार भी नहीं है, सभी धर्मों को समान नज़र से देखने का नज़रिया है – और यह बात हमारे संविधान में झलकती है। जहाँ धर्म के इर्द-गिर्द त्यौहार हों, उस से जुड़ी गतिविधियाँ और क्रियाकलाप (जैसे शादी-ब्याह-ख़ुशी-ग़मी में धर्म-ग्रंथों से मन्त्रोचारण, गृहप्रवेश के अनुष्ठान, त्यौहारों पर पूजा-पाठ, विशेष अवसरों पर हवन-यज्ञ) हमारी दिनचर्या का हिस्सा हों, वहाँ धर्म का नकार हो भी नहीं सकता। दूसरा, कहने को धर्म हमारा निजी मामला हो सकता है, लेकिन कई बार यह सामाजिक मामला भी हो जाता है – ख़ास तौर से तब जब दीवाली-दशहरा-ईद-बड़ा दिन-छठ-गणेश चतुर्थी जैसे त्यौहार, जिन का सम्बन्ध धर्म से है, घरों की चारदीवारी तक सीमित न रह कर, व्यापक स्तर पर भी मनाए जाते हों। राज्य पश्चिमी अर्थ में सेक्युलर हो, तो भी जनजीवन में सेक्युलर मूल्यों का होना सर्वथा सम्भव होगा, यह तो पश्चिमी अनुभव भी नहीं दिखाता। जहाँ तक राज्य के स्वयं धर्म से अलग रहते हुए लोगों को धर्म की आज़ादी की बात है, वह पश्चिम के सेक्युलर देशों में तो है ही, हमारे यहाँ भी है। हमारे संविधान की धारा 15 के तहत धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव की मनाही है तथा धारा 25 से 28 से हमें किसी धर्म को मानने का अधिकार भी मिला है। 

लेकिन राज्य का धर्म से पूरी तरह अलग रहना क्या भारत जैसे देश में सम्भव है?

एक मान्यता यह है कि धर्म केवल भक्त और उस के ईश्वर के बीच का मसला रहे, उस का सार्वजनिक जीवन में कोई स्थान नहीं होना चाहिए और राज्य को तो इसे बिल्कुल नज़रअन्दाज़ करना चाहिए। सवाल यह है कि अगर समाज और जीवन में धर्म का स्थान है तो क्या राज्य इस से बिल्कुल अछूता रह सकता है? क्या छुट्टियाँ उन्हीं दिनों पर हों या न हों जिन दिनों समाज का बड़ा हिस्सा छुट्टी चाहता है? महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी और बिहार में छट पर आप को छुट्टी करनी होगी या नहीं? क्या यह मुमकिन है कि करवा चौथ का सामाजिक स्तर पर विरोध तो न हो लेकिन लड़कियों की शिक्षा संस्थाओं में करवा चौथ की छुट्टी बंद हो जाए? राज्य को धर्म से दूर रखे जाने और मानव-हितों के आधार पर व्यवहार करने की अपेक्षा तो की जा सकती है – की भी जानी चाहिए – लेकिन क्या इसे सिद्धांत के तौर पर स्वीकार करवाना सम्भव होगा? इस सब को ध्यान में रखें तो शायद राज्य से सर्वधर्म समभाव की आशा और अपेक्षा ही की जा सकती है। 

हमें इस पर तो विचार करना होगा कि जिस स्तर पर हमारे यहाँ धार्मिक गतिविधियाँ होती हैं – लोगों का बड़ी सँख्या में हज पर जाना, कुम्भ मेलों का लगना, अमरनाथ-वैष्णो देवी जैसी यात्राएँ, छठ और गणेश चुतुर्थी जैसे मेलानुमा आयोजन होना – क्या राज्य एक विशेष तरह से धार्मिक पर्वों-आयोजनों के ‘संरक्षक’, व्यवस्था बनाए रखने वाली और लोगों को इन में भाग लेने के लिए सहूलियात देने वाली एजेंसी (जैसे कि स्पेशल ट्रेनें और बसें चलाना) की भूमिका से बच सकता है? कहने को कहा जा सकता है कि यह व्यक्ति का निजी मामला है कि वह यात्रा करे या न करे, सामुदायिक स्तर पर होने वाले ऐसे धार्मिक पर्वों को मनाने का हिस्सा बने-न बने, मगर क्या इन्हें रोका जा सकता है? 

लग सकता है कि यह सब अन्धविश्वास को बढ़ावा देने वाली बातें हैं। मगर क्या इस से बचाव का कोई रास्ता निकल सकता है? 

हमें शायद याद रखना चाहिए कि संविधान में “भारत के प्रत्येक नागरिक” के कर्तव्यों में से एक यह भी है कि वह ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण्, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे’ [धारा 51(क)(ज)]। यह हमारे लिए एक रास्ता है। ‘सेक्युलरिज़म’ शब्द के पश्चिमी सन्दर्भ वाली परिभाषा के हिमायतियों को अपना संघर्ष इस मुहाज़ पर चलाने के तरीकों के बारे में सोचना होगा। और ये तरीके क्या हों, यह भी एक लम्बी बहस का मुद्दा है – अब तक जिस तरह से काम किया जाता रहा है, किया जा रहा है, उस पर भी बात होना होगी,  इस पर भी बात होना होगी कि धर्म को किस नज़रिये से देखा जाए और नागरिकता-नैतिकता-आधुनिकता के साँचे-ढांचे पर भी विचार होना होगा। केवल इतनी भर चर्चा करने से बात नहीं बनेगी कि ‘सेक्युलरिज़म’ और ‘सेक्युलर राज्य’ क्या और कैसा हो। 

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स्रोत 

http://www.prospectmagazine.co.uk/features/secularisminfrance

http://theconversation.com/the-french-myth-of-secularism-36227 

http://www.royal.gov.uk/MonarchUK/QueenandChurch/QueenandtheChurchofEngland.aspx 

In Defence of Secularism, Pushpa M. Bhargava (Article in ‘The Hindu’ 2.8.2014)

The Past As Present: Forging Contemporary Identities Through History  – Romila Thapar

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