क्रान्तिकारी दल में आज़ाद का प्रवेश- विश्वनाथ वैशंपायन

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद

जेल में बेंतों की सजा खाने और उन घावों के ठीक हो जाने के पश्चात् आजाद काशी विद्यापीठ में भरती हो गए। 1921 में बनारस में महात्मा गांधी ने काशी विद्यापीट की स्थापना की थी। आज़ाद जब काशी विद्यापीठ में भरती हुए तो वह 1922 का समय था। गांधी जी के आन्दोलन के साथ-साथ देश में क्रान्तिकारी आन्दोलन भी चल रहा था। 1923 में क्रान्तिकारियों का एक केन्द्र बनारस में भी स्थापित हो गया और वहीं से फिर उत्तर प्रदेश में वह फैलता गया। 

जिन दिनों आज़ाद विद्यापीठ में भरती हुए उन्हीं दिनों वहाँ श्री मन्मथनाथ गुप्त तथा प्रणवेश चटर्जी भी पढ़ते थे। आजाद को विद्यापीठ में आया देख अनेक विद्यार्थियों को अत्यन्त आश्चर्य तथा कुतूहल हुआ। कुतूहल का एक कारण तो यह था कि वे अपनी अवस्था के अनुसार बहुत नीची कक्षा में भरती हुए, और दूसरा कुतूहल कुछ श्रद्धामिश्रित था, क्योंकि ये वही आज़ाद थे जिन्होंने देश की आजादी के लिए वेंत खाना स्वीकार किया, परन्तु माफी माँगना नहीं। आज़ाद के देर से विद्यापीठ में भरती होने का एक कारण यह भी था कि कुछ समय उन्होंने संस्कृत पढ़ने में बिताया था। 

बनारस में बंगाल के क्रान्तिकारी संगठन करने आ चुके थे और उनसे मन्मथनाथ तथा प्रणवेश चटर्जी इस दल की दीक्षा भी ले चुके थे। आज़ाद की देशभक्ति की चर्चा विद्यापीठ में तो थी ही, क्रान्तिकारियों की आँख उन पर लगी रही। प्रणवेश ने आज़ाद से मित्रता की और धीरे-धीरे उन्हें दल का सदस्य बना लिया। प्रणवेश अपनी इस सफलता पर अत्यन्त प्रसन्न थे। उन्होंने इसकी चर्चा मन्मथ से की। इस प्रकार श्री प्रणवेश चटर्जी की मार्फत आज़ाद हिन्दुस्तान प्रजातान्त्रिक संघ में आए। वैसे प्रणवेश आज़ाद से कहीं पुराने सदस्य थे, परन्तु आगे चलकर आज़ाद प्रणवेश से कहीं आगे निकल गए। इस तरह ‘गुरु गुड़ रह गए और चेला चीनी हो गए।’ अन्त में जब प्रणवेश काकोरी-पड्यन्त्र में पकड़े गए तो उन्होंने कमजोरी भी दिखाई। सजा होने के बाद उन्होंने चीफ कोर्ट में बयान दिया, जिसमें श्री मन्मथनाथ गुप्त तथा श्री जोगेशचन्द्र चटर्जी के विषय में बहुत कुछ बताया जो अभी तक पुलिस को मालूम नहीं हो सका था। जेल से छूटने के पश्चात् चटर्जी दिल्ली चले गए और शायद आत्मग्लानि से उन्होंने आत्महत्या कर ली। 

श्री मन्मथ ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि (प्रणवेश की दुर्घटना को छोड़) बनारस की एक विशेषता थी कि काकोरी-षड्यन्त्र में बनारस-केन्द्र के सदस्यों में से कोई मुखबिर नहीं बना। यदि दुर्भाग्य से कहीं ऐसा हो जाता तो बनारस के पकड़े गए सदस्यों में से बहतों को फाँसी और कालापानी की सजा मिलती। बनारस में क्रान्तिकारी दल के सदस्यों की संख्या भी काफी थी। प्रचार की दृष्टि से भी बनारस में अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य हआ। काकोरी-षड्यन्त्र में भी बनारस के सदस्य काफी थे और उन्हें काफी लम्बी सजाएँ मिली थीं। असहयोग आन्दोलन में जब आज़ाद थे तो उस समय की एक घटना का उल्लेख श्री शिवविनायक मिश्र ने अपने एक लेख में किया है। आज़ाद किस प्रकार प्रारम्भ से ही पुलिस की आँखों में धूल झोंकते थे, इसका यह एक उज्ज्वल उदाहरण है। एक बार सम्पूर्णानन्द जी ने कांग्रेस की एक नोटिस कोतवाली के पास चिपकाने के लिए कहा। आज़ाद ने वह नोटिस चिपकाना स्वीकार तो कर लिया परन्तु वहाँ पुलिस का कड़ा पहरा था। उन्होंने एक तरकीब सोची। वह नोटिस उन्होंने अपनी पीठ पर हल्का-सा चिपका कर उसके उल्टी तरफ काफी लेई लगा दी थी। कोतवाली के पास जाकर एक खम्भे से वे जा टिके, वहीं पुलिसवाला भी खड़ा था। वे पुलिसवाले से बातें करने लगे। इसी बीच उन्होंने खम्भे से लगे-लगे ही नोटिस खम्भे पर चिपका दिया। जब काम हो गया तो आज़ाद वहाँ से चले गए, क्योंकि पुलिसवाला भी इसी बीच दूसरी ओर चला गया था। थोड़ी ही देर में रास्ता चलनेवाले उस खम्भे पर चिपकी कांग्रेस की नोटिस को पढ़ने लगे। सिपाही भीड़ देख पास आया और खम्भे पर नोटिस देख हक्का-बक्का रह गया। आज़ाद के ऐसे साहस और बुद्धिमत्ता के अनेक उदाहरण उनके क्रान्तिकारी जीवन में बिखरे पड़े हैं। 

काशी विद्यापीठ में पढ़ते समय वे एक बार भावरा गए थे। वहाँ वे दस-पन्द्रह दिन माता-पिता के पास रह भी आए, इसके बाद उन्होंने घर से सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया। आज़ाद का स्वास्थ्य सदा से ही अच्छा था। बनारस में ही पाँच सौ इंड बैठकें वे नित्य प्रातः लगाया करते थे। झाँसी आने के बाद भी जब वे ओरछा के पास ढिमरपुरा गाँव में ब्रह्मचारी के वेष में रहे तो उस समय भी उनका व्यायाम का क्रम नहीं टूटा, परन्तु झाँसी लौट आने के पश्चात् जब उनके खाने-पीने की व्यवस्था ठीक न रही तो उनका व्यायाम छूट गया। सिर के बाल बढ़ाए, खादी की तहमत बाँधे तथा गले में यज्ञोपवीत पहने उस समय आज़ाद को जिन्होंने देखा है वे ही उनके उत्तम स्वास्थ्य की कल्पना कर सकते हैं। इस व्यायाम के कारण ही वे कभी बीमार नहीं पड़े, न कभी उन्होंने कोई दवा ही खाई। शाम को वे अक्सर भोजन न कर, पैसे पास होने पर आधा सेर दूध पी लेते थे और यदि उन्हें किसी दिन कब्ज की शिकायत हुई तो वे सेर भर गरम दूध पी लेते थे, जिससे उनका पेट साफ हो जाता था। अन्तिम दिनों में उनके शरीर में दर्द रहता था। अक्सर वे भूमि पर ही सोते थे, इस कारण उनका शरीर सबेरे अकड़ जाता था। इसलिए सबेरे उठने के पूर्व वे जो कोई भी पास होता उसे पीठ पर खड़ाकर पैरों से पीठ दबवाते। पाँच-सात मिनट इस प्रकार दबाने पर फिर वे उठ बैठते। 

जिस समय किसी व्यक्ति को दल का सदस्य बनाना होता तो पहले उसे क्रान्तिकारी साहित्य दे उसमें आन्दोलन के प्रति रुचि पैदा की जाती और इसी बीच यह भी पता लिया जाता था कि उस व्यक्ति का कहाँ तक इस ओर झुकाव हो सकता है। फिर यदि उसे योग्य समझा जाता तो दल का सदस्य बनाया जाता। जो पुस्तकें पढ़ने को दो जाती थीं, उनमें थीं ‘आनन्द मठ,’ ‘एशिया निवासियों के प्रति यूरोपियनों का बर्ताव.’ ‘बन्दी-जीवन’, ‘गुरुगोविन्द सिंह’, ‘शिवाजी’, ‘वीरा दी निहलिस्ट,’ मैक्सिम गोर्की की ‘मदर,’ ‘आयरलैंड की क्रान्ति तथा क्रान्तिकारियों का इतिहास’, ‘डीवेलरा’ का जीवन-चरित्र आदि। ये पुस्तकें आज़ाद बिना पढ़े ही लौटा देते क्योंकि जो किताबों में था उससे कहीं अधिक क्रान्तिकारी भावना उनमें पहले से हो जागृत हो चुकी थी, परन्त जिस पुस्तक के पढ़ने में उन्हें रुचि उत्पन्न हो जाती थी उसे पूरी पढ़कर उसे याद भी रखते थे। समय के साथ दल की विचारधारा में जो परिवर्तन होते रहे उन्हें समझने में आज़ाद किसी से पीछे नहीं रहे। वे उन सभी विचारों को आत्मसात् कर लेते थे। जवाहरलाल नेहरू से जब वे मिले और उस समय उन्होंने जो विचार प्रकट किए। वे किसी क्रान्तिकारी से कम नहीं थे। वे मार्क्सवाद को भी अच्छी तरह समझने का प्रयास करते थे। 

आज़ाद ने स्कूली शिक्षा अधिक नहीं पाई थी, फिर भी हिन्दी तो वे बखूबी पढ़ ही लेते थे, अभ्यास से बाद में अंग्रेजी भी काम चलाने के लिए काफी समझ लेते थे। अंग्रेजी का अध्ययन उन्होंने इसलिए किया कि उन दिनों अंग्रेजी के अखबारों में ही ताजे समाचार जल्दी आते थे। उनका नित्य का नियम था कि वे सबेरे उठते ही एक अंग्रेजी और एक हिन्दी का अखबार मँगवाते, अंग्रेजी अखबार मैं उन्हें पढ़कर सुनाता था। 

अखबार पढ़ना उन्हें इस कारण भी आवश्यक प्रतीत होता था कि क्रान्तिकारियों के विषय में, विशेषकर उनकी गिरफ्तारी आदि के विषय में तुरन्त पता चल जाए और उसके अनुसार वे अगली कार्यवाही कर सकें। इसलिए सबेरे के नाश्ते के लिए चाहे पैसा न रहे, पर वे अखबार अवश्य मँगाते थे। बाद में वे धीरे-धीरे स्वयं अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगे। पहले जो समाचार वे मुझसे पढ़वाकर सुनते और समझते उसे फिर वे स्वयं पढ़ते और समझते। धीरे-धीरे उन्हें अंग्रेजी अखबार स्वयं पढ़कर समाचार समझने का अभ्यास हो गया था। एक बार हमारे हाथ बम के खोल (shell) ढालने की एक पुस्तक लग गई। पुस्तक अंग्रेजी में थी। साथ ही उसमें चित्र भी दिए गए थे। पहले उन्होंने वह पुस्तक मुझसे पढ़वाई और फिर स्वयं उसे धीरे-धीरे पढ़कर खूब समझा। उसके बाद लाहौर में जो बम के खोल ढले थे उनमें सुधार कर कानपुर में बम ढालने का कारखाना खोला। इस कारखाने में दिन में चमारों के जूते ठोंकने के ठेके (एंगिल) बनते थे और रात को बम ढाले जाते थे। जब दिल्ली-षड्यन्त्र में इन बमों के विषय में सैनिक विशेषज्ञ की रिपोर्ट माँगी गई तो उसने यही लिखा कि ‘ये बम सेना के बमों से किसी प्रकार कम नहीं हैं।’ आज़ाद की इस सफलता का रहस्य उनकी अद्भुत लगन थी। जिस काम को करने की वे ठान लेते, उसे पूरा करने में वे दिन-रात एक कर देते थे। 

दल में आने के पश्चात् मन्मथ बाबू ने उनका परिचय दल के अन्य सदस्यों से कराया, जिनमें श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी, श्री राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी तथा श्री गोविन्दचरण कर थे। काकोरी के बाद श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी के परिचय से ही वे झाँसी आए थे। उसी समय श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी ने सदाशिव राव मलकापुरकर तथा भगवान दास माहौर और मेरा परिचय उनसे कराया था। सत्याग्रह आन्दोलन में आज़ाद ने यह देखा था कि नेता लोग नवयुवकों को आगे कर स्वयं पीछे रहते हैं और ब्रिटिश शासक नवयुवकों को ही चुन-चुनकर कड़ी से कड़ी सजा देते हैं, जिससे वे निरुत्साहित होकर पीछे हट जाएँ और आन्दोलन का क्रान्तिकारी रूप नष्ट हो जाए। क्रान्तिकारी आन्दोलन में अंग्रेजी हुकूमत ने नवयुवकों को आजीवन कारावास और फाँसी की सजा से कम दी ही नहीं। इन क्रान्तिकारियों के मुकदमों में निर्णय देते समय कानून की हत्या की जाती थी और कड़े-से-कड़े दंड की योजना की जाती थी। 1857 से लेकर 1942 तक के क्रान्तिकारी-आन्दोलन के इतिहास में ऐसे हजारों उदाहरण मिलेंगे। आज़ाद ने यह सब देखा और समझा था, इसीलिए नवयुवकों के उपयुक्त क्रान्तिकारी मार्ग को ही उन्होंने अपनाया और सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग पर वे जीवन की अन्तिम साँस तक अडिग रहे । दल के काम के आगे वे खाने-पीने की भी सुध भूल जाते। कम से कम पैसों में भोजन की व्यवस्था हो सके, उतने में वे गुजारा करते थे। … उन्होंने एक बार बताया था कि बनारस में रहते समय उन्हें पता चला कि गोपाल मन्दिर में नैवेद्य का पत्तल बहुत सस्ता मिलता है और उसमें दो व्यक्तियों का पेट आसानी से भर जाता है, तो वे कई दिन तक नियम से वह भोग का पत्तल ले आते और उसमें दो व्यक्तियों का पेट भर भोजन हो जाता। 

श्री मन्मथ ने आज़ाद की जीवनी में लिखा है, “बहुत से लोग यह समझते थे कि आज़ाद सैनिक के रूप में ही पार्टी के लिए सबसे अधिक उपयोगी थे, पर वास्तव में यह बात नहीं थी, वे योग्य संगठनकर्ता भी थे। वे जोगेन्द्र शुक्ल तथा रामकृष्ण खत्री को, जो उस समय स्वामी गोविन्द प्रकाश के नाम से प्रसिद्ध थे, दल में लाए।

श्री मन्मथ ने आज़ाद की जीवनी में लिखा है, “बहुत से लोग यह समझते थे कि आज़ाद सैनिक के रूप में ही पार्टी के लिए सबसे अधिक उपयोगी थे, पर वास्तव में यह बात नहीं थी, वे योग्य संगठनकर्ता भी थे। वे जोगेन्द्र शुक्ल तथा रामकृष्ण खत्री को, जो उस समय स्वामी गोविन्द प्रकाश के नाम से प्रसिद्ध थे, दल में लाए। श्री जोगेन्द्र शुक्ल ने एक बार तो ब्रिटिश शासन को झकझोर दिया था। गोविन्दप्रकाश जब पार्टी के सदस्य बनाए गए तब वे उदासी साधुओं के महामंडल के प्रान्तीय मन्त्री थे, वे एक महन्त के प्रधान शिष्य भी थे। अनेक महन्तों से उनकी जान-पहचान भी थी। वे यदि दल में न आते तो आज किसी महन्त की गद्दी पर बैठे होते। चन्द्रशेखर आजाद दल के काम के लिए धीरे-धीरे बनारस से बाहर भी जाने लगे। नेता के किसी आदेश का पालन करने में न तो वे कभी हिचकिचाए और न कभी उसकी अवहेलना ही की। आज़ाद की वीरता के तो सभी कायल थे, परन्तु साथ ही वे यह भी जानते थे कि वे अनुशासन का भी उतनी ही तत्परता से पालन करते हैं। इसी अनुशासन की लगन ने एक दिन उन्हें हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी के सेनापति पद पर आसी कराया। तब कौन जानता था कि आज़ाद एक दिन योग्य सेनापति भी होंगे। पार से ही आज़ाद के विषय में सभी की यही धारणा थी कि वे न तो कभी विपत्ति की चिन्ता करते थे, और न कभी संकट में अपना मानसिक सन्तुलन ही खोते थे। . 

आज़ाद में अभूतपूर्व साहस था। वे कहा करते थे कि बचपन में उन्हें शेर का मांस खिलाया गया था। शायद वे यह बात हँसी में कहा करते हों, परन्तु उनमें सिंह की सी निर्भीकता और साहस अवश्य था। वे जब ओरछा के ढिमरपुरा गाँव में सातार नदी के किनारे हनुमान जी की मड़िया के पास झोपड़ी में ब्रह्मचारी बनकर रहे थे तो वहाँ वे रात को अकेले ही सोते थे। लोगों को मालूम था कि वहाँ रात को हिंस्र पशु पानी पीने आते हैं, इसलिए वे ब्रह्मचारी जी को वहाँ सोने से मना करते, इस पर ब्रह्मचारी जी कहते “साधुओं को किसका डर बच्चा। उन्हें जब हम नहीं सताएँगे तो वे हमारे पास क्यों आएँगे और प्रभु की वैसी इच्छा ही होगी तो उसे कौन रोक सकता है।” और सचमुच जंगली जानवर कभी उनकी ओर नहीं आए। वे अपनी कुटिया में सोए रहते और जानवर नदी पर पानी पीकर लौट जाते। 

वे कुशल नेता थे, किसी भी योजना को वे तब तक कार्यान्वित नहीं करते थे जब तक कि वे उसे अच्छी तरह ठोंक-बजाकर देख न लेते। किसी भी एक्शन के बाद वे घटना स्थल का पूर्णतया निरीक्षण कर लेते कि वहाँ कहीं कोई ऐसी चीज या चिह्न तो नहीं छूट गया जिससे पुलिस को यह पता चले कि यह काम क्रान्तिकारियों का है। साण्डर्स-हत्याकांड में भगत सिंह के पिस्टल की मैगजीन गिर गई थी, आज़ाद चिल्लाए, ‘क्या करते हो मैगजीन छूट गई।’ यह सुनते ही बिजली की गति से राजगुरु जाकर मैगजीन उठा लाए। उस पर भी ये चिल्लाए ‘क्यों मरने जाता है।’ यों चिल्लाने का उनका इतना ही आशय था कि मैगजीन तो उठा ली जाए, पर उसे सचेत हो उठाने की आवश्यकता है। एक्शन में हत्या की पूर्व निर्धारित योजना होने पर ही वे हत्या होने देते थे, अन्यथा डकैती में वे हत्या के पक्ष में कभी नहीं रहे। ऐसे ही नियन्त्रण के कारण काकोरी केस के पूर्व उनके हाथ से एक स्त्री ने पिस्तौल छीन ली थी, जिसका पूर्ण विवरण इसी पुस्तक में आगे आएगा। 

एक बार एक एक्शन में शालिगराम शुक्ल के हाथ से अनजाने में हत्या हो गई। वास्तव में वे उस व्यक्ति का एक हाथ से मुँह बन्द किए थे और दूसरा हाथ उस व्यक्ति के गले पर था। जैसे-जैसे वह व्यक्ति चिल्लाने का प्रयत्न करता सालिग अपने दोनों ही हाथ कसते जा रहे थे। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही क्षणों में वह व्यक्ति शान्त हो गया। सालिग समझे वह बहोश हो गया है, परन्तु उसके प्राण-पखेरू कूच कर चुके थे। उस समय इस दुर्घटना का पता न चला। परन्तु दूसरे दिन जब यह समाचार अखबारों में प्रकाशित हुआ, तो आज़ाद को इसका अत्यन्त दुख हुआ और इसके लिए उन्होंने शालिगराम को बहुत डाँटा । प्रसंगावधान तो मानो उनका स्वभाव ही बन गया था। परन्तु जिसने प्राण हथेली पर रख लिए हों, शहादत जिसका जीवन-लक्ष्य हो, उसे भय किस बात का? आज़ाद स्वयं अनुशासन मानते थे और वे चाहते थे कि दल के सदस्य भी उसका पूर्ण रूप से पालन करें। इसीलिए उन्होंने पार्टी के निर्णय का कभी उल्लंघन नहीं किया। 

1923 के अन्त या 1924 के प्रारम्भ में रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व के समय की घटना है। इस दल में मन्मथनाथ गुप्त भी साथ थे। सदस्य शाहजहाँपुर से बनारस लौट रहे थे, साथ में हथियार भी थे। उस समय इस यात्रा में दल का नेतृत्व जो व्यक्ति कर रहे थे, अचानक उन्हें शंका हुई कि एक कारतूस कम है। अब उन्हें झक सवार हुई कि कारतूस गिने जाएँ। रेलगाड़ी में भला यह कैसे सम्भव हो सकता था। पर हुक्म था कि सभी अपने-अपने कारतूस गिनें। आखिर सभी ने अपनी-अपनी जेबों में हाथ डालकर कारतूस गिने। फिर भी कारतूस पूरे न हुए। फिर एक बार गिनती हुई पर कारतूस का पता न चला। तब टुकड़ी के नेता ने श्री मन्मथनाथ गुप्त को बुलाकर कहा-“चन्द्रशेखर को गोली चलाने का शौक है, उसी ने कारतूस चुराकर रख लिया होगा।” मन्मथ ने इसका विरोध किया, परन्तु नेता नहीं माने। उन्होंने उनकी तलाशी लेने का आदेश दिया, तब श्री मन्मथनाथ गुप्त ने कहा, “तलाशी होनी है तो सभी की हो, किसी एक की तलाशी लेना अनुचित होगा।” तब यह तय हुआ कि सभी की तलाशी ली जाए। इसीलिए सबसे पहले मन्मथ ने अपनी तलाशी दी। बाद में नेता की तलाशी हुई, उसके बाद अन्य सभी सदस्यों की। परन्तु कारतूस का पता नहीं चला। इस तलाशी पर सभी ने क्षोभ व्यक्त किया, परन्तु आज़ाद ने इसका तनिक भी बुरा नहीं माना। जब वे स्वयं कमांडर-इन-चीफ थे उस समय भी दल का निर्णय उन्हें शिरोधार्य होता था। केन्द्रीय समिति ने असेम्बली में बम फेंककर प्रदर्शन की योजना बना ली थी। उसमें निश्चय हुआ था कि बम फेंकने के बाद सरदार भगत सिंह और दत्त (बटुकेश्वर दत्त) आत्मसमर्पण कर देंगे। श्री चन्द्रशेखर आज़ाद इस पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि आत्मसमर्पण न किया जाए। बम फेंककर पर्चे बाँटे जाएँ और उसके बाद दोनों बाहर निकल आएँ। आज़ाद कार लेकर बाहर तैयार रहेंगे और दोनों को ही सुरक्षित निकाल ले जाएँगे। परन्तु उनकी बात स्वीकार नहीं की गई। नेता के नाते वे अपनी इच्छा पार्टी पर लाद सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और अनुशासन की प्रतिष्ठा बनाए रखा। क्रान्तिकारियों को क्रोध बहुत शीघ्र आता था, जो अवस्था में जितना छोटा होता, उतना ही उसमें जोश और क्रोध की मात्रा अधिक होती। श्री बटुकेश्वर दत्त जैसे शान्त प्रकृति के व्यक्ति बिरले ही होते थे, आज़ाद भी उस समय दल में छोटे ही थे। उन्हें अन्याय सहन नहीं था, वे तुरन्त उसका प्रतिकार करते। श्री मन्मथ ने ऐसी ही एक घटना का वर्णन किया है। 

ये लोग एक बार शाहजहाँपुर गए। वहाँ वे एक नवाब की कोठी में ठहरे। मन्मथ नवाब साहब के भांजे बने और बाकी सदस्यों में से कुछ इनके मित्र तथा नौकर बनी साथ में एक मैंचेस्टर राइफल थी जो एक साथी मन्मथ के पीछे-पीछे लेकर चल रहा था। नवाब साहब के नौकरों ने नवाब साहब के भांजे को कभी नहीं देखा था. इसलिए उन्होंने नवाब के भांजे के लिए कोठी खोल दी। यहाँ परिस्थिति नाजुक थी। एक दिन आज़ाद की एक साथी से बहस छिड़ गई। उसने झगड़े का रूप धारण कर लिया। दोनों के पास पिस्तौल थी। झगड़े का रूप देख दोनों के पास से पिस्तौलें छीन ली गईं। आजाद में एक बात थी कि वे जितनी जल्दी गुस्सा होते थे, उतनी ही जल्दी उनका क्रोध शान्त भी हो जाता था। जब आज़ाद के हाथों दल का नेतृत्व आया तो उनके स्वभाव में जमीन-आसमान का अन्तर हो गया, इसका प्रमाण यह घटना है। आगरे में हम लोग जोगेश बाबू को जेल से छुड़ाने की योजना में शामिल होने के लिए एकत्र थे। उस समय वहाँ भगत सिंह, राजगुरु, भगवान दास, विजय कुमार सिन्हा, जयदेव कपूर, बटुकेश्वर दत्त तथा कुछ अन्य साथियों के साथ मैं भी था। इतने सदस्यों के लिए दोनों समय होटल में भोजन के लिए पैसे देना सम्भव नहीं था, इसलिए सबेरे प्रति व्यक्ति को एक आना नाश्ते के लिए मिलता और दिन में एक बार भोजन बनता। दाल बन जाने के बाद दो व्यक्ति क्रम-क्रम से रोटी सेंकते और दो खाने बैठते। 

एक दिन भोजन बनाने का यह क्रम चल रहा था। राजगुरु और एक अन्य साथी रोटी बना रहे थे और दो व्यक्ति खा रहे थे। राजगुरु रोटियाँ सेंक रहे थे, इसलिए उनके हाथ में चिमटा तथा सँड़सी थी। रोटियाँ सेंकते-सेंकते उन्होंने सँड़सी आग में रख दी और जब वह गरम हो गई तो उस गरम सँड़सी से छाती पर तीन बार दाग लिया। पास बैठे साथी कुछ कहें उसके पूर्व ही सारी क्रिया समाप्त हो चुकी थी। एक साथी चिल्लाया, “क्या करते हो ?” राजगुरु की यह हरकत देख सभी सन्न रह गए और राजगुरु थे कि मुस्कुरा रहे थे मानो कुछ हुआ ही न हो। . विजय कुमार सिन्हा ने छाती पर जले स्थानों को देखकर कहा- “कैसे बेवकूफ हो जी!” कोई उत्तर नहीं ! मैंने पूछा-“रघुनाथ (यह राजगुरु का पार्टी का नाम था) तुमने यह क्या किया ?” तो बोले-“कुछ नहीं यार, देख रहा था कि पुलिस-टार्चर से विचलित तो नहीं होऊँगा।” 

आज़ाद उस दिन वहाँ नहीं थे, परन्तु रात ही को वहाँ आ पहुँचे। उनका स्वभाव था कि आते ही सभी साथियों को देख-सुन लेते। उन्हें जब रघुनाथ की हरकत मालूम हुई तो उन्होंने तुरन्त उसे बुलाया। हजरत आधी धोती ओढ़े सामने आए, जिससे छाती पर के घाव दिखाई न दें। “यह धोती क्यों ओढ़ रखी है ?” रघुनाथ चुप ! क्योंकि एक चुप्पी हजार बलाएँ टालती है, पर आज़ाद कब चुप बैठनेवाले थे। उन्होंने कहा, “धोती हटाओ !” फिर क्षण भर छाती के फफोलों को देखकर पूछा-“क्यों यह क्या है ?” नीचा सिर किए रघुनाथ ने उत्तर दिया, “मैं देख रहा था कि किसी दिन पुलिस यदि मुझे कहीं दागे तो उससे कितनी तकलीफ होगी और उसे मैं सहन कर सकूँगा या नहीं ?”  महाशय जी क्रोध से बोले-“तो किसी दिन तुम पिस्तौल की गोली भी अपने पर चलाकर देखोगे कि पुलिस द्वारा चलाई गई गोली लगने पर कितनी पीड़ा होती है और उसे सहन करने की शक्ति तुममें है या नहीं। लाओ पिस्तौल मेरे हवाले करो, तुम्हारा कोई भरोसा नहीं कि तुम कब क्या कर डालोगे।” राजगुरु उठे, पिस्तौल लाकर महाशय जी को दे दिया और जाकर चुपचाप सो रहे। हम लोगों की हँसी न रुक रही थी। राजगुरु भड़ककर बोले-“साले ! तुम्हीं लोगों ने डाँट लगवाई और अब हँस रहे हो।” बहुत देर तक यह चुहुलबाजी चलती रही। 

दूसरे दिन सबेरे आज़ाद ने रघुनाथ को पास बुलाकर बड़े प्रेम से समझाया और उसका रिवाल्वर उसे लौटा दिया। कहने का तात्पर्य यह कि नेतृत्व के साथ-साथ आज़ाद के जीवन में गाम्भीर्य आ गया था और प्रत्येक काम वे बड़ी जिम्मेदारी से करते थे। श्री रामप्रसाद बिस्मिल के कार्यकाल में भी रुपयों की बड़ी तंगी रहती थी। उसके लिए डकैतियाँ की जाती थीं। परन्तु इन डकैतियों में भय भी बहुत था, इसलिए रुपया प्राप्त करने के अन्य उपायों पर भी सोच-विचार किया जाता था और उन्हें कार्य रूप में परिणत करने के प्रयत्न भी किए जाते थे। श्री गोविन्द प्रकाश (श्री रामकृष्ण खत्री) साधु रह चुके थे, वे जानते थे कि एक महन्त अपनी गद्दी के लिए चेला ढूँढ़ रहा है। महन्त के पास काफी सम्पत्ति थी। दल ने उस धन को प्राप्त करने के लिए यह विचार किया कि दल के किसी सदस्य को महन्त का चेला बनाया जाए। सोचा गया था कि महन्त शीघ्र मर जाएगा और चेला महंत बनकर समस्त सम्पत्ति का अधिकार पा लेगा। आज़ाद को महन्त का चेला बनाने के लिए चुना गया। खत्रीजी ने सारी व्यवस्था कर दी। बनारस के पास गाजीपुर में यह उदासी अखाड़ा था। पहले तो आज़ाद इसके लिए तैयार नहीं हो रहे थे परन्तु उन्हें बताया गया कि महन्त बीमार रहता है और साल-दो साल में ही मर जाएगा और उसके बाद पार्टी के हाथ बड़ी जायदाद लगेगी, तो आज़ाद तैयार हो गए। साथ ही यह अनुशासन की भी बात थी। पार्टी का निश्चय था इसलिए आज़ाद को बात मान लेनी पड़ी। महन्त महोदय को यह नहीं बताया गया कि आज़ाद सत्याग्रह-आन्दोलन में जेल जाकर बेंतों की सजा पा चुके हैं। आज़ाद वहाँ चले तो गए परन्तु ऐसा लगा कि उन्हें पार्टी ने किसी बड़ी मुसीबत में ढकेल दिया है। वहाँ जाते ही उन्हें पहले गुरुमुखी सीखनी पड़ी। जिस पढ़ाई से वे दूर भागते थे, वही फिर उनके गले पड़ी। साथ ही जपजी को कंठस्थ करना पड़ा। कहाँ क्रान्ति का पुजारी और कहाँ यह आरती और पूजा-पाठ। कुछ दिन तो दल के लिए महान त्याग की भावना से वे सब करते रहे और सहते रहे, परन्तु जब असह्य हो गया तो महन्त से छिपाकर उन्होंने रामकृष्ण खत्री को पत्र लिखा ‘मेरी तबीयत बिल्कल नहीं लगती, जल्दी आओ और साथ में मन्मथ को लाकर मुझे यहाँ से मुक्ति दिलाओ।’ 

आज़ाद के इस सन्देश ने सदस्यों को व्यग्र कर दिया। आखिर श्री खत्री तथा मन्मथ ने वहाँ जाकर आज़ाद की हालत देखना तय किया। खत्री साधु होने के कारण वहाँ बड़ी आसानी से जा सकते थे, परन्तु मन्मथ का जाना जरा कठिन था। तब मन्यथ को एक भक्त के रूप में लेकर खत्री जी रवाना हुए। श्री मन्मथ का नाम रखा गया आप्टे। गाजीपुर पहुंचने पर ये लोग मठ में पहुँचे। मठ एक गढ़ी के समान था। उसे देखकर ही यह समझा जा सकता था कि यह हमेशा से मठ ही नहीं रहा होगा और भी किसी काम में आता रहा होगा। दोनों ही मठ में पहुँचे। स्वामी गोविन्द प्रकाश जी ने आप्टे जी का परिचय कराया। “ये साधुओं के परम भक्त हैं, आपकी कीर्ति सुन दर्शनार्थ आए हैं।” 

मन्मथ जी उर्फ आप्टे ने तुरन्त महन्त जी के पैर छुए, इधर-उधर की बातें होने के पश्चात् गीता पर भी चर्चा हुई। चर्चा के साथ-साथ आप्टे जी की आँखें महन्त जी के चेले आज़ाद को ढूँढ़ रही थीं। स्वामी गोविन्द प्रकाश भी उसी की तलाश में आँखें दौड़ा रहे थे, परन्तु दृष्टि दीवारों या महन्त के नौकरों से टकराकर वापस आ जाती थी। उनके मन में महन्त की यह गढ़ी देख प्रसन्नता हो रही थी, यह सोच-सोचकर कि एक दिन यह गढ़ी महन्त के मरते ही दल के हाथ में होगी। यहाँ गोली चलाने का अभ्यास भी बड़ी आसानी से किया जा सकेगा। गोविन्दप्रकाश जी ने मठ घूमने का प्रस्ताव किया, इस आशा से कि कहीं आज़ाद से भेंट हो जाए और जब ये लोग मठ देखने निकले तो इसी समय आज़ाद कहीं से आ टपके। आज़ाद के शरीर पर गेरुआ वस्त्र तो था परन्तु मन अत्यन्त असन्तुष्ट और अस्वस्थ था। दोनों ने आज़ाद को देखा तो इच्छा हुई कि उनसे लिपटकर गले मिलें, परन्तु वह सम्भव नहीं था क्योंकि वहाँ तो सभी यह जानते थे कि आप्टे और चेले की कोई पहचान नहीं है। आप्टे जी का परिचय आज़ाद से कराया गया। आप्टे जी ने आज़ाद के पैर छुए। आज़ाद के मुरझाए चेहरे पर हँसी की रेखा दौड़ गई। हम लोग एक जगह जाकर बैठ गए और बातें करने लगे। महन्त के दूर निकल जाने पर आज़ाद ने कहा, “यह साला अभी नहीं मरने का, डंड पेलता है और खूब दूध पीता है। गुरुमुखी पढ़ते-पढ़ते तो मेरी आँखें फूटी जा रही हैं। मैं तो यहाँ नहीं रहूँगा।” 

शाम की गाड़ी से ये दोनों वापस लौट आए; आज़ाद को यह आश्वासन देकर कि राजेन्द्र लाहिड़ी से परामर्श करने के बाद उन्हें सूचित किया जाएगा, परन्तु राजेन्द्र लाहिड़ी से परामर्श होने के पश्चात् भी ये लोग किसी निर्णय पर न पहुँच सके। बात वहीं रह गई। कुछ दिन बाद अचानक एक दिन आज़ाद बनारस आ धमके। उनकी कहानी सुनते-सुनते सभी लोट-पोट हो जाते। अब पार्टी ने महन्ती की आशा छोड़ दी। आज़ाद मश्किल से दो महीने महन्त की गद्दी के उम्मीदवारों में रहे, बाद में वे फिर बनारस में रहकर दल का काम जोर-शोर से करने लगे। 

सन् 1924 में भारतीय क्रान्तिकारी दल की ओर से सारे भारत में रंगून से पेशावर तक एक अंग्रेजी परचा बाँटा गया। यह परचा श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल ने लिखा था। लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि दल का विस्तार इतना अधिक है। विपिनचन्द्रपाल ने तो शंकित हो यहाँ तक कह डाला था कि परचा पुलिस द्वारा बँटवाया गया है। इस परचे के बँटने का समाचार पत्रों में छपा तो उससे पार्टी के प्रति उन लोगों की श्रद्धा बढ़ी और उसके विषय में उत्सुकता भी हुई। यह परचा बनारस से ही देश के विभिन्न प्रान्तों में भेजा गया था। बनारस के लक्सा मोहल्ले में क्रान्तिकारियों ने एक मकान ले रखा था। इसमें सामने के कमरे में तबला, हारमोनियम, बीड़ी, माचिस आदि पड़ा रहता था, ताकि देखनेवाले लोग यह समझें कि यहाँ कुछ शोहदे जमा होकर लफंगाई करते हैं। ऐसा सब करने का उद्देश्य यही था कि लोग चाहे गुंडा या आवारा समझें, पर क्रान्तिकारी न समझें। यहाँ आज़ाद भी आया करते थे। पैमप्लेट का जो बंडल आया वह इसी मकान में खोला गया और उसके अनेक छोटे बंडल बनाकर उन्हें उत्तर प्रदेश के केन्द्रों को भेजा गया। इन परचों के बंडल बनाने तथा उनके वितरण में जिन लोगों ने भाग लिया था उसमें आज़ाद भी थे। आज़ाद ने परचे बाँटने में सबसे अधिक सफलता प्राप्त की थी। काशी विद्यापीठ के एक अधिकारी ने जब दफ्तर खोला तो दफ्तर के हर रजिस्टर से वह परचा निकला। इसका रहस्य यही था कि आज़ाद ने दफ्तर के एक चपरासी को अपना मुरीद बना लिया था, जिसकी यह करामात थी। बनारस के कोने-कोने में यह परचा बँटा था और एक तहलका-सा मच गया था। . चन्द्रशेखर आज़ाद स्वभाव से जोशीले थे और दल के कार्यों के करने में बड़ी उत्सुकता दिखाते थे, इसी गुण से दल के सदस्यों में वे प्रिय हो गए थे। रामप्रसाद बिस्मिल ने उनका नाम ‘क्विक सिल्वर’ यानी पारा रखा था। दल के कुछ लोग इनके जोशीलेपन से प्रसन्न तो थे परन्तु चाहते थे कि आज़ाद कुछ कम जोशीले होते तो अच्छा होता। वे मन्मथ जी के अधिक निकट होने के कारण उनके घर आया-जाया करते थे। दल के काम की जब भी चर्चा होती तो आज़ाद की एक ही रट होती, “कोई एक्शन हो।” एक्शन माने डकैती या हत्या। क्रान्तिकारियों में रिवाल्वर या पिस्तौल को ‘चीज’ कहा जाता था। आज़ाद के इसी जोश के कारण पार्टी द्वारा जहाँ कहीं एक्शन आयोजित होता उसमें आज़ाद को अवश्य भेजा जाता। पार्टी द्वारा ऐसा करने के दो कारण थे। एक तो यह कि वे तगड़े थे और दूसरे इनके विषय में यह विश्वास था कि वे पकड़े जाने पर भी पुलिस को भेद नहीं देंगे। ऐसी अनेक डकैतियों में आज़ाद के साथ मन्मथ भी गए थे। इन डकैतियों का नेतृत्व रामप्रसाद बिस्मिल करते थे। 

मन्मथ ने प्रतापगढ़ के पास एक डकैती का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया है, उसमें उन्होंने लिखा है कि इस डकैती में आज़ाद के हाथ से एक स्त्री ने पिस्तौल छीन ली थी, जिस पर वे अत्यधिक छटपटाए थे। पिस्तौल छिन जाने का कारण था नेता का यह आदेश कि स्त्रियों पर हाथ न उठाया जाए और उन पर गोली भी न चलाई जाए। … 

क्रान्तिकारी दल प्रतापगढ़ के पास एक गाँव में एक सूदखोर महाजन के घर डकैती करने गया। इस दल में आठ व्यक्ति थे। जब ये गाँव में घुसे तो गाँववालों ने इन्हें रोका पर जब उन्हें यह पता चला कि वे महाजन के यहाँ जा रहे हैं तो किसी ने इस विषय में अधिक उत्सुकता नहीं दिखाई। इन सबके पास हथियार थे जो छिपे हुए थे। महाजन के मकान में घुसते ही इन लोगों ने अपना असली रूप प्रकट किया। डकैती करने का तरीका यह होता था कि निश्चित स्थान पर पहुँचकर पहले कुछ गोलियाँ चला दी जाती थीं जिससे लोग भयभीत हो आगे न बढ़ें। यहाँ भी ऐसा ही किया गया। रामप्रसाद नेता थे और वे दरवाजे पर ही खड़े थे। गोलियों की आवाज को गाँववाले पहले तो पटाखों की आवाज समझे, परन्तु बाद में वे गोल बनाकर घर की ओर आए तथा रामप्रसाद बिस्मिल पर टूट पड़े। शचीन्द्रनाथ बख्शी ने आकर उन्हें पकड़े जाने से बचाया। 

अन्दर जो हो रहा था वह और भी अजीब था। अन्दर मन्मथ तथा आज़ाद स्त्रियों को डरा-धमकाकर चुप बैठा रहे थे। मन्मथ ने लिखा है कि इन स्त्रियों में एक स्त्री हमारी माँ की अवस्था की थी और दूसरी उससे कम अवस्थावाली। ये दोनों ही बड़ी लड़ाकू साबित हुईं। वे हम पर हमला करने लगीं। रिवाल्वर की धमकी दी तो वे और आगे बढ़कर जूझ पड़ीं। उन्होंने इतना बल प्रयोग किया कि हम समझे कि हम अब खत्म हुए। अजीब परिस्थिति थी। वे हमारे रिवाल्वरों को पकड़े थीं और हमें मार रही थीं। हम रिवाल्वर नहीं छीनने दे सकते थे, इसलिए पूरी ताकत लगाकर अपने रिवाल्वर छीनने का प्रयल करते रहे। मैंने तो किसी तरह अपना रिवाल्वर छीन लिया, परन्तु उन दोनों ने मिलकर आज़ाद से उनका रिवाल्वर छीन लिया और उनमें से एक उसे ले भाग खड़ी हुई। आज़ाद उन दिनों अधिक तगड़े नहीं थे। रिवाल्वर छिन जाने से वे क्रोध से पागल हो रहे थे। यदि उनका बस चल जाता तो वे मेरा रिवाल्वर छीनकर उस स्त्री का पीछा करते, परन्तु इसी बीच हुक्म हुआ कि हम लौट चलें। लौटते समय आज़ाद ने हमारे कप्तान पं. रामप्रसाद बिस्मिल को यह रिपोर्ट देना चाहा, परन्तु गाँववालों के बढ़ते दबाव के कारण हम वापस जाने की जल्दी में थे, इसलिए बात अधूरी रह गई। हमें लौटते देख गाँववालों ने ईंट-पत्थर बरसाने शुरू किए। यही गनीमत थी कि इनके पास लाठी-भाले तो थे पर बन्दूक या रिवाल्वर नहीं थे, अन्यथा अनर्थ हो जाता। इसके पहले हुई गाँव की डकैतियों में गाँववालों ने कभी पीछा नहीं किया था। यहाँ पीछा करने का कारण शायद यह था कि यहाँ के गाँववाले यह समझ रहे थे कि हमारे पास जो हथियार हैं वे नकली हैं। इसी बीच चलते-चलते राजेन्द्र लाहिड़ी एक पत्थर से ठोकर खाकर एक गढ़े में गिर गए। उन्हीं के पास रुपयों की गठरी थी। लाहिड़ी गढ़े से निकलकर फिर पैसे के लिए वापस गढ़े में उतरना चाहते थे, पर उन्हें रामप्रसाद जी ने रोक दिया। गठरी गिरी देख कुछ गाँववाले तो उसे निकालने में व्यस्त हो गए और बाकी पीछा करना बेकार समझ वहीं रुक गए। 

परन्तु इसी बीच बन्दूक की आवाज सुन एक अन्य गाँव के लोग लालटेन और लाठियाँ लेकर मैदान में आ डटे थे। पंडितजी ने परिस्थिति समझकर हमें रुकने के लिए कहा और जब भीड़ कुछ चालीस-पचास गज पर आ गई तो भीड़ को निशाना बनाकर उन्होंने दो गोलियाँ चलाईं। गोली चलते ही एक आदमी चीखकर गिर पड़ा और उसका परिणाम यह हुआ कि लोगों ने पीछा करना बन्द कर दिया। लोग समझ गए कि हमारे पास जो हथियार हैं वे खिलौने नहीं, बल्कि वास्तविक हैं और उनसे आदमियों की मृत्यु भी हो सकती है। इतना होने पर भी एक-दो साहसी व्यक्ति हमारा पीछा करते ही रहे।  रात्रि की नीरवता में हम जल्दी-जल्दी आगे बढ़ते गए। अब गाँववालों ने पीछा करना छोड़ दिया था, परन्तु यह घटना हमारे लिए दुखद सिद्ध हुई। हाथ कुछ भी नहीं लगा बल्कि हमने एक रिवाल्वर भी गाँठ का खो दिया। इसके बाद एक-दूसरे गाँव में डकैती डाली गई, इसमें भी आज़ाद ने भाग लिया। इसका भी नेतृत्व पं. रामप्रसाद बिस्मिल ने ही किया था। इस बार दल के लोगों ने पुलिस वालों की वर्दी पहनी थी। रामप्रसाद बहुत गोरे थे, इसलिए वे पुलिस कप्तान बने। बनारस के एक सदस्य जिनकी लम्बी डाढ़ी थी, सिख पुलिस दरोगा बने और बाकी सब मामूली सिपाही। यह सब इसलिए किया गया था कि मकान के दरवाजे आसानी से खुल सकें।  इस बार पूर्ण सफलता मिली। गाँववाले यही समझे कि पुलिसवाले मकान की तलाशी ले रहे हैं, परन्तु घर के अन्दर क्या हो रहा था यह किसी को मालूम नहीं हो सका, जब ये लोग गाँव से सही-सलामत चले गए, तब कहीं यह आवाज उठी कि ये लोग वास्तव में पुलिसवाले नहीं थे। अन्त में पार्टी गाँवों की डकैतियों से ऊब गई, क्योंकि इसमें संकट अधिक रहता और लाभ नगण्य, इसलिए इस विषय में एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसमें यह निश्चय किया गया कि भविष्य में किसी गाँव या व्यक्ति विशेष के घर डाका न डाला जाए, इससे पार्टी की प्रतिष्ठा को धक्का लगता है और साथ ही दल को हानि उठानी पड़ती है, इसलिए भविष्य में रेलों या बैंकों की ही सम्पत्ति लूटी जाए। 

हाँ, ऐसे अभियानों से एक ही लाभ होता था कि सदस्यों को वास्तविक मौका आने पर किस प्रकार सामना करना चाहिए, इसकी ट्रेनिंग प्रत्यक्ष कार्य के रूप में मिलती थी। साथ ही साथियों की एक प्रकार से परीक्षा भी हो जाती थी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने इन ‘एक्शनों’ से बहुत कुछ सीखा और यह सब उनके काम आया। यह बात अलग है कि इन अनुभवों के लिए दल को कभी-कभी भारी कीमत चुकानी पड़ी। गाँवों में डकैती न करने का निर्णय तो किया गया, परन्तु पं. रामप्रसाद के नेतृत्व तक ही इस निर्णय पर अमल हो सका। षड्यन्त्र के बाद सरदार भगत सिंह तथा यतीन्द्रनाथ दास आदि ने जो दल बनाए उनमें कभी-कभी गाँवों में डकैतियाँ डालने की योजनाएँ बनीं और एक-दो बार डकैतियाँ डाली भी गईं। लाहौर-षड्यन्त्र के मुकदमे में एक यह भी अभियोग था कि बिहार के मौलनिया नामक गाँव में क्रान्तिकारियों ने डकैती डाली थी। श्री जोगेन्द्र शुक्ल तथा उनके साथियों को इस डकैती में सजा दी । पं. रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व काल में क्रान्तिकारियों के विषय में जनता को । तो जानकारी ही थी और न उनके प्रति सहानुभूति ही इस हद तक थी कि लोग कई खुलकर या चोरी-छिपे इतनी आर्थिक सहायता देते कि उन्हें दल की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए डकैतियों का सहारा न लेना पड़ता। हाँ, दो बार श्री शिवप्रसाद गप्त ने पार्टी को पाँच-पाँच सौ रुपए की मदद दी थी। जब गाँव की डकैतियाँ बन्द कर दी गईं तो निश्चय किया गया कि सरकारी खजाना लूटा जाए और इसके लिए खोज चालू हुई और अन्त में काकोरी ट्रेन डकैती की योजना बनी। योजना बनाते समय यह बात निश्चित कर ली गई कि इसमें दल का राजनैतिक रूप स्पष्ट रहे, जिससे जनता पर इसका अच्छा प्रभाव पड़े तथा सरकार के दमन के प्रतिकार को भी राजनीतिक रूप दिया जा सके। इस घटना के कुछ दिन पूर्व दल के एक सदस्य श्री रवीन्द्र मोहन को जब पुलिस किसी अन्य प्रकार न फाँस सकी तो उनको आवारा घोषित कर सजा दे दी थी। सदस्य इस घटना से बहुत क्षुब्ध थे और इसका भी प्रतिकार करना चाहते थे। 

काकोरी ट्रेन डकैती की योजना पर जब विचार हो रहा था तो श्री अशफाक उल्ला ने इस नीति का विरोध किया था। उनका कहना था कि हम यह काम करके सरकार को चुनौती तो अवश्य दे देंगे, परन्तु यहीं से पार्टी के अन्त का प्रारम्भ हो जाएगा, क्योंकि दल अभी उतना संगठित और दृढ़ नहीं है, इसीलिए अभी सरकार से सीधा मोर्चा लेना ठीक नहीं होगा, परन्तु अन्त में डकैती करने का ही निश्चय हुआ। आज़ाद तो उस समय सदा ही ऐसे कार्यों के पक्ष में होते थे, जिनमें उन्हें अपने साहस और वीरता से काम करने का अवसर मिले। 

जिस प्रकार पं. रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काम करनेवाले दल में आज़ाद को प्रत्येक एक्शन में जाने की इच्छा रहती और वे अपनी इच्छा प्रगट करते रहते थे, उसी प्रकार आज़ाद के नेतृत्व में काम करनेवाले दल में राजगुरु थे। उन्हें किसी एक्शन का पता भर चल जाए कि वह होनेवाला है, वे तुरन्त आज़ाद के पास पहुँचकर उनसे कहते “महाशय जी मुझे इसमें अवश्य भेजिए।” उनके इस शौके-शहादत से तंग आकर कभी-कभी आज़ाद उनसे कहते “रघुनाथ तू ससुरे बहुत लुकलुक करता है। इतनी अधिक लुकलुक न किया कर।” पर वे अपनी आदत से लाचार थे। साण्डर्स वध-कांड के समय राजगुरु को आज़ाद ने साथ लिया था। इससे राजगुरु बहुत प्रसन्न हुए थे और उसमें उन्होंने ही पहली गोली ऐसा निशाना साधकर चलाई थी कि साण्डर्स वहीं ढेर हो गया था।

जिस प्रकार पं. रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काम करनेवाले दल में आज़ाद को प्रत्येक एक्शन में जाने की इच्छा रहती और वे अपनी इच्छा प्रगट करते रहते थे, उसी प्रकार आज़ाद के नेतृत्व में काम करनेवाले दल में राजगुरु थे। उन्हें किसी एक्शन का पता भर चल जाए कि वह होनेवाला है, वे तुरन्त आज़ाद के पास पहुँचकर उनसे कहते “महाशय जी मुझे इसमें अवश्य भेजिए।” उनके इस शौके-शहादत से तंग आकर कभी-कभी आज़ाद उनसे कहते “रघुनाथ तू ससुरे बहुत लुकलुक करता है। इतनी अधिक लुकलुक न किया कर।” पर वे अपनी आदत से लाचार थे। साण्डर्स वध-कांड के समय राजगुरु को आज़ाद ने साथ लिया था। इससे राजगुरु बहुत प्रसन्न हुए थे और उसमें उन्होंने ही पहली गोली ऐसा निशाना साधकर चलाई थी कि साण्डर्स वहीं ढेर हो गया था। आपको एसेम्बली बम योजना में नहीं भेजा गया, उसके लिए आप बड़े दुखी हुए थे। पकड़े गए तो अन्दर भी वे सरकार के साथ संघर्ष में सबसे आगे रहने का प्रयत्न करते। उन्हें जब भगत सिंह के साथ फाँसी पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो वे फूले न समाए। साथी कहते हैं कि उन्हें इतना प्रसन्न पहले कभी नहीं देखा गया था। कार्य की लगन और मर मिटने की तमन्ना और शौके-शहादत की उत्सुकता की चर्चा करते हए श्री भगवान दास माहौर ने राजगुरु के अपने संस्मरण में लिखा है-ऐसा लगता है कि फाँसी का तख्ता गिर जाने के बाद भी दिल की धड़कन बन्द होने से पूर्व यदि राजगुरु फाँसी की काली टोपी के बाहर आँख खोलकर एक बार देख सकते, तो उस दीवाने ने यही देखने की कोशिश की होती कि कहीं भगत सिंह मुझसे पहले तो नहीं…और उस समय भी भगत सिंह के ओठों पर राजगुरु का यह पागलपन देखकर अपने जीवन की अन्तिम और सबसे मधुर मुस्कान खिल जाती और यदि वे कह सकते तो कहते, “शौके-शहादत तो हम सबकी ही रही है भाई ! पर तू तो सरापा शौके-शहादत है, हार गए तुझसे।” 

कुर्बानी की ऐसी विचित्र स्पर्धा क्रान्तिकारियों में ही होती थी। आज़ाद की उत्सुकता और राजगुरु का उतावलापन उस दीवानगी के कुछ बेजोड़ उदाहरण हैं। 

काकोरी ट्रेन डकैती की योजना में यह निश्चय किया गया कि जब ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर खड़ी हो तो उसे लूट लिया जाए। ऐसा करते समय पहले गार्ड, ड्राइवर तथा स्टेशन मास्टर को पकड़ रखना होगा। इस समय आज़ाद की भावना तो यहाँ तक थी कि गार्ड या ड्राइवर यदि अंग्रेज या एंग्लो इंडियन हों तो उन्हें मार डाला जाए। ब्रिटिश शासन काल में मेल पैसेंजर और एक्सप्रेस गाड़ियों के ड्राइवर तथा गार्ड अधिकतर अंग्रेज या एंग्लो-इंडियन होते थे, हिन्दुस्तानियों को ये पद नहीं दिए जाते थे। हाँ कुछ पारसी ड्राइवर अवश्य हो गए थे, बाकी कोई हिन्दुस्तानी इन गाड़ियों का गार्ड या ड्राइवर नहीं हो सकता था। दल के तत्कालीन नेता पंडित रामप्रसादजी डकैती में ऐसी हत्याओं के विरोधी थे। इस एक्शन के लिए उन्होंने यह शर्त रखी थी कि सदस्य जब उन्हें यह आश्वासन दें कि किसी की हत्या नहीं की जाएगी तभी वे इस योजना का नेतृत्व करेंगे। उनकी यह शर्त स्वीकार कर ली गई थी। 

इस योजना के अनुसार सहारनपुर की ओर से लखनऊ आनेवाली आठ नम्बर डाउन ट्रेन के खजाने को लूटने का निश्चय किया गया, क्योंकि यह पैसेंजर गाड़ी मार्ग के छोटे-छोटे स्टेशनों की रकम लेकर आती थी। यह निश्चय हआ कि किसी दिन इसी ट्रेन को मार्ग में दो स्टेशनों के बीच रोककर लूटा जाए। निश्चित दिन इस कार्य के लिए विभिन्न क्षेत्रों से साथी लखनऊ में जमा हुए। कुछ तो छेदीलाल धर्मशाला में ठहरे और बाकी जिनके अपने विश्वास योग्य स्थान थे वे सब अपने-अपने स्थान पर जा टिके। __उस दिन दस सदस्य स्टेशन की ओर पैदल रवाना हुए। वहाँ गाड़ी से पहले ही पहुँचना था, और जैसे ही गाड़ी स्टेशन पर रुके, गार्ड, ड्राइवर तथा स्टेशन-मास्टर को कब्जे में कर गाड़ी का खजाना लूटना था। परन्तु पैदल चलकर जाने में देर हो गई और जब लोग स्टेशन के आउटर सिगनल पर पहुंचे तो गाड़ी लखनऊ की ओर जा रही थी। एक व्यक्ति को यह देखने के लिए भेजा कि जो गाड़ी गई है वह वही थी या दूसरी कोई ? उस व्यक्ति ने लौटकर बताया कि वह वही आठ डाउन गाड़ी थी। यह सुन सभी को निराशा हुई परन्तु और कोई चारा नहीं था। इसलिए सभी वापस लखनऊ के लिए फिर पैदल चल पड़े। 

9 अगस्त 1925 को फिर दूसरी योजना बनी। इस बार यह निश्चय हुआ लखनऊ से पश्चिम की ओर जानेवाली गाड़ी पर सवार होकर अगले स्टेशन पर जाकर उतरा जाए और वहीं से आठ डाउन पैसेंजर पर सवार हुआ जाए। जंक्शन पर पहुँचकर जब आठ डाउन पैसेंजर पर चढ़े तो श्री अशफाक उल्ला. शचीन्द्रनाथ बख्शी तथा राजेन्द्र लाहिड़ी सेकेंड क्लास में सवार हुए। उन्हें यह काम सौंपा गया कि वे निश्चित स्थान पर जंजीर खींचकर गाड़ी खड़ी कर दें। बाकी सात व्यक्ति-पं. रामप्रसाद बिस्मिल, केशव चक्रवर्ती, मुरारीलाल, मुकुन्दीलाल, चन्द्रशेखर आज़ाद, बनवारीलाल तथा मन्मथनाथ गुप्त जो तीसरे दर्जे के डिब्बे में सवार हुए थे, उनमें से कुछ को गार्ड तथा ड्राइवर को पकड़ने का काम सौंपा गया था और बाकी लोगों को गाड़ी के दोनों और पहरा देने तथा खजाने पर कब्जा करने का। जिस समय गाड़ी की जंजीर खींची गई अँधेरा हो चला था। गाड़ी रुकते ही सभी अपने-अपने निश्चित कार्य पर जुट गए। 

गार्ड और ड्राइवर को तुरन्त पेट के बल लिटा दिया गया तथा तिजोरी को नीचे गिरा दिया गया। तिजोरी काफी वजनी और मोटी थी। तिजोरी तोड़ने के लिए हथौड़ा-छेनी तैयार थी। गाड़ी के दोनों ओर दो साथी पिस्टल लेकर पहरा दे रहे थे। इस बार बन्दूकें साथ नहीं लाई गई थीं, क्योंकि माउजर पिस्टल को जब उनके केसों में लगे कुन्दे पर चढ़ा दिया जाता है तो वे बन्दूक का काम दे जाते हैं। माउजर की गोली, पिस्टल या रिवाल्वर की गोली से बड़ी, पर बन्दूक की गोली से कुछ छोटी रहती है और इसकी मार की दूरी भी काफी होती है। इस गाड़ी में एक अंग्रेज मेजर तथा खजाने के साथ सशस्त्र पुलिस भी थी। इसलिए गोली चलने की सम्भावना से भी सावधानी बरतना आवश्यक था। गाड़ी रुकते ही यह घोषणा कर दी गई थी कि “क्रान्तिकारी केवल सरकारी खजाना ही लूटेंगे किसी भी मुसाफिर के माल को आँच नहीं आएगी। इसलिए कोई भी मुसाफिर गाड़ी से नीचे उतरने का प्रयत्न न करें।” लोग इसे कोरी धमकी न समझें इसलिए बीच-बीच में गोलियाँ चलाई जाती थीं। सेफ तोड़ने में कठिनाई होते देख श्री अशफाक ने अपना माउजर श्री मन्मथ को दे उसे पहरे पर खड़ा किया और वे स्वयं सेफ पर घन चलाने लगे। उस समय पंडित रामप्रसाद के बाद दल में श्री अशफाक ही सबसे तगड़े थे। श्री अशफाक की हथौड़ी की मार से मोटी तिजोरी भी मँह खोल अन्दर का खजाना उगलने के लिए विवश हो गई। हथौड़े की चोट चारों ओर गूंज रही थी और तिजोरी के टूटने के साथ-साथ सभी के मुंह पर प्रसन्नता की झलक प्रस्फुटित हो रही थी। इसी बीच लखनऊ की ओर से रेलगाड़ी आने की आहट सुनाई दी। प्रतिक्षण वह गाड़ी नजदीक आती जाती थी और दिलों में नाना प्रकार की शंकाएँ उठ रही थीं। “गाड़ी क्यों और कैसे आ रही है ? क्या अधिकारियों को इतनी जल्दी पता चल गया; परन्तु यह कैसे सम्भव है” इत्यादि। सभी ने आदेश के लिए नेता की ओर देखा। ‘बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में काकोरी ट्रेन डकैती के ऐसे दो प्रयलों का उल्लेख नहीं किया है। उनके अनुसार सब लोग उसी सहारनपुर पैसेन्जर ट्रेन में सवार थे-सम्पादक। यह तो निश्चित ही था कि यदि मोर्चा लेने की बात आती तो डटकर मुकाबला होगा। अन्धकार में केवल हथौड़े के चोट का शब्द गूंज रहा था, यात्री चुपचाप बैठे थे। धीरे-धीरे आनेवाली गाड़ी के इंजन का सर्चलाइट दिखाई देने लगा। रेलगाड़ी तेजी से क्या आ रही थी मानो भीषण संकट ही तेजी से चला आ रहा था। क्रान्तिकारी भावी संकट की कल्पना कर रहे थे, ‘गोली चलेगी। कितनों की मृत्यु हो कौन जाने ?’ और उन कुछ क्षणों में न जाने ऐसे कितने चित्र आँखों के सामने आए-गए। श्री रामप्रसाद बिस्मिल ने घटना पर विचार किया। उन्होंने देखा कि जहाँ पैसेंजर खड़ी है, वहाँ दोहरी लाइन है। उसे देखते ही उन्हें स्मरण हो आया कि यह पंजाब मेल के आने का समय है। उन्होंने तुरन्त साथियों को इसकी सूचना दे आश्वस्त किया। तब तो सभी को ध्यान आया कि यह पंजाब मेल जाने का समय है, क्योंकि उन दिनों टाइम टेबिल बड़े ध्यान से दिन में कई-कई बार देखा जाता था। अब मन में दूसरी शंका उठी कि मेल के गार्ड, ड्राइवर तथा अन्य लोग जब पैसेंजर गाड़ी को इस प्रकार जंगल में खड़ी देखेंगे तो उन्हें अवश्य शंका हो जाएगी, या फिर पैसेंजर गाड़ी के यात्री ही चिल्लाकर मेल ट्रेन के यात्रियों को अपनी विपत्ति की ओर आकृष्ट करें। गाड़ी बहुत पास आ चुकी थी, अधिक सोचने का समय नहीं था। पंडितजी सामने ही थे। सदस्य हर क्षण यह उम्मीद कर रहे थे कि पंडितजी हमें तुरन्त पेड़ों की आड़ लेकर मोर्चा लगाने को कहेंगे और तब दोनों ओर से गोलियाँ चलेंगी। अब मेल ट्रेन की सीटी सुनाई दे रही थी। कुछ ही क्षणों में उसका इंजन हमारी गाड़ी के पास होगा तभी पंडितजी ने आदेश दिया “सब लोग अपने-अपने स्थान पर ही रहें तथा अपने-अपने हथियारों को नीचा कर लें।” साथ ही अशफाक को आदेश हुआ कि वे हथौड़ा चलाना थोड़ी देर के लिए बन्द कर दें। सभी आदेश का पालन कर खड़े हो गए। मानो वे मेल ट्रेन को देखने के लिए ही पैसेंजर में से उतरकर खड़े हों। डाकगाड़ी सीटी देती सरटि से निकल गई। शायद डाकगाड़ी में बैठे व्यक्तियों का ध्यान भी इस पैसेंजर गाड़ी की ओर नहीं गया। अगर किसी ने देखा भी होगा तो यही सोचा होगा कि पैसेंजर गाड़ी जहाँ-तहाँ जब-तब रुकती ही रहती है। इसीलिए उन्होंने इस घटना को महत्त्व नहीं दिया होगा। वैसे भी डाकगाड़ी में बैठा यात्री अपने आपको पैसेंजर गाड़ी से उच्च स्तर का यात्री समझकर उसकी ओर हीन दृष्टि से ही देखता है। बात जो भी हो, डाकगाड़ी की तीव्र गति से जैसे संकट आया था वैसे ही वह गाड़ी की आवाज मन्द होने के साथ कम होता गया। गाड़ी निकलने के बाद पिस्तौलों और माउजरों की नलियाँ सीधी हो गईं और अशफाक उल्ला के धन का घनघोर शब्द अबाध गति से निनादित होने लगा। 

तिजोरी फूटी और उसके अन्दर का सारा खजाना क्रान्तिकारियों के कब्जे में आ गया। अब इस नाटक के अन्तिम दृश्य के साथ पटाक्षेप बाकी था और वह यह कि तिजोरी में नगद रुपया बहुत था, उसकी गठरी बाँधकर लखनऊ के लिए रवाना होना। आदेश चलने का हुआ। दूसरी यह बात भी थी वि. अब की बार रेल की पटरी-पटरी लखनऊ नहीं जाना था, बल्कि टेढ़े-मेढ़े रास्ते से शहर में प्रवेश करना था। चौक से लखनऊ में प्रवेश नहीं किया गया क्योंकि इस मार्ग पर अधिक रात तक लोगों की चहल-पहल रहती है। इस प्रकार गठरी लेकर जाते हुए किसी को देखकर कोई शंका नहीं कर सकता था। शहर में घुसते ही खजाना सुरक्षित स्थान पर रख दिया गया, साथ ही हथियार भी सुरक्षित स्थान पर भेज दिए गए। सदस्यों के ठहरने के जो ठिकाने थे वहाँ वे चले गए और आज़ाद जैसे लोगों ने रात पार्क में ही बैठकर बिता दी। 

प्रातः सभी सदस्य घटना का क्या परिणाम हुआ जानने को उत्सुक थे। गोमती-स्नान को जानेवाले लोगों का आवागमन प्रारम्भ हो चुका था, अतः सदस्य सहज ही इधर-उधर फैल गए और थोड़ी देर में ‘इंडियन टेली टेलीग्राफ’ अखबार बेचनेवाला ‘चिल्लाता सुना गया’ काकोरी के पास सनसनीखेज डकैती। अखबार की एक प्रति खरीदी गई और सबेरे के धुंधलके में कई कॉलमों में काकोरी ट्रेन डकैती का छपा समाचार पढ़ा गया। रिपोर्ट में लिखा था इसमें तीन व्यक्ति मारे गए जिसमें एक गोरा भी था। सदस्यों में से किसी को भी इन हत्याओं का पता नहीं था। गोरे के मरने के समाचार पर तो शायद कुछ नहीं, भारतीयों के मारे जाने पर सदस्यों को दुःख ही हुआ। अनुमान यह लगाया गया कि जब यात्रियों को डराने के लिए गोलियाँ चलाई जा रही थीं तो उसी समय अँधेरे में ये यात्री उतरे होंगे और उसी समय उन्हें गोली लगी होगी। परन्तु बाद में पता चला कि समाचार गलत था। इस दुर्घटना में कोई गोरा नहीं मरा था। हाँ, एक मुसलमान जो अपनी नई ब्याही बीबी को देखने उतरे थे, वे ही गोली के शिकार हो गए थे। जिस गोरे के मरने की बात छपी थी वे महाशय तो खतरा देख फर्स्ट क्लास का दरवाजा बन्द कर बैठ गए थे। उन्होंने दरवाजा तभी खोला जब ट्रेन लखनऊ पहुँच गई। इसके बाद उसी दिन बाहर से आए सदस्य अपने-अपने ठिकानों के लिए रवाना हो गए। 

इस कार्य में गोविन्दचरण कर जो लखनऊ में ही रहते थे बहुत सहायता की परन्तु वे डकैती-घटना स्थल पर नहीं गए थे। 

श्री अशफाक ने जो शंका की थी वह सच निकली। इस ट्रेन डकैती से ब्रिटिश शासन बौखला उठी, उसने इस डकैती को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। यह तो स्पष्ट ही था कि वह राजनैतिक डकैती थी। इसलिए सभी जगह गुप्तचर विभाग सजग हो ऐसे लोगों पर कड़ी नजर रखने लगा जिन पर क्रान्तिकारी होने या उनसे सहानुभूति होने का सन्देह था। मन्मथनाथ गुप्त तथा आज़ाद की निगरानी प्रारम्भ हो गई। आम लोगों में इस विषय की चर्चा होने लगी। मन्मथ जी ने इस विषय की चर्चा करते हुए लिखा है, “शायद ऐसा प्रचार कर वे यह देखना चाहते थे कि इस प्रकार के प्रचार का हम पर क्या असर होता है। क्रान्तिकारी नेता की ऐसी प्रसिद्धि तो लोगों से चन्दा प्राप्त करने में शायद सहायक हो जाए परन्तु साधारण सदस्य के लिए ऐसी प्रसिद्धि एक रोड़ा ही हो सकती है।” 

आज़ाद तथा मन्मथ ने राजेन्द्र लाहिड़ी को यह बात बताई और कहा कि अब घर छोड़कर फरार होने का समय आ गया है। परन्तु साधनहीनता के कारण लाहिड़ी कुछ भी नहीं कह सकते थे। 

आज़ाद इस प्रकार की बातों से निराश होनेवाले व्यक्ति नहीं थे और न वे संकट सामने आया देख अपने-आपको भाग्य के भरोसे यों ही छोड़ देना चाहते थे। इसलिए एक दिन उन्होंने यह इच्छा प्रकट की कि वे बहुत दिनों से घर नहीं गए हैं इसलिए घरवालों से मिलने के लिए घर जाना चाहते हैं और एक दिन आज़ाद बनारस से गायब हो गए। 

आज़ाद के विषय में एक विशेष बात यह थी कि उनके घर का पता कोई नहीं जानता था। वैसे दल के नियमों के अनुसार होता यह था जो व्यक्ति जिस किसी दल का सदस्य बनता था उसके विषय में तथा उसके घर इत्यादि के विषय में पूरी जानकारी प्राप्त कर ली जाती थी। परन्तु आज़ाद ने असहयोग आन्दोलन में जो वीरता दिखाई थी उससे प्रभावित होकर ही शायद नेता ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया कि आज़ाद के घर के विषय में जानकारी की गई है या नहीं और नहीं की गई तो क्यों नहीं की गई ? 

26 सितम्बर 1925 को यानी ट्रेन डकैती के 47 दिन बाद उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर गिरफ्तारियाँ की गईं। अनेकों के नाम वारंट निकले। आज़ाद के नाम भी वारंट था। बनारस में कई लोगों के नाम वारंट थे पर उस समय इने-गिने लोग ही पुलिस की पकड़ में आए। बाकी धर-पकड़ की सूचना पाते ही फरार हो गए। 

दशहरे का उत्सव चल रहा था। श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी भी नाटक देखने गए हुए थे। जब वे रात को अपने घर लौटे तो उन्हें घर के आसपास सन्दिग्ध वातावरण दिखाई दिया। वे चुपचाप उल्टे पाँव लौटे। लौटकर उन्होंने मनमोहन गुप्त को चारों ओर पता लगाने के लिए भेजा। जब उन्हें गिरफ्तारियों का पता चला तो वे तुरन्त बनारस छोड़कर चल दिए। राजेन्द्र लाहिड़ी भी पुलिस के हाथ न आए क्योंकि वे बम बनाना सीखने के लिए कलकत्ता गए हुए थे। आज़ाद का किसी को भी पता नहीं लगा कि वे कहाँ गए ? __ जिस दिन गिरफ्तारी हो रही थी उस दिन आज़ाद शाम को पाँच बजे काशी में ज्ञानचन्द की दुकान चौक में बैठे थे। किसी व्यक्ति ने यह सूचना दी कि आज़ाद के नाम वारंट है। खुफिया इंस्पेक्टर भवानी सहाय वारंट लेकर घूम रहा है। आज़ाद को सावधान किया गया और वे तुरन्त कचौड़ी गली के रास्ते निकलकर अपने निवास स्थान पर बैजनत्था की ओर चले गए। 10 मिनट बाद ही भवानी सहाय आठ-दस आदमियों के साथ ज्ञानचन्द की दुकान पर पहुँचा। उसने ज्ञानचन्द से आज़ाद के बारे में पूछा। ज्ञानचन्द ने पूछा आखिर आज़ाद को क्यों खोज रहे हो ? 

भवानी सहाय ने कहा मुलाकात करना है क्योंकि शाम को आज़ाद यहीं दुकान पर बैठते हैं। यह कहकर भवानी सहाय वहाँ से चल दिया। 

आज़ाद सबेरे चार बजे ज्ञानचन्द के घर पर गए। ज्ञानचन्द ने आजाद को खर्च के लिए पचास रुपए दिए और आज़ाद रुपए लेकर काशी के बाहर चल दिए। बनारस के अलावा शाहजहाँपुर के अशफाक उल्ला, प्रतापगढ़ के कुन्दनलाल तथा इटावा के श्री मुकुन्दीलाल भी 26 सितम्बर की धर-पकड़ में पुलिस के हाथ नहीं लगे। परन्तु इसके तीन मास पश्चात् मुकुन्दीलाल बनारस की कारमाइकल लाइब्रेरी से निकलते हुए पकड़े गए। श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी लगभग पन्द्रह मास पश्चात् भागलपुर में पकड़े गए और अशफाक उल्ला रूस जाने के लिए रुपयों के प्रबन्ध में लगे हुए थे कि दिल्ली में पकड़ लिए गए। परन्तु सारे हिन्दुस्तान की खाक छान डालने पर भी आज़ाद को पुलिस न पा सकी। 

काकोरी-षड्यन्त्र का मुकदमा चला। केस में इक्कीस अभियुक्त थे जिनमें से सत्रह पहले पकड़े गए और मुकदमा प्रारम्भ हो जाने के बाद श्री बख्शी तथा अशफाक उल्ला दोनों पकड़ लिए गए और उन पर अलग से पूरक मुकदमा चला। श्री चन्द्रशेखर आज़ाद 

और कुन्दनलाल जी को पुलिस नहीं पकड़ सकीं।। अभियुक्तों की ओर से पैरवी करनेवालों में श्री गोविन्दवल्लभ पंत, श्री आर.एफ. बहादुर तथा चन्द्रभान गुप्त थे। अभियुक्तों की सहायता के लिए एक डिफेन्स कमेटी बनी जिसमें सर्वश्री मोतीलाल नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी तथा जवाहरलाल नेहरू आदि थे। अभियुक्त थे-पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, (दल के नेता), श्री राजेन्द्र लाहिड़ी, श्री रोशनसिंह, श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल, श्री मन्मथनाथ गुप्त, श्री जोगेश चटर्जी, श्री मुकुन्दीलाल, श्री गोविन्दचरण, श्री राजकुमार सिन्हा, श्री रामकृष्ण खत्री, श्री विष्णुशरण दुबलिस, श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य, श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल, श्री रामदुलारे त्रिवेदी, श्री प्रेमकिशन खन्ना, श्री प्रणवेश चटर्जी तथा बनवारीलाल। श्री अशफाक उल्ला, श्री चन्द्रशेखर आज़ाद, श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी तथा कुन्दनलाल को फरार घोषित किया गया। 

यह मुकदमा 18 महीने चला। इसमें श्री रामप्रसाद बिस्मिल, श्री रोशनसिंह तथा श्री राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी की सजा हुई। शचीन्द्रनाथ सान्याल को कालापानी, श्री मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष का आजीवन कारावास, सर्वश्री जोगेश चटर्जी, मुकुन्दीलाल, गोविन्दचरण कर, राजकुमार सिनहा तथा रामकृष्ण खत्री को दस-दस वर्ष विष्णुशरण दुबलिस एवं सुरेन्द्र भट्टाचार्य को सात-सात वर्ष; भूपेन्द्र सान्याल, रामदुलारे त्रिवेदी और प्रेमकृष्ण खन्ना को पाँच-पाँच वर्ष । बनवारीलाल इकबाली गवाह बन गया था फिर भी उसे पाँच वर्ष की सजा हुई। पूरक मुकदमे में अशफाक उल्ला को फाँसी की सजा तथा शचीन्द्र बख्शी को कालेपानी की सजा हुई थी। इस निर्णय के विरुद्ध सरकार ने सात व्यक्तियों के विरुद्ध अपील की। ये थे सर्वश्री जोगेश चटर्जी, गोविन्दचरण कर, मुकुन्दीलाल, सुरेश भट्टाचार्य, विष्णुशरण दुबलिस तथा मन्मथनाथ गुप्त। इनमें से मन्मथनाथ गुप्त को छोड़ सभी की सजाएँ बढ़ा दी गईं। जिन्हें दस साल की सजा दी गई थी उनकी सजाएँ बढ़ाकर कालापानी कर दी गई और जिनकी सात साल की थी उनकी दस साल कर दी गई। मन्मथ के विषय में जज ने सजा यह कहकर नहीं बढ़ाई कि उनकी आयु कम है। 

इनमें से अनेकों को यह आशंका नहीं थी कि उनकी सजाएँ इतनी अधिक बढ़ा दी जाएंगी। परन्तु इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं थी, क्योंकि ब्रिटिश शासन काल में मजिस्ट्रेट पुलिस के हाथ की कठपुतली होते थे और वे इन्हें जैसा चाहते नचाते थे। जिन हाईकोर्टों को निष्पक्ष समझा जाता था, वे भी सरकार के दबाव में आकर उसके इच्छानुसार निर्णय देती थीं। बाइसरीगल बमकांड में भी ऐसा ही हुआ। यह मुकदमा गाडोदिया डकैती के आधार पर चला था। परन्तु डकैती के गवाहों की गवाही बिगड़ जाने से मुकदमे की नींव ही ढह गई। मुख्य गवाह ने पुलिस की कलई खोल दी, इस कारण पुलिस की सारी योजना ही ठंडी पड़ गई। उस समय सर जफरुल्ला जो देश के विभाजन के बाद कुछ समय पाकिस्तान के विदेश मन्त्री हुए थे, सरकारी वकील थे। उन्होंने सरकार को सलाह दी कि मुकदमा उठा लिया जाए। ट्रिब्यूनल ने दिल्ली-षड्यन्त्र का मुकदमा तो उठा लिया परन्तु हम पर अलग-अलग मुकदमे चलाने का आदेश दिया गया। 

हमारे वकील ने इस आदेश को अवैध कह हाईकोर्ट में अपील की। न केवल हमारे वकीलों को बल्कि मजिस्ट्रेटों को भी यह विश्वास था कि हाईकोर्ट से हम लोग छूट जाएँगे। हमारे वकील भी डॉ. किचलू तथा श्री श्यामलाल जी जैसे पंजाब के प्रसिद्ध बैरिस्टर तथा वकील थे। परन्तु निर्णय हमारे विरुद्ध हुआ, क्योंकि शासन का दबाव हाईकोर्ट के जज पर भी पड़ा। हमारे जेल सुपरिटेंडेंट एक एंग्लो इंडियन फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट मि. पूल थे। उन्होंने जब निर्णय सुना तो कहने लगे, ‘तुम लोगों के विषय में अब कुछ भी विश्वासपूर्वक नहीं कहा जा सकता।’ 

ब्रिटिश शासन-काल में यह परिपाटी ही रही है कि राजनैतिक मामलों में मजिस्ट्रेट पक्षपात कर अभियुक्तों को कड़ी से कड़ी सजा देते थे और इन गद्दारों को बाद में पुरस्कृत किया जाता था। क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास में ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिलेंगे जहाँ न्याय की डींग हाँकनेवाले इन ब्रिटिश शासकों ने अनेकों निरपराध व्यक्तियों को फाँसी पर चढ़ा दिया या जेलों में सड़ा दिया। यह सब इसीलिए किया जाता था कि नवयुवक इससे आतंकित हो विद्रोह न करें परन्तु परिणाम सदा उल्टा ही रहा। “मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की।” हर शहादत क्रान्ति की आग भड़काती रही और क्रान्तिकारियों के सिर कभी नहीं झुके। उनका जीवन-लक्ष्य तो शौके-शहादत ही होता था। वे तो क्रान्ति के होमकुंड की समिधि बनने में ही जीवन सार्थक समझते थे। 

इसी मस्ती में श्री रामप्रसाद बिस्मिल, श्री राजेन्द्र लाहिड़ी, श्री अशफाक उल्ला तथा श्री रोशन सिंह हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ गए। जनता की ओर से फाँसियाँ रुकवाने के लिए जन-आन्दोलन हुआ। फाँसी की दो तारीखें टलीं। वाइसराय से अपील भी की गई पर सब व्यर्थ। ब्रिटिश साम्राज्यवाद इन नवयुवकों के खून का प्यासा था वह भला कैसे न्याय कर सकता था। न्याय के नाम पर अन्याय कर इन्हें फाँसी पर चढा दिया गया। 

श्री राजेन्द्र लाहिड़ी को सबसे पहले फाँसी हुई। यानी औरों से दो दिन पहले 17 दिसम्बर 1927 को गोंडा जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई। 14 दिसम्बर को उन्होंने एक पत्र लिखा जो इस प्रकार था-कल मैंने सुना कि प्रिवी कौंसिल ने मेरी अपील अस्वीकार कर दी। आप लोगों ने हम लोगों की प्राणरक्षा के लिए बहुत कुछ किया, कुछ भी उठा नहीं रखा। परन्तु मालूम होता है कि देश की बलिवेदी को हमारे रक्त की आवश्यकता है। मृत्यु क्या है जीवन की दूसरी दिशा के सिवा कुछ भी नहीं। इसके लिए मनुष्य दुख और भय क्यों माने। यह तो नितान्त स्वाभाविक अवस्था है, उतनी ही स्वाभाविक जितना कि प्रातःकालीन सूर्य का उदय होना। यदि यह सच है कि इतिहास पलटा खाएगा तो मैं समझता हूँ कि हमारी मृत्यु व्यर्थ नहीं जाएगी। 

सबको मेरा नमस्कार 
आपका राजेन्द्र
हम सिरेदार जो वशद शौक घर करते हैं। 
ऊँचा सर कौम का हो नजर यह सर करते हैं।
सूख जाए न कहीं पौधा यह आज़ादी का।
खून से अपने इसे इसलिए तर करते हैं।
 

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फाँसी हुई। 19 दिसम्बर को हँसते-हँसते फाँसी के तख्ते पर झूल गए। 18 दिसम्बर की शाम को जब उन्हें दूध पीने के लिए दिया गया तो उन्होंने यह कहकर इन्कार कर दिया कि अब तो माता का दूध पिऊँगा। उन्हें मुक्ति नहीं पुनर्जन्म चाहिए था। इसीलिए कि भारत-भूमि पर एक बार फिर जन्म लेकर फिर देश की आज़ादी के लिए कुछ करें। फाँसी के दिन सवेरे स्नान-सन्ध्या-प्रार्थना आदि से निवृत्त हो अपनी माता को पत्र लिखा जिसमें देशवासियों के नाम सन्देश भेजा। फाँसी होनेवाले दिन बिस्मिल जी से मिलने के लिए श्रीयुत शिव वर्मा भी उनके छोटे भाई बनकर गए थे। उन्हें बिस्मिल जी से यह पूछना था कि पार्टी के हथियार कहाँ रखे हैं। उस समय वहाँ से पुलिसवाले भी हट गए थे और वर्माजी ने हथियार सम्बन्धी सभी जानकारी बिस्मिल जी से प्राप्त कर ली। बिस्मिल और उनकी माँ में जो वार्ता हुई उसका वर्णन वर्माजी ने ‘चाँद’ के फाँसी अंक में निम्नलिखित किया हैं-उस दिन माँ को देखकर उस भक्त पुजारी की आँखों में आँसू आ गए। उस समय उस जननी ने हृदय को पत्थर से दबाकर जो उत्तर दिया था वह भी भूला नहीं है। वह एक स्वर्गीय हृदय था, और उसे देखकर जेल-कर्मचारी दंग रह गए थे। माता ने कहा, ‘मैं तो समझती थी कि तुमने अपने ऊपर विजय पाई है किन्तु यहाँ तो तुम्हारी दशा ही कुछ और है। जीवन-पर्यन्त देश के लिए आँसू बहाकर अब अन्तिम समय तुम मेरे लिए रोने बैठे हो इस कायरता से अब क्या होगा ? तुम्हें वीर की भाँति हँसते हुए प्राण देते हुए देखकर मैं अपने आपको धन्य समयूँगी। मुझे गर्व है कि इस गए-बीते जमाने में मेरा पुत्र देश की बलिवेदी पर अपने प्राण निछावर कर रहा है। मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा बनाना था। तुम देश की चीज थे और उसके काम आ गए। मुझे इसमें तनिक भी दुख नहीं है।’ उत्तर में बिस्मिल ने कहा-‘माँ तुम तो मेरे हृदय को भली-भाँति जानती हो। क्या तुम यह समझती हो कि मैं तुम्हारे लिए रो रहा हूँ अथवा इसलिए रो रहा हूँ कि कल मुझे फाँसी हो जाएगी ? यदि ऐसा है तो मैं कहूँगा कि तुम जननी होकर भी मुझे नहीं समझ सकी। मुझे अपनी मृत्यु का तनिक भी दुख नहीं है। हाँ, यदि घी को आग के पास लाया जाए तो उसका पिघलना स्वाभाविक है। बस उसी प्राकृतिक सम्बन्ध से दो-चार बूँद आँसू आ गए। आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु से बहुत सन्तुष्ट हूँ।’ शिव वर्माजी ने जेल से लौटकर उस व्यक्ति के पास आदमी भेजा जिनके पास बिस्मिल जी ने हथियार रखे थे। उस व्यक्ति से वर्माजी ने पार्टी के हथियार देने के लिए कहा तो उस व्यक्ति ने हथियार अपने पास होने से साफ इन्कार किया। तब वर्माजी ने उस व्यक्ति से कहा कि पार्टी के हथियार आपके ही पास हैं उन्हें आपका न लौटाना पार्टी को सरासर धोखा देना है, जिसकी सजा गोली मार देने के सिवा दूसरी नहीं है। इसका परिणाम तुम्हारे लिए बहुत भयानक है। यह सुनते ही उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे दस मिनट का समय दें। यह कहकर वह घर के अन्दर गया और पाँच मिनट में ही उसने बोरे में लपेटा हुआ पार्टी का सभी हथियार लाकर वापस कर दिया। 

जब फाँसी के लिए बिस्मिल जी को लेने आए तो ‘वन्दे मातरम्’ तथा ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए वे तुरन्त उठकर चल दिए। चलते समय उन्होंने गर्जना की थी 

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे।
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे।
जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे।
तेरा ही जिक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे।
अब न अगले बलबले हैं और न अरमानों की भीड़।
एक मिट जाने की हसरत बस दिले-बिस्मिल में है ॥

बिस्मिल और उनकी माँ में जो वार्ता हुई उसका वर्णन वर्माजी ने ‘चाँद’ के फाँसी अंक में निम्नलिखित किया हैं-उस दिन माँ को देखकर उस भक्त पुजारी की आँखों में आँसू आ गए। उस समय उस जननी ने हृदय को पत्थर से दबाकर जो उत्तर दिया था वह भी भूला नहीं है। वह एक स्वर्गीय हृदय था, और उसे देखकर जेल-कर्मचारी दंग रह गए थे। माता ने कहा, ‘मैं तो समझती थी कि तुमने अपने ऊपर विजय पाई है किन्तु यहाँ तो तुम्हारी दशा ही कुछ और है। जीवन-पर्यन्त देश के लिए आँसू बहाकर अब अन्तिम समय तुम मेरे लिए रोने बैठे हो इस कायरता से अब क्या होगा ? तुम्हें वीर की भाँति हँसते हुए प्राण देते हुए देखकर मैं अपने आपको धन्य समयूँगी। मुझे गर्व है कि इस गए-बीते जमाने में मेरा पुत्र देश की बलिवेदी पर अपने प्राण निछावर कर रहा है। मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा बनाना था। तुम देश की चीज थे और उसके काम आ गए। मुझे इसमें तनिक भी दुख नहीं है।’

फाँसी-घर के दरवाजे पर पहुँचकर फिर उन्होंने सिंह-गर्जना की, ‘मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूँ।’ इसके बाद फाँसी के तख्ते पर खड़े होकर प्रार्थना की, ‘विश्वानिदेवसवितुर्रदुरितानि परासुव’…इत्यादि। यह त्रिसुपर्ण का घोष करते हुए वे गोरखपुर जेल में फाँसी के फन्दे में झूल गए। फाँसी के समय जेल के चारों ओर पुलिस का पहरा था। फाँसी के बाद उनके शव का गोरखपुर की जनता ने विराट जुलूस निकाला जिसमें हिन्दू-मुसलमान सही शामिल हुए। अनेकों ने फूलों के साथ पैसे भी निछावर किए। 

फाँसी के कुछ दिन पूर्व उन्होंने अपने एक मित्र को पत्र लिखकर भेजा था जिसमें उन्होंने लिखा था-19 तारीख को जो कुछ होनेवाला है उसके लिए मैं तैयार हैं। यह है ही क्या ? केवल शरीर का बदलना मात्र। मुझे विश्वास है कि मेरी आत्मा मातभमि तथा उसकी दीन संतति के लिए नए उत्साह के साथ काम करने के लिए शीघ्र ही फिर लौट आएगी। अशफाक उल्ला को भी 19 दिसम्बर को ही फाँसी हुई। वे उस समय अत्यन्त प्रसन्न मुद्रा में थे। वे बगल में कुरानशरीफ लटकाए लबेक और कलमा पढ़ते जा रहे थे। फाँसी के तख्ते पर चढ़कर उन्होंने फाँसी के फन्दे का बोसा लिया और उपस्थित जनता से कहा-“मेरे हाथ इंसानी खून से नहीं रँगे हैं। मुझ पर जो इल्जाम लगाया गया है वह गलत है। खुदा के यहाँ मेरा इंसाफ होगा।” इसके बाद उन्होंने गले में फाँसी का फन्दा डाला और कुरान की आयतें पढ़ते हुए इस संसार से बिदा हुए। 

जनता उनका शव शाहजहाँपुर ले जाना चाहती थी, पहले तो अधिकारियों ने मना किया परन्तु बाद में उसे आज्ञा दे दी गई। रास्ते में लाश लखनऊ स्टेशन पर उतारी गई थी, मृत्यु के दस घंटे बाद भी मुख पर बड़ी शान्ति थी मानो वे अभी गहरी नींद में सो रहे हों। मरने के पहले उन्होंने एक शेर बनाया था-

तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेदाद से।
चल दिए सूए अदम जिन्दाने फैजाबाद से।
वतन हमेशा रहे शादकाम और आज़ाद।
हमारा क्या है हम रहे रहे रहे न रहे ।

 रोशनसिंह के विषय में किसी को यह आशा नहीं थी कि उन्हें फाँसी की सजा दी जाएगी। इसलिए एक बार तो उन्हें यह निर्णय सुनकर कुछ धक्का लगा परन्तु बाद में उन्होंने बड़े धैर्य तथा शौर्य का प्रदर्शन किया। फाँसी के 6 दिन पूर्व अर्थात् 13 दिसम्बर को उन्होंने अपने एक मित्र को पत्र लिखा-इस सप्ताह के भीतर फाँसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह आपको मुहब्बत का बदला दे। आप मेरे लिए हरगिज रंज न करें। मेरी मौत खुशी का बायस होगी। दुनिया में पैदा होने पर मरना जरूरी है। दुनिया में बदफैली कर मनुष्य अपने को बदनाम न करे और मरते वक्त ईश्वर को याद करे। ये दो बातें होनी चाहिए और ईश्वर की कृपा से मेरे साथ दोनों ही बातें हैं। इसलिए मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है। दो साल से मैं बाल-बच्चों से अलग हूँ। इस बीच ईश्वर-भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट चुका है। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट-भरी यात्रा समाप्त कर मैं आराम को जिन्दगी के लिए जा रहा हूँ। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि धर्मयुद्ध में मरनेवालों की वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करनेवालों की होती जिन्दगी जिन्दादिली को जान ऐ रोशन। वरना कितने मरे और पैदा होते जाते हैं। 

आखरी नमस्ते !
 रोशन

रोशनसिंह को इलाहाबाद के मलाका जेल में फाँसी दी गई थी, उन्हें जिस समय फाँसी के लिए ले जाने लगे तो वे हाथ में गीता ले तुरन्त चल पड़े। फाँसी का फन्दा गले में पड़ने के पूर्व उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ का नारा लगाया और ‘ओम्’ का जाप करते फाँसी के तख्ते पर झूल गए। 

उनके शव का स्वागत करने भीड़ एकत्रित थी। परन्तु अधिकारियों ने इसकी आज्ञा नहीं दी। तब शान्तिपूर्वक उनके शव को श्मशान घाट ले जाकर आर्यसमाजी विधि से उसका दाह संस्कार किया। 

आज़ाद फरार हो गए

25 सितम्बर 1925 को काकोरी डकैती की धर-पकड़ के पूर्व ही आज़ाद बनारस से गायब हो गए थे। उन्होंने साथियों को तो यह बताया कि वे अपने घर जा रहे हैं परन्तु वे घर न जाकर सीधे झाँसी गए। 

झाँसी में आकर वे चुपचाप बैठ गए। किसी भी साथी को अपने वहाँ होने की सूचना उन्होंने नहीं दी। वहाँ उनके जाने की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता था, क्योंकि एक बार ही उन्हें झाँसी शचीन्द्रनाथ बख्शी के पास भेजा गया था, और यह बात श्री लाहिड़ी के सिवा और किसी को मालूम नहीं थी। इसीलिए काकोरी षड्यन्त्र के समय न कोई साथी उनका पता लगाने आया और न उन्होंने किसी को अपने वहाँ होने की खबर दी। 

आज़ाद की यह आदत थी कि जब भी कोई ऐसा साथी पकड़ा जाता जो उन्हें तथा उसकी रहने की जगह जानता होता तो वे रहने की जगह तुरन्त ही बदल देते थे और आवश्यकता हुई तो शहर भी। अपने इसी नीति के कारण अनेक लोगों के मुखबिर होने पर भी पुलिस उनका पता बरसों तक न पा सकी। उनकी चुनौती थी 

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।

साभार- अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद – विश्वनाथ वैशंपायन, राजकमल प्रकाशन

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