भीष्म साहनी

भीष्म साहनी के रचना-कर्म सम्बन्धी विचार – रमणीक मोहन

भीष्म साहनी

भीष्म साहनी आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रबल हस्ताक्षरों में से एक हैं। 1953 में उन का पहला कहानी संग्रह छपा। 2003 में अपनी अन्तिम कृति छपने तक भीष्म जी ने कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध की विधाओं का इस्तेमाल जिस प्रकार सामाजिक सरोकारों को केन्द्र में रख कर किया, वह अपनी मिसाल आप है।  भारत के मध्य-वर्ग पर लिखी गई कहानियों से उन्हें एक अलग पहचान मिली। समाज निम्न माने जाने वाले वर्गों का जीवन्त चित्रण भी हमें उन की कुछ कहानियों में मिलता है। विभाजन की त्रासदी पर उन के मशहूर उपन्यास ‘तमस’ ने राष्ट्रीय स्तर पर उन के सम्मान को बढ़ाया। भीष्म साहनी की नज़र हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति और साम्प्रदायिक सौहार्द तथा तनाव के हालात पर भी बराबर बनी रही।

लेकिन यहाँ उन की रचनाओं पर बात न कर के हम एक नज़र डाल रहे हैं इस बात पर कि भीष्म साहनी की नज़र में एक लेखक होने के अर्थ क्या हैं, लेखक के कर्म का मर्म क्या है?

इस मसले पर भीष्म जी ने अपने अनुभव के आधार पर अलग-अलग समय पर कुछ न कुछ लिखा और कहा है मगर उंन की सैद्धान्तिक दृष्टि में कोई विशेष अन्तर आया प्रतीत नहीं होता – कम से कम 1978 से ले कर 2003 के बीच तो नहीं। विचार, विचारधारा, यथार्थ, कल्पना, लेखक का संवेदन, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता  – रचना-प्रक्रिया में इन सब की भूमिका की ओर वे इशारा करते हैं। 

भीष्म जी का बल सदा ही इस बात पर रहा कि लेखक को अपना कच्चा माल जीवन और यथार्थ से मिलता है। और लेखक का संवेदन जब उस के साथ अन्त:क्रिया में आता है तो कहानी लिखने का विचार बनता है। उन्हीं के शब्दों में 

“कहानी-उपन्यास आदि की प्रेरणा यथार्थ-जीवन से ही मिलती है। लेकिन वह एकतरफ़ा प्रतिक्रिया नहीं होती। लेखक का संवेदन एक तरह की ज़मीन होती है, जिस पर यथार्थ- जीवन से प्राप्त होने वाले बीज का अंकुर फूटता है….. संवेदन की प्रतिक्रिया हवा में नहीं हो सकती। यथार्थ-जीवन से दूर रहने और मात्र अपने संवेदन के बल पर कविता-कहानी लिखने का दम्भ भरने वाला लेखक भी जीवन से ही कहीं न कहीं जुड़ता है…..” [मेरे साक्षात्कार  (किताब घर, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1996), पंक्तियों पर बल मेरा पृ.14]।

यथार्थ-जीवन और लेखक के संवेदन की इस अन्त:क्रिया में भीष्म साहनी प्रामाणिकता की बात को जोड़ते हैं। उन के अनुसार  

“रचनात्मक प्रक्रिया…. के पीछे लेखक की कोशिश रहती है कि वह प्रामाणिकता को प्राप्त कर पाए, ताकि उस की रचना जीवन पर सही उतरे। इस तरह घटना-चक्र के स्तर पर लेखक अपनी ओर से कितनी ही छोटी-बड़ी घटनाएँ जोड़े, पात्रों की कल्पना करे, कथानक का ताना-बाना बुने, भले ही सारी की सारी रचना उस की कल्पना की उपज बन जाए, लेकिन वह प्रामाणिकता जीवन के किसी सार-तत्व से ही जुड़ कर प्रामाणिक बनती है। इस तरह लेखक यथार्थ-जीवन से प्रेरणा पा कर, अपने संवेदन के आधार पर भले ही नई दुनिया खड़ी कर दे, लेकिन यथार्थ-जीवन से वह फिर भी जुड़ी होगी। हम उस की प्रामाणिकता घटना-चक्र की वास्तविकता के आधार पर नहीं, जीवन के सार-तत्व के आधार पर आँकेंगे।” (मेरे साक्षात्कार, पृ. 14-15 – पंक्तियों पर बल मेरा ).

1978 के एक साक्षात्कार में कही इसी बात को वे 2003 में छपी अपनी आत्मकथा “आज के अतीत” में कुछ यूँ लिखते हैं :

“मेरी समझ में साहित्यिक कृति में विश्वसनीयता का होना नितान्त आवश्यक है; शायद एक अच्छी कृति की यही सब से अच्छी कसौटी है कि वह विश्वस्नीय हो, ज़िन्दगी पर खरी उतरे….. साहित्य ज़िन्दगी की कोख में से निकल कर आए तभी विश्वसनीय हो पाता है।”  (आज के अतीत, पृष्ठ 266-67, पंक्तियों पर बल मेरा

इस विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का रस इस बात पर निर्भर करेगा कि लेखक विचार, अनुभव और भावना को किस प्रकार कलात्मक अभिव्यक्ति देता है। एक साक्षात्कार में भीष्म जी कहते हैं:

कहानी न केवल भावना के स्तर पर हमें उद्वेलित तथा प्रभावित करती है, बल्कि विचार के स्तर पर भी। हाँ, विचार-तत्व कहानी में खप कर आए तो कहानी का स्वाभाविक विकास बना रहता है, पर यदि विचार को कहानी पर ओढ़ाया जाए या थोपा जाए तो कहानी को नुकसान पहुँचाएगा। कहानी हमें कला के माध्यम से प्रभावित करती है, तर्क के माध्यम से नहीं।” (मेरे साक्षात्कार,पृ. 23 – पंक्तियों पर बल मेरा )

यानी लेखक की विचारधारा बिना किसी अतिरिक्त आग्रह के, बिना लेखक की बेजा कोशिश के, कहानी या उपन्यास के पात्रों और घटनाक्रम में, कथानक के ताने-बाने में रच-बस कर पाठक के सामने आए। “आज के अतीत” में इसी बात को भीष्म साहनी यूँ लिखते हैं – 

“मैं निश्चय ही इस बात को सही मानता हूँ कि रचना में कथानक का स्वाभाविक विकास हो, कृति ख़ुद बोले, उस पर कुछ भी आरोपित न हो, उस में से जीवन की सच्चाई झलके…. वास्तव में जीवन से साक्षात ही लेखक के लिए सर्वोपरि होता है, भले ही वह स्वयं किसी भी विचारधारा से प्रेरित क्यों न हो। उस का सरोकार जीवन ही होता है….. विचारधारा की भूमिका लेखन के क्षेत्र में बड़ी महत्वपूर्ण है, पर निर्णायक नहीं होती। निर्णायक जीवन की वास्तविकता ही होती है।….. ऊपर से निष्कर्ष थोपने से न तो साहित्य-सृजन होता है और न ही किसी विचारधारा का प्रचार-प्रसार होता है” (आज के अतीत, पृ. 265-67 – पंक्तियों पर बल मेरा )। 

यानी मसला रचना के स्वतन्त्र विकास का है। सवाल यह भी उठता है कि इस में वास्तविकता कितनी हो और कल्पना कितनी? और कल्पना का स्वरूप क्या हो? इस सन्दर्भ में भीष्म साहनी का कहना है – 

“काल्पनिक और वास्तविक की चर्चा के सम्बन्ध में….. मैं तो कहूँगा कि कभी-कभी वास्तविकता का यथावत चित्रण इतना प्रभावशाली नहीं होता जितना कल्पना की मदद से किया गया चित्रण। कल्पना की उड़ान से मतलब मनगढ़न्त चित्रण नहीं है। कथानक के विकास के अनुरूप ही आप के पात्रों का व्यवहार होगा। और आप की कल्पना द्वारा नई-नई स्थितियों का आविष्कार भी। बेशक, वास्तविकता की जानकारी आधार का काम करेगी, पर उस के अन्दर पाई जाने वाली सच्चाई का उदघाटन कल्पना द्वारा ही होगा।”  (आज के अतीत, पृ. 229)

वास्तविकता के अन्दर पाई जाने वाली सच्चाई और उस के उद्घाटन की बात महत्वपूर्ण है क्योंकि इस का सम्बन्ध लेखक की दृष्टि, और उस के कलात्मक पक्ष, दोनों से है। यह सच्चाई उस घटना की कोई ‘विसंगति, कोई अन्तर्विरोध, कोई विडम्बना’ हो सकती है जिसे देख कर लेखक अपनी कल्पना का इस्तेमाल करते हुए कहानी का रूप देने की सोचता है, और बकौल भीष्म जी, 

“उसे देखने के पीछे मेरी सोच, मेरी जीवन-दृष्टि, मेरी मान्यताएँ, सभी काम आते हैं। …. ‘कच्चा माल’ उठा लेने के बाद मेरा संवेदन, मेरी कल्पना और शिल्प सम्बन्धी मेरी सूझ सक्रिय होने लगते हैं….।” (मेरे साक्षात्कार, पृ. 24 / दिसम्बर 1994)

विचार और अनुभव, कल्पना और वास्तविकता के बीच के सम्बन्ध को वे एक और वक्तव्य में इस प्रकार रखते हैं:

कहानी लिखने में विचार पहले आता है या अनुभव, इस का कोई नपा-तुला उत्तर न देते हुए, मैं फिर भी अपने लिए यही मानता हूँ कि जीवन में से उठाई गई कच्ची सामग्री में ताज़ापन ज़्यादा होता है, कुछ विविधता भी ज़्यादा होती है, और जीवन का यथार्थ लेखक की कल्पना पर अंकुश भी लगाए रखता है, उसे हवाई उड़ान भरने से रोके रखता है” (मेरे साक्षात्कार, पृ. 189)।

यानी कल्पना वास्तविकता और विश्वसनीयता के दायरे में काम कर रही होगी, वास्तविकता उसे एक बेलगाम घोड़े की तरह दौड़े चले जाने से रोकेगी। 

अपनी कहानियों के सन्दर्भ में भीष्म साहनी ने एक जगह लिखा है: 

“अपने तईं मुझे ऐसी कहानियाँ पसन्द हैं, जिन में अधिक व्यापक स्तर पर सार्थकता पाई जाए। व्यापक सार्थकता से मेरा मतलब है कि अगर उन में से कोई सत्य झलकता है तो वह सत्य मात्र किसी व्यक्ति का निजी सत्य ही न रह कर बड़े पैमाने पर पूरे समाज के जीवन का सत्य बन कर सामने आए, जहाँ वह अधिक व्यापक सन्दर्भ ग्रहण कर पाए, किसी एक की कहानी न रह कर पूरे समाज की कहानी बन जाए, जहाँ वह हमारे यथार्थ के किसी महत्वपूर्ण पहलू को उजागर करती हुई अपने परिवेश में सार्थकता ग्रहण कर ले। ऐसी कहानी मेरी नज़र में अधिक प्रभावशाली और महत्वपूर्ण होती है” (मेरी प्रिय कहानियाँ, राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, पृ. 7 – पंक्तियों पर बल मेरा )। 

भीष्म साहनी के समुद्र जैसे साहित्यिक रचना-संसार से एक बूंद को उदाहरण के तौर पर लें तो उन की कहानी “गंगो का जाया” में हमें लगभग ये सब विशेषताएँ मिलेंगी। यह एक इमारत पर काम करने वाली मज़दूरन गंगो, उसी की तरह मज़दूर उस के पति घीसू, और उन के छह बरस के लड़के रीसा की कहानी है। कहानी की कई परतें हैं। विचार के स्तर पर लेखक दिहाड़ी मज़दूर के हक़ में खड़ा दिखाई देता है। संवेदन से परिपूर्ण उस की दृष्टि एक दिहाड़ी मज़दूर, और उस में भी महिलाओं की ज़िन्दगी के सच को अन्दर तक देख-समझ पा रही प्रतीत होती है – यानी उस का रोज़ का संकट, उस के दुख-दर्द, उस के साथ हो रही ज़्यादती, बेरहमी से हो रहा उस की ज़िन्दगी के साथ खिलवाड़, छह बरस के बेटे को बूट पॉलिश के काम में धकेलने की उस की मजबूरी। एक और तह में हमें बाल मज़दूरों की दुनिया उजागर होती दिखाई देती है। य़ह उस बच्चे की दुनिया का सच है जिसे होना तो चाहिए स्कूल में लेकिन घूम रहा है सड़कों पर बूट पॉलिश का सामान उठाए, लोगों के ताने सहता मगर फिर भी जीवन से जूझता। इस वृत्तान्त में बाल मनोविज्ञान पर भी लेखक की पकड़ साफ़ दिखाई देती है। साथ ही हम देख पाते हैं ‘विकास’ का विडम्बनापूर्ण, शर्मनाक सच – महानगर की चकाचौंध और उस की शान-ओ-शौकत की कीमत गंगो और घीसू जैसे दिहाड़ी मज़दूरों को चुकानी पड़ रही है, विकास की यह तसवीर उन के जीवन से हो रहे खिलवाड़ की तसवीर है। गंगो और घीसू के जीवन का सच हमारे लिए उन का व्यक्तिगत सच न रह कर समाज के एक बड़े तबके, बल्कि पूरे समाज के जीवन का सच बन जाता है। एक व्यक्ति की कहानी के माध्यम से एक बड़ी सामाजिक सच्चाई हमारे सामने आ जाती है।

कहानी में लेखक की ओर से आरोपित कहे जाने लायक कुछ है तो बस शायद कुछ-एक छोटी-छोटी टिप्पणियाँ – “दिल्ली के हर खण्डहर की अपनी गाथा है, कहानी है, पर मज़दूर की फूस की झोंपड़ी का खण्डहर क्या होगा, और कहानी क्या होगी? हँसती-खेलती नयी आबादियों में इन झोपड़ों का, या इन झोपड़ों में खेले गए नाटकों का, स्मृति चिह्न भी नहीं मिलता।” कहानी के अन्त में दो और टिप्पणियाँ इस वर्ग के जीवन के कड़वे सत्य और विकास की हमारी अवधारणा पर रौशनी डालती हैं – “घीसू का उद्विग्न मन जहाँ बेटे के यूँ चले जाने पर व्याकुल था, वहाँ उस दारुण सत्य को भी न भूल सकता था कि अब झोंपड़े में दो आदमी होंगे और बरसात कटने तक, और गंगो की गोद में नया जीव आ जाने तक, झोंपड़ा शायद सलामत खड़ा रह सकेगा।” कहानी का अन्त इस टिप्पणी से होता है – “आकाश पर बरसात के बादलों से खेलती हुई चाँद की किरणों के नीचे नये मकानों की बस्तियाँ झिलमिला रही थीं। दिल्ली फिर बस रही थी, और उस का प्रसार दिल्ली के बढ़ते गौरव को चार चाँद लगा रहा था।” कहानी के सन्दर्भ और परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखें तो ये टिप्पणियाँ भी उसी का अंश जान पड़ती हैं न कि कोई आरोपित बात।

असल में तो इस सब में कुछ भी आरोपित नहीं है, थोपा हुआ नहीं है, क्योंकि यह दास्तान तो रोज़ हमारी आँखों के सामने की है। पूरी कहानी में कोई लफ़्फ़ाज़ी नहीं है, कोई नारेबाज़ी नहीं है, लेकिन विषय और विषयवस्तु स्वयं विचार और विचारधारा को समेटे हुए हैं। लेखक की कला ने समाज के कड़वे सच को इस प्रकार उद्घाटित कर दिया है कि विषयवस्तु और शिल्प हमें एक हो गए दिखाई देते हैं।

भीष्म साहनी विचारधारा को महत्व देते थे। साहित्य में प्रगतिशील विचारधारा के साथ उन का बहुत ही गहरा सम्बन्ध था। मगर लेखक के तौर पर वे विचारधारा और कलात्मकता के द्वंद्वात्मक रिश्ते के बारे में सचेत थे, उसे बख़ूबी समझते थे।

उन का कहना था कि, “लेखक का लेखकीय व्यक्तित्व तभी बनता है जब उस की विचारधारा उस के सृजनात्मक संवेदन का अभिन्न अंग बन जाए…. विचारधारा हमें नज़रिया देती है, पर हमें कलाकार नहीं बनाती….. आप की सृजन क्षमता ही आप का लेखकीय व्यक्तित्व बनाती है (आज के अतीत, पृ. 265-66)।” यानी   विचारधारा को ले कर लेखक का दृष्टिकोण और उस की सर्जनात्मकता यदि उस की कलात्मक अभिव्यक्ति के साथ एकीकृत हो जाएँ तो उस से बेहतर कोई और बात नहीं है। इसी लिए वे कहते हैं, “मेरी नज़र में वस्तु और शिल्प एक दूसरे के पूरक होते हैं। शिल्प का कहानी में उतना ही महत्व होता है, जितना वस्तु का। लेखक का संवेदन और सर्जनात्मक कल्पना, कथावस्तु पर काम करते हुए शिल्प के माध्यम से ही उसे कलाकृति का रूप दे पाते हैं। शिल्प को कथ्य से अलग कर के नहीं देखा जा सकता” (मेरे साक्षात्कार, पृ. 25/ दिसम्बर 1994)।

Leave a Reply

Your email address will not be published.