पीठासीन अधिकारीः बेहतरीन कहानियों का गुलदस्ता- अरुण कुमार कैहरबा

हरियाणा के जिला यमुनानगर के जाने-माने कथाकार ब्रह्म दत्त शर्मा का तीसरा कहानी संग्रह ‘पीठासीन अधिकारी’ बीते वर्ष के आखिरी चरण में के.एल. पचौरी प्रकाशन, गाजियाबाद से प्रकाशित हुआ। संग्रह में दस कहानियां संकलित की गई हैं, जिनमें लेखक ने हरियाणा के सामाजिक ताने-बाने के विभिन्न पहलुओं, लोकजीवन के विभिन्न रंगों, खूबसूरती, विडंबनाओं व समस्याओं को पूरी कुशलता से उकेरा है। कहानी संग्रह की भूमिका प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. बी. मदन मोहन ने लिखी है।

संग्रह में दस कहानियां संकलित की गई हैं, जिनमें लेखक ने हरियाणा के सामाजिक ताने-बाने के विभिन्न पहलुओं, लोकजीवन के विभिन्न रंगों, खूबसूरती, विडंबनाओं व समस्याओं को पूरी कुशलता से उकेरा है। कहानी संग्रह की भूमिका प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. बी. मदन मोहन ने लिखी है। संग्रह की सभी कहानियों की विशेषता उनका सहज प्रवाह है। लेखक कहानी को शुरू करता है और कहानी फिर पूरी जीवंतता के साथ साकार होती हुई आगे बढ़ती है। कहानियों की शुरूआत बहुत सहज और अंत प्रभावपूर्ण है। अधिकतर कहानियों की अंतिम पंक्ति शीर्षक में छिपे प्रतीकों का रहस्योद्घाटन करती है और पाठक को अपने आसपास के परिवेश पर सोचने पर मजबूर कर देती है। कहानी पढ़ते हुए पाठक बंधा रहता है। विषय-वस्तु के स्तर पर ही नहीं भाषा के स्तर पर भी सहजता और सरलता पाठकों को आकर्षित करती है।

संग्रह की सभी कहानियां पर्याप्त विविधता लिए हुए हैं। संग्रह की पहली कहानी ‘चतुर्भुज’ स्त्री-पुरूष समानता के संदर्भों को उठाती हुई पितृसत्ता पर चोट करती है। कहानी मुख्य पात्रों गौरव और शगुन के जीवन संघर्षों से आत्म-संघर्षों तक लेकर जाती है। शगुन अपने बुजुर्ग माता-पिता के प्रति पूरी जिम्मेदारी व चिंता से भरी हुई है। विवाह के बाद स्त्री की लाचारगी का उसे अहसास है। विवाह के लिए गौरव के सामने वह अपने ही घर में रहने की शर्त रखती है, जिसे एक बारगी तो गौरव अजीब, बेतुकी और मूर्खता मानता है। लेकिन धीरे-धीरे उसकी मानसिकता में बदलाव आता है और वह विवाह की शर्त मान लेता है। शगुन का परिवार त्रिभुज से चतुर्भुज का रूप लेता है।

संग्रह की दूसरी कहानी ‘बुढ़ापे का एक दिन’ में वृद्धावस्था की उपेक्षा और एकाकीपन का मुद्दा उठाया गया है। किस तरह से शहरीकरण व तकनीक के मोहपाश में हमने अपने घरों व आस-पास के बुजुर्गों से नजर फिरा ली है। युवा खेती-बाड़ी का काम छोड़ कर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर रूख कर रहे हैं। शहरों से केबल की लाईनों के जरिये टीवी के सैंकड़ों चैनल घर के कमरों में चल रहे हैं, जिसका चस्का ही नहीं लत बढ़ती जा रही है। मोबाइल ने भी युवाओं और बच्चों को आज अपना गुलाम बना लिया है। ऐसे में गांव की चौपालों व बैठकों की रौनक गायब हो गई है। बुजुर्ग पूरी तरह से अकेले हो गए हैं। लेखक कहता है कि लोग जैसे दूरदर्शन को भूल गए थे, वैसे ही बैठकों में बैठे बुजुर्गों को भूल गए हैं। कहानी में 80वर्ष पार कर चुके मामराज के पास भी अकेले यादों की जुगाली करने के अलावा कोई काम नहीं है। स्मृतियाँ मधुमक्खी के छत्ते की भांति मन पर चिपक पर परेशान करती हैं, लेकिन अपने अनुभव सांझा करने के लिए कोई नहीं है। परेशानी से पिंड छुड़ाने के लिए वह स्कूल में जाता है, जहां पहले की भांति बच्चे खेलते हुए नहीं दिखते। पांच-छह खेलते बच्चों को मम्मी स्कूल का होमवर्क याद करवाकर घर ले जाती है। मामराज के पोते को बच्चों के साथ खेलते हुए नेट, फेसबुक, व्हाट्सअप, डाउनलोड आदि की बातें करने से वक्त नहीं है। बेटे को भी टीवी पर रीयलटी शो देखना है। घर में आए भांजे को जाने की जल्दी है। मामराज की पत्नी को गुजरने तीन साल हो गए हैं। कहानी में इस बात का खुलासा रहस्यमयी ढ़ंग से जब अंतिम पंक्तियों में होता है, तब यह कहानी मर्म को छू लेती है। मामराज किसी के साथ भी बात करने को उतावला है, लेकिन कोई बात करने वाला नहीं है। कहानी आधुनिक दौर की त्रासदी को चित्रित करते हुए सोचने को मजबूर करती है।

तीसरी कहानी-‘त्रिशंकु’ मौजूदा समाज की जटिलताओं की पुरूष प्रधान मानसिकता से सनी एक परत को उघाड़ा गया है। नितिन पायल से प्रेम करता है। दोनों ने प्रेम के इस रिश्ते को विवाह का मुकाम देने का संकल्प किया है। इसी बीच नितिन अपने ही कार्यालय में काम करने आई साक्षी से घुलमिल जाता है। मन ही मन वह उसे चाहने लगता है। पायल को इस बात का पता चलता है तो वह फोन पर ही नाराजगी प्रकट करती है। लेकिन वह साक्षी को मन से निकाल नहीं पा रहा। पायल के आग्रह पर आखिर नितिन साक्षी से बात करना बंद कर देता है। धीरे-धीरे साक्षी भी उसकी उपेक्षा करने लगती है। अंतर्द्वंद्व में घिरा नितिन निर्णय नहीं कर पाता और पेंडुलम की तरह झूलता रहता है। पायल उसके पास आती है और पिता के शादी के लिए राजी होने की खुशखबरी सांझी करती है। साक्षी के प्रेम में घिरा नितिन उसे सच बता देता है। नितिन के फैसले से घायल होकर पायल चली जाती है। अगले दिन जब वह कार्यालय जाता है तो अन्य कर्मचारियों से घिरी साक्षी उसका मीठा मुंह करवाते हुए बताती है कि उसकी सगाई हो गई है।

चौथी कहानी-‘गुरु गोविंद’ शिक्षा की विसंगतियों को उजागर करती है। अध्यापक, विद्यार्थी व समुदाय के संबंधों को उघाड़ती हुई शिक्षा में सज़ा और अध्यापक के कर्मचारीकरण पर सवाल खड़े करती है। निजी स्कूलों में खासतौर पर अध्यापकों की स्थिति किसी दोयम दर्जे के कर्मचारी ही नहीं गधे से कम नहीं होती। वह स्वतंत्र सोच और मनपसंद विधि के साथ बच्चों को पढ़ा नहीं सकता। कभी वांछित परिणाम ना आने पर और कभी शारीरिक दंड का प्रयोग करने पर उसे अपमानित किया जाता है। ऐसे में जिस कबीर के प्रसिद्ध दोहे- गुरु गोविंद दोऊ खड़े को वह पढ़ा रहा होता है, उसके विपरीत स्थितियों को से गुजरते हुए उसकी मानसिक दशा को यहां दर्शाया गया है।
पांचवीं कहानी- ‘पीठासीन अधिकारी’ संग्रह की प्रतिनिधि कहानी है, जोकि हमारे देश की चुनावी व्यवस्था की अव्यवस्था को उद्घाटित करती है। कहानी चुनावी प्रक्रिया की उलझनों, पोलिंग पार्टी की भूमिका और चुनावी वातावरण का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती है। पोलिंग पार्टी में किसी एक सदस्य की गैर-जिम्मेदारी किस तरह से पूरी टीम के कार्य को बुरी तरह प्रभावित कर देती है। ऐसे में यदि पीठासीन अधिकारी ही गड़बड़ी पर उतर आए तो फिर पूरी टीम पर क्या गुजरेगी, इसका अंदाजा हर चुनावी ड्यूटी दे चुके व्यक्ति आसानी से लगा सकते हैं। कहानी झूठ के सहारे से भावनात्मक आवरण में स्वार्थ-सिद्धि की चालबाजियों को भी खोल कर रखती है।

‘पच्चीस साल बाद’ कहानी सतिंदर की यादों के जरिये कॉलेज के दिनों की उमंग-तरंग, शरारतों, ख्वाहिशों व अभिव्यक्ति के संकट को विभिन्न कोणों से हमारे सामने पेश करती है। कॉलेज में लडक़े-लड़कियों की भावनाओं को बहुत सरसता से प्रकट किया गया है, जैसे लेखक स्वयं अपनी पुराने दिनों को लेकर बैठ गया हो। कहानी में लेखक की कल्पनाशीलता की अद्भुत छटाएं देखने को मिलती हैं। कॉलेज के दिनों में शीतल को मन ही मन चाहने वाले सतिंदर को जब पच्चीस साल पता चला कि सम्पन्न परिवार से संबंध रखने वाली शीतल ने 12 साल पहले सुसाइड कर लिया तो कहानी दुखद अफसोस के साथ समाप्त होती है।

‘बर्थडे गिफ्ट’ कहानी अस्थाई शिक्षकों के जीवन-संकट, संघर्षों व समस्याओं का उद्घाटन करती है। नेताओं के द्वारा बार-बार उनसे वादे किए जाते हैं। सत्ता में आने के बाद सरकारें सभी कुछ भुला देती हैं। पक्का होने की आस में अध्यापक के घर व बच्चों की जरूरतें अधूरी रह जाती हैं। पक्का करने की बजाय यदि उन्हें नौकरी से ही निकाल दिया जाए तो घर में क्या कुछ गुजरती है। बर्थडे गिफ्ट के रूप में बेटी को स्कूटी दिलाने का वादा नौकरी से निकाल दिए गए अध्यापक के सिर पर किस तरह से भार बन जाता है। कहानी देश भर के कच्चे कर्मचारियों की मानसिक-सामाजिक स्थितियों को यथार्थपरक व मार्मिक ढ़ंग से चित्रित करती है। निजीकरण व उदारीकरण से उपजी कंटीली राहों को दर्शाते हुए कहानी अप्रत्यक्ष रूप से समाजवादी शासन व्यवस्था और पक्के रोजगार की गारंटी की मांग उठाती है।

‘पांच साल बड़ी पत्नी’ कहानी उस पुरूषवादी मानसिकता को नंगा करती है, जिसमें माना जाता है कि पत्नी पति से छोटी ही होनी चाहिए। मोबाइल और पत्नी लेटेस्ट होने चाहिएं कह कर पत्नी को उपभोग की वस्तु की तरह पेश किया जाता है। अरविंद के मन में अपने से पांच साल बड़ी पत्नी को लेकर एक प्रकार की दहशत है। वह किसी भी तरीके से इस तथ्य को औरों से छुपाना चाहता है। पत्नी की रिटायरमेंट पार्टी वह इसलिए नहीं करना चाहता, क्योंकि इससे औरों के सामने उम्र का खुलासा हो जाएगा। पार्टी रोकने के लिए वह खुद को लंग कैंसर होने की सूचना पत्नी को देता है। कहानी महिलाओं के प्रति समाज की संकीर्ण सोच पर सवाल खड़े करती है।

संग्रह की नौवीं कहानी ‘स्वाहा’ यमुनानगर के पास लेखक के अपने ग्रामीण परिवेश की गरीबी और भोलेपन को जीवंत किया गया है। बाकी सभी कहानियों में लेखक लोकभाषा के प्रयोग की संभावनाओं के बावजूद उससे संकोच करता रहा। लेकिन स्वाहा में लोक मुखर हो उठा। स्वाहा में सिल्ला और बिमला मजदूर दंपत्ति के पक्के घर के अरमानों की बानगी देखिए- ‘इब अम कोई जमींदार तो हैंनी। गरीब-गुरबों के मकान तो न्यूहीं तंगियां-संगियां सहके इ बणे करेकरां। साल दो साल तंगी काट ले! फेर मनमर्जी का खै पीलेंगे, ओढ़पैर बी लेंगे।’ बिमला का यह संवाद बताता है कि किस तरह वे अपना पक्का घर बनाने के लिए अपनी दैनिक जरूरतों के साथ भी समझौता करते हैं। एक-एक पैसा जोड़ कर बलविन्द्र चौधरी की सलाह पर बैंक में खाता खुलवाया जाता है। एटीएम बन जाता है। दोनों को यह चमत्कारिक लगता है। लेकिन बढ़ते साइबर क्राइम की भेंट उनके अरमानों के खाते में जमापूंजी भी चढ़ जाती है। खुद को बैंक कर्मी बताकर डाका डालने वाले लोग किस तरह भोले-भाले लोगों से एटीएम का पिन नंबर पूछ कर सब कुछ उड़ा ले जाते हैं। ऐसा ही सिल्ले के साथ होता है। मकान बनाने की सारी तैयारी करके जब वह बैंक से रूपये निकलवाने के लिए जाता है, तब उसके खाते से रूपये उड़ाए जाने का खुलासा होता है तो उसके पांव तले की जमीन खिसक जाती है।

किसान-विमर्श से संबंधित ‘गिरफ्तारी’ एक सशक्त कहानी है, जोकि सामंती प्रशासनिक सोच की पोल खोलती है। फसल अवशेष को जलाए जाने का हौ-हल्ला हर तरफ मचा हुआ है। पराली जलाने वालों की धरपकड़ करने के लिए कर्मचारियों की टीमें निकली हुई हैं। तहसीलदार सरपंच के यहां आवभगत करवा रहा है। टीम के सदस्य किसान बनवारी को पकड़ कर लाते हैं। उसे अवशेष जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में बताते हैं। भोले किसान के सहज तर्कों की बानगी देखिए- ‘‘साहब, आप भी कमाल करते हैं। मैं यहाँ अपने खेत में पराली जला रहा हूँ और धुआँ जाकर दिल्ली के ऊपर इका हो रहा है। आकाश में उडक़र यह कहीं भी जा सकता है। दिल्ली में क्यों इका होता है। इतनी बड़ी दुनिया में सिर्फ दिल्ली ही थोड़ी रह गई है।’’ किसान के तर्क हमें सोचने को मजबूर करते हैं। लेकिन उसकी सारी बातों को अनसुना करके उसे गिरफ्तार करके ले जाते हैं। जबकि उसे खेत में आलू लगाने थे।

कहानियों के विषय-चयन, विषय-वस्तु की पकड़ और रस लेकर उसे लक्ष्य तक पहुंचाने में लेखक की निपुणता देखते ही बनती है। सभी कहानियों का परिवेश हमारे आस-पास का परिवेश है। परिवेश को जीवंत करते हुए लेखक पात्रों के मनोभावों व द्वंद्वों को भी प्रकट करता हुआ आगे बढ़ता है। कहानियों में कहीं विषय का भटकाव देखने को नहीं मिलता, जिससे शुरू से लेकर अंत तक रोचकता, जिज्ञासा व उत्सुकता बनी रहती है और पाठकों को बांधे रखती है।

कहानियों के विषय-चयन, विषय-वस्तु की पकड़ और रस लेकर उसे लक्ष्य तक पहुंचाने में लेखक की निपुणता देखते ही बनती है। सभी कहानियों का परिवेश हमारे आस-पास का परिवेश है। परिवेश को जीवंत करते हुए लेखक पात्रों के मनोभावों व द्वंद्वों को भी प्रकट करता हुआ आगे बढ़ता है। कहानियों में कहीं विषय का भटकाव देखने को नहीं मिलता, जिससे शुरू से लेकर अंत तक रोचकता, जिज्ञासा व उत्सुकता बनी रहती है और पाठकों को बांधे रखती है। भाषा किसी भी रचना का महत्वपूर्ण तत्व होता है। ब्रह्म दत्त शर्मा अपनी कहानियों की भाषा में कहीं भी विद्वता प्रदर्शित करने का मोह नहीं करते। जगह-जगह मुहावरों का प्रयोग भाषा में सारगर्भिता लेकर आता है। पात्रों व परिवेश के अनुकूल भाषा पाठक की संवदेना को समृद्ध करती है। कोई भी रचना उद्देश्य के बिना नहीं लिखी जाती। संग्रह की हर कहानी अपने उद्देश्य के साथ न्याय करती है। डॉ. बी. मदन मोहन के अनुसार- ‘कहानी संग्रह की दस कहानियों में सृजन की गंभीरता, अनुभव की प्रौढ़ता, अभिव्यक्ति का कौशल, सामाजिक-प्रतिबद्धता एवं मानवीय मूल्यों के संरक्षण की चिंता साफ-साफ देखी जा सकती है।’

ब्रह्म दत्त शर्मा का पहला कहानी-संग्रह ‘चालीस पार’ 2010 में आया था। 2014 में ‘मिस्टर देवदास’ आया। 2016 में उत्तराखंड की प्राकृतिक त्रासदी पर आधारित उपन्यास ‘ठहरे हुए पलों में’ त्रासदी का यथार्थपरक चित्रण किया गया। 2020 के अंत में आए ‘पीठासीन अधिकारी’ को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया है। 2021 के शुरू में ही संग्रह का दूसरा संस्करण आ गया है। हम उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में ब्रह्मदत्त शर्मा की कलम से और बेहतरीन रचनाएं निकलेंगी और शब्द-संसार व संवेदनाओं को समृद्ध करेंगी।

समीक्षक
अरुण कुमार कैहरबा, हिन्दी प्राध्यापक, लेखक व स्तंभकार
वार्ड नं.-4, रामलीला मैदान, इन्द्री, जिला-करनाल, हरियाणा
मो.नं.-946622014

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